गुरुवार, मई 20, 2010

व्यंग्य- न साधु की जात पूछो और न ज्ञान्

व्यंग्य
न साधु की जाति पूछो और न ज्ञान
वीरेन्द्र जैन
यह कहना गलत है कि साधु की जाति नहीं होती। साधु की जाति तो होती है किंतु वह बताना नहीं चाहता। हमारे नीतिज्ञों ने कहा है- जाति न पूछो साधु की, पूछ लीज़िए ज्ञान
ये बातें अगर सही अर्थों में स्मझी जायें तो बहुत काम की हैं, भल्र ही थोड़ी बहुत मुश्किल हैं। बहरहाल पहली बात पर आयें और गौर फरमाएं कि नीतिज्ञों ने कहा है कि साधु की जाति तो होती है, पर पूछिएगा मत क्योंकि ज्यादातर साधु उन्हीं जातियों में से बनते हैं जो समाज में निचली समझी जाती रही हैं। ऊंची जाति वाले तो वैसे ही मालपुये उड़ाते रहते रहे हैं सो उन्हें आधुनिक साधु बनने के पाखण्ड की क्या ज़रूरत! ये पुरानी कहावत पहले भी सही थी और उस स्तिथि में अभी भी कोई खास फर्क नहीं आया है। मानलो राम भरोसे ने किसी साधु से उसकी जाति पूछ ली-
“महाराज कौन ठाकुर हौ?” अब यदि बाबा किसी दलित मानी जाने वाली जाति में से हुआ तो वो क्या बताएगा। वह आँखें दिखा सकता है, गुस्सा दिखा सकता है, गाली दे सकता है, श्राप दे सकता है पर जाति बता कर अपने धन्धे का भविष्य खराब नहीं करना चाहता, भले तुम्हारा कर दे। इसलिए समझदारी इसी में है कि उसकी जाति मत पूछो।
पर एक स्तिथि ऐसी भी आती है जब साधु को दोनों जहाँ की फिक्र सताने लगती है और वह राजनीति में कूद पड़ता है। बस यहीं उसे अपनी जाति बताना पड़ती है। साधु हो या साध्वी उसे बताना पड़ता है कि वह लोधी है या यादव है जिससे लोधी या यादवों के वोटों को देखते हुये उसे टिकिट मिल सके और टिकिट मिलने के बाद वोट भी मिल सकें।
सन्यासी जब होंगे तब होंगे अभी तो प्रत्याशी हैं और प्रत्याशी की जाति जाने बिना वोट नहीं मिलते। तुन सड़क बनवा दो पुल बनवा दो, स्कूल खुलवा दो अस्पताल खुलवा दो और अगर पहले से खुला हुआ है तो उसमें डाक्टर और मास्टर पोस्ट करा दो, यदि पोस्ट हैं तो उनका आना सुनिश्चित करवा दो, पर यदि अपनी जाति के नहीं हो तो सब बेकार। इन साले वोटरों के बच्चों को जैसे वोट नहीं देना हो अपनी बेटी व्याहना हो। सो साधु को भी जाति खोलना पड़ती है।
भले बाबा का ढाबा चल निकले और योग की डिश खूब बिकने लगे पर आयुर्वेदिक दवाओं की फैक्ट्री में फायदा तभी हो सकता है जब मज़दूरों को ठीक से वेतन न देना पड़े और सरकार की उदार सहायता मिलती रहे। सो लालू और मुलायम को बताना पड़ता है कि तुम भी यादव हम भी यादव। बाबा बन गये पर जात नहीं भूले।
में किरार मुख्यमंत्री हो तो लोधी साध्वी को प्रदेश में स्थान नहीं मिलता। उसे अपनी तशरीफ लोधी बहुल दूसरे राज्य में ले जाकर अपने चोगे के रंग को भुनाने की सलाह दी जाती है-
जोगी तुम जाओ रे,
ये है धन प्रेमियों की बस्ती,
यहाँ पैसा ही है ईश्वर
जोगी तुम जाओ रे.................
[ पैसा खुदा तो नहीं पर खुदा से कम भी नहीं]

बेचारा साधु अपना इकतारा बजाता हुआ अपनी जाति वालों के पास चला जाता है। यही सत्य है यही ईश्वर है। आखिर में अंतिम संस्कार अपनी जाति वाले ही करते हैं। दूसरी बात कि अगर आप साधु का ज्ञान पूछने लगे तो आपका कल्यान निश्चित है। वे मोटे मोटे डंडे, चिमिटा और त्रिशूल आदि इसीलिए रखते हैं कि ज्ञान पूछने वाले का संज्ञान ले सकें। साला, हमारा ज्ञान पूछता है, कपड़ों का रंग नहीं देखता। हमने ये रंग चुना यही हमारा ज्ञान है। हम साधु हैं और चाहे जिस भक्त पर जीप चढा दें, कानून हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। नंगों से भगवान भी डरता है ये तो उस सरकार की पुलिस है जो इस बात पर भी अपनी पीठ खुद थपथपाती है कि साधु की जीप से इतने कम लोग मरे, कुम्भ सफल रहा। साधु कोई राज्यपाल थोड़ी है कि उसका स्टिंग आपरेशन हो जाये तो स्तीफा देना पड़े या साड़ी लुटाकर पचासों औरतों को मार दे और अंतर्ध्यान हो जाये। भगवा पहिन कर कुछ भी करते रहो और फिर भी देश सेक्युलर होने का ढिंढोरा पीटता रहे। जय हो।
इसलिए न साधु की जात पूछना और ना ज्ञान पूछना इसी में कल्याण है। नचिकेता की कथा यही कहती है कि ज़िन्दा रहना चाहते हो तो कुछ मत पूछो।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

बुधवार, मई 19, 2010

व्यंग्य - प्लेटफार्म पर मौतें

व्यंग्य प्लेटफार्म पर मौत
वीरेन्द्र जैन
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मैं आत्महत्या करने जा रहा हूँ
कहाँ ?
रेलवे स्टेशन पर
पर सारी दुनिया में आत्महत्या करने के लिए लोग स्टेशन पर नहीं रेल की पटरियों पर जाते हैं।
जाते होंगे, पर यह हिन्दुस्तान है, यहाँ लोग प्लेटफार्म पर भी मर सकते हैं।


वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

रविवार, मई 16, 2010

व्यंग्य अखिल भारतीय श्वान सम्मलेन में व्यक्त चिंताएं


अखिल भारतीय श्वान सम्मेलन में व्यक्त चिंताएं
वीरेन्द्र जैन
अगर कोई जाति दलित पिछड़ी या उपेक्षित होती है तो वह अपनी पहचान बनाये रखकर भी अपनी जाति को प्रचलित नामों की जगह संस्कृतनिष्ठ शब्दों में बदलकर अपना जाति सम्मेलन आयोजित करती है। शायद यही कारण रहा होगा कि जब कुत्तों ने माननीय नेताओं के उदगारों पर अपने विचार व्यक्त करना चाहे तो उस आयोजन का नाम कुत्ता सम्मेलन न रखकर अखिल भारतीय श्वान सम्मेलन रखा और उसीका बैनर लगाया ताकि पढे लिखे लोग भी यह न कह सकें कि साला कुत्ता सम्मेलन हो रहा है। प्लेक्स के बैनर पर श्वान शिरोमणि को पाँच पाण्डव और सती द्रोपदी के साथ हिमालय की ओर कूच करता हुआ दर्शाया गया था। इतना ही नहीं सम्मेलन का उद्घाटन करने वाले श्वान श्री ने कहा कि ये सम्मेलन महान स्वामिभक्त श्वानों का सम्मेलन है किसी राजनीतिक पार्टी की सभा नहीं है। इसमें श्वानों की समस्याओं पर गम्भीरता पूर्वक विचार होगा। उनकी इस ओज़ पूर्ण वाणी पर सभी श्वानों ने तलुआ ध्वनि करके हर्ष व्यक्त किया।
विषय प्रवर्तन करते हुये श्वान प्रमुख ने कहा कि आज हम अपनी जाति के अपमान से आहत होकर इतनी बड़ी संख्या में यहाँ एकत्रित हुये हैं और यही कारण है कि दूर दूर से पधारे अपने श्वान भाइयों पर भोंकने की परम्परा को छोड़ कर हम एक साथ बैठे हुये हैं। ये नेता लोग पिछले कई सालों से लगातार हमारा अपमान करते चले आ रहे हैं और अब तो हद ही हो गयी। हमने बहुत दिनों से तलुवे चाटना बन्द कर दिया है और आजकल बंगलों में रहने वाले बन्धु मालिकों के मुँह चाटते हैं न कि तलुवे। हमें इंसान के जैसा बताकर हमारा अपमान किया जा रहा है। हम इंसान के जैसे कृतघ्न नहीं हो सकते कि जो राज्य में हमारी सरकार बचाये हम उसी के खिलाफ केन्द्र में बिक जाएं और बार बार बिक जाएं ।
...............न हम चारा खाते हैं और न भाईचारा !
[इसके बाद वह कुछ सैकिंड तक रुका ताकि श्वानों को तलुवे पीटने का अवसर मिल सके, और संकेत समझ कर तलुवे पीटे भी गये]
हम तो दूध रोटी, बोटी या अंडे वगैरह खाते हैं जो सत्तर प्रतिशत इंसानों को नसीब नहीं होते। ये इंसान ज़िन्दा रहने में ही नहीं मरने में भी हमारी नकल करने लगा है और देश के लाखों इंसान हमारी [कुत्तेकी] ही मौत मर रहे हैं। जाने को तो हम यधुष्टिरों के साथ स्वर्ग में भी गये हैं, पर

रौनके ज़न्नत कभी भी हमको रास आयी नहीं
हम ज़हन्नुम में ही रहना चाहते परवरदिगार
हमने तो कभी संसद में भी जाना पसन्द नहीं किया बरना जब वहाँ तीन सौ करोड़पति जा सकते हैं तो उनकी सुरक्षा करने वाला क्यों नहीं जा सकता। जब वहाँ तरह तरह के अपराधों के आरोपों से घिरे आरोपी पहुँच सकते हैं, गद्दार पहुँच सकते हैं, सांसदनिधि बेचने वाले पहुँच सकते हैं, सवाल उठाने के लिए पैसे माँगने वाले पहुँच सकते हैं, कबूतरबाज़ी करने वाले पहुँच सकते हैं, दलाली करने वाले पहुँच सकते हैं, तो हम स्वामिभक्त क्यों नहीं जा सकते। पर नहीं, हमने तय किया है कि हमें वहाँ नहीं जाना सो नहीं जाना, भले ही वहाँ कभी कभी कुछ अच्छे इंसान भी मिल जाते हों। हमारा वंश चाँद पर सबसे पहले जाने वालों का वंश है। हम भले ही पुलिस में चले जायें, पर वहाँ नहीं जाना सो नहीं जाना। किंतु ये इंसान फिर भी हमारी तुलना वहाँ जाने वाले खराब लोगों से करने पर तुला हुआ है। किसी ज़माने में हमारी तुलना ब्राम्हणों और नाइयों के साथ होती थी, पर हा... आते आते क्या ज़माना आ गया है कि हमारी तुलना कैसे कैसे लोगों से होने लगी है। दलाल लोग सरे आम कहने लगे हैं कि हमें मालूम है कि कुत्ता कौन है। जैसे ग़ालिब चचा कह गये हैं कि हमको मालूम है ज़न्नत की हक़ीकत लेकिन, दिल के बहलाने को ग़ालिब ये खयाल अच्छा है। अरे भाई मालूम है तो बताओ भी। उसे अपनी टेलीफोन टेपिंग की तरह छुपा क्यों रहे हो। पर दलाल तो हर मामले में सौदा करना चाहता है। फिल्म में सस्पेंस हो तो खूब चलती है। कयास लगाने वाले सम्भावनाओं की पतंगें दूर दूर तक उड़ाने लगते हैं। .......और ये सब हमारी कीमत पर हो रहा है। यदि ये नेता नहीं माने तो हमें ज़बाबी कार्यवाही करना पढेगी जिसका यह उपयुक्त समय है। हमें मालूम है कि ज्यादातर स्वास्थ संचालकों के घरों से करोड़ों रुपये निकल रहे हैं, किंतु, अस्पतालों में रैबीज़ के इंजेक्शन नहीं हैं और जो हैं या तो वे नकली हैं या एक्स्पायरी डेट के हैं। इस समय हमला कर देने से ये घर के रहेंगे न घाट के। [ सभा में ज़ोश भर गया था और तलुवे पीटे जाने लगे]
पत्रकार लोग तुरंत वहाँ से खिसक लिये ताकि एकाध अदद रैबीज़ के इंजैक्शन का जुगाड़ ज़मा सकें।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

शुक्रवार, मई 14, 2010

व्यंग्य- मुहावरे में कुत्ता


व्यंग्य
मुहावरे में कुत्ता
वीरेन्द्र जैन
कुत्ता बहुत पुरानी जाति है। पाण्डव स्वर्ग जाते हुये अपने कुत्ते को स्वर्ग में भी साथ ले गये थे और उसके बिना युधिष्टर ने स्वर्ग में जाने से भी मना कर दिया था। तब से ही यह परम्परा चल पड़ी है कि जो भी बड़ा आदमी कहीं जा रहा है उसके पीछे पीछे उसके कुत्ते भी जाते हैं। परम्परा बड़ी खराब चीज़ होती है जो चलती चली जाती है। पिछले दिनों जब अमेरिका के प्रेसीडेंट भारत आये थे तब गान्धीजी की समाधि पर जाने से पहले उनके कुत्तों ने गान्धीजी की पूरी समधि को सूंघा था। वे सोचते होंगे कि क्या पता ये गान्धी अब पुराने गान्धी न हों और अचानक ही समाधि से उठ कर धायँ धायँ कर दें। अमेरिका ने इतने पाप किये हैं कि उसके पदाधिकारियों को हरेक से डर लगता रहता है।
किसी ज़माने में कुत्ते पुलिस के विशेषण की तरह याद किये जाते थे किंतु बहुत दिनों से पुलिस वालों ने उस विशेषण से पीछा छुड़ा लिया है क्योंकि अब राठौर जैसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ और भी बड़े बड़े विशेषण जुड़ने लगे हैं। किसी ज़माने में किसी कवि ने लिखा था कि - कुत्ता कहने से बुरा मानते पुलिस वाले
रक्खा निज ठौर का फिर नाम कुतवाली क्यों
राजनीति को सर्वग्रासी कहा जाता है सो वो अब विशेषणों से लेकर गालियों तक सब कुछ हज़म करने लगी है। गालिब पहले ही कह गये हैं कि – गालियाँ खा के बेमज़ा न हुआ। किसी ज़माने में जब राम जेठमलानी भाजपा में थे तब उन्होंने बोफोर्स काण्ड पर राजीव गान्धी से प्रति दिन दस सवाल पूछने का सिलसिला शुरू किया था शायद वे राजीव जी की क्षमता पहचानते थे और नहीं चाहते होंगे कि एक दिन में ज्यादा सवाल पूछ कर सारे उत्तर एक साथ माँगे जायें। राजीवजी ने उनके किसी सवाल का तो उत्तर नहीं दिया था अपितु इतना भर कहा था कि कुत्ते भौंकते ही रहते हैं। प्रति उत्तर में अपने समय के नामी वकील जो अभी मनु शर्मा की वकालत करने में भी बिल्कुल नहीं शरमाये थे उत्तर में कहा था कि कुत्ता चोर को देखकर ही भौंकता है।
लोगों के शौकों का पता धीरे धीरे ही चलता है हाल ही में पता चला है कि भाजपा के नये अध्यक्ष नितिन गडकरी को मुहावरे दार भाषा बोलने का बहुत शौक है और इसी शौक के वशीभूत उन्होंने कह दिया कि लालू और मुलायम कुत्ते की तरह सोनिया जी के तलुवे चांटते है। अब ये बात काँग्रेसियों को कैसे हज़म हो सकती है कि उनके हक़ को दूसरी पार्टी के लोग हड़प जाएं। उन्होंने विरोध किया तो भारतीय संस्कृति के गौरव माननीय गडकरी जी ने कहा कि उन्होंने तो मुहावरे में कुत्ता कहा था। कल्पना करें कि अगर उन्होंने उक्त स्पष्टीकरण नहीं दिया होता तो हो सकता था कि लोग सोचते कि सोनिया जी के तलुवे इतने साफ सुथरे इसलिए रहते हैं। यह् रहस्य अब समझ में आया।
आदरणीय गडकरीजी जब मुहावरेदार भाषा का प्रयोग करते हैं तो उन्हें पता ही होगा कि हिन्दी में मुहावरों का भण्डार भरा हुआ है। इनमें से कुछ हैं- राम नाम जपना पराया माल अपना मुँह में राम बगल में छुरी राम मिलायी जोड़ी, इक अन्धा इक कोड़ी राम नाम ले हज़म कर गये, गौशाला के चन्दे इत्यादि मुहावरे कम पड़ जायें तो इस अकिंचन को सेवा का अवसर दें। आप जैसे मुहावरेदार महानुभाव की सेवा करके मुझे बड़ी खुशी होगी।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

मंगलवार, मई 04, 2010

शौचालय और मोबाइल की क्या तुलना

शौचालय और मोबाइल की क्या तुलना
वीरेन्द्र जैन


कभी आदमी की मौलिक ज़रूरतों में रोटी कपड़ा और मकान हुआ करता था किंतु अब प्रथिमिकताएं बदल गई हैं, रोटी कपड़ा और मकान की जगह रोटी कपड़ा और मोबाइल ने ले ली है।
मकान न हो तो चलेगा। वैसे भी अगर मोबाइल आ जाये तो आदमी मकान से बाहर ही निकलता है। ओशो रजनीश की भाषा में कह सकते हैं कि मकान से मोबाइल तक अर्थात मकान पहला कदम है और मोबाइल उसकी मंज़िल। जो पहले कदम पर ही जम कर बैठ गया तो उसे मंज़िल कैसे मिलेगी। पहला कदम ज़रूरी है पर उसी पर टिक कर नहीं रह जाना है। ओशो यही सिखा गये हैं।जड़ से चेतन की ओर यात्रा।
मकान है और मोबाइल आ गया तो पड़ोसियों को कैसे पता लगेगा कि हमारे पास मोबाइल आ गया है तो सिग्नल बाहर आकर ही मिलते हैं और इसी बाहर आने से सिग्नल बाहर तक पहुँचते भी हैं। मोबाइल आ गया तो अपनों के प्यार भरे फोन भी आयेंगे और फोन आयेंगे तो बातें भी होंगीं अब वे बातें ऐसी तो होती नहीं जैसे कि सास बहू के सीरियल हों या झगड़े हों, जो घर परिवार के सभी सदस्यों के बीच कह-सुन ली जायें सो बाहर तो निकलना ही पड़ेगा। कहने का मतलब यह कि मोबाइल ने आदमी को मोबाइल अर्थात गतिवान बनाया है। घर से बाहर निकल खेत की ओर चल.....[निदा फाज़ली से क्षमा याचना सहित]
मोबाइल के कई उपयोग होते हैं जैसे कि आप उसे कान से लगाकर प्राणांतक कवि गोष्ठी से बाहर निकल कर सुख-संतोष की सांस ले सकते हैं, और कोई आपको सींग पुच्छविहीन पशु भी नहीं कह सकता है, क्योंकि ज़रूरी काल आया है। इसकी कालर ट्यून तो मरघट तक में हो गयी तेरी बल्ले बल्ले कर सकती है।
कितने गिनवाऊँ मोबाइल के फायदे ही फायदे हैं, पर कुछ लोग हैं जिन्हें तुलना करने की बीमारी होती है वे तुलना ही करते रहते हैं जैसे कि कोई कांग्रेसी कहे कि भाजपा ने गुजरात में गुजरात में तीन हज़ार मुसलमान मार डाले तो वे पलट कर कहते हैं कि इससे ज्यादा तो तुमने 1984 में सिख मार डाले थे। ऐसे ही लोग कहते हैं कि देश में शौचालय से अधिक मोबाइल हो गये हैं। अरे भाई शौचालय अपनी जगह और मोबाइल अपनी जगह। यही देखो कि शौचालय मोबाइल में तो आ नहीं सकता किंतु मोबाइल शौचालय में जा सकता है। छोटे बच्चे तक अपनी मम्मी से कहने लगे हैं कि मम्मी तुम टायलेट से बाहर रहो और मोबाइल से पूछती रहो कि छिछ्छी की या नहीं। शौचालय का उपयोग दिन में एक दो बार होता है किंतु मोबाइल का उपयोग दिन में दो सौ बार हो सकता है। शौचालय में तो अनावश्यक रूप से पानी की बरबादी होती है क्योंकि किये कराये पै पानी फेरना होता है किंतु मोबाइल में एक बून्द भी पानी की चली जाये तो उसकी बोलती बन्द हो जाती है। यही कारण है कि पानी बचाओ आन्दोलन वाले उसी पेज पर मोबाइल के दस बीस विज्ञापन छापते रहते हैं जिस पेज पर पानी बचाने की दस बीस लाइनें छपी होती हैं। पानी बचाने की यह भी एक तरक़ीब है कि मोबाइल को पास रखो जिसे पानी से दूर रखना पड़ता है। शौचालय को गन्दा स्थान समझा जाता रहा है कि जिसमें आदमी को मजबूरी में ही जाना होता है और वह वहाँ से शीघ्रातिशीघ्र बाहर आना चाहता है किंतु मोबाइल ऐसी चीज होती है जिसे दिन में तो क्या रात में भी दूर नहीं रखा जाता। साइलेंट या बाइब्रेशन मूड में तो इसे दिल के और ज्यादा करीब रखा जाता है। क्या कभी किसी ने मोबाइल में से बदबू आने की शिकायत की है या मोबाइल सुधारने वाले को किसी ने कभी अछूत समझा है? शौचालय जड़ है जबकि मोबाइल चेतन होने के सारे गुण रखता है वह धड़कता है, बोलता है, गाता है, संगीत सुनाता है, मनोरंजन करता है, सन्देशों का आदान प्रदान करता है। अब आप ही बताइए कि मोबाइल की शौचालय से क्या तुलना?
हमारे ऋषि मुनि जब हिमालय पर तपस्या करने जाते थे तो महीनों सालों तक शौचालय के बारे में सोचते तक नहीं थे किंतु अपनी आत्मा के मोबाइल से परम पिता परमात्मा से डायलोग करते रहते थे। यह हमारी पुरानी परम्परा का थ्री जी सिस्टम था जिससे संजय युद्ध का ताजा हाल महल-बैठे अन्धे धृतराष्ट्र को सुनाता रहता था। अनेकानेक जगहों को हमने महाभारत काल, रामायण काल के स्मारकों की तरह संरक्षित कर रखा है किंतु इन पौराणिक काल की पांडव कुटीरों आदि में कहीं भी शौचालय नज़र नहीं आते। ये गन्दी सोच तो आज के लोगों की है कि शौचालय के बारे में सोचते हैं। हमारे किसी भी काल के किसी भी पौराणिक ग्रंथ में इसे समस्या के रूप में नहीं लिया गया और ना ही वर्णन किया गया। जबकि बाकी के सारे काम किये जाने के श्लोक मिल जाते हैं। इसलिए अगर शौचालय की तुलना में मोबाइल बढ रहे हैं तो स्वाभाविक है। दर असल जिनके यहाँ शौचालय नहीं हैं उन्होंने कभी चिंता प्रकट नहीं की, आज तक कोई आन्दोलन शौचालय की माँग को लेकर नहीं हुआ, जबकि यह खुरापात तो उनके दिमागों की उपज है जिनके यहाँ एक बैड रूम से अटैच रहता है और दूसरा बाथ रूम से। जिनके यहाँ शौचालय नहीं हैं वे पक्के राष्ट्रवादी हैं और पूरे देश को माँ की गोद समझते हैं। मिनरल वाटर की बोतल में सादा पानी भरा और लोगों की नज़रें बचा के जहाँ जगह मिली सो हज़रते दाग की तरह बैठ गये, बैठ गये। और एक बार जहाँ बैठे वहाँ दुबारा नहीं देखा। हर बार एक नई जगह की तलाश में कोलम्बस की तरह निकल पड़ते हैं।
इसलिए प्यारे भाइयो, बहिनो और पत्रकार बन्धुओ, कृपया मोबाइल से शौचालय की तुलना न करें अपितु शौचालय से शौचालय की और मोबाइल से मोबाइल की तुलना करें। तुलना बराबरी वालों में ही ठीक रहती है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

शुक्रवार, अप्रैल 23, 2010

व्यंग्य - डाकिये और कुत्ते

व्यंग्य
डाकिये और कुत्ते
वीरेन्द्र जैन
डाकिया बेचारा क्या करे। दर दर भटकना उसकी मजबूरी है। भिखारी और डाकिये में इतना ही फर्क होता है कि भिखारी लेने के लिए आता है और डाकिया देने के लिए आता है। भिखारी टेर लगाता है, एडवांस में दुआएं लुटाता है जबकि डाकिया चुपचाप डाक डाल कर चला जाना चाहता है पर ऐसा हो नही पाता! बंगलों पर बंगले में रहने वालों के नाम पट के साथ कुत्तों से सावधान रहने के बोर्ड भी लगे होते हैं। अब बेचारा कुत्तों से सावधान रहने के चक्कर में रहे तो डाक नही बांट सकेगा और उसकी नौकरी खतरे में पड़ सकती है। पर सावधान न रहने पर जिन्दगी खतरे में पड़ सकती है। बहुत धर्म संकट रहता है बिल्कुल उत्तर भारत के मतदाओं जैसा कि इधर कांग्रेस् उधर भाजपा, यहॉ कुंआ वहां खाई- कहॉ जायें भाई।

बंगलों और कुत्तों का नेता और चमचों जैसा चोली- दामन नुमा साथ होता है। ऐसा लगता है जैसे बंगले बनाये ही कुत्तों के लिए जाते हों। बंगलें में चाहे ड्राइंग रूम, लॉन, पोर्च आदि हो या न हो पर कुत्ता जरूर होता है- गोया बंगले के साथ फ्री मिलता हो। घंटी बजने के उत्तर में सबसे पहले कुत्ता ही उत्तर देता है जिससे डाकिये की टांगे थरथराने लगती हैं। बंगले वालों की डाक वह बाहर से भी नहीं फेंक सकता। उनकी डाक में ज्यादातर शेयरों के एलाटमेन्ट या वापिसी के चैक आते हैं जो रजिस्टर्ड डाक से आने के कारण उनको दस्तखत कराके देना पड़ते है। दरवाजा खुलते ही सबसे पहले कुत्ता ही निकलता है। उसकी समझ में नहीं आता कि मालकिन को बिना बाहों वाले वस्त्रों में देखकर श्रृंगार भाव जगाये या कुत्ते के भय से भयभीत हो। इधर दिल मचलता है तो उधर पेंट गीली हो जाने का खतरा मंडराता है। डाकिये के पास गैस सिलेन्डर वाले जैसा भारी भरकम सामान भी नही होता कि कुत्ते के काटने की दिशा में उस पर पटक देने की सुविधा हो, ना ही वह अखबार वाले की तरह पुंगी बना कर फेंक सकता है। उसे तो धीरे से किवाड़ के नीचे से सरकाने या पर्सनल लैटर बॉक्स (यदि लगा हो) में डालना होती है। कोई हाथ में ले ले तो और भी अच्छा ।

एक बार एक भौंकते हुऐ कुत्ते को देखकर डाकिये ने बाहर से ही पूछा था- यह काटता तो नहीं है ?

'' आ जाओं, आ जाओं '' मालिक ने उत्तर में कहा था।
'' मै पूछ रहा था यह काटता तो नहीं है,'' डाकिये ने प्रश्न दुहराया था।
'' आ जाओं कुत्ता नया खरीदा है और इसकी यही जॉच करनी है, बेचने वाले ने तो कहा था कि बाहरी आदमी को देखते ही टूट पड़ेगा'' मालिक ने स्थिति साफ की थी।

कुत्तों के बारे में मित्र लोग दूसरों को यह सलाह देते हैं कि कुत्ते के भोंकने पर भागना नहीं चाहिए। वैसे ऐसी सलाह देने वाले लोगों को सबसे पहले भागते हुए देखा जाता है। जिस बंगले का कुत्ता काटने दौड़ता है उस बंगले के आसपास वाले दो तीन बंगलों की डाक बिना बंटी ही रह जाती है।

पहले डाकियों की वर्दी का रंग गलत था। वह पुलिस वालों जैसे खाकी वर्दी पहनते थे। भले ही उस वर्दी पर पुलिस वालों जैसा कलफ नहीं लगा रहता तथा उनकी वर्दी की धुलाई का एलाउन्स अन्य कामों में आता हो पर कुत्तों को तो यह ज्ञान नहीं होता वे तो उन्हें खाकी वर्दी में देखकर अपनी ही जाति का समझ कर ही गुर्राने लगते थे। अब अच्छा हुआ हैं कि उनकी वर्दी का रंग नीला कर दिया गया है।

सुधारों के इस क्रम में डाकियों की भर्ती के समय जो आवश्यक बातें जॉचना चाहिए वे इस प्रकार हो सकती हैं कि:-

1- डाकिये को अच्छा दौड़ने वाला होना चाहिए।

2- वह चप्पल पहिनने वाला नहीं होना चाहिए।

3- उसे चरित्र का मजबूत होना चाहिए जो मालकिन और कुत्ते के एक साथ प्रकट होने पर कुत्ते से अधिक सावधान रहे।

4- उसे पेट में लगने वाले इन्जेक्शनों के प्रति भयग्रस्त नही होना चाहिए।

5- उसे कुत्ते वाले बंगलों की डाक को पंच तत्व में विलीन कर अंतिम संस्कार की क्रिया में भी पारंगत होना चाहिए ताकि वक्त जरूरत पर काम आ सके।

श- उसे गाय के महत्व पर एक प्रवचन याद होना चाहिए ताकि वह कुत्ते पालने वालों को गाय का महत्व समझा सके।

7- उसे नई तकनीक जैसे- फोन, फेक्स, ई- मेल और कोरियर सेवा के बारे में अच्छी जानकारी होना चाहिए तथा मौका मिलते ही उनके महत्व को समझाना चाहिए। खास तौर पर कुत्ते वाले बंगलों वालों को।

8- सम्भव हो सके तो उसे जिरह बख्तर पहना कर डियूटी पर भेजा जाना चाहिए ताकि लोग महाराणाप्रताप को नहीं भूलें।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

बुधवार, अप्रैल 14, 2010

एक लतीफा - माँ मैं तुम्हें मिस कर रहा हूँ

एक लतीफा
माँ मैं तुम्हें मिस कर रहा हूं
एक पोस्ट का शीर्षक पढते पढते अचानक ही एक लतीफा हो गया तो सोचा कि
उसे आपसे शेयर कर लिय जाये
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बेटे का हास्टल से फोन आया तो माँ और बेटा दोनों ही भावुक हो गये। बेटा बोला माँ मैं तुम्हें मिस कर रहा हूं.....। सुन कर माँ शर्मा गयी और बोली बेटे पहले मैं मिस ही थी पर तुम्हारे पिताजी ने ही मुझे मिसेज बना दिया। ये तो वन वे ट्रैफिक है अब में दुबारा मिस नहीं हो सकती।
veerendra jain
2/1 shaalimaar sterling
raisen road BHOPAL
9425674629