शनिवार, मार्च 26, 2011

व्यंग्य - चुनाव परिणाम से फैसला


व्यंग्य
चुनाव परिणाम से फैसला
वीरेन्द्र जैन
हमारे प्रधानमंत्री सच्चे लोकतांत्रिक हैं, भले ही कभी लोकसभा चुनाव नहीं जीत पाये हों। उन्होंने न्याय का नया मापदंड निर्मित किया है जिसका नाम रखा जाना चाहिए “चुनाव जीत लो न्याय”। इस तरीके से देश के सारे न्यायालयों को सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के बन्द होने जैसी सम्भावनाएं पैदा हो गयी हैं। सदन में उन्होंने कहा कि मैंने, मेरे द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति ने, या मेरी पार्टी ने 2008 में अल्पमत में आ गयी सरकार को बचाने हेतु वोट के लिए नोट नहीं दिये। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि चुनाव में हम जीत गये।
उनके कथन में हमारे देश में प्रयुक्त होने वाले एक पुराने सूत्र वाक्य की ध्वनि सुनायी दे रही थी- सत्यमेव जयते। अर्थात सत्य ही जीतता है, या जो जीतता है वही सत्य होता है चाहे वह भारतीय मतदान प्रणाली के अनुसार हुये चुनाव की जीत ही क्यों न हो। उनके बयान से सबसे ज्यादा खुश गुजरात में नरेन्द्र मोदी हुये। वे अमित शाह से बोले, ‘देखो मैंने कहा था न...’ “क्या...” अमित शाह ने प्रश्न किया। “यही कि 2002 में हुये मुसलमानों के नरसंहार में मेरा कोई हाथ नहीं था” “पर ये कैसे तय हुआ” उन्होंने फिर पूछा “इसलिए कि उसके बाद मैं एक बार नहीं दो बार चुनाव जीत गया हूं, और हमारे प्रधान मंत्री ने न्याय का यही माप दण्ड तय कर दिया है। चुनाव जीतो और जीत का प्रमाणपत्र लेकर माननीय न्यायधीश के पास पहुँच जाओ।“ झारखण्ड में यही बात शिबू सोरेन अपने भाजपायी सहयोगियों को समझा रहे थे कि अब तो मैं अपने ऊपर लगे सारे आरोपों से मुक्त हो जाऊंगा इसलिए मुख्यमंत्री की कुर्सी को अपने गले में डले पीले दुपट्टे से पौंछ कर रखना। बिहार में लालू प्रसाद नीतीश कुमार के आगे खम्भ ठोकने को तैयार हो रहे हैं। तामिलनाडु में ए राजा का शीराजा बिखरने से पहले ही सम्हल सकता है। मायावती सीबीआई से अपने सारे केस वापिस लेने के लिए कह रही हैं। अमर सिंह सोच रहे हैं कि काश मुझे भी कोई ऐसा सुरक्षित स्थान मिल जाये जहाँ से चुनाव जीतकर अपने ऊपर लगे सारे आरोपों से मुक्त हो सकूं। मुलायम टिकिट देने से पहले कह रहे हैं कि जिस के ऊपर जितने ज्यादा केस चल रहे हों उन्हें सबसे पहले और सबसे सुरक्षित सीट से टिकिट दिया जायेगा। चुनाव जीतना ही सत्य है भले ही चुनाव पूरी तरह झूठे वादे और झूठी उपलब्धियों के विज्ञापनों पर आधारित हों। चुनाव चाहे पाँच पाँच सौ रुपये फी वोट के हिसाब से खरीद कर जीते गये हों। चाहे दारू की बोतल से नहला कर और जाति के रिश्ते से जीत गये हों। चुनाव जीत कर नेता कह सकते हैं कि सूरज पूरब से नहीं बल्कि पश्चिम से उगता है। कोई गैलीलिओ यह बताने से पहले कि पृथ्वी सूरज का चक्कर लगाती है चुनाव का फार्म भरेगा और वोट माँगने के लिए गाँव गाँव के चक्कर लगाते हुए यह भी भूल जायेगा कि कौन किसका चक्कर लगाता है।

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

1 टिप्पणी:

  1. वीरेन्द्र जैन जी!
    आजकल व्यंग्य के नाम पर जाने क्या-क्या छप रहा है। कुछ लोग उपहास को व्यंग्य के नाम पर परोस देते हैं। आपके व्यंग्य को पढ़ कर दिमाग मे करेंट दौड़ गया। बहुत खूब ....आपकी कलम चूमने का मन करता है।
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    प्रवाहित रहे यह सतत भाव-धारा।
    जिसे आपने इंटरनेट पर उतारा॥
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    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

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