सोमवार, अप्रैल 12, 2010

द्वार खटखटाती मालिन

व्यंग्य
द्वार खटखटाती मालिन
वीरेन्द्र जैन

रेडियो मिर्ची पर गाना बज रहा है। गाना मधुर है पर कुछ नेताओं को गाना मीठा लगने की जगह मिर्ची सा लग रहा है। गाना कुछ यूं है-

मेरा नाम है चमेली
में हूं मालन अलबेली
चली आई मैं अकेली बीकानेर से
ओ दरोगा बाबू बोलो
जरा दरबज्जा तो खोलो
खड़ी हूँ मैं दरबज्जे पै कितनी देर से

द्वार खटखटाये जा रहे हैं पर दरोगा बाबू हैं कि दरबज्जा ही नहीं खोल रहे हैं। वे कह रहे हैं अब मालिन की जरूरत नहीं हैं, हमारे पास मालिनी है, हेमा मालिनी। जब मालिन की जरूरत थी, तब थी। अब मालिनी ज्यादा भीड़ जुटा रही है।
मालिन कह रही है कि मैं तो सर्वेंट क्वार्टर में ही रह लूंगी तुम्हारे ड्राईंग, ड्रैसिंग, और डायनिंग रूम में नहीं आऊंगी पर दरोगा बाबू पसीज ही नहीं रहा है कहता है कि बाहर तुम से पहले ही लौटने वाले बुद्धू लाइन लगा कर खड़े हैं जिनमें कई तो भक्त प्रह्लाद जैसे हैं पर क्या करें हमारा ही ठिकाना नहीं है, चौबेजी छब्बे बनने निकले हैं पर पता नहीं दुबे भी रह पाते हैं या नहीं! कवि केदारनाथ अग्रवाल कह गये हैं कि-
कागज की नावें हैं, तैरेंगीं तैरेंगीं
लेकिन वे डूबेंगीं
डूबेंगीं
डूबेंगीं
पूरब पशचिम उत्तर दक्षिण सब तरफ से लोग भाग रहे हैं। मालिन कह रही है कि वो जसवंत सिंह वाला कमरा खाली हो गया है उसी को दे दो। अब तो उसका मुक़दमा भी निबट गया है। दरोगा कहता है कि मैं क्या कर सकता हूँ हमारे ऊपर भी एसपी है डीआइजी है आईजी है और ये नीचे वाले भी हैं, जो तुमसे खार खाये बैठे हैं अगर मैंने दरबज्जा खोल दिया तो आंगन में दीवार उठ जायेगी। मुझे भी बाहर का रास्ता दिखा दिया जायेगा। पहले भी एक बार ऐसा हो चुका है। बड़ी मुश्किल से दुरुस्ती हुयी है।
मालिन फिर से घर की बेटी बनना चाहती है पर दरोगाबाबू बाप बनने को तैयार नहीं है। वह अपने आप को लौहपुरूष कहलवाता फिरता है। पिछले दिनों जंग लग गयी थी तो बड़ी मुशिकिल से मिट्टी का तेल लगवा कर छुटवायी है अब कोई खतरा मोल नहीं लेगा। इस घर में कभी भी शादी व्याह का अवसर आ सकता है और काम करने वालों की जरूरत भी है पर दरोगा बाबू टंटा मोल नहीं लेना चाहता। पिछले दिनों अपने वाले ही ढाई करोड़ रुपये लेकर चंपत हो गये थे पर किसकी रिपोर्ट करते! इस घर को आग लग गई घर के चिराग से। और तुम तो सीधी फायर ब्रांड कहलाती हो एक बार में ही मुँह झुलसाये बैठे हैं।
जाओ बाई बाहर बाहर जो करना हो सो करो, इस घर में तुम्हारी कोई जगह नहीं है। अब कह दिया सो कह दिया, अब जाओ चाहे कुम्भ के मेले में जाओ या केदारनाथ जाओ। तुम घर में घुसना चाह रही हो और तुम्हारे टैंक रूट मैप पूछ रहे हैं। अब रूट मैप बताना हमारे वश का नहीं है, प्लीज़ गो आउट।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

3 टिप्‍पणियां:

  1. एकदम सही लिखा है, लोहपुरुष की पार्टी के आगे तो लम्बी लाइन लगी है, मुसीबत तो चीन की नाजायज औलादों की पार्टी की है, इन्हें कोई कौड़ी का भी नहीं पूछ रहा.. अपनी दुकान के आगे खड़े होकर चले आओ, चले आओ पुकार रहे हैं, लेकिन कोई भी इन्हें घास नहीं डाल रहा,,

    ममता के जहूरे की ज्वाला के आगे ज्योति बुझ रही है, और बुद्द बुद्दू बन गये हैं,

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