सोमवार, जनवरी 17, 2011

व्यंग्य पर उपदेश कुशल बहुतेरे


व्यंग्य
पर उपदेश कुशल बहुतेरे

वीरेन्द्र जैन
संत टी वी पर प्रवचन फटकार रहे थे। वे माया मोह भगाने के लिए प्रेरणा देने से पहले चैनल प्रबंधक से अपनी रायल्टी बढ़ाने के बारे में लम्बी चर्चा कर चुके थे। उनके पर्सनल सेक्रटरी और पीआरओ ने चैनल प्रबंधक को पहले ही आश्वस्त कर दिया था कि संत जी प्रवचनों के बीच में 'छोटे से ब्रेक' के दौरान पेन्टीज और ब्रेसरीज के विज्ञापनों में दिखाई जाने वाली अधनंगी माडलों के विषय में आपत्ति व्यक्त नहीं करेगे। उदार हृदय संत अपने वचनों पर दृड़ रहे और उन्होने इस विषय पर कोई चर्चा नहीं की।
पिछले दिनों उन्होने एक झूठे भक्त की दानशीलता के झांसे में आकर उसे दो सौ करोड़ की राशि विनियोजन के लिए सोंप दी थी जिसे लेकर वह ध्यान में बैठने की जगह अर्न्तध्यान हो चुका था। भक्तों के इस माया प्रेम में पड़ कर अनैतिक होते जाने से संत कुपित थे व इस हानि की जल्दी भरपाई में प्राणप्रण से जुट गये थे। वे चाहते थे कि भक्त महाठगिनी माया से मुक्त होकर मुक्त हस्त से दान दें ताकि आश्रम फलता फूलता रहे।
संत पहले विज्ञापनों पर नखरे दिखाते थे। वे कहते थे कि उनके प्रवचनों के बीच में दिखाये जाने वाले विज्ञापन पहले उन्हें दिखाये जाने चाहिऐ। एकाध बार ऐसा किया भी गया पर उन विज्ञापनों के देह र्दशनों ने उनके मन में पाप पनपा दिया था जिसका प्रायश्चित उन्होने आश्रम में एक कोठरी में बैठकर कर किया था। तब से उन्होने यह जिम्मेवारी आश्रम के मैनेजर को सोंप दी थी। अब वे सारी आसक्तियों से मुक्त हो गये थे। जो चाहे दिखाओ केवल मेरी रायल्टी बढ़ा दो।
संत भावपूर्ण मुद्रा में उपर उंगली उठा कर परम पिता परमात्मा पर भरोसा रखने और उसकी कृपा पाने की प्रेरणा देते होते वहीं विज्ञापन में पेन्टी पहने माडल मशीन पर एक्सरसाईज करती हुयी जांघों और पेट पर से चर्बी कम करने के लिए ऐशियन स्काई शाप की एक्सरसाईज मशीन मंगाने की प्रेरणा दे रही होती। दोनो ही ऊपर स्काई की ओर इशारा करते पर जांघों की चर्बी कम करने वाली माडल की स्काई-शाप संत की स्काई शाप से ज्यादा दमदार सिद्व होती है।
संत प्रवचन देते हैं कि मन का मैल साफ करो और वहीं ब्रेक में कोई प्यारी भाभीनुमा गृहणी किसी डिटर्जेन्ट सोप का विज्ञापन करती ढेरों कपड़े धोने के बाद भी खुशी खुशी मुस्कराती हुयी कपड़ों का मैल साफ करने की प्रेरणा दे रही होती या टायलेट सोप को चिकने घुले गोरे गोरे हाथ पैरों आदि पर फिराते हुऐ शरीर का मैल निकालने को प्रेरित कर रही होती । संत का प्रवचन फिर पिट जाता और लोग शरीर का मैल धोने की तैयारी करने लगते ।
संत प्रभु के रंग में रंग लेने को उकसाते वहीं डिस्टेम्पर आईल पेन्ट से घर रंगने के लिए प्रेरित करती फिर कोई हसीना ऑखों ही ऑखों में आमंत्रित करती नजर आती। संत शेम्पू से धुली अपनी दाढ़ी पर हाथ फेर कर उसके जुएं मुक्त होने का संदेश देते होते तो कोई सुन्दरी अपनी केश राशि को लहराती और किसी शेम्पू का कमाल बताती आंखों के तीर चला कर चली जाती। संत का संदेश नहीं चल पाता। संत कम से कम कपड़े पहने नजर आते तो माडलें और कम कपड़ों में नजर आती।

संत को भविष्य की चिन्ता सताती। अगर टीआरपी क़म हो गयी तो धंधा कैसे चलेगा। जो पैसा भक्त के माया मोह के चक्कर में चला गया वो कैसे निकलेगा, संत ने उद्योग स्थापित कर लिये। अब वे जड़ी बूटियॉ और मानव खोपड़िया आदि कुटवा पिसवा कर बिकवाने लगे। अगरबत्ती, साबुन, तेल, चन्दन, माला, प्रवचन की पुस्तकें, आडियो वीडियो की सीडियां उनकी एन्सिलरी इकाईयां बन गयीं। भक्तों की जो भी जरूरतें होती है। वे आश्रमवासियों के द्वारा पूरी की जा सकती है। बड़ी पापड़, सिंवई, आचार आदि बनवाने के लिए विधवा आश्रम खोल दिया गया। बढ़ती बेरोजगारी, मंहगाई और भुखमरी ने सेवादार, सेवादारिनी बनने का मार्ग प्रशस्त किया। वे लोग मजदूर नहीं सेवादार थे इसलिए उन्हें मजदूरी की जगह प्रभु प्रसाद मिलता था। चूकि प्रसाद की कोई दर नही होती इसलिए उनका परिश्रम भी अमूल्य था। सेवादारों को संतोष का पाठ नि:शुल्क पढ़ाया जाता और विधवाओं को किसी भी तरह के अभावों में नही रखा जाता था।
भक्त संत का प्रवचन विज्ञापन सुन्दरियों की झलक पानें के लिए सुनते। प्रवचन तो ब्रेक में झेलने जैसी चीजें थी। वे मन का मैल साफ करने की जगह घर का मैल साफ करते और मैल को सड़क पर फेंक देते। चूंकि संत मैल साफ करने का संदेश तो देते हैं पर मैल को कहॉ कैसे फेंकना है, उसके बारे में कुछ नही बताते इसलिए लोग कचरा एक दूसरे के घर के सामने फेंक कर पुण्य कमाते रहते है। कोई सन्त यह नही बताता कि गुटखा की पीक कहॉ थूकना है या नाली का पानी कहॉ पर निकालना है। आत्मा परम स्वतंत्र होती है। इसलिए उसे धारण करने वाली देह को अपनी सीमा से बाहर जाकर दूसरों और समाज के लिए नहीं सोचना चाहिए। सारे रिश्ते बेमानी हैं, भम्र हैं, धोखा हैं इसलिए धोखे से बचो अपना मैल निकाला और दूसरे पर पटक दो। दूसरा भी ऐसा ही करे। मातृवत पर दारेषु की तरह तुम हमारी पत्नी को मां मानों और मैं तुम्हारी पत्नी को मॉ मानूं। इस तरह सब एक दूसरे के बाप बन जाओ। ऐसा होने पर जगह जगह वह डायलाग सुनायी देगा कि ' रिशते में हम तुम्हारे बाप लगते है' ।
संत का अपना टेन्ट हाऊस चलता है। वे दूसरे के टेन्ट हाऊस वाले शमियाने में प्रवचन नहीं करते । टेन्ट का किराया कुल दस लाख रूपयें प्रतिदिन है। जिसने सन्यासी का मेकअप करके घर छोड़ दिया उसने अरबों का आश्रम कारोबार जमा लिया और अपनी गाड़ी में चलकर अपने टेन्ट में ही भाषण देता है। सारे ब्रम्हाण्ड में उसी एक परमपिता परमेश्वर का वास है। पर टेन्ट हाऊस हमारा अपना अलग है जिसमें हमारे अपने भक्तों के पान की पीक लगी है। आध्यात्म उसी में पनपता है। किराया एडवांस न देने पर नही पनपेगा। आपको पनपवाना हो तो जल्दी बुकिंग करवाओं वरना संत किसी और को डेट दे देंगे।
----- वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

शनिवार, नवंबर 13, 2010

laghukathaa raajaa kee nangaee राजा की नंगई

लघुकथा
राजा की नंगई
वीरेन्द्र जैन
----------------------------------------------------------------------------- ---------
राजा नंगा है। उपदेश कथा में यह कहने का साहस एक बच्चे को छोड़कर किसी को भी नहीं हुआ था। कथा में उसका बाप उसे बार बार चुप कराने की कोशिश कर रहा था। सब राजा के तथाकथित वस्त्रों की तारीफ करके स्वयं की रक्षा कर रहे थे। अब समय दूसरा है। सारे के सारे लोग कह रहे हैं कि राजा नंगा है और चाहें तो राजा के नंगे होने की जाँच करा के देख लें। पर महाराजा और उसके बच्चे सारा सच जान समझ कर भी कह रहे हैं कि नहीं राजा नंगा नहीं है।
महाराजा ने अगर राजा को नंगा कह दिया तो उसके खुद नंगे हो जाने की सम्भावना है।
------------------------------------------------------------
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

शनिवार, अक्टूबर 30, 2010

शिशु जिज्ञासाएं और हाथियों के सौदे


व्यंग्य
शिशु जिज्ञासाएं और हाथियों के सौदे
वीरेन्द्र जैन
दीवाली सिर पर आ गयी थी ओर ढेर सारे काम करने को पड़े थे। यथा राजा तथा प्रजा- हमारा हाल भी नेताओं की तरह है कि जब चुनाव सिर पर आ जाते हैं तब याद आता है कि दलित एजेन्डा निकालना है, महिलाओं को आरक्षण आदि देना है,किसानों के पांच हार्स पावर के बिल माफ करने हैं सवर्णों के आरक्षण का प्रस्ताव केन्द्र को भेजना है, सच्चर कमेटी और श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्टों पर विचार करना है बगैरह बगैरह।
रास्ते में याद आया कि रक्षाबंधन के अवसर पर बहिनों को लाने की तरह दीवाली पर लक्ष्मीजी को घर पर लाना है- चूंकि लक्षमीजी तो घर पर आ नहीं सकतीं इसलिए उनका फोटो ही आ जाये तो ठीक है। मैंने लक्ष्मी जी का पना, जो शायद उस पन्ना का अपभृंश है जिस पर छपा हुआ लक्ष्मी जी का फोटो बाजार में मिलता है, खरीद लिया। जो छोटी बच्ची उसे बेच रही थी उसने शायद कभी उसे गौर से देखा नहीं होगा, जैसे पत्रिकाएं बेचने वाले उन्हें कभी पढते नहीं हैं।
घर लौटा तो देखा कि उसी उम्र की पड़ौसी की छोटी बच्ची मेरे घर खेल रही थी, लक्ष्मी का पना देख कर पूछा ''यह क्या लाये अंकल, मैं देखूं?''
मैंने उस चित्र को बहुत नरमी से उसके हाथ में दिया ताकि लक्ष्मीजी और मेरी गृहलक्षमीजी की भावनाएं आहत न हों, क्योंकि मुझे लक्ष्मीजी से उम्मीदें और गृहलक्ष्मी से भय अभी भी है। सुना है कि लक्ष्मीजी दीवाली के दिन चुनावों के दिनों की तरह दीवाली को खूब राहतें लुटाती हैं, हो सकता है एकाध मुझे भी मिल जाये।
'' ये क्या है अंकल?'' बच्ची ने फिर पूछा
'' ये लक्ष्मीजी हैं बेटे'' मैंने स्वर में इतनी श्रद्धा लपेट कर कहा जितना कौर निगलने से पहले उसमें लार लपेटी जाती है।
'' ये वाटर में क्यों खड़ी हैं, इन्हें क्या बहुत गरमी लगती है अंकल ?''
'' हाँ बेटे ये धन की देवी हैं, और पैसों में बहुत गरमी होती है इसलिए इन्हें बहुत गरमी लगती होगी। देखो गरमी कम करने के लिए इनके हाथ से मैल की तरह पैसे छूट रहे हैं''
'' हाँ मेरे पापा भी कहते हैं कि पैसा हाथों का मैल होता है, पर अंकल मेरे हाथ जब गंदे हो जाते हैं तो मम्मी उन्हें धुलवा देती हैं पर उनमें से तो कभी भी पैसे नहीं निकलते?''
'' हाँ बेटे यह लक्ष्मीजी के ही हाथों का मैल होता है।''
बच्ची मान गयी पर फिर पूछा ''लक्ष्मीजी के दोनों ओर क्या हैं अंकल?''
''ये हाथी हैं बेटे''
'' आपको पक्का पता है?''
'' हाँ बेटे, आपके स्कूल में भी किताब में ऐलीफैंट का चित्र दिखाया गया है''
''हाँ अंकल वो तो पता है, पर ये हाथी ही क्यों है, उसकी वाइफ हथिनी क्यों नहीं है ?''
मैं चकरा गया, दोनों हाथी आधे पानी में डूबे हुए थे, मैंने इस दिशा में कभी सोचा भी नहीं था। अचकचा कर बोला ''बेटे सवारी गांठने और अंकुश चुभाने के लिए पुल्लिंग ही चुना जाता है, इसलिए ये हाथी ही है''
'' पर मैंने तो सुना है कि लक्ष्मीजी हाथी पर कभी नहीं बैठतीं, उनकी सवारी तो उल्लू है''
'' हाँ बेटे वे रोड और रेल मार्ग से यात्रा नहीं करती, हमेशा वायु मार्ग से आवागमन करती हैं इसलिए उनकी सवारी उल्लू होती है। हाथी तो दिखाने और सलामी देने के लिए खड़े कर रखे हैं।''
'' पर अंकल मैंने उनका ऐसा कोई चित्र नहीं देखा जिसमें वे उल्लू पर सवार हों, जब भी देखा है उन्हें कमल के फूल पर खड़े देखा है। उनके घर चेयर नहीं हैं क्या ?''
''बेटे उन्हें जब भी जरूरत होती है वे कमल के फूल को ही कुर्सी बनाती हैं या उल्लू पर सवार होकर फुर्र हो जाती हैं। उनका उल्लू बहुत तेज उड़ता है इसलिए वह फोटों में नहीं आ पाता''
''ये हाथी क्यों पालती हैं बेच क्यों नहीं देतीं जबकि इनके पास उल्लू और कमल का फूल दोनों ही हैं''
बच्ची की माया मेरी समझ में नहीं आ रही थी। उसके सवालों के आगे मैं लक्ष्मीवाहन का पट्ठा नजर आने लगा था मैंने झुंझला कर कहा- बेटे हाथी बिकने के लिए ही होते हैं, बिकेंगे बस कोई ठीक ठाक दाम चुकाने वाला भर मिल जाये। वे कर्नाटक में बिकेंगे, वे लखनउ में बिकेंगे, कहीं भी बिकेंगे। हाथी मंहगा बिकता है तथा ज्यादा पैसे वाला ही उसको खरीद पाता है- और हाँ अब तुम घर जाओं क्योंकि बहुत देर हो चुकी है।''
देश की जनता की तरह मासूम बच्ची नमस्ते अंकल कहती हुयी घर चली गयी और मैं हाथी के भविष्य पर विचार करने लगां
ऐसा लगा कि पना की लक्ष्मी मेरे ऊपर कुटिलता से मुस्करा रहीं थीं।

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

शनिवार, सितंबर 11, 2010

व्यंग्य - साम्प्रदायिक सद्भाव वाया दूरदर्शन


व्यंग्य
सरकारी साम्प्रदायिक सद्भाव वाया दूरर्दशन
वीरेन्द्र जैन
ईद होली दिवाली दशहरा आदि जो कभी खुशी के अवसर होते थे अब आतंकित होने के हो गये हैं। एक दिन पहले से खाकी वर्दी के लोग ऐसी निगाहों से घूरने लगते हैं कि आइना देखने को मन होने लगता है कि आखिर इस चेहरे से कहीं आतंकी होने का संदेह तो नहीं टपक रहा। राम भरोसे से पूछता हूँ- यार क्या मैं आतंकवादी जैसा दिखता हूँ?
उत्तर में वह उल्टा सवाल करता है- और क्या मैं दिखता हूँ?
''नहीं तो, पर तुम क्यों पूछ रहे हो?'' मैं पूछता हूं
''उसी कारण से जिस कारण से तुम पूछ रहे थे, आजकल सारे पुलिस वाले हर आदमी में कहीं आतंक तलाशते फिरते हैं, वे ऐसे देखते हैं जैसे कि फिल्मों के अंतिम दृशयों में खलनायक हीरोइन को देखता है। त्योहार आ गया है न.....'' वह बताता है।
आजकल त्योहारों के आने का पता इसी से चलता है जब पुलिस वाले घूर घूर कर देखने लगें तो समझो त्योहार आने को है। यदि रीतिकाल में ऐसा होता तो उस समय के कविराज जरूर उस पर कई छन्द रच जाते- घूरन लगे पुलिस के ठुल्ले, सखि दीवाली आई। जब मोटर साइकिलों की चैकिंग हो रही हो तो समझो कि छब्बीस जनवरी या पन्द्रह अगस्त आ गया है।
ऐसे में सरकार का भी कुछ कर्तव्य बनता है कि वह साम्प्रदायिक सद्भाव इत्यादि फैलाये सो वह ठीक समय पर वैसे ही फैलाने लगती है जैसे कि बबलू की मम्मी बरसात जाने के बाद क्वांर की धूप में गरम कपड़े फैला देती हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव फैलाने के लिए सरकार के पास एक दूरर्दशन नामक चीज है जो जैसे हाथ धोना सिखा कर स्वाइन फ्लू भगाना सिखाता है वैसे ही सरकारी रिपोर्टों द्वारा साम्प्रदायिक सद्भाव फैलवाता है। इस बार ईद को उसने जम्मू में पूरे दिन मुसलमान कारीगरों द्वारा रावण बनाना दिखाया और उससे साम्प्रदायिक सद्भाव का संदेश फैलवाया। वे बेचारे अपनी रोटी के लिए जुटे थे और ये साम्प्रदायिक सद्भाव खोज रहे थे।
इससे पहले मुझे पता नहीं था कि यह इतनी सरल सी चीज है बरना मैं कब से इसमें जुट गया होता और दो चार कतरनों के संग्रह छपवा कर कई इनाम जीत चुका होता,या लाखों की दौलत बना चुका होता। कुछ नमूने देखिये-
• भोपाल। सुबह के छह बजे हैं और ये उस्मान भाई हमारे दरवाजे पर हैं। ये हमारी पूरी कालोनी में पिछले दस सालों से अखबार बांट रहे हैं। हमारी कालोनी में एक भी मुसलमान नहीं रहता। कालोनी के हिन्दू बिल्डर ने फ्लैट बेचते समय उसकी जो विशोषताएं बतायी थीं उनमें से फुसफुसा कर बतायी गयी यह भी एक थी कि- हमने किसी मियां भाई को एक भी फ्लैट नहीं दिया। इस कालोनी के कई खरीददार तो इसी पर मुग्ध होकर फ्लैट बुक करवाये थे। इसमें सब हिन्दू हैं पर उसमान भाई बिना नागा सबको अखबार पढवा कर साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल कायम किये हुये हैं। हमारा देश महान है।
• ये सलीम भाई हैं जो कम्प्रैसर से हवा भरने का काम करते हैं अपने छह बच्चों को हवा खाने से बचाने के लिए ये हिन्दू मुसलमान सभी की कारों और बाइकों में हवा भर के साम्प्रदायिक सद्भाव की बयार चला रहे हैं, ये किसी से उसकी जाति और धर्म नहीं पूछते, और पूछने की जरूरत भी क्या है वो तो हाथों में कलावा बांध कर, माथे पर रंग लगा कर जाली दार टोपी पहिन कर, पगड़ी बांध बाल बढा कर या बकरे जैसी दाढी बढा कर अपने आराघ्य की कृपा का नारा वाहन पर मोटे मोटे अक्षरों में लिखवा कर वैसे भी प्रकट करता रहता है। ये बीस साल से इसी तरह हवा भरने और पंचर जोड़ने का साम्प्रदायिक सद्भाव का काम कर रहे हैं। हमारा देश महान है। उनके खुद के पास भी एक साइकिल है जो 'थी' की क्रिया लगाने के लिए पूरी तौर पर तैयार है। वह अब है और नहीं है जैसे दार्शनिक आधार बना सकती है
• मुसलमान दर्जी हमारे सूट सिल कर साम्प्रदायिक सद्भाव फैलाते हैं
• मुसलमान मैकेनिक हमारी मशीनें सुधार कर साम्प्रदायिक सद्भाव फैलाते हैं
• भारत रत्न विसमिल्ला खां भगवान विश्वनाथ के मंदिर के पीछे बैठ शहनाई बजा कर साम्प्रदायिक सद्भाव फैलाते थे और पीछे इसलिए बैठते थे क्योंकि उनका प्रवेश वर्जित था। हमारा देश महान है। भारत रत्न भारत में सब जगह नहीं जा सकता।
• मुसलमान रिक्शावाले हमें रिक्शों पर बैठा मंदिर पहुँचा कर साम्प्रदायिक सद्भाव फैलाते हैं
जब सरकार और उसके दूरर्दशन के पास साम्प्रदायिक सद्भाव फैलाने के इतने टोटके हैं तो फिर पता नहीं कि ये साला फैल क्यों नहीं रहा! क्यों बार बार मिरज मेरठ मुंबई गुजरात इंदौर धार होता रहता है। वे चाहें तो किसी हिन्दू को रोजा रखवा सकते हैं और किसी मुसलमान से ब्रत रखवा कर साम्प्रदायिक सद्भाव मजबूत करा सकते हैं। रोजा अफ्तार की दावतें दे सकते हैं।
हाँ नहीं करा सकते तो सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को लागू नहीं करा सकते। लागू हो गई तो वे मजदूरी की मजबूरी से निकल कर कुछ और भी कर सकेंगे पढ लिख सकेंगे।
पर तब दूरदर्शन साम्प्रदायिक सद्भाव मजबूत कैसे करेगा!
जय हो!
वीरेन्द्र जैन
21 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

शुक्रवार, सितंबर 10, 2010

व्यंग्य- मनमोहिनी राष्ट्रीय पर्व


व्यंग्य
मनमोहिनी राष्ट्रीय पर्व
वीरेन्द्र जैन
शेक्सपियर ने कहा था- आई डू नाट फालो इंगलिश, इंगलिश फालोस मी अर्थात मैं अंग्रेजी का अनुशरण नहीं करता अंग्रेजी मेरा अनुशरण करती है।
हिन्दी के साहित्यकार समझते हों या न समझते हों किंतु हमारे देश के नेता भाषा को ऐसी ही चेरी समझते हैं। आदरणीय अडवाणी जी डीसीएम टोयटा को रथ कहते हैं, तो संघ परिवार स्कूलों को मन्दिर का नाम देती है- सरस्वती शिशु मन्दिर- तय है कि मन्दिरों में कोई मस्जिद वाला तो जायेगा नहीं सो अपने आप ही बँटवारा हो गया। अब हमारे [कांग्रेस]जन प्रिय प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह जी भी कम थोड़े ही हैं सो वे कामन वैल्थ गेम्स को राष्ट्रीय पर्व कहते हैं तो क्या गलत कहते हैं, आखिरकार हैं तो वर्ल्ड बैंक के पूर्व कर्मचारी।
हमारे यहाँ तो छोटे से छोटा मजदूर भी पर्व त्योहार जरूर मनाता है भले ही उधार लेकर मनाये। वह और दिन पेट काट लेगा पर कहेगा- वा साब तेहार तो मनाना ही पड़ता है। छोटे आदमी का छोटा त्योहार सौ पचास रुपये में निबट जाता है पर वर्ल्ड बैंक वाले मनमोहनजी का राष्ट्रीय पर्व तो एक लाख करोड़ में ही मन पायेगा। आप ठीक से पढ रहे हैं न एक......लाख.....करोड़..। आशिक का जनाजा है जरा धूम से निकले। कंजूस चीन ने बीस हजार करोड़ में ओलम्पिक करा लिये थे पर हमारे यहाँ एक लाख करोड़ में कामन वैल्थ गेम्स हो रहे हैं जो उन देशों का समूह है जो कभी अंग्रेजों के गुलाम थे। यह ऐसा ही है जैसे कभी जेल में साथ रहे कैदी अपना सम्मेलन करें। ब्रिट्रेन ने भी बहुत उदारता दिखाते हुये अपने ओलम्पिक 72000 करोड़ में निबटा लिये थे जिनमें 11000 खिलाड़ियों ने भाग लिया था जबकि हमारे कामन वैल्थ गेम्स में तो कुल 72 देश और दो हजार खिलाड़ी ही भाग ले रहे हैं।
जब इसके मेडल बाँटे जायेंगे तो हमें खेल में भले ही मेडल न मिलें पर खेल की तैय्यारियों में किये गये भ्रष्टाचार के लिए जरूर ही सबसे ज्यादा मेडल मिलेंगें। कैसे कैसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं हमारे कर्ता धर्ता कि एक एक आदमी तीन तीन नामों से लूट रहा था। पहलवान तो डोपिंग टेस्ट में फँस गये अब कौन कहाँ कहाँ फँसा है यह बाद में पता लगायेंगे। एक खेल होना चाहिए कामन वैल्थ तैयारी गेम जिसमें दिल्ली से पशु भगाओ प्रतियोगिता हो, भिखारी भगाओ प्रतियोगिता हो, झुग्गी बस्ती उजाड़ो प्रतियोगिता हो। इससे बिल्डरों को बहुत सुविधा होगी। उजड़ी झुग्गी दुबारा तो बनने नहीं देंगे। रहमान को इसका संगीत रचने के लिए छह करोड़ दिये गये हैं तो मोदी के बाइब्रेंट गुजरात के ब्रांड एम्बेसडर अमिताभ बच्चन और समाजवादी पूर्व सांसद जया बच्चन की बहू ऐश्वर्या राय को प्रमोशन के लिए कई कई करोड़ दिये जायेंगे। राम नाम की लूट है लूट सके सो लूट अंत काल पछतायेगा जब पोस्ट जायेगी छूट। दनादन कंडोम ढाले जा रहे हैं, दुनिया भर से आने वाली काल गर्लों के लिए पलक पाँवड़े बिछाये जा रहे हैं, आखिर विदेशी मेहमान जो आने हैं। यह अलग बात है कि हम जनता को सड़ता हुआ गेंहूं भी मुफ्त नहीं दे सकते, पीने को साफ पानी नहीं दे सकते, निरक्षरों को साक्षर नहीं बना सकते सफाई स्वास्थ आदि की बातें तो जाने ही दीजिए। यह भीष्म साहनी की कहानी चीफ की दावत की तरह हो रहा है जिसमें चीफ के स्वागत के लिए पूरे घर और घर वालों को सजाया संवारा जाता है पर बूढी माँ को घर की एक कोठरी में बन्द कर दिया जाता है, आखिर चीफ को कुछ भी असुन्दर नहीं दिखना चाहिए।

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

रविवार, सितंबर 05, 2010

व्यंग्य- कानून , जिसे हमने हाथ में नहीं लिया


कानून जिसे हमने हाथ में नहीं लिया
वीरेन्द्र जैन

छोटे बच्चों की आदत होती है कि वे आपकी जेब मैं से चश्मा पैन या मोबाइल निकाल कर अपने मुँह में खाने लगते हैं। आप गोद में लिये हुये प्यारे प्यारे बच्चे का दिल भी नहीं तोड़ना चाहते पर उसे न खाने वाली चीज को मुँह में भी नहीं रखने देना पसंद करते हैं इसलिए उस चीज को छुपा देते हैं और कहते हैं कि कहाँ है वो तो छू हो गयी। अपने खाली हाथ दिखाते हुये आप उसकी अल्प विकसित समझ को भ्रमित करते हैं और वह हतप्रभ सा देखता रहता है कि इनके हाथ से वह चीज आखिर चली कहाँ गयी। कुछ लोग 'बड़े बूढे बच्चों' के साथ भी ऐसा ही खेल करते रहते हैं। उनकी दोनों जांघें सटी रहती हैं जिससे घुटने कुछ कुछ मुड़ जाते हैं पर वे दोनों हाथ खाली हिलाते हुये देश को बहलाते हुए नजर आने वाली मुख मुद्रा में कहते हैं कि हमने कानून को हाथ में नहीं लिया है! हम तो कानून हाथ में लेते ही नहीं हैं! देखो मेरे दोनों ही हाथ खाली हैं।
ज्यादातर लोग समझ नहीं पाते कि जब कानून इन्होंने हाथ में नहीं लिया तो आखिर कहाँ चला गया पर फिर भी कुछ लोग तो समझ ही जाते हैं कि इन्होंने कानून को कहाँ पर दबा रखा है। ये हाथ तो हिला कर दिखा रहे हैं पर टांगें नहीं हिला सकते, कुर्सी से उठ नहीं सकते।
हमारे देश में यह एक मंत्र वाक्य सा हो गया है कि कानून को हाथ में मत लो। नहीं लेते साब! लेते भी कैसे! जिन्दगी भर तो नून तेल सब्जी के थैले और गैस का सिलिन्डर हाथ में लिए घूमते रहे तो कानून को हाथ में कैसे लेते! हम तो कहते थे कि जिसको लेना हो सो ले हम तो सड़ने से बचाने के लिए राशन की दुकान से सस्ता गेंहू लेने जा रहे हैं, तुम्हें लेना हो तो तुम भी चलो।
पहले एकाध बार मन भी हुआ कि कानून को हाथ में लेकर देखें पर उसी समय पत्नी ने बच्चे को गोद में डालते हुये कहा कि अगर रोटी खाना हो तो पहले बैठ कर इसे खिलाओ। सो देश के भविष्य को हाथों में लिए बैठे रहे। कानून को हाथ में लेने का रोमांच कभी नहीं जिया।
समय बदला दुनिया बदली और यहाँ तक बदली कि कभी नेताजी के नाम से सुभाष चन्द्र बोस की तस्वीर उभरती थी पर अब गिजगिजी जुगुप्सा पैदा होती है। जो नेता पाठय पुस्तकों में अपनी जीवनी सहित छपते थे अब वे अखबारों के मुखपृष्ठ की शोभा बढाते हैं क्योंकि किसी को हत्या के लिए फाँसी की सजा हो रही होती है तो किसी को आजन्म कारावास की। कोई सवाल पूछने के पैसे लेने के लिए दण्डित हो रहा होता है तो कोई सासंद निधि स्वीकृत करने के लिए। कोई कबूतर बाजी कर रहा होता है तो कोई हवाला में बाइज्जत बरी होकर रथ पर सवार हो रहा होता है। यही कारण है कि अब नेता नहीं कहते कि कानून हाथ में मत लो। अब तो वे कहते हैं कि देखो तो बेचारा कानून कैसी जगह पड़ा हुआ है इसलिए हे वीर पुत्रो उठो और शिव के धनुष की तरह उसे हाथों में उठा कर उसकी प्रत्यंचा चढा दो।
राज्यों में जो दल सरकार में हैं वे ही प्रदेश बन्द का आवाहन करते हैं। हमारे एक मुख्यमंत्री ने एक बार कहा था कि वीरांगनाओं उठो और राशन की कालाबाजारी करने वालों का मुँह काला कर दो। महिलाएँ कहती हैं कि यह काम आप क्यों नहीं करते! तो उनका उत्तर होता है कि हमें जरा उनसे चुनावी चन्दा लेना पड़ता है इसलिए यह काम हम नहीं कर सकते। महिलाएं कहतीं हैं कि ठीक है पर जब तक तुम ये हमारी चूढियाँ सम्हाल कर रख लो और चाहो तो पहिन भी लो। वे चूढियाँ पहिन कर लालबत्ती वाली एसी गाड़ी में बैठ कर केन्द्र सरकार से और आर्थिक मदद माँगने चले जाते हैं। राज्य के मुख्यमंत्री और कर भी क्या कर सकते हैं!
दिल्ली की मुख्यमंत्री ने तो दलालों को पीटने का आवाहन कर दिया था पर जब लोगों ने पूछा कि आपकी पार्टी क्या कर रही है तो वे बोलीं गरमी इतनी पड़ रही है कि वे एक कैन्टीन चलाने वाले की गाड़ियाँ ले कर शिमला मसूरी गये हुये हैं। वैसे भी वे अहिंसक हैं और खुद भी चुनावों में पिटते रहते हैं इसलिए मारपीट उनका काम नहीं है। ये काम तो जनता को करना चाहिये, रही कानून की बात सो कानून अपना काम करेगा उससे डरना नहीं चाहिये।
केन्द्र के कृषिमंत्री ने अपने कानूनमंत्री से बिना सलाह लिए किसानों को सलाह दे डाली कि वे गाँव के प्राइवेट सूदखोरों का उधार न चुंकायें।
असल में बन्दे मातृम गाने और सूर्यप्रणाम के बाद जैसे ही हम भारत माता के श्री चरणों में अपना सिर झुकाते हैं वैसे ही हमारा ध्यान बंटने के दौर में सिर पर रखा कानून कहाँ गायब हो जाता है पता ही नहीं चलता। हम केवल उनके हाथ देखते रह जाते हैं कि वे तो खाली हैं और कानून उनके हाथों में दिख तो नहीं रहा है।
कोई नहीं कह रहा कि उसने कानून हाथों में लिया हुआ है, पर आखिर वो गया कहाँ? जनता द्वापर युग की गोपियों की तरह पूछती फिर रही है कि- कौन गली गया कानून ?
या पूछती है- कानून तू कहाँ है, दुनिया मिरी जवाँ है।
शम्मी कपूर का जमाना होता तो गाया जाता- कानून मिरा आज खो गया हैं कहीं, आप के पाँव के नीचे तो नहीं!
लैला मजनू की शैली में कहा जाता- कानून कानून पुकारूं में वन में, मोरा कानून बसा मोरे मन में।
कहाँ छुप गया है तू कठोर, देख तिरे चाहने वाले दर दर भटक रहे हैं
अखबारों में विज्ञापन छपवाया जाता प्रिय कानून तुम जहाँ कहीं भी हो फौरन घर चले आओ, तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी मम्मी की तबियत बहुत खराब हो गयी है। घर पर कोई तुम्हें कुछ नहीं कहेगा। जो लोग भी कानून को देखें वे उसे हमारे घर तक पहुँचाने में मदद करें, उन्हें उचित इनाम दिया जायेगा।
वीरेन्द्र जैन
21 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

शनिवार, अगस्त 21, 2010

व्यंग्य- पाकिस्तान में बाढ़


व्यंग्य
पाकिस्तान में बाढ
वीरेन्द्र जैन
“पाकिस्तान में बाढ आयी है और हमारे नेता परेशान हैं” राम भरोसे कुछ खीझ कर बोला।
“मानवीयता के नाते यह स्वाभाविक है” मेरी प्रतिक्रिया थी।
इसे सुनकर राम भरोसे कुटिलितापूर्वक मुस्कराया और बोला- इस सरकार के नेता, जो कहते हैं कि गेंहूं सड़ा देंगे पर गरीबों में नहीं बाँटेंगे, और मानवीयता?
“तो फिर?” मैने उसका मन टटोलना चाहा।
“उनमें से कई सोच रहे होंगे कि कामन वैल्थ गेम्स की तरह वहाँ से भी बाढ राहत का चेक देने पर दस परसेंट कमीशन मिल जायेगा जैसा अपने यहाँ से मिलता है”
“पर उन्होंने तो लेने से मना कर दिया था”
“उनके राष्ट्रपति खुद ही मिस्टर दस परसेंट के नाम से जाने जाते हैं और ऐसा ही क्रम चलता तो अंत में प्रार्थना ही बचती सो उन्होंने सोचा होगा कि प्रार्थना के लिए फालतू का अहसान क्यों लिया जाये”
“सुना है इसके लिए भी अमेरिका से सिफारिश लगवाना पड़ी है”
“अब इस महाद्वीप में अमेरिका की सिफारिश के बिना कुछ भी नहीं हो पाता, पाकिस्तान के प्रधान मंत्री की पत्नी पूछती होगी कि आज लंच के लिए चिकिन बिरयानी बनवा लें तो वे उत्तर देते होंगे हमसे क्या पूछती हो अमेरिका से पूछ लो, वे कह दें तो बनवा लेना। इसी तरह भारत की ओर से पचास लाख डालर की सहायता के लिये जब अमेरिका ने हाँ कह दी तभी उन्होंने स्वीकारी। हमारे नेता कहते हैं कि गेंहूं सड़ा देंगे पर गरीबों को नहीं देंगे और वहाँ के नेता कहते हैं कि चाहे बाढ पीढित मर जायें पर भारत की सहायता नहीं लेने देंगे। निदा फाजली ने कहा है न-
खूंखार दरिन्दों के फकत नाम अलग हैं
इंसान में शैतान यहाँ भी है वहाँ भी “
“पर डर है कि अगर बाढ पीढितों को सहायता नहीं मिली तो वे चालीस लाख लोग तालिबानों के प्रभाव में आ जायेंगे” “पता नहीं यह उनका डर है या अमेरिका को डराने का तरीका है। अभी जितने लोग तालिबानों के प्रभाव में आ गये हैं वे क्या बाढ पीढित हैं या अमेरिका पीढित!”
“पर हमारे यहाँ के नेता क्यों परेशान है?”
“इसलिए, क्योंकि बाढ हमारे यहाँ नहीं आयी और सूखे के न आने की भी भविष्यवाणियाँ की जा रही हैं! बेचारे! सूखी तनखा पर गुजर करेंगे “

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629