बुधवार, जून 03, 2009

राष्ट्रीय से अन्तर्राष्ट्रीय तक लातें ही लातें

व्यंग्य
राष्ट्रीय से अर्न्तराष्टीय तक लातें ही लातें
वीरेन्द्र जैन
आस्ट्रेलिया आकर वह भारतीय अपने देश को भूल गया था। आस्ट्रेलिया वैसे ही प्रवासियों का देश है जहाँ प्रति हजार में से चार सौ तो प्रवासी हैं जिनमें से कुछ पहली पीढी के हैं तो कुछ दूसरी और तीसरी पीढी के। वह कहने लगा था कि-
न हम हैं यारो आलू, ना तुम हो यार गोभी,
हम भी हैं यार धोबी तुम भी हो यार धोबी।
पर क्या करें बकौल सुभद्रा कुमारी चौहान- तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियां कब भाईं, रानी विधवा हुयी हाय विधि को भी नहीं दया आयी- सो उसका देश भूलने का सुख भी विधिना से देखा नहीं गया। ............और एक दिन-वह लात घूंसे और जूते की ठोकरें खा खा कर बेहोश हो गया था। तब उसे अपने देश की याद आयी, बकौल रहीम - जा पर विपदा परत है सोहि आवत इहि देश। विपदा में उसका राष्ट्रीय प्रेम जागा। अगर यूं ही पिटना था तो बम्बई, .......नहीं नहीं मुम्बई ही क्या बुरी थी। आस्ट्रेलिया की गोरी गोरी औरतें उसे बहुत भाती थीं पर पिटने के मामले में उसे काला गेंहुआ रंग ही पसंद था। इस दिशा में वह बेहद राष्ट्रीय किस्म का आदमी था। राज ठाकरे की बात और है। उसे याद आया कि जब वह मुम्बई में राज ठाकरे के गुंडों से पिटा था तब विपक्ष के नेता को भी कुछ कहने में हफ्ता भर लग गया था क्यों कि वह देश का मामला था तथा उनके चुनावी सहयोगियों का मामला था। पर उसके आस्ट्रेलिया में पिटते ही वही विपक्ष के नेता तीर की तरह बयान देने लगे। अरे मुम्बई तो छोड़ो खास बिहार में जब उसके गाँव के जमींदार उसे पीटते थे तब चोट भले इससे ज्यादा लगती हो पर पीड़ा कम होती थी। आस्ट्रेलिया आकर वह भूल गया था कि वह अपने देश में नहीं विदेश में है।
देश ऐसी चीज नहीं है कि जिसे भूला जाये। किसी न किसी तरह उसकी याद आ ही जाती है। ये मेरे प्यारे वतन ये मेरे बिछुड़े चमन तुझ पर दिल कुरबान।
पर सवाल यह है कि आस्ट्रेलिया वालों ने ऐसा किया क्यों? मैंने जानने की कोशिश की तो मुझे रामभरोसे ने बताया कि यह सब हिन्दी के कारण हुआ है।
''हिन्दी के कारण! क्या? कैसे?'' मैंने पूछा
'' अरे कुछ लोगों ने उन्हें हिन्दी सिखा दी जिससे उनने हमारी वह कहावत भी सुन ली कि दूध देने वाली गाय की लातें भी सहन की जाती हैं, तुम तो जानते ही हो कि वहाँ गायें भी खूब हैं और दूघ भी खूब है सो उन्हें समझ में जल्दी आ गया कि हम लोग दूध के कितने प्रेमी हैं और उसी के लिए आस्ट्रेलिया तक गये हैं, सो लातें भी सह लेंगे, बस इसीलिए उन्होंने लातें मारना शुरू कर दीं। पर वे यह भूल गये कि ये कहावत देशी गाय के लिए है न कि जर्सी गाय के लिये''
मुझे रामभरोसे की बात कुछ कुछ समझ में आ रही है, एक बार लोगों की समझ में ये आ जाये कि ये लात खा लेते हैं तो फिर देश क्या और विदेश क्या जगह जगह लिखा मिल जायेगा-
लातें ही लातें, एक बार मिल तो लें।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

3 टिप्‍पणियां:

  1. taaje haalaaton par bilkul naye andaaj mein likha gaya aalekh pasand aayaa....

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  2. आपने सही कहा
    श्याम सखा
    http//:gazalkbahane.blogspot.com/या
    http//:katha-kavita.blogspot.com पर कविता ,कथा, लघु-कथा,वैचारिक लेख पढें

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  3. sir ape nay bedashso may rahinay balo ka atam saman pre satek commemts keya, aena dekahnay kay leya danyabad.

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