बुधवार, दिसंबर 12, 2012

व्यंग्य- टंकी का गिरना उर्फ चप्पलों कीचाह में अनुरक्त


व्यंग्य
टंकी का गिरना उर्फ चप्पलों की चाह में अनुरक्त
वीरेन्द्र जैन
       पिछले दिनों मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आधी रात के दौरान एक टंकी गिर गयी थी जिससे सात लोगों की मौत हो गयी थी व 33 लोग घायल हो गये थे। टंकी पानी की थी और उस पानी की टंकी के नीचे लोगों ने घर बना लिए थे और सरकार ने स्कूल बना लिया था। लोग अतिक्रमणकारी थे पर सरकार तो सरकार है वह कुछ भी कर सकती है। पर गलती उन लोगों की थी जिन्होंने रहने के लिए घर न होने के कारण टंकी को ही छत मानकर उसके पास अपनी झोपड़ी डाल ली थी और आठ डिग्री तापमान वाली सर्दी की रात में अपने झोपड़े और बाल बच्चों समेत टंकी के नीचे दब गये। सरकार की कोई जिम्मेवारी नहीं है कि वे टंकी के नीचे वर्षों से कैसे रह रहे थे और उन्हें वे छोटे छोटे घर भी क्यों नहीं मिल सके जिसके विज्ञापन पर करोड़ों रुपया लुटा कर अपने आप को गरीबनवाज बताती रहती है। अगर उन्हें सही जगह रहने और उसके पास ही रोजगार के अवसर मिले होते तो वे टंकी के नीचे क्यों रहते। सरकार की कोई जिम्मेवारी नहीं बनती कि वह देखे कि टंकी के बनने में ठेकेदार ने कितना पैसा इंजीनियर के रास्ते मंत्रीजी तक पहुँचाया और उसके जर्जर हो जाने के बाद भी उसको उपयोग में क्यों लाया गया।

       पर क्षमा करें सरकार चूंकि एक हिन्दुत्व वाली पार्टी की है इसलिए उसका काम तो लोगों को तीर्थयात्रा कराना है ताकि वे अपना परलोक सुधारने के चक्कर में इन्हें वोट देकर इनका इसी लोक में उद्धार कर दें। विधानसभा में नगरीय प्रशासन मंत्री के बयान तो टंकी के पतन से भी ज्यादा पतित रहे। उन्होंने कहा कि न तो टंकी ही जर्जर थी और न ही कोई अफसर ही जिम्मेवार है। अफसरों के लिए तो उनका कहना था कि दूध देती गाय को टोंचा नहीं जाता। वैसे तो भाजपा के लोग शर्म प्रूफ होते हैं पर मंत्रीजी के इन उत्तरों से तो भोपाल क्षेत्र के दो भाजपा विधायकों तक को शर्म आ गयी, और उन्होंने आगामी चुनावों को देखते हुए अपनी ही पार्टी के मंत्री से सवाल कर डाले।
       वैसे भाजपा के मंत्रियों के ऐसे जबाब कोई खास आश्चर्य की बात नहीं हैं। अयोध्या में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बारे में गत बीस साल से लिब्राहन आयोग करोड़ों रुपया खर्च कराके भी किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँच सका था। मस्जिद ध्वंस की एक आरोपी उमा भारती हैं जिनका राजनीति में प्रवेश इस कारण से हुआ था क्योंकि उन्हें बचपन में ही रामायण याद हो गयी थी और वे एक बच्ची के रूप में जब रामायण पाठ करती थीं तो कौतुहलवश भीड़ जुट जाती थी और वे लोकप्रिय हो गयी थीं। भाजपा हर लोकप्रियता को वोटों के रूप में भुनाने की कला जानती है इसलिए उन्होंने उमाभारती को राजनेता बना दिया था। उन्होंने आयोग को उत्तर दिया था कि उन्हें कुछ याद नहीं कि छह दिसम्बर 92 को अयोध्या में क्या हुआ था। बाद में मस्जिद किसने तोड़ी के जबाब में उन्होंने कहा था कि मस्जिद तो भगवान ने तोड़ी। उल्लेखनीय है कि नगरीय प्रशासन मंत्री उनके ही उत्तराधिकारी के रूप में मुख्यमंत्री भी रहे हैं सो उनका उत्तर भी ऐसा ही था कि न तो अफसर जिम्मेवार हैं, न ठेकेदार जिम्मेवार हैं अर्थात टंकी तो भगवान ने तोड़ी। अब आप चाहें तो भगावान को मीमो दे सकते हैं या सस्पेन्ड कर सकते हैं। कुछ दिनों पहले एक फिल्म आयी थी ‘ओह माई गाड’ इस फिल्म में जब एक दुकानदार की भूकम्प से ध्वस्त दुकान का बीमा क्लेम इस कारण से निरस्त हो जाता है क्योंकि उसमें ‘एक्ट आफ गाड’ के कारण हुआ नुकसान कवर नहीं होता। तब वह भगवान की तलाश में निकलता है और इन दिनों जो लोग थोक के भाव में  भगवान बने घूम रहे हैं उन सब को कानूनी नोटिस भिजवा देता है। अदालत में चली इस बहस में वह इनके सारे पाखण्डों और कुतर्कों की धज्जियां उड़ा देता है। उल्लेखनीय है कि भाजपा को इस फिल्म के कारण अपनी भी धज्जियां उड़ने का खतरा पैदा हो गया था इसलिए लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने इस फिल्म को हिन्दुत्व विरोधी बता कर इसके खिलाफ बयान दिया था।
       वैसे ईश्वर की तलाश हिन्दी के एक हास्यकवि काका हाथरसी ने भी की थी और उन्होंने मन्दिर से चप्पलें  चुराने का कारण ईश्वर के किसी भौतिक स्वरूप तक पहुँचने के प्रयास से जोड़ा था। वे कहते हैं-

प्रेम से तुम नित्य ही हरि कीर्तन में जाइए
खूबसूरत चप्पलों को छाँट कर ले आइए
बात कहता हूं पते की कल्पना कोरी नहीं
सब प्रभू की वस्तु जग में, इसलिए चोरी नहीं
विश्व ढूंढा टार्च लेकर, पर प्रभू पाया नहीं
चिट्ठियां डालीं बहुत उत्तर कभी आया नहीं
हर मुहल्ला छान मारा, पर न उसका घर मिला
किसी टेलीफोन ग़ाइड में नहीं नम्बर मिला
प्रभू को फिर छोड़ कर मैं भक्त के आया शरण
भक्त से भी अधिक समझे भक्त के प्यारे चरण
चरण से भी अधिक उनकी पादुका का भक्त हूं
इसलिए मैं चप्पलों की चाह में अनुरक्त हूं  
       लगता है कि मध्यप्रदेश के मंत्री भी इसी तरह चप्पलों की चाह में अनुरक्त होकर प्रभु तक पहुँचने की कोशिश में हैं। देखना होगा कि उनकी यह इच्छा कैसे पूरी होती है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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शुक्रवार, नवंबर 30, 2012

व्यंग्य- सड़क की चिंता, हेमामालिनी की चिंता


व्यंग्य
सड़क की चिंता, हेमामालिनी की चिंता


वीरेन्द्र जैन
       उर्दू शायरी भी क्या चीज है जिसको पढ कर आप यह सच जान सकते हैं कि प्रेम अन्धा होता है जबकि हिन्दी कविता पढ कर पता चलता है कि शादी आँखें खोल देती है। बहरहाल यहाँ मैं हिन्दी-उर्दू कविता या शायरी की बात नहीं कर रहा हूं अपितु आँखें बन्द होने और खुल जाने की बात कर रहा हूं जो किसी नेत्र चिकित्सक की चिंताओं की तरह नहीं है जो आपके नेत्र देखते हुए आपको नेत्रदान की सलाह देने लगते हैं।
       हमारे भारत देश में एक प्रदेश मध्य प्रदेश है और अगर हम पूरे देश को किसी मानव शरीर की तरह देखें तो मध्य प्रदेश देश का पेट नजर आयेगा। जब से इस प्रदेश के नेताओं को अपनी इस स्थिति का भान हुआ है वे निरंतर खाने को अपना परम पुनीत दायित्व समझ रहे हैं। खाये जाओ खाये जाओ यूनाइटिड के गुण गाये जाओ। खेत खालो, खदानें खा लो, बस्तियों की बस्तियां खा लो, पर ‘अपना मध्य प्रदेश’ भरते रहो। एक मंत्री दूसरे को थोड़ा भी उदास देखता है तो पूछता है- ये क्या हाल बना रखा है, कुछ लेते क्यों नहीं? उसे क्या पता कि उसका तो लेते लेते ही हाजमा खराब हो गया है, और इसी से ये हाल बन गया है।
       जब नेता खाते ही रहेंगे और उड़ते रहेंगे तो उन्हें जनता की तकलीफों का ध्यान कहाँ से आयेगा। जो बीजेपी, बीएसपी अर्थात बिजली सड़क पानी के नाम पर सत्त्ता में आयी थी उसने फिर से सत्ता में आने के लिए दस साल बाद भी अपने मुद्दों को बदला नहीं है। सरकार समझ रही थी कि अभी भी सारे मुद्दे जैसे के तैसे हैं और ये ही अगले चुनावों में काम आ जायेंगे पर वह धोखा खा गयी। सारे मुद्दे जैसे के तैसे नहीं हैं अपितु और भी बुरे हो गये हैं। प्रेम अन्धा हो सकता है पर प्रेमिका की तो बड़ी बड़ी और कई बार कजरारी आँखें होती हैं जो तीर वगैरह चलाने से बचे समय में देख भी लेती हैं। प्रदेश में जो सड़कें मध्य प्रदेश के इनवेस्टर मीट दर इनवेस्टर मीट कराते जाने वाले मुख्यमंत्री समेत पूरे मंत्रिमण्डल को नहीं दिख पाती थीं उन्हें हेमामालिनी ने ग्वालियर से दतिया की एक बार की यात्रा में ही देख लिया। तीन घंटे में तिहत्तर किलोमीटर की यात्रा करने में उन्हें पिचासी झटके लगे जिसके बदले में  उन्होंने प्रदेश की सरकार को फटकार लगा दी। प्रदेश सरकार को अपनी स्टार प्रचारक की दृष्टि से देखने को मजबूर होना पड़ा तब उनकी समझ में आया कि प्रदेश में क्या हो रहा है। कहते हैं कि हेमामालिनी दतिया में सरकारी आयोजन में नृत्य करने आयी थीं और मंच पर उन्होंने जो अपनी दैहिक पीड़ा व्यक्त की उसे ही नृत्य समझा गया।
       मध्य प्रदेश में फिल्मों की शूटिंग्स शायद इसलिए ही बढ रही हैं क्योंकि सरकार अपनी तौर पर देखने की क्षमता खो चुकी है और वह जो कुछ भी देखना चाहती है वह फिल्मी कलाकारों की नजर और अनुभवों के आधार पर ही देखना चाहती है। आमिरखान आकर बता जाते हैं कि गाँवों में गरीबी, बेरोजगारी, व आत्महत्याएं बढ रही हैं, तो प्रकाशझा आकर बता जाते हैं कि राजनैतिक हिंसा कितनी बढ रही है। अमिताभ बच्चन बतलाते हैं कि शिक्षा का निजी करण किस तरह से शिक्षा पद्धति का सत्यानाश कर रहा है, और कुछ ही दिनों चोर का शोर भी मचने वाला है । कुल मिला कर सरकार तो धृतराष्ट्र की तरह से सुन भर रही है देख कुछ नहीं रही है। मंत्रिमण्डल में सफेद वर्दी वाले गुण्डे भरे हुए हैं जिनमें से कुछ के कारण तो मुख्यमंत्री को कभी कभी खुद अपनी जान का खतरा महसूस होने लगता है। वरिष्ठ नेता उन्हें घोषणावीर बताते हैं तो किसान नेता वादा तोड़ने वाला बताते हैं, पर जब तक हेमा मालिनी न कह दें वे किसी की बात नहीं सुनेंगे ऐसा तय कर चुके हैं
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, नवंबर 12, 2012

अथ उल्लू गाथा


अथ उल्लू गाथा
वीरेन्द्र जैन

        








जीववैज्ञानिकों के अनुसार उल्लू एक पक्षी होता हैं। चूंकि वह पक्षी होता हैं, इसलिए कभी विपक्षी नही होता। जैसे सारे पक्षी उल्लू नही होते, वे तोते भी हो सकते हैं और कौवे भी वे हंस भी हो सकते हैं और मैना भी, और कई तो कबूतर भी हो सकते हैं और उसमें से भी अटरिया पर चढ़ जाने वाले लोटन कबूतर भी हो सकते हैं। पर इस समय मेरा ध्यान पूरी तरह से उल्लू पर उसी तरह केन्द्रित हैं जिस तरह से सीबीआई का ध्यान नेताओ के चरित्रों पर केन्द्रित हैं।
         उल्लू को हम दो वर्गो  में बांट सकते हैं- एक अपना उल्लू और दूसरा पराया उल्लू।  अपने उल्लू की एक विशेषता होती हैं कि वह हमेशा टेढ़ा रहता है। यही कारण हैं कि इस जमाने के सभी लोग उसे सीधा करने में लगे रहते हैं। आजकल जो लोग अपना उल्लू सीधा नही कर पाते उन्हैं दूसरे लोग उल्लू ही मानने लगते हैं। जब कभी किसी की पत्नी या प्रेमिका किसी को  कहे कि तुम बड़े  ''वो '' हो तो उसे समझ लेना चाहिए कि वह उसे उसके सही उपनाम से पुकारने में शरमा रही है। कुछ लोग तो किंग ब्रूस की तरह मकड़ियों से प्रेरणा पाकर आजीवन अपना उल्लू सीधा करने के लिए प्रयासरत  रहते रहते खुद लंबे हो जाते हैं। इतिहास गवाह हैं किसी ने भी कभी दूसरे के उल्लू को सीधा करने का प्रयास नही किया गया जिसने भी जब भी किया, अपना उल्लू ही सीधा किया।

         व्यक्तियों में भी जो लोग उल्लुओं के रूप में पहचान लिए जाते हैं उनमें भी दो भेद होते हैं। कुछ सचमुच के उल्लू होते हैं, ये सक्रिय किस्म के उल्लू होते हैं तथा दूसरे जड़ किस्म के उल्लू होते हैं उन्हैं काठ का उल्लू कहा जाता है।

         कुछ लोग अपने आप उल्लू बन जाते हैं तथा कुछ को उल्लू बनाया जाता है जिसे वे कई बार समझ जाते हैं और कई बार नहीं समझ पाते। कुछ लोग उल्लू बनने के लिए खुद ही ऐसे गुरूओं के पास जाते हैं जो पूर्ण उल्लू  बन चुके होते हैं तथा अपनी उपलब्धियों को बॉटने के पुनीत कार्य में लगे होते हैं। उनके इन प्रशिक्षणार्थीयों को उल्लू के पट्ठे कहा जाता है। इन पट्ठों में कुछ लोग तो पूरे उल्लू बन जाते हैं और कुछ अधूरे ही रह जाते हैं, उन्हें उल्लू की दुम कहकर पहचाना जाता है। ये आधे तीतर आधे बटेर उल्लू के पट्ठों  की तुलना में अपनी एक अलग पहचान बनाते हैं।

         आमतौर पर उल्लू पुराने महलों- खंडहरों में राजा- महाराजाओं के उत्तराधिकरी के रूप में विचरण करते रहते हैं। वे सदैव ठूंठों पर बैठकर ही बाग- विहार का आनंद लेते हैं पर जब भी वे बगीचे में शाखाओं पर बौद्विक करते हैं तो शायर लोग-बगीचे के बारे में चिंतित होकर कहने लगते हैं कि '' हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामें गुलिस्तॉ क्या होगा! ''सरकार उनकी शायरी सुन कर उन्हैं किसी पीठ पर बैठा देती है।

         उल्लुओं का कार्य समय रात्रि होता हैं और वे अक्सर ही समाचारों पत्रों के समाचार संपादकों से उनके विश्राम के समय भेंटें करते रहते हैं। इन्सान  भी अजीब पाजी जाति का है। हैंदराबाद के चिड़ियाघर में पिछले दिनों एक ऐसा आश्रय बनाया गया हैं जहॉ पर दिन में बिजली से हल्की नीली रोशनी की जाती हैं और उल्लू रात्रि समझकर वहॉ विचरण करने लगते हैं जिसे देखकर दर्शक  उसी तरह आनंदित होते हैं जैसे विभिन्न तलों वाले दर्पणों में अपना छोटा बड़ा प्रतिबिब देखकर बच्चे आनंदित होते हैं। रात्रि में उस आश्रय में पीली रोशनी की जाती हैं और उल्लू दिन समझकर सो जाते हैं।
         लगता हैं मनुष्य, मनुष्यों को बनाते रहकर ऊब गया हैं और अब उल्लुओं को उल्लू बना रहा है।

         बेचारे कवियों को तो उल्लू की तुक कल्लू और लल्लू से जोड़ने के खतरे भी उठाने पड़ते हैं पर अब लेखक तो मानने लगे हैं कि अब हमें अभिव्यक्ति के खतरे टालने ही होगें।
----- वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, नवंबर 08, 2012

व्यंग्य किसका कितना आई क्यू


व्यंग्य
किसका कितना आई क्यू
वीरेन्द्र जैन
       अगर आपने लारेल हार्डी की फिल्में नहीं देखीं तो कोई बात नहीं, कुछ ही वर्ष पहले की हास्य अभिनेत्री टुनटुन की फिल्में जरूर ही देखी होंगीं। अगर वे भी नहीं देखीं तो भी कोई बात नहीं आप भाजपा के संघ नामित अध्यक्ष नितिन गडकरी को देख सकते हैं। काश अगर आप उन्हें सुन सकें तो औडियो विजुअल दोनों का ही मजा मिल जायेगा। भले ही देश और दुनिया में भाजपा के नेता साम्प्रदायिक, हिंसक षड़यंत्रकारी, कुटिल असत्यभाषी और भ्रष्ट माने जाते हों पर सच तो यह है कि भाजपा एक मनोरंजन प्रधान फिल्म ............. नहीं नहीं पार्टी है, जिसमें तरह तरह की हीरोइनों, खलनायकों, बहुरूपियों से लेकर हास्य अभिनेता तक सब कुछ मिल जायेगा। वैसे तो कांग्रेस पार्टी के नेता भी जिस क्षेत्र में जाते हैं वहाँ की टोपी से लेकर सींगों के मुकुट तक पहिन कर ढोल बजाने की मुद्रा में फोटो खिंचवाते और प्रकाशित कराते हैं ताकि हाईकमान को दिखा कर बताया जा सके कि वे पार्टी के लिए कितना काम कर रहे हैं। उनके हाईकमान तक को भ्रम रहता है कि ऐसी नौटंकियों से वोट मिलते हैं, जिसे जुटाना उनकी पार्टी का पहला और आखिरी लक्ष्य है।
       यों कहने को आप मुझे ग़डकरीजी का प्रचारक कह सकते हैं, पर फिर भी में उनका इतिहास अवश्य ही बताऊंगा। ‘भए प्रकट कृपाला दीनदयाला’ की तरह दीनदयाल उपाध्याय की इस पार्टी में गडकरीजी का अचानक ही धम्म से अवतरण हो गया था जैसे रंगमंच पर कठपुतलियां उतरती हैं वैसे ही वे सीधे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर ऐसे धमाक से गिरे थे कि बाहर वाले तो बाहर वाले, अन्दर वाले तक हतप्रभ होकर रह गये थे कि यह क्या हो गया। उनकी डोरियां नागपुर के केशवकुंज की उंगलियों में बँधी थीं। अंग्रेजी में एक कहावत है कि आकाश में बिजली चमकने और बादल गरजने की घटना एक साथ होती है पर प्रकाश की गति तेज होने के कारण प्रकाश पहले दिखाई देता है और गरज बाद में सुनाई देती है इसी तरह कुछ लोगों की चमक तब तक ही रहती है जब तक उनकी आवाज नहीं सुनाई देती। गडकरीजी के मुखारविन्दु से जब स्वर फूटे तब उनकी असलियत समझ में आयी। अध्यक्ष बनने के बाद ही उन्होंने भंडारा में बीमार चीनी मिलें खरीद ली थीं और वहाँ एक रैली की थी। इस रैली में बोलते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष महोदय  ने कहा था कि ‘याद है न, अँधेरी रात में दिया तेरे हाथ में. काँग्रेस के हाथ को वोट दिया था अब मजे लो।‘ शरद पवार के कारनामों के बारे में उन्होंने कहा था कि उनका आईपीएल का खेल भी गज़ब का है, जब चौका पड़ता है तो चियर्स लीडर अपनी एक टाँग उठा देती है व छक्का पड़ने पर उसकी दोनों टाँगें उठ जाती हैं। अफज़ल गुरु को तो उन्होंने कांग्रेस का दामाद तक कह दिया था और लालू तथा मुलातम के खिलाफ की गयी गन्दी टिप्पणी के बाद तो उन्हें माफी तक माँगना पड़ी थी। विवेकानन्द के आईक्यू से तुलना करने के लिए उन्हें दाउद इब्राहीम ही मिला था क्योंकि भाजपा वाले जब भी शत्रु की कल्पना करते हैं तो उन्हें मुसलमान ही नजर आते हैं। सब कुछ देखते हुए भी मोहन भागवत का उन्हें अध्यक्ष बनाना, और बनाये रखने के लिए भाजपा के संविधान में परिवर्तन करा देने को देखते हुए इस राष्ट्रवादी संघ प्रमुख के आईक्यू की तुलना धृतराष्ट्र से ही की जा सकती है।
       बहरहाल गडकरीजी अपनी पहली रैली के दौरान ही चक्कर खाकर अडवाणीजी के मजबूत कँधों पर टिक गये थे क्योंकि इससे पहले कड़ी धूप का उन्होंने सामना ही नहीं किया था। कुछ दिनों बाद उन्होंने अपनी चर्बी छिलवाई थी और अब जेठमलानी पिता पुत्र उनकी चमड़ी उधेड़ने पर लगे हुए हैं। कांग्रेस के महा सचिव दिग्विजय सिंह तो गत एक साल से सवाल उठा रहे थे कि उनके पास इतनी सम्पत्ति कहाँ से आयी, पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कांग्रेस के महा सचिव की बातों का जबाब देने की वैसे ही कोई जरूरत नहीं समझी, जैसी कि अरविन्द केजरीवाल ने उनके सवालों के जबाब देने की जरूरत नहीं समझी थी। जेठमलानी तो वकील हैं इसलिए जो उनके वकालतनामा पर दस्तखत कर देता है उसके पक्ष में बात करते हैं। मोदी ने उन्हें चुना है तो वे मोदी को देश का प्रधानमंत्री तो क्या अमेरिका का राष्ट्रपति तक बनवाने के लिए जिरह कर सकते हैं। गडकरी की कलई भी खुली और उन्होंने जेठमलानी की सेवाएं भी नहीं लीं सो उन्हें मजबूरन उनका विरोध करना पड़ा। सुना है कि गडकरी जी स्व. चन्द्रशेखर के उन कार्यकर्ताओं को भाजपा में भरती कराने के प्रयास में जुट गये हैं जिन्होंने जेठमलानीजी द्वारा चन्द्रशेखरजी के घर के सामने धरना रखने के खिलाफ उनका सम्मान कर दिया था।
       गडकरीजी सचमुच ही अभिनन्दनीय हैं, मेरी दिली इच्छा है कि उन्हें एक कार्यकाल और दिया जाये ताकि वे भाजपा के बचे खुचे कपड़े तक उतरवा सकें।
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, नवंबर 02, 2012

व्यंग्य- चोर चोर का शोर


व्यंग्य
चोर चोर का शोर
वीरेन्द्र जैन
       पूरे देश में आजकल चोर चोर का खेल मचा हुआ है। लोकतांत्रिक टंगड़ी मार प्रतियोगिता के अंतर्गत टूर्नामेंट चल रहा है। तू चोर, तेरा बाप चोर, तेरा खानदान चोर, तेरी जाति चोर, ये..., ऊ...., हट, भग, चल, से शुरू होकर गालियों के शहस्त्रनाम तक का मार्ग प्रशस्त हो रहा है।
       दरअसल चोरी से किसी को गुरेज नहीं है पर बदनाम दूसरे को करना चाहते हैं ताकि सरकार बनाने का मौका हथिया सकें। सफाई कोई नहीं दे रहा, दे भी नहीं सकता , पर आरोप सब लगा रहे हैं। स्वीकारने के तरीके भी अलग अलग हैं। उनके समर्थक कहते हैं कि हमारा नेता छोटा चोर, तेरा नेता बड़ा चोर। जिसकी समझ में आ जाता है कि अब बच नहीं सकते तो वह कहने लगता है कि यार छोड़ो सभी चोर हैं, और इस तरह वह जो चोर नहीं हैं उनके उभरने का रास्ता भी धुन्धलाने लगता है। जिसकी सरकार केन्द्र में है वह केन्द्र में चोरी कर रहा है और जिसकी सरकार राज्य में है वह राज्य में चोरी कर रहा है। जो राज्य में विपक्ष में है वह सत्तारूढ को चोर कह रहा है और जो केन्द्र में विपक्ष में है वह केन्द्र सरकार को चोर कह रही है। एक ऐसे नवजात हैं जिनका नाम करण संस्कार भी नहीं हुआ है वे दोनों को ही चोर कह रहे हैं, तो दोनों ही मिल कर उनको और उनके लग्गे भग्गों को चोर ठहरा रहे हैं। जनता का ठलुआ क्लब कह रहा है कि ये सब चुनाव तक ही चोर चोर चिल्ला रहे हैं चुनाव के बाद सब चुपचाप हो जायेंगे। जैसे चुनाव के समय सोनिया गान्धी विदेशी महिला और ईसाई हो जाती हैं तथा अडवाणी एंड कम्पनी साम्प्रदायिक हो जाती है पर चुनाव के बाद प्यार मुहब्बत चलती रहती है। गडकरी को ज़मीन अजीत पवार देते हैं।
       वे साफ साफ कहते हैं कि अगर चोरी नहीं करेंगे तो काहे को अपना काम धन्धा, खेती बाड़ी छोड़ कर फलाँ भैया ज़िन्दाबाद, ढिकाँ भैया को जन्मदिन के शुभकामनाएं देते फिरेंगे? उल्लू हैं क्या? कहीं ठीकठाक जगह पर अपने दाँत गड़ाने के लिए अवसर की तलाश में हैं, कोई लाइसेंस मिल जाये, ठेका मिल जाये, सप्लाई मिल जाये, एजेंसी मिल जाये, ज़मीन मिल जाये, बंगला मिल जाये, निगम मण्डल में जुगाड़ जम जाये, एनजीओ मिल जाये, नौकरी दिलाने या ट्रांसफर कराने की दलाली मिल जाये, राशन की दुकान मिल जाये, कुछ तो हो, नहीं तो क्या फालतू में चप्पलें चटकाते फिरें। बताओ तो आजकल कौन फ्री में कुछ करता है, साले वोटर तक तो पहले फी वोट पाँच सौ का नोट एडवांस में धरा लेते हैं तब वोट देने जाते हैं तो हम कार्यकर्ता क्या ऐसे ही अपनी पेंट और पेंट के अन्दर का ढाँचा घिसते रहें। आजकल इस जनता की माँगों का दिखावा करने के लिए रैली और धरना प्रदर्शन करते हैं, उसमें जनता तो आती नहीं, सौ सौ रुपये और लंच की पेकेट देकर तो रैली के लिए कल्लू पहलवान से जनता खरीदनी पड़ती है, मीडिया वालों को लिफाफे देना पड़ते हैं, तब जाकर राष्ट्रीय विपक्ष की लाज बचती है। बताओ चोरी न करें तो रैली का कोटा कैसे पूरा करें। अरे किसी फोटोग्राफर को ही भूल जायें तो वो रैली की असली तस्वीरें दिखा देता है और आप उम्मीदें पाले रहते हो कि चोरी न करें। अब बाँटने के बाद कुछ घर पर भी रख लेते हैं तो उसमें क्या गलत है, आखिर हमारे भी बाल बच्चे हैं। हम कोई कम्युनिष्ट तो हैं नहीं कि पगलाए फिर रहे हैं और जमानतें जब्त करा रहे हैं, अपुन तो देसी हैं भैया। ये नास्तिक कुछ भी करें पर हमारे भगवान ने तो अपने युग में माखन चोरी करके हमें सन्देश दे दिया है कि अपने अपने युग में जो चोरी हो सकती है सो करो।
       हम तो राष्ट्रीय एकता वाले लोग हैं सो मिल के खाते हैं, हमारे यहाँ कोई अफसर भूखा नहीं रहता, जिसके यहाँ छापा पड़ता है तो करोड़ों से कम किसी के पास नहीं निकलता, पुलिस, फौज़, न्यायाधीश, सबसे मिल कर खाते खिलाते हैं क्योंकि सच्चे समाजवादी तो हमीं हैं। सच्चा समाजवाद तो यही है कि सबको बराबर का अवसर मिले और जिसकी जैसी क्षमता हो वह वैसा अवसर का उपयोग करे। जिन्हें कमाने खाने की तमीज नहीं है तो उनके लिए क्या कर सकते हैं, नालायक लोग हैं, जाने कैसे भर्ती हो गये। ये तो लोकतंत्र है साब, जनता तो योग्य लोगों के साथ है, जो कमाना जानता है उसी को वोट देती है। जिसे चोर चोर कहते फिरते हैं वही जीत जाता है या किसी और बड़े चोर से हारकर भी लाखों वोट ले जाता है। बड़ा बदनाम किया था मायावती दीदी को पर उत्तर प्रदेश में पिछले चुनावों से सेंतीस लाख वोट ज्यादा ले गयीं और सीबीआई में चल रहे प्रकरणों के बाद भी मुलायम सिंह ने अपने खानदान की सरकार बनवा ली।
       वो तो भैया चोर चोर कहने का फैशन है सो हम भी कह रहे हैं, बरना बहती गंगा के मैल में हाथ धोकर हाथों का कुछ मैल हम भी कमा लेते हैं, सो सदा सरकारी पार्टी में रहते हैं, आप भी कहाँ पड़े हो हमारे साथ आ जाओ तो तर जाओगे, बाकी आपकी मर्जी, हरिश्चन्दों को बेटे का कफन भी बेचना पड़ता है। जय श्री राम।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, अक्टूबर 18, 2012

व्यंग्य- क्या फेंकूं क्या जोड़ रखूं


व्यंग्य  
क्या फेंकूं क्या जोड़ रखूं ?
वीरेन्द्र जैन
      हरिवंशराय बच्चन, जिनकी कीर्ति पताका अब उनके काब्य संसार से अधिक एक स्टार कलाकार के पिता होने के कारण फड़फड़ा रही है, ने अपनी आत्म कथा का शीर्षक दिया है - क्या भूलूं क्या याद करूं। उनकी इस मन:स्थिति की कल्पना हम प्रतिवर्ष दीवाली पूर्व किये जाने वाले सफाई अभियान के दौरान करते हैं। नई आर्थिक नीति का सांप हमारे घर में ऐसा घुस गया है कि हम जीवन मरण के झूले में लगातार झूल रहे हैं। नई आर्थिक नीतियों के अनुसार हमने न केवल अपने दरवाजे खोले अपितु खिडकियों रोशनदानों सहित चौखटें भी निकाल कर फैंक दीं जिससे दुनिया का बाजार दनादन घुसा चला आया और हमें आदमी से ग्राहक बना डाला । अब हमारा केवल एक काम रह गया है कि कमाना और खरीदना । बाजार से गुजरने पर इतनी लुभावनी वस्तुएं नजर आती हैं कि मैं उन्हें खरीदने का लोभ संवरण नहीं कर पाता। उपयोग हो या ना हो पर खरीदने का आनन्द भी तो अपना महत्व रखता है- सोचो तो ऊंचा सोचो।
      इन नयी नयी सामग्रियों की पैकिंग का तो क्या कहना। बहुरंगी ग्लेजी गत्ते का मजबूत डिब्बा उसके अन्दर थर्मोकाल के सांचे में सुरक्षित रूप से फिट किया गया सामान इतना सम्हाल के रखा गया होता है जैसे कोई मां गर्भ में अपने बच्चे को रखती है भले ही जन्म के बाद वह कुपुत्र निकले पर माता कुमाता नहीं होती है। कई बार तो मन करता है कि सामान फैंक दिया जाये पर डिब्बा सम्भाल कर रख लिया जाये ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत पर काम आवे। दीवाली का आगमन ऐसे सामान के प्रति बड़ी कड़ी प्रतीक्षा की घड़ी होती है। छोटे छोटे फ्लेट इन डिब्बों से पूरे भर जाते हैं। दीवाली पर इन्हें बाहर निकाला जाता है पोंछा जाता है और सोचा जाता है कि रखूं या फैकूं। क्या भूलूं क्या याद करूं की तरह असमंजस रहता है। वैसे आजकल यूज एण्ड थ्रो का जमाना है पर हम हिन्दुस्थानी मध्यम वर्गीय लोगों से फेंका कुछ नहीं जाता। हमारे यहाँ ऐसे डाटपैन सैकड़ों की संख्या में मिल जायेगे जिनकी रिफिल खत्म हो गयी है। और रिफिल बदलने वाली बनावट नहीं है, पर पड़े हैं तो पड़े हैं। न किसी काम के हैं और ना ही फेंके जाते है। ढेरों किताबें है जिनकों पढ़ने का कभी समय नहीं मिला पर रद्दी में बेचने की हिम्मत नहीं होती। अंग्रेजों के समय में लोग जेल जाया करते थे, जहां उन्हें लिखने और पढ़ने का समय मिल जाता था पर आजकल के जेलों में जगह ही खाली नहीं रहती कि पढ़ने लिखने वालों को अवसर दिया जा सके। इसलिए किताब बिना पढ़ी रह जाती हैं। पुराना ब्लैक एण्ड व्हाइट टीवी क़ो कोई पांच सौ रूपये में भी नहीं खरीदना चाहता है जबकि इतना पैसा तो उसे शोरूम से घर लाने और पड़ोसियों को मिठाई खिलाने में ही लग गया था। अगर कुछ वर्ष और रह गया तो उल्टे पांच सौ रूपया देकर ही उठवाना पड़ेगा। पुराने जूते, खराब हो गयी टार्च, कपड़े के फटने से बेकार हो गये छाते, बच्चे की साइकिल गुमी हुई चाबियों वाले ताले, सेमिनारों में मिलें फोल्डर और स्मारिकाएं, बरातों में मिले गिफ्ट आइटम, जो न केवल दाम में कम है अपितु जिनके काम में भी दम नहीं है। बिल्कुल वही हाल है कि -
चन्द तस्वीरे-बुतां, चन्द हसीनां के खतूत
बाद मरने के मेरे घर से ये सामां निकला
रद्दीवाला तक कह देता है कि छोटे छोटे कागज अलग कर लीजिए इनका हमारे यहां कोई काम नहीं है। ये इकट्ठे होते रहते है तथा मरने के बाद ही बाहर निकलते हैं (वैसे सामान तो कुछ और भी निकला होगा पर एक शेर में आखिर कितना सामान आ सकता हैं। )
      इन सामानों का क्या करूं ? प्लास्टिक के आधार पर पीतल जैसी धातु के चमकीले स्मृति चिन्ह दर्जनों रखे हैं। कई स्मृति चिन्हों की तो स्मृतियों ही खो गयी है कि ये कब किसके द्वारा क्यों मिला था। अगर इन्हें बेचने जायेगे तो खरीददार समझेगा कि बाबूजी ने शायद जुआ या सट्टा खेल लिया है जो अब स्मृति चिन्हों को बेचने की नौबत आ गयी है। ऐसी दशा में वह इतने कम दाम लगायेगा कि अपमान के कई और घूंट बिना चखने के पीने पड़ जायेगे। वे केवल इस उपयोग के रह गये है कि गाहे बगाहे इनकी धूल पोंछते रहो। कई बार अतिथियों को दिखाने की फूहड कोशिश की तो वे बोले कि हमारे घर तो आपके यहाँ से दुगने पड़े हैं और दुगनी धूल खा रहे है।
      एक जमाना तो ऐसा था प्लास्टिक की पन्नियों को भी सम्हाल के रखा जाता था। जो दुकानदार इन पन्नियों मं सामान बेचता था उसकी बिक्री बढ़ जाती थी। अब यही पन्नियां, पत्नियों की तरह आफत की पुड़ियां बन गयी है। कई फोटो एलबम है जिनमें बचपन से लेकर पचपन तक के चित्र डार्विन के विकासवाद की पुस्तक - बन्दर से आदमी बनने की विकास यात्रा की तरह सजे हुऐ हैं। निधड़ नंग धड़ंग स्वरूप में नहलायें जाने से लेकर सिर के गंजे होने तक के चित्रों की गैलरी सजी है। कभी लगता था कि वह दिन भी आयेगा जब लोग अखबार के पन्नों पर इनकी झांकी सजायेंगे पर अब इस शेख चिल्लीपन पर खुद ही हंसी आती है। इन्हें फेंकने का जो काम भविष्य में कोई और करेगा वही काम खुद करने में हाथ कांपते है।
धूल उड़ाने के लिए खरीदा गया वैक्यूम क्लीनर खुद ही धूल खा रहा है। कई तरह के वाइपर जिन पर खुद ही पोंछा लगाने की जरूरत महसूस होती है। मकड़ी छुडाने वाले झाडू पर मकड़ी के जाले लग गये हैं। बाथरूम में फ्रैशनर की केवल डिब्बियॉ टंगी रह गयी हैं। फ्रैशनर की टिकिया खरीदते समय वह फालतू खर्च की तरह लगती है पर डिब्बी फैंकी नहीं जाती। मेलों, ठेलों से खरीदे गये कई तरह के अचार मुरब्बे चटनियों और चूरन इस प्रतीक्षा में है कि कब खराब होकर सड़ने लगें तब फैके जावें।
जिस तरह आत्मा शरीर को नहीं छोडना चाहती बिल्कुल उसी तरह बेकार हो गयी सामग्रियॉ छूटती नहीं हैं। कहना ही पड़ेगा- क्या फेकूं ? क्या जोड़ रखूं ?
 वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, अक्टूबर 11, 2012

अगर पैसे पेड़ पर लगते तो ...........


व्यंग्य
अगर पैसे पेड़ पर लगते तो...................... 


वीरेन्द्र जैन
                राम भरोसे के हाथ में हमेशा अखबार रहता है और उसकी हथेलियों की गरमी से ठंडी ठंडी खबरें भी गर्म हो जाती हैं। हमेशा की तरह मुझे आज भी उम्मीद थी कि वह अखबार फैला कर कोई गरम-गरम या मसालेदार खबर पढवायेगा, पर उसने ऐसा नहीं किया। कुर्सी पर बैठ कर सीधा सवाल दाग दिया ये बताओ कि ये वाक्य वनस्पति शास्त्र का है, अर्थ शास्त्र का है, राजनीति शास्त्र का है, या पर्यावरण से सम्बन्धित है!
       ‘पहले सवाल तो बताओ? मैंने उसकी पहेली से उलझते हुए पूछा
                “ अरे तुम कौन सी दुनिया में रहते हो तुम्हें आज के ताजा घटनाक्रम की भी खबर नहीं रहती! मैं अपने मौन मोहन सिंह जी के ताजा बयान की बात कर रहा हूं जो सोनिया जी के चाहने तक देश के प्रधानमंत्री हैं। वह ऐसे बोला जैसे बहुत रहस्य की बात बता रहा हो, बरना ये बत किसे नहीं पता।
                “अच्छा, अच्छा, वही पैसों के पेड़ पर लगने वाली बात, हाँ भाई कहा तो उन्होंने सही है, पेड़ों पर पत्तियां लगती हैं, फूल लगते हैं, शाखाएं लगती हैं, कभी कभी फल लगते हैं, घोंसले लगते हैं, अमर बेलें चढी रहती हैं, दीमक लगती है, मकड़ी के जाले लगते हैं, कीलें ठोंक कर विज्ञापन लगते हैं, कट कर गिरी पतंगें अटक जाती हैं, और अटकी रहती हैं, पर पैसे नहीं लगते। मैंने अपना ज्ञान बघारा।
                “ पर पेड़ों पर वोट भी नहीं लगते, जिनके अचार से सरकार बनती है, उन्हें भी बड़े जतन से कबाड़ने पड़ते हैं। पर मैंने तुम से पूछा था कि इस विषय का शास्त्र क्या है जो सम्भवतः तुम नहीं जानते। अच्छा छोड़ो ये बताओ कि अगर पैसे पेड़ पर लगते होते तो क्या होता। रामभरोसे ने कहा तो प्रतिउत्तर में मैंने प्रस्तावित किया कि इस चिंतन को ज्वाइंट वेंचर में किया जाये। मैं और राम भरोसे दोनों ही उसी तरह चिंतन की मुद्रा में बैठ गये जैसे कभी जवाहरलाल नेहरू की फोटो छपा करती थी, जिसमें एक उंगली गाल पर और बाकी ठोड़ी के नीचे रहती थीं। इस चिंतन से जो गहरे मोती निकाले वो इस तरह थे।
·         अगर पैसे पेड़ों पर लगते तो देश में जंगल ही जंगल होते, क्योंकि जंगल के पैसों पर सरकार का अधिकार होता  
·         अगर पैसे पेड़ों पर लगते तो ज्यादातर गैराअदिवासी लोग. आदिवासी कहलाना चाहते और कहते कि गर्व से कहो हम जंगली हैं,   
·         अगर पैसे पेड़ों पर लगते तो नगरों गाँवों के घरों में एक, दो पाँच, दस, पचास, सौ, पाँच सौ और हजार रुपयों के अलग अलग पेड़ लगे होते। सबको घरों में पेड़ लगाने के लिए सरकार से अनुमति लेनी पड़ती और वीआईपी लोग पाँच सौ या हजार से नीचे का पेड़ ही नहीं लगाते। एक दो रुप्यों के पेड़ तो इमली, बेरों की तरह रस्तों पर लगे रहते,  
·         कुछ लोग बिना अनुमति के चोरी से हजार पाँच सौ रुपयों के पेड़ लगा लेते जिन्हें काले पेड़ कहा जाता और छापों में पकड़े जाने पर पता लगता कि किसने कितने पेड़ लगाये हुए थे।
·         बाबा रामदेव जैसे लोग कहते कि हजार पाँच सौ के पेड़ों के बीज ही खत्म कर दो तब काले पेड़ों की समस्या से मुक्ति मिलेगी। वे खुद दवाओं के नाम पर अपने आश्रम कम दवा उद्योग में ऐसे सैकड़ों पेड़ लगा कर रखते।    
·         अगर पैसे पेड़ों पर लगते तो नीति वाक्य सिखाने वाले कहते कि जैसा कर्म करेगा वैसा पेड़ देगा भगवान क्योंकि तब लोग फलों के पेड़ ज्यादा नहीं लगाते और फल देने का मुहावरा नहीं बनता
·         अगर पैसे पेड़ों पर लगते तो फिर अलग से पर्यावरण मंत्रालय बनाने की जरूरत ही नहीं रहती क्योंकि कोई कालिदास भी कालिदास की तरह व्यवहार नहीं करता
·         वन विभाग और वित्त विभाग के बीच मुकदमा चल रहा होता
·         वगैरह
·         अगर पैसे पेड़ों पर लगते होते तो सबसे बड़ी बात यह होती कि श्री मनमोहन सिंह्जी प्रधानमंत्री नहीं होते
वीरेन्द्र जैन
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