गुरुवार, फ़रवरी 18, 2010

दो लघ कथायें

दो लघुकथाएं
वीरेन्द्र जैन
1
नकली नोट और असली मशीन
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एक प्रदेश के बड़े मंत्री ने प्रधानमंत्री द्वारा बुलायी गयी आंतरिक सुरक्षा की बैठक में कहा कि अगर हमें नकली नोटों के चलन से मुक्ति पानी है तो उसका उपाय हमारे पास है। यह सुनकर ज़िज्ञासा में सारी निगाहें उनकी ओर उठ गयीं।
इस ध्यानाकर्षण के बाद उन्होंने कहा कि नकली नोटों से बचने का इकलौता उपाय यह है कि हज़ार और पाँच सौ रुपयों के नोट बन्द कर दिये जायें। इससे विदेश से इन नोटों को लाने वालों को ट्रक में भरकर लाना पड़ेगा और हम ट्रक को ऐसे ही पकड़ लेंगे जैसे हाईवे पर खड़े रह कर हमारे ट्रैफिक इंसपैक्टर पकड़ लेते हैं।
उनका उत्तर सुनते ही सारे लोग मुस्करा दिये और बात आयी गयी हो गई। बैठक से लौटते हुये बड़े मंत्री के निजी सचिव ने कहा कि सर अगर हमारा प्रस्ताव मान लिया गया होता तो हमें तो बहुत मुश्किल हो जाती क्योंकि अपने यहाँ भी ट्रकों में भर कर नोट आते तो अपुन हिसाब कैसे रखते।
- तुम्हें पता नहीं कि हमने भी यह बयान सोच समझ कर ही दिया है। अपनी मेमसाब ने पहले ही नोट गिनने की मशीन खरीद कर रखी हुयी है- बड़े मंत्री ने राज बताया।







2
उस पार न जाने क्या होगा!
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बड़े मंत्री को अपने गुप्तचरों के द्वारा भनक लग गयी थी कि उसके प्रदेश के कुछ अफसरों पर आयकर विभाग का छापा पड़ने वाला है, इसलिये उन्होंने पहले से ही शोर मचाना शुरू कर दिया था एक एक को देख लूंगा, किसी को नहीं छोड़ूंगा। ये लोग ही हैं जो प्रदेश का विकास नहीं होने दे रहे हैं। मैं सबको सस्पेंड कर दूंगा, आदि आदि।
अफसरों को लगा कि वे सनक गये हैं, या दिखावे के लिये ड्रामा कर रहे हैं। हम जो कुछ भी कर रहे हैं सब सरकार की मर्ज़ी से ही तो कर रहे हैं और उनका सिंह भाग अर्थात लायन शेयर तो ठीक समय पर ठीक ढंग से पहुँचा रहे हैं। वे वर्षा के लिये यज्ञ कराते हैं तो हम ही पैसा जुटाते हैं, वे अपना अधिवेशन कराते हैं तो भी हम ही पैसा जुटाते हैं, वे गणेश बैठाते हैं, दुर्गा बैठाते हैं, रैली करते हैं प्रदर्शन करते हैं, चुनाव लड़ते हैं, बेटे बेटियों की शादी-व्याह करते हैं, सब के लिये हम ही तो पैसा देते हैं फिर ये फुफकार कैसी। वे लापरवाह रहे और लुट गये। इतने नोट निकले इतने नोट निकले कि गिनने वाले थक गये पर नोट कम नहीं हुये। झख मार कर नोट गिनने की मशीन बुलवाना पड़ी तब कहीं दो दिन में गिनती पूरी हुयी।
छापा मारने वालों की दशा देख कर वह अफसर जिसके यहाँ छापा पड़ा था हँसने लगा तो उन लोगों ने पूछा कि क्यों हँस रहे हो। उत्तर में वह बोला कि जब हमारे यहाँ छापा मारने में तुम्हारा यह हाल हो रहा है तो जब तुम मंत्री जी के यहाँ छापा मारोगे तो क्या हाल होगा!
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

3 टिप्‍पणियां:

  1. दोनों लघुकथाएं बहुत सटीक और तीखा प्रहार कर रही हैं व्यवस्था पर. बधाई.

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  2. बहुत सटीक वार है दोनों कथाओं का.

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