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शुक्रवार, मार्च 16, 2012

व्यंग्य -पड़ोसी की टाँग टूटने के सत्तरह बरस


व्यंग्य
पड़ोसी की टॉग टूटने के सत्रह बरस
वीरेन्द्र जैन
            अपनी आदत के विपरीत मुंगेरीलाल काफी हाऊस में बहुत संयत और गंभीर होकर बैठा था। उसके पहने हुए कपड़े धुले जैसे लग रहे थे वे जहॉ जहॉ भी फटे हों, वहॉ वहॉ फटे दिखाई नही दे रहे थे चाहे तो उन्हैं सिल लिया गया था या इस तरह से पहना गया था कि फटे हुए हिस्से सीधे सामने न दिखें।
            '' मुंगेरीलाल, क्या बात हैं आज बहुत गरिष्ठ नजर आ रहे हो?'' रामभरोसे ने पूछा। दूसरे के फटे में टांग डालने की उसे आदत हैं।
            मुंगेरीलाल ने यथावत गंम्भीरता ओढ़े हुए रामभरोसे को हिकारत की निगाह से देखते हुए कहा, '' तुम लोगों को अपने इतिहास, परंम्परा और संस्कृति का ज्ञान तो है नहीं। बात- बात पे ठिल्ल-ठिल्ल करके अपना समय काट देते हो। जानते हो आज क्या दिन है ?
            '' शनिवार । '' रामभरोसे ने छूटते ही उत्तर दिया।

            '' अबे, दिन से मेरा मतलब दिन के महत्व से था वो क्या कहते हैं कि........ ज़ोश में मुंगरीलाल भूल गये थे कि क्या कहना है।
            '' ज्ञानी जी, आप ही बताइए कि क्या दिन है आज। '' रामभरोसे किसी नई बेवकूफी की बात सुनने और फिर उस बात का कीमा बनाने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका था।
            '' अबे आज से ठीक सत्रह वर्ष पहले मेरे पड़ोसी टांग टूटी थी। आज उसकी सत्रहवी वर्षगॉठ है। ''

            '' अब यूँ तो हर रोज कोई न कोई घटना होती ही रहती हैं और टांग तुम्हारे पड़ोसी की टूटी थी, तुम्हारी नहीं। अब इसमें इस तरह गंभीरता ओढ़कर गधे बन जाने का क्या मतलब?

            '' अब तुम्हैं कुछ पता तो रहता नहीं, जानते हो यह वही पड़ोसी है जिसने मेरी छह इंच जमीन दाब ली थी। बस, तभी से मेरा इससे झगड़ा हैं, यह न्याय का प्रश्न है। मैं उसका कुछ नही बिगाड़ सका, वह शक्तिशाली हैं, पैसे वाला हैं, विधायक उसके घर पड़ा रहता है, न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका सभी ने उसका साथ दिया। फिर आज से ठीक सत्रह वर्ष पहले वह बाथरूम में फिसल पड़ा। उसकी टांग टूट गई। मैं प्रभु को बीच में ले आया कि आखिर वही सुनता हैं उसके यहॉ रिश्वत नही चलती, उसके यहॉ देर हैं पर अंधेर नही, अत: इस दिन को मैं प्रभु के न्याय दिवस के रूप में मानता हूँ। मेरा विश्वास हैं कि मेरी जमीन दबाने के कारण और मुझे इस व्यवस्था से न्याय न मिलने के कारण ही प्रभु ने उसे बाथरूम में भेजा, वहॉ फिसलवाया ओर उसकी टांग तोड़ दी। अब जैसे आप रावण को मारे जाने वाले दिन के रूप में दशहरा मनाते हैं उसी तरह में पड़ोसी की टांग टूट जाने की खुशी में आज के पवित्र दिन को न्याय दिवस के रूप में मनाता हूँ।

            '' पड़ोसी की टांग टूटने के सत्रह बरस '' इस विषय पर समारोह आयोजित होना चाहिए व भोज होना चाहिए '' रामभरोसे ने भरसक गंभीर बनकर कहा। उसे आज के मनोरंजन का विषय मिल चुका था।

            रामभरोसे ने कार्यक्रम की रूप रेखा बनाने की तैयारी में कागज और पेन मंगा लिए व मुंगेरीलाल की तरफ से काफी का आर्डर दे दिया। लेखों भाषणों और गोष्ठियों के कुछ विषय यूँ तैयार हुए :

      1-     टांग टूटने के सत्रह बरस।
      2-    प्राकृतिक न्याय की व्यवस्था और हमारा समाज।
      3-    टूटी टॉग की दशा और दिशा।
      4-    स्वत: टॉग टूटना - एक अहिंसात्मक न्याय।
      5-    न्याय का स्वप्न और टांग का टूटना।
      श्-    सत्रह वर्षो  में टांग टूटने के क्षेत्र में प्रगति।
      7-    टांगे टूटने का इतिहास ।
      8-    आर्थोपोड्स का विकास।
            इतने में जुगाडूपाँडे आ गया। उसकी संस्कृति मंत्री के पास पहुँच है। आयोजन का मौका देखकर वह खिल उठा- उसने कहा, '' मुझे जरा जल्दी से विषय दो, मैं इसे लेकर मंत्रालय तक जाता हूँ। शाम को संस्कृति भवन में पचास-साठ रिटायर्ड बुद्विजीवियों को बटोर लाना। मैं संस्कृति मंत्री से समय एंव इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए अनुदान  का चेक लेकर आता हूँ। ये फालतू बुद्विजीवी जब भी बैठ जायेंगे तो विषय को अपनी अपनी जगह से खीच-तान कर ऐसा फैला ही लेगे वह हिन्दूस्तान का नक्शा बनकर रह जाए। ''
            रामभरोसे ने तुंरत जुगाडूपाँडे के कान में कुछ कहा जिसका मजलब बिना सुने ही सबकी समझ में आ गया  कि वह अनुदान की राशि को इतना स्वीकृति कराने के लिए कह रहा होगा जिससे कार्यक्रम के बाद उसकी सफलता की खुशी में शाम की दारू पार्टी  के लिए भी पैसा बच जाए। जुगाडूपाँडे ने उसे आश्वस्त किया कि प्रमुख कार्यक्रम तो वही हैं, शेष तो उसकी भूमिकाएं हैं।
            रात्रि में मुंगेरीलाल ने नशे में धुत होकर लौटते समय अपने पड़ोसी को भरपूर गालियॉ दीं। पड़ोसी ने उसके नशे में होने के कारण अहिंसा का परिचय दिया। फिर शेष विश्व की भॉति दोनो चैन की नींद सो गए।
            इस तरह टॉग टूटने के सत्रह बरस का भव्य आयोजन संपन्न हुआ।
----- वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास  भोपाल मप्र
फोन 9425674629

बुधवार, जून 08, 2011

व्यंग्य- एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के पक्ष में


व्यंग्य
एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के पक्ष में
वीरेन्द्र जैन
ये कांग्रेसी बहुत ही असांस्कृतिक लोग हैं और हों भी क्यों न आखिर शाखा से थोड़े ही निकले हैं। जो लोग संघ की शाखाओं से निकले हुए होते हैं वे सांस्कृतिक होते हैं क्योंकि संघ की नियमावली में लिखा हुआ है कि संघ एक सांस्कृतिक संगठन है और जो एक सांस्कृतिक संगठन है उससे निकले हुए लोग असांस्कृतिक कैसे हो सकते हैं।
अब जब भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद की वैकल्पिक प्रत्याशी, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने राजघाट पर नृत्य दिखा दिया तो ये कांग्रेसी कह रहे हैं कि राजघाट अपवित्र हो गया। ये कैसी नासमझी की बातें हैं। नाचना गाना भले ही कैसा भी हो किंतु यदि उसे नृत्य संगीत और राष्ट्रगीत जैसे संस्कृतनिष्ठ शब्द दे दिये जायें तो उसमें एक गरिमा आ जाती है। सारा प्रताप शब्दों का ही तो है, अडवाणीजी डीसीएम टोयटा को रथ कह कर लोकसभा में अपनी दो सीटों की संख्या को छियासी और फिर दो सौ तक बढा लेते हैं। अब अगर वे डीसीएम टोयटा यात्रा पर निकालते तो रामभक्त टोयटा-यात्री को टाटा कर देते। इसलिए पूरा संघ परिवार शब्दों के प्रयोग में बहुत चतुराई से काम लेता है। अपने स्कूलों को मन्दिर कहता है जिससे दूसरे धर्मों के लोग अपने बच्चों को भेजने से वैसे ही कतरा जाते हैं। सरस्वती शिशु मन्दिरों में मुसलमान बच्चे प्रविष्ट नहीं हो पाते हो जायें तो भोजन मंत्र पढने के बाद ही खाना खा पायेंगे। क्षमा करें मैं संघ के सांस्कृतिक शब्द जाल में वैसे ही उलझ गया था जैसे मैथली शरण गुप्त की पंचवटी में सूर्पणखा का बाँया हाथ चिकुर जाल में उलझ गया था। हाँ तो मैं कह रहा था कि सुषमाजी ने नृत्य किया तो ठीक किया आखिर बाबा रामदेव को फाइव स्टार होटल में मंत्रमंडलीय स्वागत के बाद महिलाओं के बीच छुपकर और उधार मांगे हुए सलवार कुर्ते में दुपट्टे से मुँह छुपा कर भागने को मजबूर करने का अपराध जो केन्द्र सरकार ने किया था, उसका विरोध तो करना था। सबके विरोध का अपना अपना तरीका होता है, सुषमाजी का तरीका सांस्कृतिक है सो वे सोनिया गान्धी के प्रधानमंत्री बनने का विरोध सिर मुँढा, जमीन पर सो और चने खाकर करना चाहती थीं तथा बाबा पर हुए हमले का विरोध राजघाट पर नाच कर करना चाहती हैं।
मैं इस छिद्रांन्वेषण में नहीं जाना चाहता कि राजघाट एक समाधि स्थल है और शांति व सादगी ही उसकी सुन्दरता है उसे धरनास्थल बनाना ही गलत है व बना भी लिया तो नाचना और ठुमका लगाना गलत है। अरे भैया जिस पार्टी की वरिष्ठ उपाध्यक्ष हेमामालिनी जैसी एक सुप्रसिद्ध नृत्यांगना हो जो अच्छों को केंट वाटर प्योरीफायर का पानी पिला देती हैं, तो उसके बाकी के सदस्य नाच गाने से कैसे दूर रह सकते हैं, चाहे अवसर दुख का हो या सुख का हो। मेरा सैंय्या छैल छबीला मैं तो नाचूंगी। भोपाल में जब पंचज कार्यक्रम वाली मुख्यमंत्री उमा भारती बनीं तब भाजपा कार्यालय के सामने महिलाओं के नाचते हुए फोटो समाचार पत्रों में छपे, जब उमाजी को निकलवाकर गोकुल ग्राम वाले गौर साब सीएम बने तब भी फोटो छपे और जब उमाभारती की लोकतंत्र की माँग को दरकिनार करते हुए स्वर्णिम मध्य प्रदेश वाले शिवराज सिंह चौहान सीएम बने तब भी वैसे ही फोटो छपे जिनमें महत्वपूर्ण यह रहा कि हर अवसर पर नाचने वाली महिलाएं वही की वही रहीं। कोउ सीएम होय हमें का हानी , हमें तो नाचना है। मुख्यमंत्री कोई हो, अवसर कोई हो, सांस्कृतिक पार्टी को तो संस्कृति से काम, सांवरे की बंशी को बजने से काम...............।
नाचने में नृत्य, गीत, संगीत सब सम्मलित रहते हैं। यह हमारी परम्परा का हिस्सा है, पुराणकथाओं के अनुसार शिव जी का तांडव और डमरू दोनों ही प्रसिद्ध हैं, तो रास रचाते श्री कृष्ण तो कुंजन कुंजन में रासलीला करते रहते थे। कर्नाटक में इसी सांस्कृतिक पार्टी की सरकार भ्रष्टाचार का नंगा नाच नाच रही है पर उसे आशीर्वाद देने का श्रेय कोई नेता नहीं लेना चाहता। रेड्डी बन्धु मुख्यमंत्री येदुरप्पा को उंगलियों पर नचा रहे हैं और मुख्यमंत्री पार्टी को नचा रहे हैं, जाओ नहीं देते स्तीफा। मुख्यमंत्री के परम शत्रु अनंत कुमार के बारे में एक नई प्रकाशित किताब में आर के आनन्द ने लिखा है कि उन्होंने उन्हें अपने पड़ोस में स्थित नीरा राडिया के फार्म हाउस में उसके साथ पश्चिमी धुनों पर थिरकते देखा है।
उधर भाजपा में किसी तरह पुनर्प्रवेश के लिए उमाभारती तकली जैसा नाच रही थीं, कभी नागपुर के संघ कार्यालय तो कभी गडकरी के दरबार में कभी यूपी तो कभी एमपी कभी उत्तराखण्ड। कभी बाबा रामदेव को प्रधानमंत्री बनवाने लगती थीं, तो कभी अन्ना हजारे के अनशन स्थल से खदेड़ी जाती थीं, पर कहीं गति नहीं मिल रही थी, किसी गुरू किसी देवता का आशीर्वाद काम नहीं आ रहा था। उनके लिए भाजपा का दरवाजा सुई का छेद हुआ जा रहा था, पर उन्होंने नाचना नहीं छोड़ा गाना नहीं छोड़ा और पूरे छह साल बाद भगवान ने उनकी नैय्या पार लगा दी, बस घाट बदल दिया।
भ्रष्टाचार के लालच से नेत्र मूंदे कांग्रेसियो जरा समझो यार सब ओर नाच चल रहा है, धरती नाच रही है, सूरज नाच रहा है चन्दा नाच रहा है, काला सफेद पैसा नाच रहा है, रिंगमास्टर के कोड़े पर सरकस का शेर तक नाच के दिखा रहा है, इसलिए नाचने दो भाई। जब ए राजा की बारात का बाजा बज गया है तो बाकी बकरों की अम्मा कब तक खैर मनायेगी। चलो तुम भी थोड़े सांस्कृतिक बन जाओ, चलो उठो, अच्छे अमूल बेबी जिद नहीं करते ।

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629