गुरुवार, सितंबर 01, 2011

व्यंग्य धर्म का रास्ता और रास्ते पर धर्म


व्यंग्य
                          धर्म का रास्ता और रास्ते पर धर्म
                                                            वीरेन्द्र जैन
      इस दुनिया में पता नहीं कब क्या हो जाये। अब इसी को देख लो कि मुझ जैसे नास्तिक के सीने में अचानक एक धार्मिक आत्मा अंगड़ाई लेने लगी है। अंगड़ाई की तुक लड़ाई से मिलती है इसलिए अंगड़ाई जैसे शुद्ध श्रंगार रस के शब्द के साथ लड़ाई जैसा वीर रस का शब्द जुड़ ही जाता है।
                     अभी तो ये अंगड़ाई है
                     आगे और लड़ाई है
सो आत्मा के अंगड़ाई लेते ही वह लड़ाई की तलाश करने लगी। अब मेरी समझ में आया कि जिनके अन्दर धार्मिक आत्माएं अंगड़ाइयां लेती हैं वे लड़ाइयां करने पर क्यों उतर आते हैं। ये सब तुकों का खेल है।
      एक धार्मिक व्यक्ति परहित की बहुत चिंता करता है सो वह दूसरों को स्वर्ग भिजवाने की चिंता में  दुबला हुआ जाता है। वह बहुत जोर से चिल्लाता है कि धर्म की रक्षा करो, धर्म के लिए जान दे दो जिससे तुम्हें स्वर्ग मिलेगा। तुम अपनी बीबी बच्चों को छोड़ कर मर जाओगे तो स्वर्ग में तुम्हें अप्सराएं मिलेंगीं। यहाँ पर तुम्हारी बीबी का खयाल हम और बच्चों का खयाल बीमा कम्पनी कर लेगी जो नई आर्थिक नीति आने के बाद विदेशों से फेल होकर अपने देश में कुकरमुत्तों सी उग आयी हैं। धार्मिक व्यक्ति इतना उदार होता है कि वह स्वर्ग जाने का अवसर दूसरों को ही देना चाहता है, जब अयोध्या में एक धर्म स्थल के लिए जान देने का पवित्र अवसर आया था तब उस के लिए आवाहन करने वाली पार्टी के नेताओं ने दरिद्र नारायणों के बच्चों को यह अवसर देने के लिए अपने बच्चों को घरों में कैद कर लिया था, या अमरीका भेज दिया था। अंत्योदय जैसा कुछ कुछ था जिसमें स्वर्ग जैसे सर्वोत्तम के लिए गरीबों का पहला हक बनता है।  
      देश में रथों की संख्या मनुष्यों की आबादी से होड़ ले रही है। बिना कोई मशीनरी बदले डीसीएम टोयटा रथ में मोटर साइकिलें उड़न तश्तरियों में बदलती जा रही हैं। जो वाहन पैट्रोल से चलने के लिए बनाये गये थे वे डीजल से चल रहे हैं और जो वाहन डीजल से चलने के लिए बनाये गये थे वे मिट्टी के तेल से चल रहे हैं जो राशन की दुकानों के लिए चलता है और सीधे पैट्रोल पम्प में पहुँच जाता है। जो चीज जहाँ से निकलना चाहिए वह वहाँ से नहीं निकल रही अपितु किसी बड़े बड़े बालों वाले बाबा की तरह हवा से निकल रही है। आप एक बाबा के खजाने और सेंटों के लिए रोते रहते हैं और यहाँ साईं ही साईं हैं जो डीजल पम्पों से मिट्टी का तेल निकाल कर दिखा रहे हैं। पर्यावरण के लिए काम करने वाले एनजीओ कहते हैं कि इससे पर्यावरण प्रदूषित होता है, और स्वास्थ का प्रोजेक्ट लिए हुए एनजीओ इस प्रदूषण से होने वाली बीमारियों की जो सूची गिनाते हैं उसे सुन कर तो मैं गिनती ही भूल जाता हूं।
अपने भीतर धार्मिक आत्मा अंगड़ाई लेते ही मुझे सड़क के किनारे बने धर्म स्थलों में बिराजे देवताओं के स्वास्थ की चिंता सताने लगती है। वे किस सीमा तक प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं यह सोच सोच कर अंगड़ाई लेती हुयी आत्मा काँप काँप जाती है। जो देवता कूलर लगा कर शयन करते हैं, निर्मल जल से स्नान करते हैं, शुद्धता पूर्वक बना परसाद ग्रहण करते हैं, वे साँस भी लेते ही होंगे तो उनके फेफड़ों में कितनी कार्बन डाई आक्साइड पहुँचती होगी। इस प्रदूषण से खाँसी से लेकर दमे तक कैसी कैसी बीमारियां हो सकती हैं। आखिर ये धर्मस्थल सड़क के किनारे क्या कर रहे हैं, इन्हें यहाँ से हटा कर किसी प्रदूषण मुक्त जगह में ले जाने के लिए मैं आवाहन करता हूं। मैं अगर सत्तर पार का होता तो आमरण अनशन के लिए रामलीला मैदान में बैठ जाता और दूसरों को इंतजाम का मौका देता, पर, अब इसके लिए मुझे किसी अन्ना को पकड़ना पड़ेगा।  
      देवताओं का सम्भावित दुख मुझसे देखा नहीं जाता। जब प्रदूषण कम था तब भी पहले वाले देवता ज्यादा समझदार थे सो कोई हिमालय पर चला गया तो किसी ने सागर की लहरों पर अपनी सेज सजा ली। पर अब तो सब कुछ सड़कों पर ले आया गया है दुकानें हों या धर्मस्थल अपनी सीमा से आगे अतिक्रमण किये बिना नहीं रह सकते। इसमें बाजार का नियम लागू होता है, जो दिखता है सो बिकता है। गली वाले धर्मस्थल पर भक्त भी नहीं पहुँचते।  
      दिखने के लिए झांकियों के पण्डाल बड़े बड़े बनाने पड़ते हैं, उनमें बड़ी बड़ी मूर्तियां
लगवानी पड़ती हैं। बिजली की कमी से रोते देश में दूर से दिखाई देने के लिए ये झांकियां कितनी बिजली पी जाती हैं इसका हिसाब लगाया जा सकता था अगर इसके लिए विधिवत कनेक्शन लेकर बिजली ली जाती होती।
      मैं आवाहन करता हूं कि धर्म प्रेमियो आओ और अपने आराध्यों को प्रदूषण से बचाने के लिए जुट जाओ। जिन पुजारियों ने तुम्हारे देवताओं को सड़क पर ला दिया है और अपने पेट के लिए उन्हें प्रदूषण की चपेट में ले आये हैं, उनसे मुक्त कराके उन्हें बाग बगीचों, हरेभरे पेड़ों. कल कल करते झरनों, लुभाती पर्वत मालाओं की ओर ले चलो यह मेरी अंगड़ाई लेती हुयी आत्मा कह रही है और इसके लड़ाई छेड़ने के लिए उकसा रही है।
अगर तुम में आत्मा है तो उकसो भाई थोड़ा तो उकसो। जन्नत में हूरें तुम्हारा इंतजार कर रही हैं।  
वीरेन्द्र जैन
2/1   शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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