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रविवार, मई 16, 2010

व्यंग्य अखिल भारतीय श्वान सम्मलेन में व्यक्त चिंताएं


अखिल भारतीय श्वान सम्मेलन में व्यक्त चिंताएं
वीरेन्द्र जैन
अगर कोई जाति दलित पिछड़ी या उपेक्षित होती है तो वह अपनी पहचान बनाये रखकर भी अपनी जाति को प्रचलित नामों की जगह संस्कृतनिष्ठ शब्दों में बदलकर अपना जाति सम्मेलन आयोजित करती है। शायद यही कारण रहा होगा कि जब कुत्तों ने माननीय नेताओं के उदगारों पर अपने विचार व्यक्त करना चाहे तो उस आयोजन का नाम कुत्ता सम्मेलन न रखकर अखिल भारतीय श्वान सम्मेलन रखा और उसीका बैनर लगाया ताकि पढे लिखे लोग भी यह न कह सकें कि साला कुत्ता सम्मेलन हो रहा है। प्लेक्स के बैनर पर श्वान शिरोमणि को पाँच पाण्डव और सती द्रोपदी के साथ हिमालय की ओर कूच करता हुआ दर्शाया गया था। इतना ही नहीं सम्मेलन का उद्घाटन करने वाले श्वान श्री ने कहा कि ये सम्मेलन महान स्वामिभक्त श्वानों का सम्मेलन है किसी राजनीतिक पार्टी की सभा नहीं है। इसमें श्वानों की समस्याओं पर गम्भीरता पूर्वक विचार होगा। उनकी इस ओज़ पूर्ण वाणी पर सभी श्वानों ने तलुआ ध्वनि करके हर्ष व्यक्त किया।
विषय प्रवर्तन करते हुये श्वान प्रमुख ने कहा कि आज हम अपनी जाति के अपमान से आहत होकर इतनी बड़ी संख्या में यहाँ एकत्रित हुये हैं और यही कारण है कि दूर दूर से पधारे अपने श्वान भाइयों पर भोंकने की परम्परा को छोड़ कर हम एक साथ बैठे हुये हैं। ये नेता लोग पिछले कई सालों से लगातार हमारा अपमान करते चले आ रहे हैं और अब तो हद ही हो गयी। हमने बहुत दिनों से तलुवे चाटना बन्द कर दिया है और आजकल बंगलों में रहने वाले बन्धु मालिकों के मुँह चाटते हैं न कि तलुवे। हमें इंसान के जैसा बताकर हमारा अपमान किया जा रहा है। हम इंसान के जैसे कृतघ्न नहीं हो सकते कि जो राज्य में हमारी सरकार बचाये हम उसी के खिलाफ केन्द्र में बिक जाएं और बार बार बिक जाएं ।
...............न हम चारा खाते हैं और न भाईचारा !
[इसके बाद वह कुछ सैकिंड तक रुका ताकि श्वानों को तलुवे पीटने का अवसर मिल सके, और संकेत समझ कर तलुवे पीटे भी गये]
हम तो दूध रोटी, बोटी या अंडे वगैरह खाते हैं जो सत्तर प्रतिशत इंसानों को नसीब नहीं होते। ये इंसान ज़िन्दा रहने में ही नहीं मरने में भी हमारी नकल करने लगा है और देश के लाखों इंसान हमारी [कुत्तेकी] ही मौत मर रहे हैं। जाने को तो हम यधुष्टिरों के साथ स्वर्ग में भी गये हैं, पर

रौनके ज़न्नत कभी भी हमको रास आयी नहीं
हम ज़हन्नुम में ही रहना चाहते परवरदिगार
हमने तो कभी संसद में भी जाना पसन्द नहीं किया बरना जब वहाँ तीन सौ करोड़पति जा सकते हैं तो उनकी सुरक्षा करने वाला क्यों नहीं जा सकता। जब वहाँ तरह तरह के अपराधों के आरोपों से घिरे आरोपी पहुँच सकते हैं, गद्दार पहुँच सकते हैं, सांसदनिधि बेचने वाले पहुँच सकते हैं, सवाल उठाने के लिए पैसे माँगने वाले पहुँच सकते हैं, कबूतरबाज़ी करने वाले पहुँच सकते हैं, दलाली करने वाले पहुँच सकते हैं, तो हम स्वामिभक्त क्यों नहीं जा सकते। पर नहीं, हमने तय किया है कि हमें वहाँ नहीं जाना सो नहीं जाना, भले ही वहाँ कभी कभी कुछ अच्छे इंसान भी मिल जाते हों। हमारा वंश चाँद पर सबसे पहले जाने वालों का वंश है। हम भले ही पुलिस में चले जायें, पर वहाँ नहीं जाना सो नहीं जाना। किंतु ये इंसान फिर भी हमारी तुलना वहाँ जाने वाले खराब लोगों से करने पर तुला हुआ है। किसी ज़माने में हमारी तुलना ब्राम्हणों और नाइयों के साथ होती थी, पर हा... आते आते क्या ज़माना आ गया है कि हमारी तुलना कैसे कैसे लोगों से होने लगी है। दलाल लोग सरे आम कहने लगे हैं कि हमें मालूम है कि कुत्ता कौन है। जैसे ग़ालिब चचा कह गये हैं कि हमको मालूम है ज़न्नत की हक़ीकत लेकिन, दिल के बहलाने को ग़ालिब ये खयाल अच्छा है। अरे भाई मालूम है तो बताओ भी। उसे अपनी टेलीफोन टेपिंग की तरह छुपा क्यों रहे हो। पर दलाल तो हर मामले में सौदा करना चाहता है। फिल्म में सस्पेंस हो तो खूब चलती है। कयास लगाने वाले सम्भावनाओं की पतंगें दूर दूर तक उड़ाने लगते हैं। .......और ये सब हमारी कीमत पर हो रहा है। यदि ये नेता नहीं माने तो हमें ज़बाबी कार्यवाही करना पढेगी जिसका यह उपयुक्त समय है। हमें मालूम है कि ज्यादातर स्वास्थ संचालकों के घरों से करोड़ों रुपये निकल रहे हैं, किंतु, अस्पतालों में रैबीज़ के इंजेक्शन नहीं हैं और जो हैं या तो वे नकली हैं या एक्स्पायरी डेट के हैं। इस समय हमला कर देने से ये घर के रहेंगे न घाट के। [ सभा में ज़ोश भर गया था और तलुवे पीटे जाने लगे]
पत्रकार लोग तुरंत वहाँ से खिसक लिये ताकि एकाध अदद रैबीज़ के इंजैक्शन का जुगाड़ ज़मा सकें।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

शुक्रवार, मई 14, 2010

व्यंग्य- मुहावरे में कुत्ता


व्यंग्य
मुहावरे में कुत्ता
वीरेन्द्र जैन
कुत्ता बहुत पुरानी जाति है। पाण्डव स्वर्ग जाते हुये अपने कुत्ते को स्वर्ग में भी साथ ले गये थे और उसके बिना युधिष्टर ने स्वर्ग में जाने से भी मना कर दिया था। तब से ही यह परम्परा चल पड़ी है कि जो भी बड़ा आदमी कहीं जा रहा है उसके पीछे पीछे उसके कुत्ते भी जाते हैं। परम्परा बड़ी खराब चीज़ होती है जो चलती चली जाती है। पिछले दिनों जब अमेरिका के प्रेसीडेंट भारत आये थे तब गान्धीजी की समाधि पर जाने से पहले उनके कुत्तों ने गान्धीजी की पूरी समधि को सूंघा था। वे सोचते होंगे कि क्या पता ये गान्धी अब पुराने गान्धी न हों और अचानक ही समाधि से उठ कर धायँ धायँ कर दें। अमेरिका ने इतने पाप किये हैं कि उसके पदाधिकारियों को हरेक से डर लगता रहता है।
किसी ज़माने में कुत्ते पुलिस के विशेषण की तरह याद किये जाते थे किंतु बहुत दिनों से पुलिस वालों ने उस विशेषण से पीछा छुड़ा लिया है क्योंकि अब राठौर जैसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ और भी बड़े बड़े विशेषण जुड़ने लगे हैं। किसी ज़माने में किसी कवि ने लिखा था कि - कुत्ता कहने से बुरा मानते पुलिस वाले
रक्खा निज ठौर का फिर नाम कुतवाली क्यों
राजनीति को सर्वग्रासी कहा जाता है सो वो अब विशेषणों से लेकर गालियों तक सब कुछ हज़म करने लगी है। गालिब पहले ही कह गये हैं कि – गालियाँ खा के बेमज़ा न हुआ। किसी ज़माने में जब राम जेठमलानी भाजपा में थे तब उन्होंने बोफोर्स काण्ड पर राजीव गान्धी से प्रति दिन दस सवाल पूछने का सिलसिला शुरू किया था शायद वे राजीव जी की क्षमता पहचानते थे और नहीं चाहते होंगे कि एक दिन में ज्यादा सवाल पूछ कर सारे उत्तर एक साथ माँगे जायें। राजीवजी ने उनके किसी सवाल का तो उत्तर नहीं दिया था अपितु इतना भर कहा था कि कुत्ते भौंकते ही रहते हैं। प्रति उत्तर में अपने समय के नामी वकील जो अभी मनु शर्मा की वकालत करने में भी बिल्कुल नहीं शरमाये थे उत्तर में कहा था कि कुत्ता चोर को देखकर ही भौंकता है।
लोगों के शौकों का पता धीरे धीरे ही चलता है हाल ही में पता चला है कि भाजपा के नये अध्यक्ष नितिन गडकरी को मुहावरे दार भाषा बोलने का बहुत शौक है और इसी शौक के वशीभूत उन्होंने कह दिया कि लालू और मुलायम कुत्ते की तरह सोनिया जी के तलुवे चांटते है। अब ये बात काँग्रेसियों को कैसे हज़म हो सकती है कि उनके हक़ को दूसरी पार्टी के लोग हड़प जाएं। उन्होंने विरोध किया तो भारतीय संस्कृति के गौरव माननीय गडकरी जी ने कहा कि उन्होंने तो मुहावरे में कुत्ता कहा था। कल्पना करें कि अगर उन्होंने उक्त स्पष्टीकरण नहीं दिया होता तो हो सकता था कि लोग सोचते कि सोनिया जी के तलुवे इतने साफ सुथरे इसलिए रहते हैं। यह् रहस्य अब समझ में आया।
आदरणीय गडकरीजी जब मुहावरेदार भाषा का प्रयोग करते हैं तो उन्हें पता ही होगा कि हिन्दी में मुहावरों का भण्डार भरा हुआ है। इनमें से कुछ हैं- राम नाम जपना पराया माल अपना मुँह में राम बगल में छुरी राम मिलायी जोड़ी, इक अन्धा इक कोड़ी राम नाम ले हज़म कर गये, गौशाला के चन्दे इत्यादि मुहावरे कम पड़ जायें तो इस अकिंचन को सेवा का अवसर दें। आप जैसे मुहावरेदार महानुभाव की सेवा करके मुझे बड़ी खुशी होगी।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

सोमवार, अप्रैल 12, 2010

द्वार खटखटाती मालिन

व्यंग्य
द्वार खटखटाती मालिन
वीरेन्द्र जैन

रेडियो मिर्ची पर गाना बज रहा है। गाना मधुर है पर कुछ नेताओं को गाना मीठा लगने की जगह मिर्ची सा लग रहा है। गाना कुछ यूं है-

मेरा नाम है चमेली
में हूं मालन अलबेली
चली आई मैं अकेली बीकानेर से
ओ दरोगा बाबू बोलो
जरा दरबज्जा तो खोलो
खड़ी हूँ मैं दरबज्जे पै कितनी देर से

द्वार खटखटाये जा रहे हैं पर दरोगा बाबू हैं कि दरबज्जा ही नहीं खोल रहे हैं। वे कह रहे हैं अब मालिन की जरूरत नहीं हैं, हमारे पास मालिनी है, हेमा मालिनी। जब मालिन की जरूरत थी, तब थी। अब मालिनी ज्यादा भीड़ जुटा रही है।
मालिन कह रही है कि मैं तो सर्वेंट क्वार्टर में ही रह लूंगी तुम्हारे ड्राईंग, ड्रैसिंग, और डायनिंग रूम में नहीं आऊंगी पर दरोगा बाबू पसीज ही नहीं रहा है कहता है कि बाहर तुम से पहले ही लौटने वाले बुद्धू लाइन लगा कर खड़े हैं जिनमें कई तो भक्त प्रह्लाद जैसे हैं पर क्या करें हमारा ही ठिकाना नहीं है, चौबेजी छब्बे बनने निकले हैं पर पता नहीं दुबे भी रह पाते हैं या नहीं! कवि केदारनाथ अग्रवाल कह गये हैं कि-
कागज की नावें हैं, तैरेंगीं तैरेंगीं
लेकिन वे डूबेंगीं
डूबेंगीं
डूबेंगीं
पूरब पशचिम उत्तर दक्षिण सब तरफ से लोग भाग रहे हैं। मालिन कह रही है कि वो जसवंत सिंह वाला कमरा खाली हो गया है उसी को दे दो। अब तो उसका मुक़दमा भी निबट गया है। दरोगा कहता है कि मैं क्या कर सकता हूँ हमारे ऊपर भी एसपी है डीआइजी है आईजी है और ये नीचे वाले भी हैं, जो तुमसे खार खाये बैठे हैं अगर मैंने दरबज्जा खोल दिया तो आंगन में दीवार उठ जायेगी। मुझे भी बाहर का रास्ता दिखा दिया जायेगा। पहले भी एक बार ऐसा हो चुका है। बड़ी मुश्किल से दुरुस्ती हुयी है।
मालिन फिर से घर की बेटी बनना चाहती है पर दरोगाबाबू बाप बनने को तैयार नहीं है। वह अपने आप को लौहपुरूष कहलवाता फिरता है। पिछले दिनों जंग लग गयी थी तो बड़ी मुशिकिल से मिट्टी का तेल लगवा कर छुटवायी है अब कोई खतरा मोल नहीं लेगा। इस घर में कभी भी शादी व्याह का अवसर आ सकता है और काम करने वालों की जरूरत भी है पर दरोगा बाबू टंटा मोल नहीं लेना चाहता। पिछले दिनों अपने वाले ही ढाई करोड़ रुपये लेकर चंपत हो गये थे पर किसकी रिपोर्ट करते! इस घर को आग लग गई घर के चिराग से। और तुम तो सीधी फायर ब्रांड कहलाती हो एक बार में ही मुँह झुलसाये बैठे हैं।
जाओ बाई बाहर बाहर जो करना हो सो करो, इस घर में तुम्हारी कोई जगह नहीं है। अब कह दिया सो कह दिया, अब जाओ चाहे कुम्भ के मेले में जाओ या केदारनाथ जाओ। तुम घर में घुसना चाह रही हो और तुम्हारे टैंक रूट मैप पूछ रहे हैं। अब रूट मैप बताना हमारे वश का नहीं है, प्लीज़ गो आउट।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

गुरुवार, अप्रैल 08, 2010

लघुकथा[व्यंग्य] अनुशासित टिकिटार्थी

लघुकथा[व्यंग्य]
अनुशासित टिकिटार्थी
वीरेन्द्र जैन
देश में अचानक चुनाव आ गये थे। बिना न्यूनतम साझा कार्यक्रम के गठबन्धन बनाने पर चुनाव भी मौत की तरह कभी आ सकते हैं। ताबड़तोड़ चुनावी तैय्यारीं शुरू हो गयीं। हमारे देश में चुनाव आने पर सबसे पहले अपने ही दल के लोगों से टकराना पड़ता है क्योंकि अपना टिकिट पाने के लिए दूसरे का कटवाना ज़रूरी होता है। सबसे पहले दूसरे टिकिट चाहने वालों के दबे छुपे सारे अवगुण उज़ागर करने होते हैं और अपने गुण बताने होते हैं।
एक राष्ट्रवादी, हिन्दुत्ववादी, दल के ऐसे ही एक प्रत्याशी ने अपने दल की वरिष्ठ उपाध्यक्ष जो एक प्रसिद्ध नृत्यांगना और फिल्म अभिनेत्री हैं, को अपना बायोडेटा भेजते समय विशेष उल्लेख में लिखा-
बैंक खाता - बैंक ओफ राजस्थान
पानी - हमेशा केंट का
पत्रिका - मेरी सहेली
नहाने का साबुन - पियर्स सोप
पसन्दीदा फिल्में - शोले, चरस, सीता और गीता, जुगुनू, बर्निंग ट्रेन, त्रिशूल ,जोशीला, लाल पत्थर, बाग़वान, वीर ज़ारा आदि अतिरिक्त
पसन्दीदा टीवी शो - लाफ्टर चैलेंज[सिद्धू वाला]
शराब - डिप्लोमट /बैग पाइपर्[शत्रुघ्न सिन्हा निर्देशित]
कपड़े धोने का साबुन - निरमा[दीपिका चिखलिया वाला]
आवेदक ने बैंक आफ राजस्थान की पास बुक की फोटोकापी, साबुनों के रेपर, पत्रिका का कवर पेज, सिनेमा के फटे हुये टिकिट और वाटर फिल्टर की रशीद संलग्न की। अब वह टिकिट की प्रतीक्षा में रामायण पाठ में लगा हुआ है। उसे भरोसा है कि टिकिट मिल ही जायेगा।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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गुरुवार, फ़रवरी 25, 2010

व्यंग्य- बड़ी लकीर खींचने की प्रतियोगिता

व्यंग्य
बड़ी लकीर खींचने की प्रतियोगिता
वीरेन्द्र जैन
‘’क्या आपके यहाँ कोई घूरा है?’’ उन्होंने पूछा
’’पहले तो था पर अब नहीं है, बिल्डरों ने उन पर कब्जा कर लिया है और सब पर बिल्डिंगें तन गयी हैं’’ मैंने उत्तर दिया
’’ तब तो बेकार है....’’ वे लम्बी साँस लेकर बोले
’’क्यों आपको घूरे पर क्या, किसे फैंकना है?’’ मैंने जानना चाहा
’’ अपनी पार्टी का अधिवेशन करना था...” उन्होंने बताया
’’ पर मैं तो घूरे के बारे में पूछ रह था?’’ मुझे उनकी श्रवण क्षमता पर अचानक सन्देह सा हुआ।
’’ वही बता रहा हूं, अगर आप सब्र रख सकें’’ कह कर उन्होंने मेरी ओर दया की दृष्टि से देखा। फिर ठंडी साँस लेकर बोले जब से फाइव स्टार संस्कृति पर मीडिया की उंगलियाँ उठने लगी हैं, तभी से हमारे अध्यक्ष भी कहने लगे हैं कि हम किसी की लकीर को मिटा नहीं सकते इसलिये बड़ी लकीर खींचो। सारी पार्टियों वाले सादगी की प्रतियोगिता पर उतर आये हैं सो हमने सोचा कि हम अपनी पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन घूरे पर करेंगे,और नारा देंगे- जनता ने हमें घूरे पर फेंका पर हम घूरे से राज सिंहासन तक जायेंगे-, इसलिये कोई अच्छा सा, बड़ा सा घूरा तलाशते फिर रहे हैं’’
‘’ पर आप पूरे राज्य पर शासन कर रहे हैं और जब आपके मंत्रियों के यहाँ, छापे पड़ते हैं तो उनके ड्राइवरों तक के लाकरों से करोड़ों रुपये निकलते हैं, उनके नीचे काम करने वाले अफसरों के यहाँ से सोने की सिल्लियाँ निकलती हैं, तब आप अपना अधिवेशन चाहे टेंट लगा कर करें या घूरे पर करें क्या फर्क पड़ता है- ये जो पब्लिक है सब जानती है, ये जो पब्लिक है...!’’
‘’मैंने आप से घूरे के बारे में पूछा था अपनी पार्टी चलाने के बारे में आप से सलाह नहीं मांगी थी, हमारी पार्टी कैसे और काहे से चल रही है वह हमें पता है और पब्लिक तो तब जानेगी जब हम उसे चैन से जीने देंगे। अभी इन्दौर में भाजपा का अधिवेशन हुआ तो ऊपर से टेंट लगा कर अन्दर से एसी लगा दिया गया, गोबर में सेंट डाल कर लीप दिया गया, जर्सी गायें बंधवा कर गौग्राम बनवा दिया गया, मनेका गान्धी के लिये चारे का इंतज़ाम कर दिया गया जिसे उन्होंने हर एक घंटे बाद पशुओं को डाल कर उस ताकत की उम्मीद की जिससे वे अपने सपूत से मनुष्यों के हाथ कटवा सकें। बैलगाड़ी से चले, गन्ना चूसा, भुने कच्चे चने खाये, मटर की चाट चखी, घर लौट कर काफी पीते हुये बच्चों को बताया कि पिकनिक अच्छी रही। ’’ वे बोले।
‘’ पर बातें मोबाइलों से कीं और काम लेपटाप से किया’’ मैंने कहा।
‘’ हम लोग छवि सुधारने में भरोसा करते हैं चरित्र सुधारने में नहीं। सीता रूपी लक्ष्मी हरण करने के लिये रावण को भी साधु का भेष धारण करना पड़ता है, बरना मंत्रियों के ड्राईवरों तक के लाकरों में से करोड़ों रुपये यूं ही नहीं निकलते। कभी देशभक्ति का चोला ओढना पड़ता है तो कभी साधू साध्वी का चोला ओढे हुये को आगे करना पड़ता है, कभी धर्म की रक्षा करवानी पड़ती है तो कभी गाय की। भले ही दोनों पर कोई खतरा नहीं हो तो भी खतरों की कहानियाँ बनानी पड़ती हैं। पूजा से भी ज्यादा देर तक घंटी बजानी होती है ताकि दुनिया वालों को भ्रम हो जाये कि यहाँ बड़ा धार्मिक आदमी रहता है। सारे चोर उचक्के माथा ज़रूर पोत कर रखते हैं, सब ध्यान बँटाने का खेल है। इधर नज़र भटकी उधर माल यारों का। कहावतें यों ही नहीं बन जातीं। बगल में छुरी तभी काम कर पाती है जब मुँह में राम रख कर धोखा दिया जाये। राम नाम रटना पराया माल अपना तभी हो पाता है। राज कपूर की फिल्म का एक गीत है-
देखे पंडित ज्ञानी ध्यानी दया धर्म के बन्दे,
राम नाम ले हज़म कर गये गौशाला के चन्दे
अजी मैं झूठ बोल्याँ? अजि मैं कुफर तोल्याँ? कुई ना, हो कुईना, हो कुई ना।
अब तुम्हारे यहाँ घूरा नहीं है तो कोई बात नहीं अब हम फुट्पाथ पर अधिवेशन कर लेंगे पर बड़ी लकीर ज़रूर खींचेंगे।‘’
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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सोमवार, दिसंबर 28, 2009

व्यंग्य जिसने की बेशरमाई उसने खाई दूध मलाई

व्यंग्य
जिसने की बेशरमाई उसने खाई दूध मलाई
वीरेन्द्र जैन
जैसा मेरा अनुमान था कि राज नाथ अनाथराज हो गये हैं और उन्हें लगभग वैसे ही अन्दाज़ में बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है जैसा कि रावण ने विभीषण को दिखाया था, वह गलत साबित हुआ। कल जब वे दो उंगलियाँ उठा कर अंग्रेजी की वी बना विक्टरी का संकेत देते हुये दिखाई दिये तब लगा कि उनके लिये अभी भी कुछ काम बाकी बचा हुआ था-
दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं
दोस्तों की मेहरबानी चाहिये
राजनाथ की ये दो उंगलियाँ जो पिछले कुछ दिनों से अपने दुश्मनों की जीत का शोर सुनने से बचने के लिये दोनों कानों में डालने के काम आ रही थीं हवा में हैं। यह अवसर उनको झारखण्ड चुनाव परिणाम आने के बाद गुरूजी अर्थात शिबू शोरेन की कृपा से मिल सका है जिन्होंने कह दिया था कि हमें मुख्यमंत्री बनाने के सारे रास्ते खुले हैं जिसे भी बनाना हो चला आये। सो नेह निमंत्रण पा कर भाजपा दौड़ी दौड़ी चली आयी और झारखण्ड के जंगलों में गूंजने लगा- मैं तुझसे मिलने आयी, मन्दिर जाने के बहाने।
इन्हीं राजनाथ ने झारखण्ड के चुनाव हो जाने के बाद कहा था कि हम अटल बिहारी वाजपेयी के जन्म दिन पर उपहार के रूप में कि झारखण्ड में सरकार देंगे। फर्क केवल इतना रह गया कि बीमार वाजपेयी को भाजपा नहीं अपितु भाजपा के समर्थन वाली सरकार दी है और उन शिबू सोरेन की सरकार दी है जिनको केन्द्र में मंत्री बनाने पर उसने हंगामा खड़ा कर दिया था और दागियों को मंत्री बनाये जाने के खिलाफ सदन नहीं चलने दिया था। पहले अगर उनके दल को कोई आरोपी समर्थन देता था तो वे कहते थे कि गंगा में मिलकर गन्दे नाले भी पवित्र हो जाते हैं, पर हे अनाथ अब ये तथा कथित गंगा कहाँ मिल रही है?
संघ द्वारा स्थापित कठपुतली अध्यक्ष के प्रेस कांफ्रेंस की स्याही भी नहीं सूख पायी थी जिसमें उन्होंने शेखी बघारी थी कि सता की राजनीति तो होती रहेगी पर हम राजनीति को समाज से जोड़ने की बात करते हैं, उन्हींने अपने पहले काम के रूप में भाजपा को शिबू सोरेन से जोड़ दिया और उनके विधायक दल के नेता कहने लगे कि भले ही उन्होंने शिबू सोरेन को दागी बताते हुये चुनाव लड़ा था पर [चुनाव परिणाम आने के बाद]अब हमारी सोच यह है कि सोरेन कोर्ट से बरी हो चुके हैं इसलिए दागी नहीं हैं। ये बात अलग है उनकी यह बात आम जनता को तो छोड़िये उनके ही एक सांसद को हज़म नहीं हुयी और झारखण्ड के गोड्डा क्षेत्र के सांसद निशिकांत दुबे ने अपना स्तीफा श्रीमती सुषमा स्वराज और संगठन महामंत्री रामलाल को भेज दिया है तथा मीर कुमार को भी भेजे जाने की अफवाह फैलवा दी है।
अब ये कौन बतायेगा कि ये सत्ता की राजनीति है या समाज की राजनीति है! हो सकता है कि अगले कुछ वर्षों में तो वे नीतीश भक्ति की तरह इतनी गुरुभक्ति दिखा दें कि संघ के असली गुरूजी को ही भूल जायें। यदि भाजपा नेता किसी शर्मप्रूफ क्रीम के विज्ञापन हेतु माडल के रूप में काम करने लगें उनकी सफलता की बहुत सम्भावनायें हैं। स्लोगन कुछ ऐसा हो सकता है- जिसने की शरम, उसके फूटे करम, जिसने की बेशरमाई, उसने खाई दूध मलाई। कहो गडकरी भाई- हाँ राजनाथ भाई।
राम भरोसे हमेशा की तरह मुझसे असहमत है, वह कह रहा था कि भाजपा के नये अध्यक्ष सत्ता की राजनीति में भरोसा नहीं करते। वे अपने महाराष्ट्र में पार्टी को हरा कर आये हैं तो पार्टी के अध्यक्ष बन गये। सुषमा स्वराज के राज्य हरियाना में पार्टी साफ हो गयी तो वे विपक्षी दल की नेता बन गयीं। आडवाणी ने पूरे देश में पार्टी को हरवा दिया सो वे दोनों सदनों के सद्स्यों के नेता बन गये। यही तो उदाहरण है कि पार्टी को सत्ता से दूर करो पद से जुड़ो। हो सकता है कि नये अध्यक्ष का नया फार्मूला हो आखिर उन्होंने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस पहला महत्वपूर्ण वाक्य यही तो बोला कि आइ एम कमिटिड फोर कंस्ट्रक्शन।
वीरेन्द्र जैन
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