रविवार, जनवरी 24, 2010

व्यंग्य -बसंत में बीमारी




व्यंग्य
बसंत में बीमारी
वीरेन्द्र जैन
कभी कभी प्रभु की मति भी मारी जाती है। जैसे कोई ढीठ मक्खी बार- बार उड़ाने पर भी किसी चरित्रवान व्यक्ति की नाक पर बैठने की गुस्ताखी करती है और चरित्रवान व्यक्ति को इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता नही सूझता कि मक्खी को मार दिया जाए इसी तरह मति भी मारी जाने के लिए मजबूर हो जाती है। अब मति चाहे प्रभु की हो, प्रभुवर्ग की हो या आम जनता की, जब मारी जाना होती है सो मारी ही जाती है। जबसे मैंने यह सुना है कि उसकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता तभी से मैं अपने सारे दोष उसी पर मढ़ देने में सिद्वहस्त हो गया हूँू।

अब यह भी कोई बात हुई कि वह मुझे बीमारी दे और वह भी बसंत के मौसम में, यह उसकी मति मारे जाने का लक्षण नहीं तो और क्या है ? अरे भला आदमी बीमारी को कुछ अच्छा सा अवसर देखकर नही दे सकता था! कि जब दफ्तर में ज्यादा काम हो तब दे दे,े जब बच्चे छुट्टियों में पहाड़ घुमाने की जिद कर रहे हों तब दे दे। ऐसे रिश्तेदारों के यहॉ विवाह समारोह हो जहॉ बड़ा खर्च करना जरूरी होता है तब दे देता। लोग इस्तीफा देने तक में अवसर की अनुकूलता का ध्यान रखते हैं और यह प्रभु है कि बीमारी देने में भी वक्त नही देखता। सोचता हूँ कि मोनोपली का लाभ उठाने में जब सभी माहिर हैं तो प्रभु ही क्यों पीछे रहे, वह भी राशन के दुकानदार, विद्युत सरकारी टेलीफोन विभाग की तरह अपनी मनमानी करता रहता है।

वैसे बसंत में लोग बनावटी बीमार दिखने में भी आनंदित महसूस करते है, कोई प्रेमरोगी होने का ढोग करता है तो किसी का दिलो जिगर चाक- चाक हुआ रहता है, भले ही उसमें से रक्त की एक बूंद भी न टपकती हो। कोई अपना बैंक बेलेन्स, दुकान, जमीन, बीमा, का पैसा आदि छोड़कर शेष सारा जीवन न्यौछावर करता नजर आता है। जैसे कि जीवन नहीं नाक हो जिसे जब चाहे छिनका जा सके। कुछ घायल होने के लिए खुद सलाह देते हैं कि '' सीधा तो कर लो तीर को '' और कुछ कहते हैं कि
'' आज अपने हाथों से क्यों न कत्ल हो जाएँ,
अब तो मेरे कातिल के हाथ थक गए होंगे। ''

वैसे मैं इस बासंती मौसम में भी इनमें से किसी कोटि का बीमार नहीं था। अब चाहे आप मुझे रस हीन, हृदयहीन, निरा बौद्विक भौतिक प्राणी के रूप में उपेक्षा से देखें पर में तो अपने और जग के सारे दोषों के लिए प्रभु को जिम्मेवारी सौंपकर ऐसे खड़ा हो जाता हूॅ जैसे दूध की थैली में से दूध निकाल लेने और आखिरी बूॅद तक झटक लेने के बाद वह उजली पारदर्शी होकर कचरेदान में शोभायमान होती है।

मैं इस देश के कर्मचारियों, अधिकारियों और राजनेताओं की तरह बनावटी बीमार भी नही था जो डाक्टरों को स्वस्थ्य करने की जगह बीमार करने के लिए पैसे देते हैं। मैं बीमार था और प्रभु की कृपा से सचमुच बीमार था। सुइयॉ दिल में चुभने की जगह बाहों और कूल्हे पर चुभाई जा रहीं थीं। छाती खोलकर सीने पर तीर खाने की जगह गोलियॉ खा रहा था और वह भी मुँह के रास्ते। अधरों का रस पीने की जगह मौसम्बी का दूसरे के द्वारा निकाला हुआ रस पी रहा था। लोग अस्पताल में मुझे देखने आते, तो मुझे कम नर्सो को ज्यादा देखते। नर्सें शायद उनके हृदय में पीड़ा पहुँचा रही हों पर मुझे तो वे निरंतर मेरे कुल्हों में बदल बदलकर सुइयॉ चुभाने की पीड़ा पहुँचा रही थीं। बांसती मौसम में जब दिलों में हूक उठती है, मेरे पेट में गैस बन रही थी जिसका इस्तेमाल ईधन के रूप में भी संभव नही होता। जब कलियों के चटककर फूल बनने का समय था तब मेरा सिर चटक रहा था और पेट फूल रहा था। जब ऑखों में गुलाबी डोरे उभरने का समय था मेरी ऑखे दर्द और बुखार में लाल हो रही थीं, जब नायक से नायिका अंग अंग में पीर होने का वर्णन गा गाकर कर रही हो तब मैं उसी पीर का वर्णन कराह- कराहकर कर रहा था। जब कवियों - रसिकों के मन मचल रहे होंगे, तब मेरा जी मिचला रहा था। जब असंख्य देहैं पुष्प गंधों से महक रही थीं तब मैं पसीने में मिली एंटी बायटिक की दुर्गध से सराबोर पड़ा था। जब लोग चांदनी में नहाने को कपड़े उतार रहे थे तब में नगर निगम के द्वारा रिसाए गए प्रदूषित जल से भी स्नान कर सकने की हिम्मत नही जुटा पा रहा था। जब साहित्यप्रेमियों को ईसुरी, घनानंद, जयदेव और कालिदास याद आ रहे थे तब में एंटी बायटिक एंटीसेप्टिक, एंटासिड, एंटीइन्फ्लूएंट आदि आदि दवाइयों के ब्रान्ड नाम उनके लेने के समय उनके फायदे और नुकसान के बारे में जानने की कोशिश कर रहा था। जब लोग दिलो जान लुटा रहे थे तब मैं डॉक्टरों, दवाइयों और नर्सिग होम पर पैसे लुटा रहा था। जब नायिकाओं के विनोद पर नायकों को हॅसी आ रही थी तब मुझे खॉसी आ रही थी।

जब लोग मदिरा पीकर मस्त हो रह थे, मैं काम्पोज खाकर सुस्त हो रहा था। जिस बंसत ऋतु में कामदेव कालिदास की नायिका के प्रत्येक अंग में प्रवेश कर जाते हैं तथा ऑखों में चंचलता बनकर, कपोलों में पीलापन बनकर, कुचों में कठोरता बनकर, कमर में पतलापन बनकर तथा जॉघों में पुष्टता बनकर प्रकट होते हैं ,बिल्कुल उसी तरह मेरी बीमारी ने भी इस बसंत ऋतु में मेरे पूरे शरीर में प्रवेश कर लिया था बस, अंतर इतना था कि नायिकाओं के जिन अंगों में जिस रूप में बसंत प्रकट हो रहा था मेरे उससे भिन्न अंगों में बीमारी प्रकट हो रही थी पीलापन मेरी ऑखों में था, कठोरता पेट में थी, पतलापन कलाइयों में था और कपोलों पर रूखापन विद्यमान था।

खैर, जो हुआ, सो हुआ, जब मैं अस्पताल में वापिस आ गया हूँ तथा उसी मोनोपलिस्ट एकाधिकारवादी प्रभु से प्रार्थना है कि भविष्य में वह अपनी मति को मारी जाने से बचा ले तो बसंत को भी कुछ अपने खेल दिखाने को मौका मिले और इतनी फूल, पत्तियों, पार्क, बगीचे, नायिकाएं, उन पर आते जाते रंग उनके निरंतर विकास मान परिधान, बासंती हवाएं तथा प्रकृति का एयरकंडीशनर व्यर्थ होने से बच सकता है। गीतकारों के गीत, कवियों की कविताएं, कहानीकारों की कहानियों, ललित निबंधकारों का श्रम तथा आकाशवाणी, दूरर्दशन वालों की नौकरी बरबाद होने से बच सकती है। आखिर मितव्ययिता भी तो कोई महत्व रखती है।

मैं ये नही कहता कि बीमारी न दे और डॉक्टरों की रोजी रोटी छीन ले, पर थोड़ा वक्त और मौसम देख-दाख के दे, इतनी ही विनय है।
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वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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फोन 9425674629

बुधवार, जनवरी 06, 2010

व्यंग्य -मर्द हो जाना शीला दीदी का

व्यंग्य
मर्द हो जाना शीला दीदी का
वीरेन्द्र जैन
में जब भी बाल ठाकरे के बारे में कोई बात करता हूं तो राम भरोसे हमेशा पूछता है- ये कहाँ के बाल हैं और मुझे हमेशा बताना पड़ता है कि महाराष्ट्र की बम्बई...... नहीं नहीं मुम्बई के। ठाकरेजी की उम्र अस्सी से आगे निकल गयी है और अब ज़ेंडर भेद भूल जाना चाहिये था पर उनकी भाषा अभी तक भी जवानी के दिनों में ही अटकी हुयी है। पिछले दिनों जब उन्होंने दिल्ली की मुख्यमंत्री के उस बयान पर टिप्पणी की तो उसकी प्रशंसा के लिये उन्हें ज़ेंडर वाली शब्दावली ही मिली और उन्होंने उन्हें कांग्रेस के अंन्दर अकेला मर्द बताया। उनके अनुसार मर्द अर्थात जो बिहारियों को अपने प्रदेश से बाहर का रास्ता दिखाये। पता नहीं कि उन्होंने मध्य प्रदेश के शिव राज ठाकरे का बयान पढा कि नहीं और यदि पढा तो उन्हें कोई उपाधि क्यों नहीं दी! हो सकता है कि इसलिये नहीं दी हो कि उन्हें एक बिहारी को अपने प्रदेश से राज्य सभा में भेजने के लिये विवश होना पढा हो और अब उसे प्रदेश अध्यक्ष बनने से रोकने में उन्हें दांतों पसीने आ रहे हों।
जब राम भरोसे को मैंने बाल ठाकरे का बयान सुनाया था उसके अगले ही दिन वह सुबह सुबह मेरे दरवाजे पर आ गया और वह भी केवल अदरक वाली चाय पीने के लिये नहीं आया था अपितु रात में देखे गये अपने एक सपने को सुनाने के लिये आया। अपने सपने में वह भविष्य में चला गया था और वह देख रहा था कि देश में महिला आरक्षण कानून लागू होने के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव आ गये हैं। चुनाव में शीला दीक्षित के बेटे वाली सीट महिला आरक्षण में चली गयी है और कांग्रेस हाई कमान ने उस सीट पर शीला दीक्षित को उम्मीदवार बनाया है। दिल्ली की वे महिलायें जो अन्य में नहीं आतीं किंतु कांग्रेस उम्मीदवार के फारम भरने, प्रचार पर जाने और जीत जाने पर ढोल धमाकों के साथ नाचने गाने का राजनीतिक काम वर्षों से करती आ रहीं हैं, शीला दीदी को फार्म भरवाने के लिये नाचते गाते हुये ले जाती हैं। पीछे से धक्का मुक्की वाली परंपरा का निर्वाह करते हुये कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के साथ जब दीदी अपना फार्म निर्वाचन अधिकारी के सामने प्रस्तुत करती हैं तो वह बड़े सम्मान के साथ कहता है- मैडम यह सीट तो रिजर्व हो चुकी है।
- हाँ इसीलिये तो दिल्ली प्रदेश का मुख्य मंत्री पद छोड़ कर मुझे लोकसभा के लिये फार्म भरना पड़ रहा है वे विनम्रता से कहती हैं।
निर्वाचन अधिकारी फिर कुटिलता से मुस्कराता है और कहता है कि यह सीट तो महिलाओं के लिये आरक्षित है और आप कांग्रेस में अकेली मर्द हैं, यह सीट तो किसी महिला के लिये है इसलिये हो सकता है कि आपका फार्म रिजेक्ट हो जाये क्योंकि डाक्टर बाल ठाकरे साब ने तो सार्टिफिकेट दिया है कि आप कांग्रेस में मर्द हैं।
-अरे आप किस की बातों में आ रहे हैं इस देश में कानून का शासन चलता है कि न कि बाल ठाकरों का- वे बोलीं
- मैडम अगर ऐसा होता तो श्री कृष्ण आयोग की रिपोर्ट पर कार्यवाही के बाद उन्हें जेल में होना चाहिये था, पर वे तो मुम्बई के तानाशाह बने बैठे हैं।
........ इतने में भाजापा के हुड़दंगिये आ गये और उनके हुड़दंग से सपना टूट गया, आगे क्या हुआ पता ही नहीं चला- राम भरोसे ने अदरक वाली चाय पीते हुये बताया।
- पर राम भरोसे बाल ठाकरे तो भाजपा को भी नहीं बख्शते, तुम्हें याद नहीं कि पिछले दिनों राष्ट्रपति के चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार के खिलाफ वोट दिया था और लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा के प्रधानमंत्री पदप्रत्याशी श्री लाल कृष्ण आडवाणी को मिलने का समय नहीं दिया था। इतना ही नहीं जब भाजपा ने मायावती के साथ छह छह महीने की सत्ता लूट का प्रयोग किया था तो उस पर भी सारी दुनिया के साथ उन्होंने भी हँसते हुये कहा था कि इस छह छह महीने का प्रयोग का क्या मतलब अगर कुछ उम्मीद ही करनी थी तो कम से कम नौ नौ महीने का प्रयोग तो करना चाहिये था।
- यही तो मैं भी कहता हूं कि वे अच्छे भले कार्टूनिस्ट हैं पर राजनीति में आकर वे खुद ही कार्टून बन जाते हैं- राम भरोसे बोला।
कभी कभी रामभरोसे भी समझदारी की बात कर जाता है।
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, दिसंबर 29, 2009

व्यंग्य एक नेता का मनोबली आत्मालाप्

व्यंग्य
एक नेता का मनोबली आत्मालाप
वीरेन्द्र जैन

ये कोई मिग या मिराज विमान नहीं है कि हमसे बिना पूछे चाहे जब चाहे जितने गिरते जायें। ये राजनेताओं का नैतिक पतन भी नहीं है कि एक बार गिरा तो पहाड़ से गिरे पत्थर की तरह तलहटी तक लुढकता ही गया। ये पुलिस का मनोबल है जिसे हम किसी भी तरह गिरने नहीं दे सकते अगर उसका मनोबल गिर गया तो हमारा क्या होगा- क़ालिया ।
उसके मनोबल के बने रहने पर ही तो हम टिके हुऐ हैं वरना हमारे कामकाज तो ऐसे हैं कि लोग गली गली सौ जूते मार कर एक गिनें और फिर गिनती ही भूल जायें। पुलिस का मनोबल कोई झुमका भी नहीं है कि बरेली के बाजार में गिर भी जाय और जिसका गिरा है वो ठुमुक ठुमुक कर गाने भी गाता रहे । यह हमारे लिए चिन्ता का विषय है। इसलिए, हे! पुलसिया लोगो, हम तुम्हारा मनोबल गिरने नहीं देंगे और लगातार नीचे से हथेली लगाये रहेंगे। तुम घबराना मत, हम साधे हुये है।
हम तो उन सारे थानेदारों से जिनके ट्रांसफरों के लिए हमने ही दलाली की थी, रोज फोन करके पूछते रहते हैं- ' कहो शुक्ला जी कैसे हो ? ''
'' ठीक है, कौन बोल रहे हैं?'' थानेदार कहता है।
'' अरे हमें नहीं पहचाने, हम राम संजीवन त्रिपाठी बोल रहे हैं, गृहमंत्री जी के साले''
'' अरे त्रिपाठी जी दण्डवत प्रणाम, आपकी आवाज आज कैसी आ रही है ''
'' अब उम्र है भईया, फिर दो ढ़ाई पैग भी भीतर पड़े हुऐ है। अच्छा तुम ये बताओं कि कहीं तुम्हारा मनोबल तो नही गिर रहा ''
'' अरे नहीं त्रिपाठी जी पर यहॉ रिश्वत का रेट बहुत गिरा हुआ है, लगता है कि सालभर में ट्रासर्फर में खर्च किये हुऐ पैसे भी नही निकलेंगे'' ।
'' अरे निकलेंगे भई, सब निकलेंगें वो भदौरिया कोई उल्लू तो नहीं था जो इस थाने के पॉच लाख बोल के गया था। वो तो तुम अपने जातभाई हो इसलिए तुम्हें साढे चार में दिलवा दिये। कभी कभी दो चार डकैतियॉ डलवा दिया करो। ये जो दो नम्बर की कमाई वाले लोग हैं इनका वजन हल्का करते रहना है। ये तो पूरी लुटाई की रिपोर्ट भी नहीं लिखवा पाते वरना इनकम टैक्स वाले पूछने लगेगे कि कहॉ से आया ''
'' मुझे तो डर लगता है ''
'' इसका मतलब तुम्हारा मनोबल गिर रहा है। हम ऐसा करते हैं कि एकाध उठे हुये मनोबल वाला असिस्टेंट भिजवाये देते हैं जो थाने में पकड़ कर एकाध की वो मरम्मत करेगा कि साला वहीं टें बोल जाय। इससे तुम्हारा भी मनोबल उठ जायेगा। फिर उसकी महरारू रोती हुई आयेगी सो तुम वही थाने में उसके साथ थोड़ा बहुत बलात्कार कर डालना जिससे तुम्हारा मनोबल तो बल्लियों उछलेगा''।
'' पर त्रिपाठी जी नेतागिरी ?
'' अरे शुक्ला तुम येई पेंच तो नई समझे। वहॉ पै ससुर नेतागिरी करने वाला कोई नहीं है। वो भदौरिया इसी खातिर तो पॉच दे रहा था, वो तो हम तुम्हारी खातिर अपना नुकसान कर लिये। वहॉ ससुरी नेतागिरी वाली दो ही तो पार्टियॉ है सो एक तो तुम हमारे आदमी हो और दूसरी पार्टी वाले हमारे फूफा के समधी होते हैं। बस कभी कभी उनका आदर सत्कार कर दिया करो, मन्दिर बनवाने के लिए चन्दा दे दिया करो और उनके काम के लिए एकाध गुण्डे को छुट्टा छोडे रखों, बस हो गया फिर जो चाहे सो करो। तुम्हारा राज । ''
'' पर अखबार वाले ''
'' भई शुक्ला, चींटियों का मुंह कितना सा, दो चार दाने डाल दो तो अघाये अघाये फिरते हैं। ''
इस तरह हम रोज उनका मनोबल बना कर रखते है जिसका मनोबल गिरा वो पुलिस के काम का नहीं रहा। एक छुकरिया बहुत मानव अधिकार- मानव अधिकार करती थी सी एक दिन हमने एक कानिस्टबल से कह रह उसी का मनोबल गिरवा दिया। अब भूल गई मानव अधिकार। पुलिस के अधिकार के आगे काहे का मानव अधिकार ।
हमारा तो कहना है कि शासन ऐसा हो कि चोर उचक्के, अपराधी, गुण्डे सब डर कर रहें, पर पुलिस से डरकर रहें। अगर वे जनता से डरने लगे तो फिर पुलिस को कौन पूछेगा। पुलिस का काम ही लोगों को डरा कर रखना है इसीलिए तो उनका मनोबल उठा कर रखा जाता है। जिसका मनोबल उठा हुआ हो उससे सब डरते हैं। दूसरी तरफ गिरे हुये मनोबल वाले को सब लतिया कर चलते जाते है। हम विरोधियों को इसीलिए तो धिक्कारते हैं क्योंकि वे जरा जरा सी बात पर पुलिस का मनोबल गिराने लगते हैं। अरे भई पुलिस को डन्डे फटकारते रहना चाहिए अब इसमें रस्ता चलते लोगों को दो चार डन्डे लग जायें तो इसमें रोने धोने की क्या बात है। कहते हैं उन्हें संस्पेंड कर दो। हम ऐसा नही होने देते, इसी से तो उनका मनोबल बना रहता है कि उनके पीछे कोई तो है।
मनोबल वो कलफ है जिससे पुलिस की वर्दी कड़क रहती है। मनोबल वह पालिश है जिससे उनके जूते चमकते रहते हैं। मनोबल वह ब्रासों है जिससे उसकी बैल्ट के बक्कल सोने जैसे दिखते हैं। इसी पुलिस की दम पर तो हम करोड़ों के कमीशन खा रहे हैं सरकारी जमीनें बेच रहे हैं, नकली स्टाम्प बिकवा लेते हैं सरकारी कारखानों को खाने में लगे रहते हैं फिर उसे कोड़ियों के मोल कबाड़ियों को तौल देते है। ऐसी पुलिस का मनोबल हम कैसे गिरने दे सकते हैं। हरगिज नहीं। हम नही गिरने देगे।
पुलिसियो, अपना मनोबल उठाये रखो , हम तुम्हारे साथ है।

वीरेन्द्र जैन
2-1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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सोमवार, दिसंबर 28, 2009

व्यंग्य जिसने की बेशरमाई उसने खाई दूध मलाई

व्यंग्य
जिसने की बेशरमाई उसने खाई दूध मलाई
वीरेन्द्र जैन
जैसा मेरा अनुमान था कि राज नाथ अनाथराज हो गये हैं और उन्हें लगभग वैसे ही अन्दाज़ में बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है जैसा कि रावण ने विभीषण को दिखाया था, वह गलत साबित हुआ। कल जब वे दो उंगलियाँ उठा कर अंग्रेजी की वी बना विक्टरी का संकेत देते हुये दिखाई दिये तब लगा कि उनके लिये अभी भी कुछ काम बाकी बचा हुआ था-
दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं
दोस्तों की मेहरबानी चाहिये
राजनाथ की ये दो उंगलियाँ जो पिछले कुछ दिनों से अपने दुश्मनों की जीत का शोर सुनने से बचने के लिये दोनों कानों में डालने के काम आ रही थीं हवा में हैं। यह अवसर उनको झारखण्ड चुनाव परिणाम आने के बाद गुरूजी अर्थात शिबू शोरेन की कृपा से मिल सका है जिन्होंने कह दिया था कि हमें मुख्यमंत्री बनाने के सारे रास्ते खुले हैं जिसे भी बनाना हो चला आये। सो नेह निमंत्रण पा कर भाजपा दौड़ी दौड़ी चली आयी और झारखण्ड के जंगलों में गूंजने लगा- मैं तुझसे मिलने आयी, मन्दिर जाने के बहाने।
इन्हीं राजनाथ ने झारखण्ड के चुनाव हो जाने के बाद कहा था कि हम अटल बिहारी वाजपेयी के जन्म दिन पर उपहार के रूप में कि झारखण्ड में सरकार देंगे। फर्क केवल इतना रह गया कि बीमार वाजपेयी को भाजपा नहीं अपितु भाजपा के समर्थन वाली सरकार दी है और उन शिबू सोरेन की सरकार दी है जिनको केन्द्र में मंत्री बनाने पर उसने हंगामा खड़ा कर दिया था और दागियों को मंत्री बनाये जाने के खिलाफ सदन नहीं चलने दिया था। पहले अगर उनके दल को कोई आरोपी समर्थन देता था तो वे कहते थे कि गंगा में मिलकर गन्दे नाले भी पवित्र हो जाते हैं, पर हे अनाथ अब ये तथा कथित गंगा कहाँ मिल रही है?
संघ द्वारा स्थापित कठपुतली अध्यक्ष के प्रेस कांफ्रेंस की स्याही भी नहीं सूख पायी थी जिसमें उन्होंने शेखी बघारी थी कि सता की राजनीति तो होती रहेगी पर हम राजनीति को समाज से जोड़ने की बात करते हैं, उन्हींने अपने पहले काम के रूप में भाजपा को शिबू सोरेन से जोड़ दिया और उनके विधायक दल के नेता कहने लगे कि भले ही उन्होंने शिबू सोरेन को दागी बताते हुये चुनाव लड़ा था पर [चुनाव परिणाम आने के बाद]अब हमारी सोच यह है कि सोरेन कोर्ट से बरी हो चुके हैं इसलिए दागी नहीं हैं। ये बात अलग है उनकी यह बात आम जनता को तो छोड़िये उनके ही एक सांसद को हज़म नहीं हुयी और झारखण्ड के गोड्डा क्षेत्र के सांसद निशिकांत दुबे ने अपना स्तीफा श्रीमती सुषमा स्वराज और संगठन महामंत्री रामलाल को भेज दिया है तथा मीर कुमार को भी भेजे जाने की अफवाह फैलवा दी है।
अब ये कौन बतायेगा कि ये सत्ता की राजनीति है या समाज की राजनीति है! हो सकता है कि अगले कुछ वर्षों में तो वे नीतीश भक्ति की तरह इतनी गुरुभक्ति दिखा दें कि संघ के असली गुरूजी को ही भूल जायें। यदि भाजपा नेता किसी शर्मप्रूफ क्रीम के विज्ञापन हेतु माडल के रूप में काम करने लगें उनकी सफलता की बहुत सम्भावनायें हैं। स्लोगन कुछ ऐसा हो सकता है- जिसने की शरम, उसके फूटे करम, जिसने की बेशरमाई, उसने खाई दूध मलाई। कहो गडकरी भाई- हाँ राजनाथ भाई।
राम भरोसे हमेशा की तरह मुझसे असहमत है, वह कह रहा था कि भाजपा के नये अध्यक्ष सत्ता की राजनीति में भरोसा नहीं करते। वे अपने महाराष्ट्र में पार्टी को हरा कर आये हैं तो पार्टी के अध्यक्ष बन गये। सुषमा स्वराज के राज्य हरियाना में पार्टी साफ हो गयी तो वे विपक्षी दल की नेता बन गयीं। आडवाणी ने पूरे देश में पार्टी को हरवा दिया सो वे दोनों सदनों के सद्स्यों के नेता बन गये। यही तो उदाहरण है कि पार्टी को सत्ता से दूर करो पद से जुड़ो। हो सकता है कि नये अध्यक्ष का नया फार्मूला हो आखिर उन्होंने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस पहला महत्वपूर्ण वाक्य यही तो बोला कि आइ एम कमिटिड फोर कंस्ट्रक्शन।
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, दिसंबर 25, 2009

व्यंग्य- बढे बालो से योग प्रशिक्षण के रिश्ते

बढ़े बालों से योग प्रशिक्षण के रिश्ते
वीरेन्द्र जैन
इन दिनों योग बहुत फरफरा रहा हैं। जिसे देखों वही हाथ, पाँव, गर्दन, पेट, पीठ, आदि ऊँचा नीचा आड़ा तिरछा करने में जुटा हुआ है। लोग सासों पर साँसे लिये चले जा रहे है। और ज़ोर ज़ोर से लिए चले जा रहे हैं। अब कोई नहीं कहता कि गिनी चुनी साँसें मिली हैं अगर जल्दी जल्दी ले लोगों तो जल्दी राम (देव) नाम सत्य हो जायेगा। ऐसा लगता है जैसे- जल्दी जल्दी लेकर साँसों का हिसाब रखने वाले को गच्चा देने की कोशिश कर रहे हों। वह पूछता होगा कि आज कितनी लीं, तो योग करने वाला, सात हज़ार लेकर कहता होगा कि, पाँच हज़ार ही ली हैं महाराज !
बच्चे, बूढ़े, औरतें सब एक छोटे से ड्राइंग रूम में टी.वी. के सामने लद्द पद्द हुऐ जा रहे हैं किसी की टाँग उत्तर को जा रही है तो किसी का सिर रसातल की ओर जा रहा है। शरीर का कोई भी भाग किसी भी दिशा में असामान्य तरीके से मोड़ा जाये या मोड़ने का प्रयास किया जाये तो उस क्रिया को किसी आसन का नाम दिया जा सकता है, जिसे वे लोग कर रहें हैं। चैन की नींद सोये हुए बच्चों को उठा कर उससे योग कराया जा रहा है तथा गुस्से में वह जो लात घूँसे फटकार रहा है उसे शायद लन्तंग फन्तंग आसन कहते होंगे । बाबा जी देख सकते तो धीर गंभीर स्वर में बतलाते कि यह आसन बहुत उपयोगी है, इसके करने से शरीर में उत्पन्न आवेश बाहर निकलता है और थोड़ी देर में चित्त शांत हो जाता है। मैने भी एक बार मेहमाननवाज़ी करते हुये मेज़बानों की खुशी के लिए उनके साथ टी.वी के सामने आसन करने का धर्म निभाया था पर ऐसा करते समय मेरी लात सीधे बाबा जी के मुँह में लगी और वे अर्न्तध्यान हो गये। मैं समझा कि बुरा मान गये हैं और मुझे शाप देने के लिए शब्द कोश देखने चले गये होंगे पर समझदार मेज़वान ने अपने अनुभवी परीक्षण के बाद बताया कि ऐसा नहीं है अपितु सच्चाई यह है कि तुम्हारे पाद प्रहार से टी.वी फुक गया है। रही बाबा जी की बात सो वे अभी भी पड़ोसी के यहाँ सिखला रहें है। मैने शर्मिन्दा होना चाहा पर सच्चे मेजबान ने मुझे शर्मिन्दा नही होने दिया अपितु छत पर सूख रहें मेरे एक जोड पेंट शर्ट को बन्दर द्वारा ले जाना घोषित कर दिया।
योग में हस्त एवं पद का यहाँ वहाँ फटकारे जाने को तो किसी न किसी र्तर्क में फिट किया जा सकता है पर उसका बालों से क्या सम्बंध है ये मैं अभी तक नहीं समझ पाया। मैंने टी.वी. पर जितने भी योग गुरू देखे उनके बालों और दाढी को स्वतंत्रता पूर्वक फलते फूलते देखा। यदि किसी की दाढ़ी नही बड़ी होती तो बाल बड़े होते हैं। मुझे नहीं पता कि क्या बालों से हाथ पाँव ठीक चलते हैं या साँसें तेजी से बहती हैं। आखिर कुछ तो होगा जो ये लोग बाल और दाढ़ी बढ़ाये मिलते हैं। हो सकता है ठीक तरह से योग करने पर बाल तेजी से बढ़ते हों। मुढ़ाने की प्रथा ने भी इसी कारण अपना स्थान बनाया होगा। एक बार सफाचट करा लो और योग करो, तो फौरन बढ़ जायेगे।
योग अब धर्म का स्थान ग्रहण करता जा रहा है। पहले अतिक्रमण करने के लिए किनारे की ओर धर्मस्थल बना लिया जाता था जिससे धार्मिक अनुयायी उस अतिक्रमित स्थल की रक्षा करना अपना धर्म समझते थे। अब लोग अतिक्रमण की जगह योगाश्रम खोल लेते हैं और नगर निगम के अतिक्रमण हटाओं दस्ते के आने पर भारतीय संस्कृति और योग विद्या पर किया गया आक्रमण बताने लगते हैं। कुछ तो इसे कोका कोला आदि विदेशी कम्पनियों के इशारे पर की गई कार्यवाही निरूपित करते हुये इतना कोलाहल करते हैं कि अतिक्रमण की बात ही तूती की आवाज़ होकर रह जाती है। आप उद्योग खोलकर कर्मचारियों का वेतन दबा सकते हैं या चाहे जब उन्हें नौकरी से बाहर कर सकते हैं । यदि कोई यूनियन बनाये और अपनी मजदूरी माँगे तो योगाश्रम का बोर्ड आपकी रक्षा करेगा। आप कह सकते हैं कि हमारे योग के विरोध में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के ऐजेन्ट भारतीय संस्कृति के खिलाफ षडयंत्र कर रहें है।
योगी होने से आप विदेशी कम्पनियों के निशाने पर होने का ढोंग फैला जेड श्रेणी सुरक्षा माँग सकते हैं और विदेश जाने के मौके पा सकते हैं। इमरजैसी में धीरेन्द्र ब्रम्हचारी ने भी खूब योग सिखाया था पर बाद में देशी बन्दूकों पर विदेशी मुहर लगाने वाला उनका कारखाना चर्चा में आया था। चन्द्रास्वामी तो एक प्रधानमंत्री के धर्मगुरू थे व धर्मज्ञान देने अनेक मुस्लिम देशों के प्रमुखों के मेहमान होते थे। मेरी कामना है कि प्राचीनतम योग की ताज़ा हवा खूब देर तक चले और लोगों के कब्ज ढीले करे। ऐलोपेथी दवाओं की जगह आयुर्वेदिक दवाओं की दुकानें चलें तथा उन दवाओं को बनाने वाली कंम्पनियों का मालिक कोई योग गुरू ही हो।
वैसे बाबा के योग सिखाने वाले कार्यक्रम के दोनों सिरों और बीच में उन कंपनियों के विज्ञापन दिखाये जा सकते हैं जिनमें बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के उत्पादनों को बेचने के लिए सुन्दर ललनाएँ अपने रूप का छोंक लगा रही हों। आप मान सकते हैं कि इन ललनाओं ने अपना रूप योग से ही सँवारा होगा।

सोमवार, दिसंबर 21, 2009

व्यंग्य मुद्रा गाथा

व्यंग्य
मुद्रा गाथा
वीरेन्द्र जैन
वैसे तो मुंह से मुद्रा शब्द का उच्चारण होते ही मन में सोने के नही तो लोहे के सिक्के खनखनाने लगते हैं किन्तु मेरा आशय उन मुद्राओं से न होकर मनुष्य की मुद्राओं से है।
योग और ध्यान में मुद्राओं को विशेष महत्व प्रदान किया गया है। योग जिसे आत्मा का परमात्मा से जोड़ माना जाता है वह भी मुद्रा के बिना सम्भव नहीं है। मुझे तो लगता है कि शायद इसी गलतफहमी में लोग परमात्मा से जुड़ने के लिए मुद्राएं जोड़ कर रखने लगे होगें। जिस प्रकार महापुरूषों ने अपने अपने पंथ अलग अलग बना रखे हैं। उसी तरह उनकी मुद्राऐं भी अलग अलग हैं। बुद्व की मूर्तियां उनकी मुद्रा से ही अलग पहचान में आ जाती हैं। जिस तरह जीता हुआ आदमी दो उंगलियों से अंग्रेजी का वी बनाकर विजयी होने की सूचना देता है उसकी प्रकार बुद्व की मूर्तिया तर्जनी उंगली और अंगूठे को जोडकर ( और शेष तीन उंगलियों को खड़ी रख कर) जिस शून्य का निर्माण करते हैं उससे वे अपने शून्यवाद का उपदेश देते हुए प्रतीत होते है। महावीर और बुद्व की मूर्तियों में उनके बालों के घुंघराले होने से पता चलता है कि ज्ञान की प्राप्ति के लिए केश विन्यास का क्या महत्व है।
हिन्दी साहित्य के महान साहित्यकारों ने भी अपनी रचनाओं में अपनी अपनी मुद्राओं की सूचनाएं दी है। जिन साहित्य कारों ने अपनी मुद्राओं की सूचनाए नहीं दी हैं उन पर रिसर्च करने वाले भविष्य में उनकी मुद्राएं भी खोज निकालेंगे। कबीरदास अपने फक्कड़पने के अन्दाज में ही अपनी मुद्रा और मुद्रा स्थल का जिक्र करते हुए कहते हैं कि -
कबिरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ'
कबीर की मुद्रा, खडे 'होने' ही नही, खडे 'रहने' की मुद्रा है। वे यह मुद्रा सूने जंगल में जाकर नही बनाते अपितु बीच बाजार में बनाते हैं तथा सहारे के लिए हाथ में लाठी भी लिये रहते है। भक्तिकाल की मशहूर कवियत्री मीरा बाई राज परिवार से हैं और वे खड़े होकर नही रह सकतीं। बाजार से तो वैसे भी उनका कोई सम्बंध नहीं क्योकि वे चादर बनाती नहीं, ओढ़ती हैं। इसलिए मीरा बाई की मुद्रा बैठने की मुद्रा है वे कहती हैं कि –
संतन ढिंग बैठ बैठ लोक लाज खोई ।
कबीर और मीरा की मुद्राओं का अन्तर उनकी पृष्ठभूमियों का अन्तर है। कबीर मेहनतकश हैं।,इसलिए अपना उत्पाद बेचने हेतु बाजार में खडे हैं- मीरा राजपरिवार से हैं इसलिए संतो के पास बैठी हैं और बेच कुछ नहीं रहीं हैं, खो रही हैं।
दाग साहब की मुद्रा उठने बैठने की मुद्रा है। वे कहते हैं- हजरते दाग जहॉ बैठ गये- बैठ गये। वे बैठना पसन्द करते हैं पर बैठ पाना नसीब में नहीं है। इसलिए जब बैठ पाते हैं तो बैठ ही जाते हैं।
मिर्जा गालिब चलकर रहने में भरोसा करते हैं। उन्हें एकान्त तो पसन्द है, पर जम कर बैठना पसन्द नहीं। वे कहते हैं- रहिये अब ऐसी जगह चलकर जहॉ कोई ना हो। गालिब का चलकर रहना' शोर से चलकर तनहाई में जा बसना नहीं है बल्कि वे गतिमान ही बने रहना चाहते हैं इसलिए जहॉ कोई भी न हो वहॉ भी वे चलकर ही रहना चाहते हैं। इशक के दरिया में भी वे डूब कर चलते हैं- पर चलते है- इक आग का दरिया है और डूब कर जाना है। अगर उन्हें बैठना भी पडता है तो वे उसमें भी दोष खोजते रहते हैं और पछताते रहते हैं कि - इशक ने गालिब निकम्मा कर दिया। बरना वह भी आदमी था काम का।
गालिब से अलग कुछ ऐसे भी शायर हुए हैं जिनकी मुद्रा ही आराम की मुद्रा रही है वे न केवल खुद आराम पसन्द करते हैं अपितु दूसरों को भी सलाह देते है कि ''आराम बड़ी चीज है मुंह ढक के सोइये'।
घुटने मोड़कर आधे पैरों को आसन बना लेने वाले गांधी जी की चर्खा कातने की अलग ही मुद्रा है तो चन्द्रशोखर आजाद की मुद्रा मूंछ ऐंठने की है। अम्बेडकर उंगली उठाकर समाज के दोषियों को इंगित करते रहते है तो एकदम सीधे खड़े रहने में और सिर को ताने रहने में विवेकानन्द का कोई सानी नहीं है।
आधुनिक काल के साहित्याकारों में बड़े बडे बालो के साथ सुमित्रानन्दन पंत की मुद्रा दूसरों से अलग हटकर है।इस समय नीरज जैसे- लोकप्रिय कवि की अपनी मजबूरी है जब वे कहते है कि “एक पॉव चल रहा अलग अलग और दूसरा किसी के साथ है”। पता नहीं यह कौन सी मुद्रा होगी!
हां मुद्रा राक्षस के बारे में मुझ जैसे देवता आदमी में कुछ कहने का साहस नहीं है।

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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शनिवार, दिसंबर 05, 2009

व्यंग्य एकवचन को बहुवचन बनाने वाले

व्यंग्य
एक वचन को बहुवचन बनाने वाले
वीरेन्द्र जैन
मैं परेशान हूं । मेरी यह परेशानी व्याकरण पर आये संकट के कारण है। आजकल आचरण की तरह व्याकरण भी क्षरण होने की ओर अग्रसर है। आचरण की चिंता करना मैंने छोड़ दिया है क्या व्याकरण की चिंता भी छोड़ देना पड़ेगी?
हमारे देश में भी आजकल कुछ ऐसे ही व्याकरण बदलने वाले लोग सक्रिय हैं जो एक वचन को बहुवचन और बहुवचन को एक बचन बनाते रहते हैं। जब हमारे गड़बड़ियाजी को कोई बात पसंद नहीं आती तो वे कहते हैं कि देश के पिचासी करोड़ हिन्दू व्यथित हैं। जब उन्हें धमकाना होता है तो कहने लगते हैं कि देश के पिचासी करोड़ हिंदू इस अपमान को सहन नहीं करेंगे।
मैं राम भरोसे के घर जाकर उससे पूछता हूँं- राम भरोसे तुम हिंदू हो?
''क्यों तुम्हें क्या रिश्ता करना है?'' वह हमेशा की तरह उल्टा जबाब देता है।
''अरे नहीं भाई बताओ तो, और रिश्ते की बात होती तो पहले में जाति पूछता गोत्र पूछता उपगोत्र पूछता''
''पहले तुम बताओ कि तुम्हें मेरे हिन्दू होने पर संदेह क्यों है?''
'' चलो ठीक है मान लिया कि तुम नि:सन्देह हिंदू हो अब यह बताओ कि क्या तुम व्यथित हो?''
'' अगर तुम पागल हो तो मैं व्यथित हूँ'' वह जैसे को तैसे के अन्दाज में उत्तर देता है
'' तुम तो हमेशा मिर्चें खाये रहते हो। अरे भाई गड़बड़ियाजी ने कहा है कि पिचासी करोड़ हिंदू राम मन्दिर न बनाये जाने के कारण व्यथित और आक्रोशित हैं''
'' गड़बड़िया ने क्या हिंदुओं का ठेका ले रखा है और वह किससे पूछ कर आये हैं, मैं अगर व्यथित भी होऊंगा तो गड़बड़िया को फोन करके नहीं बताऊंगा।''
''अरे भाई वे विश्व भर के हिंदुओं के अर्न्तराष्ट्रीय महा सचिव हैं''
''उन्होंने किस हिंदू से वोट लेकर यह पद पाया है और अगर वोट लेकर भी पाते तो कौन उन्हें वोट देता और जो देता वो और चाहे कुछ होता पर सच्चा हिंदू तो नहीं होता?''
ये बीमारी केवल गड़बड़िया की ही नहीं है यह बीमारी मौलाना सुपारी की भी है। जब उनके पेट में दर्द होता है तो वे कहते हैं कि मुसलमानों के पेट में दर्द हो रहा है। मेरे कई मुसलमान दोस्त तरह तरह से अपना पेट दबा कर देखते हैं और अपने आप से पूछते हैं कि हमारे पेट में तो दर्द नहीं हो रहा ये मौलाना सुपारी हमारे पेट में कैसे घुस रहे हैं! असल में होता यह है कि अपनी लड़ाई को वे दूसरों के कंधों पर बन्दूक रख कर लड़ने के आदी हो चुके हैं। दूसरी तरफ अगर कोई मुसलमान परिवार में पैदा हुआ लड़का कोई आतंकवादी हरकत करता है तो गड़बड़िया एन्ड कम्पनी कहती है कि मुसलमान इस देश की समस्याओं की जड़ में हैं। यदि गोधरा में ट्रेन की आगजनी में किन्हीं मुसलमानों पर संदेह होता है तो वे निर्दोष मुसलमानों के हजारों घर जला देते हैं लाखों की सम्पत्ति लूट लेते हैं व तीन हजार मुसलमानों को मार देते हैं। इन्दिरागांधी को धोखे से मारने वाले एक सरदार की सजा दिल्ली के पाँच हजार निर्दोष सिखों को झेलना पड़ती है। उत्तरप्रदेश बिहार से आने वाले सारे लोग मराठी बोलने वाले किसी भी गोडसे से ज्यादा बुरे हो जाते हैं।
सच्ची बात तो यह है कि जिस तरह प्राइवेट बसों में लिखा रहता है कि यात्री अपने सामान की रक्षा स्वयं करें उसी तरह हमारी सरकार की पुलिस और कानून व्यवस्था पर किसी का भरोसा नहीं रहा कि उसके सहारे उन्हें विधि सम्मत न्याय मिल जायेगा। वे अपनी रक्षा स्वयं करने के चक्कर में लोगों को एकत्रित करने के लिए झूठे सच्चे आधार पर गिरोह बनाते रहते हैं। कोई धर्म के आधार पर बनाता है तो कोई भाषा के आधार पर, कोई जाति के आधार पर बनाता है तो कोई क्षेत्र के आधार पर। कहीं गाँव आधार बन जाता है तो कहीं मुहल्ला, कहीं कालेज आधार बनता है तो कहीं हॉस्टल। तिलक हॉस्टल वाले कहते हैं कि टैगोर हास्टल वाले लड़के बहुत बदमाश हैं।
मेरे कस्बे में पुरानी दावतों के कई किस्से बहुत रोचक ढंग से और कुछ कुछ अतिरंजित करके सुने सुनाये जाते रहे हैं। इनमें से एक था कि पंगत में बैठे मुखर किस्म के लोगों को कोई व्यंजन चाहिये होता था तो वो परोसने वाले को जोर से आवाज लगाता हुआ अपने पड़ोस में बैठे व्यक्ति की पत्तल की ओर इशारा करके कहता था कि- भइया की पत्तल में रसगुल्ला तो परोसो इस लाइन में रसगुल्ले आये ही नहीं! उसके परोस देने के बाद वो धीरे से अपनी पत्तल की ओर इशारा करते हुये कहता था कि दो इधर भी डाल दो। उनका वह पड़ोसी केवल मुस्करा कर रह जाता था और अपनी पत्तल के रसगुल्ले भी उनकी पत्तल में सरका देता था।
अगर किसी मुसलमान दुकानदार का अपने पड़ोसी हिन्दू दुकानदार से झगड़ा हो जाता है तो वो कहता है कि मुसलमानों पर बड़ा दबाव है और हिंदू दुकानदार भी ऐसी स्थिति में सीधा बजरंग दली बनने लगता है ताकि हिंदू धर्म की रक्षा के पवित्र काम में उसकी दुकान के हित भी सुरक्षित रहें। अगर जरूरत से ज्यादा मुनाफा लेने वाला दुकानदार सिंधी निकलता है तो फिर गृहणी कहने लगती है कि तुम सिंधी की दुकान पर गये ही क्यों! सिंधी दुकानदार तो होते ही ऐसे हैं। पर जब रिलाएंस के शेयरों के भाव चढने से अग्रवाल साब को फायदा होता है तो वे जैनसाब से कहते हैं कि धन्घा करना तो सिंधी ही जानते हैं।
हमारे बड़े बड़े उपदेशक कहते कहते मर गये कि- हंसा आये अकेला हंसा जाये अकेला- पर धरती पर रह कर हंसा सिंधी हिंदू सिख या मुसलमान होता रहता है और अपने साथ दूसरे सैकड़ों लोगों को भी साथ में ले जाता है। जो लोग प्रभु की इस माया पर बहुत चकित चकित से रहते हैं कि किन्हीं दो आदमियों की शक्लें एक जैसी नहीं होतीं व अंगूठा इसलिए लगवाते हैं क्योंकि किन्हीं दो लोगों की अंगूठा निशानी एक जैसी नहीं होती वे ही सारे सरदारों के एक साथ बारह बजवाते रहते हैं और ऐसे में उन्हें भगतसिंह की याद भी नहीं आती जिसकी टक्कर का दूसरा कोई नहीं हुआ।
वीरेन्द्र जैन
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