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शुक्रवार, जून 05, 2015

व्यंग्य पालीथिन युग पुराण



व्यंग्य
पालीथिन युग पुराण
वीरेन्द्र जैन
     
           सतयुग वालों को आगामी त्रेता,द्वापर, कलयुग के बारे में पता था। पर पत्थरयुग वालों  से परमाणुयुग के बारे में पूछने का साहस किसी ने नहीं किया अन्यथा पत्थर और सिर का मेल मिलाप हो जाता।
              अब युग पदयात्रियों की तरह खरामा खरामा नहीं चलते अपितु राकेट की गति से चलते हैं। मैं आज कह सकता हूं कि दो हजार बीस से युग पालीथिन युग के नाम से जाना जायेगा। यूरोप से एशिया और अफ्रीका से आस्ट्रेलिया तक चारों ओर पालीथिनें ही पालीथिनें होंगी। भारत के लोग अपने राष्ट्रवादी शासन से कहैंगे कि हिमालय से कन्या कुमारी और अटक से कटक तक जहां तिरंगी पालीथिनें बिखरी पड़ी हैं, वह स्य रंगबिरंगी आसेतु हिमालय हमारी पुण्यभूमि है। भाजपा वाले भगवा पालीथिनों पर जोर दैंगे तो मुस्लिम लीगी हरी पालीथिनें फैलायेंगे। कम्युनिष्ट लाल ही लाल पालीथिनें लहरायेंगे तो कांग्रेसी तिरंगी पालीथिनें। सड़कों पर गलियों में, खेतों में तालों में, नदियों-समुद्रों,में पेड़ों की डालों पर , बिजली के तारों पर, सर्वत्र पालीथिनें फैली होंगी। कोई नाली ऐसी नहीं होगी जहां पालीथिनें न फंसी पड़ी हों। सड़कों पर धूल उड़ना बन्द हो जायेगी और गाड़ियों के आने जाने पर पालीथिनें उड़ा करेंगी।  आंधी आयेगी तो पालीथिनों के बगूले बनेंगे। पानी बरसेगा तो सड़प सड़प की विचित्र सी आवाज से लोग समझ जायंगे कि बारिहो रही है। सभी खिड़कियों में जालियां लगी होंगीं ताकि पालीथिनें अन्दर न आ जायें।
             आस्तिक प्रभु की महिमा बताते हुए कहेंगे कि उसकी लीला देखो उसने कैसी कैसी पालीथिनें बनायी हें। उपदेझाड़ने का धन्धा करने वाले सन्त महात्मा आत्मा के बारे में प्रवचन फटकारते हुए बतायेंगे कि आत्मा पालीथिन की तरह नश्वर होती है। न वो सड़ती है न गलती है। गाय और गधे के पेट से जिस तरह पालीथिन यथावत बाहर निकल आती है, उसी तरह रीरों में आत्मा का प्रवेऔर निष्कासन होता है। यह पालीथिन की तरह अजर अमर अविनाी है, घट घट वासी है। दुनिया में ऐसा कौन सा स्थान है जहां पालीथिन नहीं है। पुराने जमाने के उपदेशक जिन कणों-कणों में परमात्मा का वास होना बतलाते हैं वे सारे कण आज पालीथिनों में रखे हैं या यहां से वहां ले जाये जा रहे हैं। मनुष्य के हाथों में अगर कोई चीज लटकी है तो वो पालीथिन है। दुकानदार कोई चीज तौलने के बाद किसी चीज में भर रहा है तो वह पालीथिन है। सारा व्यापार, वाणिज्य, द्यो, पालीथिन पर टिका है। पर्यटन व पुरातत्व के सारे स्थल पालीथिनों से भरे हैं। कवि उपमा दे रहे हैं कि तेरे होठों का रंग गुलाबी पालीथिन की तरह है। जिस कहानी में पालीथिन का जिक्र न आये वह पौराणिक कथा  या ऐतिहासिक कहानी मानी जायेगी। ईसवी सन और ईसापूर्व के युग विभाजन की तरह पालीथिन आने से पहले और पालीथिन आने के बाद का विभाजन बनेगा।

फिल्मी गीतों के मुखड़े होंगे-पालीथिन के अन्दर क्या है? या मेरी सामने वाली खिड़की में एक लाल पालीथिन लटकी है । जहां लिखा होगा कि 'यहां पालीथिन लाना सख्त मना है' वहीं पर पालीथिन कचरे का ढेर लगा होगा। इस ढेर के पीछे लिखा होगा-गधा पालीथिन फैंक रहा है। बाहर गांव सड़क के किनारे ौच के लिये लोग मोटी पालीथिनों में पानी ले जाया करेंगे।

  कचरा बीनने वाले पालीथिनों को छोड़ कर सब कुछ बीनेंगे और पालीथिन  फ्री पार्कों के टिकिट बहुत मंहगे बिकंगे। पर्यावरण प्रेमी 'पालीथिन स्वास्थ  लिये हानिकरक है' जैसी वैधानिक चेताविनियां मुद्रित करवाने में सफल भी हो जायेंगे तो भी उसका परिणाम वैसा ही होगा जैसा कि सिगरेट के पैकिटों या राब की बोतलों पर लिखी चेताविनियां का होता आया है।

इस युग में जिस अवतार से जन्म लेने लिये कहा जायेगा तो वह जन्म लेने की जगह सिक लीव पर चला जायेगा।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
मो. 9425674629



गुरुवार, सितंबर 18, 2014

मल संशय और साध्वी चिंतन



व्यंग्य
मल संशय और साध्वी चिंतन
वीरेन्द्र जैन

       उनके साथ न गुरु खड़े हैं न गोबिंद। आखिर किससे पूछें! साध्वी परेशान हैं।
       सामने कुछ कोमल कोमल पड़ा हुआ है, जो कमल तो नहीं है, जरूर किसी मनुष्य का मल ही होगा, यह तय है। कमल का अपना स्वरूप होता है गन्ध होती है, पर इसमें से तो दुर्गन्ध उठ रही है।
       जिज्ञासाओं का भी एक स्तर होता है। साध्वी की जिज्ञासा राष्ट्रीय स्तर की है। यह मल देश के लिए समस्या खड़ी कर सकता है। अगर यह समस्या किसी व्यक्ति के स्तर की होती कि इससे मुन्नी के बीमार पड़ सकने की सम्भावना होती तो अभिनेत्री विद्या बालन एडवांस में गोलियां देकर सुलझा सकती थीं पर अब यह मामला गम्भीर हो गया है। देश की एक केन्द्रीय मंत्री ने कह दिया है कि नास्तिकों के मल से बाढ आती है। आस्तिकों के मल से क्या होता है इसका उद्घाटन होना अभी शेष है। शायद उससे बीमारी भी नहीं फैलती होगी तभी तो उत्तर प्रदेश में लाखों लोगों ने घर में शौचालय बनवाने के लिए मिला अनुदान अपने परिवार की पेट की भूख मिटाने में लगा दिया और पेट भर कर खुले में शौच करने जाते रहे।
       साध्वी के सामने ज्वलंत प्रश्न है, वे जानना चाहती हैं कि यह मल किसका है? आस्तिक का या नास्तिक का? कौन बतायेगा? क्या बाढ आने न आने के परिणाम तक प्रतीक्षा करना पड़ेगी? दूसरा कोई टेस्ट नहीं है? मलेच्छों के आने के बाद हमारे देश का प्राचीन विज्ञान नष्ट हो गया, बरना कोई विधि होती। बत्रा जी की किताबें जो गुजरात के स्कूलों में लगा दी गयी हैं, और मध्य प्रदेश में लगायी जाने वाली हैं, में बताया गया है कि पहले हमारे यहाँ मोटर कारें बनती थीं क्योंकि अनाश्व रथ की चर्चा पुराणों में आयी है। हवाई जहाज और टीवी होने के बारे में तो पहले ही विश्वास रहा है क्योंकि संजय द्वारा महाभारत के युद्ध का आँखों देखा हाल और पुष्पक विमान के बारे में ग्रंथों में लिखा है। आस्तिकों और नास्तिकों के मल परीक्षण की विधि भी जरूर किसी ग्रंथ में छुपी हुयी होगी। मंत्रीजी गलत नहीं हो सकतीं। हो सकता है कि बत्रा जी की अगली किसी किताब में मिल जाये। पहले इस जगत गुरु देश में सब कुछ था, हमें देश को वहीं ले जाना है।
       साध्वी का चिंतन जारी है- रेल दुर्घटनाएं भी शायद इसीलिए बढ रही हैं क्योंकि रेल के डिब्बों में अस्तिकों और नास्तिकों के शौचालयों में भेद नहीं किया गया है और दोनों ही समान रूप से उसी में आते जाते रहते हैं। हाँ एक बात साध्वी की समझ में नहीं आती कि ये नास्तिक तीर्थस्थलों में क्यों जाते हैं? क्या ये बाढ लाने के लिए ही जाते हैं। इनका जाना बन्द करवा दिया जाये तो बाढ आना बन्द हो जाये। मध्य प्रदेश की एक विधायक ने तो गरबा में प्रवेश रोकने की माँग कर ही दी है। पहले साध्वी इस तरह की बातें सार्वजनिक रूप में करने से कतराती थी, पर जब से देश के प्रधानमंत्री ने देवालयों के पहले शौचालयों के बाद लाल किले की एतिहासिक प्राचीर से देश को सम्बोधित कर दिया तो वह चिंतन करने लगी।  
       साध्वी की चिंताएं बढती जा रही हैं और गुरु व गोबिन्द कोई भी नहीं है जो बता सके कि हल क्या है?  
वीरेन्द्र जैन                                                                           
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बुधवार, सितंबर 18, 2013

व्यंग्य - झूठ बोलती प्रार्थनाएं

व्यंग्य
झूठ बोलती प्रार्थनाएं
                                           वीरेन्द्र जैन
         
     भक्त आरती गा रहा है-
          जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा
          अन्धन खों आंख देत, कोढिन को काया
          बांझन खों पुत्र देत निर्धन को माया।

          ऐसा लगता है जैसे गणेश जी ने आरती लिखने के लिए किसी राजनीतिक दल के घोषणा पत्र लिखने वाले को अनुबंधित करा दिया हो और वह लिख रहा हो कि प्रतिवर्ष एक करोड़ लोगों  को रोजगार दिया जायेगा तथा प्रत्येक  गांव में पीने को पानी की सुचारू व्यवस्था की जावेगी, सारे गांवों को सड़कों से जोड़ने में करोडों रूपये लगाये जायेगें व उन पर प्रधानमंत्री के फोटो सहित होर्डिग लगाये जायेगे, विकलांगों को आरक्षित कोटे का बैकलाग भरा जायेगा आदि। यनि जिसके पास जो कमी है वह पूरी किये जाने का लालच जगा के वोट झटक लो।
          मैं एक अंधे को पिछले दस वर्ष से गणेश उत्सव में यही आरती गाते देख रहा हूँ पर आंख की तो छोडिये उसकी छड़ी तक कोई चुरा कर ले गया पर उसने गाना नहीं छोड़ा कि अन्धन खों आंख देत । गणेश जी यदि कोढ़ियों को काया देना शुरू कर दें तो बहुत उत्तम होगा। वैसे मुझे या मेरे आस पास के किसी व्यक्ति को ऐसी कोई शिकायत नहीं है पर मेरा एक दुश्मन ' एमड़ीटी ख़ाओं कुष्ठ  मिटाओं करता हुआ कुष्ठ निवारण मिशन में नौकरी पर लग गया है और गणेश जी कोढिन को काया दे दें तो उसकी नौकरी से छुट्टी हो जायेगी। पर असल  में ऐसा होता नहीं है कई बार तो आरती गाने वालों को कुष्ठ होते तो देखा है पर आरती गा कर काया पाता हुआ कोई कोढ़ी नही मिला।
          यदि लढुअन कौ भोग लगाने के बाद संत सेवा करते रहें तो अंधन खों आंख देने की फुरसत किसे मिलेगी और क्यों मिलनी  चाहिए। पत्नी पैर दबाती रहे तो आदमी को भी शेष नाग पर लेटे हुये नींद आ जाये, देवताओं की तो बात ही और है। हमारे देवता वैसे भी सोने के लिए मशहूर हैं और मूर्ख  जनता समझती है कि वे समाधि में हैं जिसमें केवल मुद्रा का फर्क  होता है। चिड़िया तो पेड़ पै बैठे बैठे सो लेती है और घोड़ा खड़े खड़े सो लेता है पर उसे  तो हम नहीं कहते कि वह समाधि में हैं। श्रद्वा ऐसी ही चीज होती है जो भोजन को भोग में और सोने  को समाधि का सम्मान प्रदान करती है। वर्षाऋतु में देवता सोते हैं तो फिर वर्षा बाद ही उठते हैं और उनके उठने वाले दिन देवोत्थान एकादशी का त्यौहार मनाया जाता है। जिन्हें रोज सुबह सुबह  उठ कर काम पर जाना पड़ता है उनके लिए तो रोज ही एकादशी होती है। लम्बे सोने की सुविधा देवताओं को ही प्राप्त है।
          वैसे तो  मेरे मुहल्ले में कई गोबर  गणेश मिल  जाते हैं। मैं उनकी बात नही करता पर मुझे लगता है कि देवताओं में  भी एकाधिक गणेश हुये हैं। शायद यही कारण है उनकी अलग पहचान बताने के लिए आरती गाने वालों ने  आरती में ही उनकी बल्दियत बताना जरूरी समझा है। वह कहता है कि - माता जा की पारवती, पिता महादेवा - अर्थात  आप किसी दूसरे गणेश की जय मत करने लग जाना, असली यही हैं।

          प्रार्थनाओं में अपने आराध्य की अतिरंजित स्तुति ही काफी नहीं होती अपितु दूसरे देवताओं  की छवि खराब करना भी जरूरी समझा जाता है। कांग्रेस और भाजपा में भले ही एक ही पार्टी  के सदस्य रहते हों पर गुट और नेता तो अलग अलग होते हैं। हर गुट के सदस्य को अपने नेता की प्रशंसा और दूसरे  गुट के नेता की निन्दा अनिवार्य होती है। तुलसीदास ने भी ज्ञान गुण सागर हनुमान जी की हनुमान चालीसा में स्तुति करते हुए दूसरे देवताओं की छवि भी अंकित करने की कोशिश की है। वे कहते है कि:-

          और देवता चित्त न धरई
          हनुमत वीर सदा सुख करई
          अर्थात नेताओं की तरह दूसरे देवता तो ध्यान नहीं देते पर  हनुमत वीर सदा ही सुख करते हैं। रामचरित्र मानस को स्वान्त: सुखाय घोषित  करने वाले तुलसीदास अपनी पुस्तक की विशेषताएं बताते हुए कहते है कि ' जो यह पढ़े  हनुमान चालिसा होय सिद्व साकी गौरी सा  अर्थात रेपिडैक्स खरीदिये और सौ दिन में  अंग्रेजी सीखिये।
          ऐलोपेथी के प्रचार में एक प्रार्थना ने बहुत सहायता की है। मेरे एक एमबीबीएस मित्र अपने क्लीनिक में  जय जगदीश हरे की प्रार्थना का चार्ट भी अन्य चार्टो की तरह लटकाये हुऐ है जिनमें शरीर को चीर फाड़ कर भीतरी अंग दर्शाये गये है। जब मैने उनसे कारण पूछा तो वे बोले यह हमारी प्रचार नीति का मुख्य गीत है जिसमें भक्त जनन के संकट पल में दूर करने वाले हरे जगदीश की स्तुति की गयी है। इस प्रार्थना के कारण  भक्त लम्बे समय वाली आयुर्वेदिक या होम्योपैथिक चिकित्सा पद्वति के चक्कर में नहीं फंसता। वह संकट को पल में दूर करने वाली ऐलोपैथी के पास ही दौड़ा चला आता है। वो जमाने लद गये जब भक्त  को भरोसा था तथा वह मानता था कि- कबहुं दीन दयाल के भनक परेगी कान।  अब तो वो आके कहता है कि डाक्टर साब आप दीन दयाल के कानों में मशीन फिट कर दो ताकि वे जल्दी सुन लिया करें।
          मैं अपने सफाई कर्मचारी देवीदयाल को कट्टर जैन मानता हूँ क्योकि जब शाम को वह नगरपालिका इंसपेक्टर को गाली देता हुआ निकलता है उसी समय मेरी पत्नी एक जैन प्रार्थना का कैसिट लगा कर भजन सुनती है जिसमें कहा गया है कि - मन में हो सो वचन उचरियें, वचन होय सो तन सों करिये। इन्सपेक्टर साहब की मॉ स्वर्गवासी हो चुकी हैं तथा बहिन कोई है नहीं अन्यथा बहुत सम्भव था कि वह वचन को कर्म में परिवर्तित करने की कोशिश करता हुआ और  सच्चा जैन  साबित होता। मै शाम को बाजार जा रहा होता हूँ तभी जैन  भजन का वह भाग बजता है जिसमें कहा गया है कि ' संसार में  विषबेल नारी तज गये योगीश्वरा'। तब मैं पत्नी  की ओर नही  देखता।
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, जनवरी 28, 2013

मर्यादामुक्त मर्द की मर्दानगी


व्यंग्य
मर्यादामुक्त मर्द की मर्दानगी
वीरेन्द्र जैन

       चचा गालिब को जिस इश्क ने निकम्मा कर दिया था , वही हाल गडकरी जी का भाजपा के अध्यक्ष पद पर रहते हुए हुआ। पर जैसे ही उन्हें पद से बड़े बे-आबरू कर के हटाया गया वैसे ही वे मर्द में बदल गये और आयकर अधिकारियों को चुनौती दे डाली कि सालो अभी तक तो में पद की मर्यादा में था इसलिए चुप था पर अब मुँह पर से ढक्कन उठ गया है और अब मेरे अन्दर जो कुछ भी सड़ रहा है उसका भभूका उठेगा। अब तो बोतल की सील टूट चुकी है, अब काहे का परदा। लगता है कुछ दिनों बाद आप से, मेरा मतलब आमआदमी के केजरीवाल से पूछेंगे- तेरा क्या होगा केजरीवाल? तूने ही तो ये ढक्कन उठाया है! केजरीवाल कहेंगे- हुजूर मैंने आपके लोगों की सहायता और सहयोग से दिल्ली में कई रैलियां की हैं। मर्द कहेगा कि- अब वकील कर ! क्योंकि वीके सिंह और किरन बेदी तो आप से दूर जा चुके हैं तेरी रक्षा कानून ही करे तो करे।
       कांग्रेस देश की सबसे बड़ी आस्तिक पार्टी है जो सारे काम प्रभु की मर्जी पर छोड़े हुए है इसलिए स्वयं कुछ भी नहीं करती। जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, और जो होगा वो अच्छा होगा। जब खाना पक जायेगा तो आपस में कुत्तों की तरह लड़ते हुए खाने आ जायेंगे। खुद कुछ करना भगवान की मर्जी में दखल देना है इसलिए जो हो रहा है सो होने दो। गडकरी स्वतंत्र हैं कि किसी भी अधिकारी को धमकावें या कुछ भी करें। वो तो उन्होंने सौजन्यतावश वैसे ही कह दिया कि जब 2014 में हमारी सरकार आयेगी तब सोनिया गान्धी या मनमोहन सिंह तुम्हें बचाने नहीं आयेंगे, अन्यथा अभी कौन से आ रहे हैं। मध्य प्रदेश में तो आये दिन अधिकारी, पुलिस और प्रोफेसर पिट रहे हैं या मारे जा रहे हैं पर कांग्रेस चूं भी नहीं कर रही। तुम्हारे अधिकारी तुम्हारी पुलिस चाहे जो करो। ज्यादातर अधिकारियों और पुलिस ने तो वह रवैया अपना लिया है जिसकी कल्पना कभी हिन्दी के यशस्वी कवि स्व. ओमप्रकाश आदित्य ने बहुत पहले ही कर ली थी। उन्होंने लिखा था-

एक आदमी बीच सड़क पर तोड़ रहा था ताला
पकड़ो इसको पुलिसमैन से बोले जाकर लाला
लाला की सुन कर के उनसे कहने लगा सिपाही
कुछ भी कर लो मैं तो इसको नहीं पकड़ता भाई
आगे जाकर के ये मेरी सर्विस खो सकता है
सरे आम चोरी करता है नेता हो सकता है  

       यही कारण है कि मध्यप्रदेश में पुलिस किसी पर भी हाथ नहीं डालती, गडकरी तो आयकर अधिकारियों को 2014 के बाद देखेंगे पर प्रदेश के नेता तो अभी के अभी देख लेंगे, या सव्वरवाल गति तक पहुँचा देंगे।
       भाजपा में जिन लोगों की कृपा से गडकरी इस मर्यादाहीन दशा को पहुँचे हैं उनका विरोध भी उनके पद तक ही था। इसके बाद तो वे उनके यार हैं सो पिता-पुत्र जेठमलानी, यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा, आदि किसी ने भी उनकी मर्दानगी की समीक्षा नहीं की। पद से मुक्त होते ही उन्होंने मुखौटा उतार कर इतनी दूर फेंका कि वह किसी भी तरह की अनैतिकता के प्रति असहनशील होने का आवाहन करते अडवाणी जी के मुँह पर लगा, और अडवाणीजी तुरंत उनके प्रति सहनशील हो गये।
       वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, दिसंबर 12, 2012

व्यंग्य- टंकी का गिरना उर्फ चप्पलों कीचाह में अनुरक्त


व्यंग्य
टंकी का गिरना उर्फ चप्पलों की चाह में अनुरक्त
वीरेन्द्र जैन
       पिछले दिनों मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आधी रात के दौरान एक टंकी गिर गयी थी जिससे सात लोगों की मौत हो गयी थी व 33 लोग घायल हो गये थे। टंकी पानी की थी और उस पानी की टंकी के नीचे लोगों ने घर बना लिए थे और सरकार ने स्कूल बना लिया था। लोग अतिक्रमणकारी थे पर सरकार तो सरकार है वह कुछ भी कर सकती है। पर गलती उन लोगों की थी जिन्होंने रहने के लिए घर न होने के कारण टंकी को ही छत मानकर उसके पास अपनी झोपड़ी डाल ली थी और आठ डिग्री तापमान वाली सर्दी की रात में अपने झोपड़े और बाल बच्चों समेत टंकी के नीचे दब गये। सरकार की कोई जिम्मेवारी नहीं है कि वे टंकी के नीचे वर्षों से कैसे रह रहे थे और उन्हें वे छोटे छोटे घर भी क्यों नहीं मिल सके जिसके विज्ञापन पर करोड़ों रुपया लुटा कर अपने आप को गरीबनवाज बताती रहती है। अगर उन्हें सही जगह रहने और उसके पास ही रोजगार के अवसर मिले होते तो वे टंकी के नीचे क्यों रहते। सरकार की कोई जिम्मेवारी नहीं बनती कि वह देखे कि टंकी के बनने में ठेकेदार ने कितना पैसा इंजीनियर के रास्ते मंत्रीजी तक पहुँचाया और उसके जर्जर हो जाने के बाद भी उसको उपयोग में क्यों लाया गया।

       पर क्षमा करें सरकार चूंकि एक हिन्दुत्व वाली पार्टी की है इसलिए उसका काम तो लोगों को तीर्थयात्रा कराना है ताकि वे अपना परलोक सुधारने के चक्कर में इन्हें वोट देकर इनका इसी लोक में उद्धार कर दें। विधानसभा में नगरीय प्रशासन मंत्री के बयान तो टंकी के पतन से भी ज्यादा पतित रहे। उन्होंने कहा कि न तो टंकी ही जर्जर थी और न ही कोई अफसर ही जिम्मेवार है। अफसरों के लिए तो उनका कहना था कि दूध देती गाय को टोंचा नहीं जाता। वैसे तो भाजपा के लोग शर्म प्रूफ होते हैं पर मंत्रीजी के इन उत्तरों से तो भोपाल क्षेत्र के दो भाजपा विधायकों तक को शर्म आ गयी, और उन्होंने आगामी चुनावों को देखते हुए अपनी ही पार्टी के मंत्री से सवाल कर डाले।
       वैसे भाजपा के मंत्रियों के ऐसे जबाब कोई खास आश्चर्य की बात नहीं हैं। अयोध्या में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बारे में गत बीस साल से लिब्राहन आयोग करोड़ों रुपया खर्च कराके भी किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँच सका था। मस्जिद ध्वंस की एक आरोपी उमा भारती हैं जिनका राजनीति में प्रवेश इस कारण से हुआ था क्योंकि उन्हें बचपन में ही रामायण याद हो गयी थी और वे एक बच्ची के रूप में जब रामायण पाठ करती थीं तो कौतुहलवश भीड़ जुट जाती थी और वे लोकप्रिय हो गयी थीं। भाजपा हर लोकप्रियता को वोटों के रूप में भुनाने की कला जानती है इसलिए उन्होंने उमाभारती को राजनेता बना दिया था। उन्होंने आयोग को उत्तर दिया था कि उन्हें कुछ याद नहीं कि छह दिसम्बर 92 को अयोध्या में क्या हुआ था। बाद में मस्जिद किसने तोड़ी के जबाब में उन्होंने कहा था कि मस्जिद तो भगवान ने तोड़ी। उल्लेखनीय है कि नगरीय प्रशासन मंत्री उनके ही उत्तराधिकारी के रूप में मुख्यमंत्री भी रहे हैं सो उनका उत्तर भी ऐसा ही था कि न तो अफसर जिम्मेवार हैं, न ठेकेदार जिम्मेवार हैं अर्थात टंकी तो भगवान ने तोड़ी। अब आप चाहें तो भगावान को मीमो दे सकते हैं या सस्पेन्ड कर सकते हैं। कुछ दिनों पहले एक फिल्म आयी थी ‘ओह माई गाड’ इस फिल्म में जब एक दुकानदार की भूकम्प से ध्वस्त दुकान का बीमा क्लेम इस कारण से निरस्त हो जाता है क्योंकि उसमें ‘एक्ट आफ गाड’ के कारण हुआ नुकसान कवर नहीं होता। तब वह भगवान की तलाश में निकलता है और इन दिनों जो लोग थोक के भाव में  भगवान बने घूम रहे हैं उन सब को कानूनी नोटिस भिजवा देता है। अदालत में चली इस बहस में वह इनके सारे पाखण्डों और कुतर्कों की धज्जियां उड़ा देता है। उल्लेखनीय है कि भाजपा को इस फिल्म के कारण अपनी भी धज्जियां उड़ने का खतरा पैदा हो गया था इसलिए लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने इस फिल्म को हिन्दुत्व विरोधी बता कर इसके खिलाफ बयान दिया था।
       वैसे ईश्वर की तलाश हिन्दी के एक हास्यकवि काका हाथरसी ने भी की थी और उन्होंने मन्दिर से चप्पलें  चुराने का कारण ईश्वर के किसी भौतिक स्वरूप तक पहुँचने के प्रयास से जोड़ा था। वे कहते हैं-

प्रेम से तुम नित्य ही हरि कीर्तन में जाइए
खूबसूरत चप्पलों को छाँट कर ले आइए
बात कहता हूं पते की कल्पना कोरी नहीं
सब प्रभू की वस्तु जग में, इसलिए चोरी नहीं
विश्व ढूंढा टार्च लेकर, पर प्रभू पाया नहीं
चिट्ठियां डालीं बहुत उत्तर कभी आया नहीं
हर मुहल्ला छान मारा, पर न उसका घर मिला
किसी टेलीफोन ग़ाइड में नहीं नम्बर मिला
प्रभू को फिर छोड़ कर मैं भक्त के आया शरण
भक्त से भी अधिक समझे भक्त के प्यारे चरण
चरण से भी अधिक उनकी पादुका का भक्त हूं
इसलिए मैं चप्पलों की चाह में अनुरक्त हूं  
       लगता है कि मध्यप्रदेश के मंत्री भी इसी तरह चप्पलों की चाह में अनुरक्त होकर प्रभु तक पहुँचने की कोशिश में हैं। देखना होगा कि उनकी यह इच्छा कैसे पूरी होती है।
वीरेन्द्र जैन
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