शुक्रवार, मार्च 26, 2010

व्यंग्य- भावना का ठेसित होना

व्यंग्य
भावना का ठेसित होना
वीरेन्द्र जैन
देश में दो तरह के लोग हैं। एक वो कि जिनकी भावना को निरंतर ठेस लगती रहती है और दूसरे वे जो कि इस ठेसित भावना से नुकसान उठाते रहते हैं। कल ऐसे ही ठेसित भावना वाले लोगों ने मेरा स्कूटर फूंक दिया और मैं यह भी नहीं कह सका कि आपकी इस हरकत से मेरी भावना को ठेस लग रही है।
उनकी भावना भावना है क्योंकि उनके हाथ में लाठी है।
नया मुहावरा यही बनेगा कि जिसके हाथ में लाठी उसीकी भावना, भावना। आप बिना हाथ में लाठी लिए हुये अपनी भावना को ठेस भी नहीं लगवा सकते!
पता नहीं पुराने जमाने में भावनाएं नहीं होती थीं या भावनाएं ठेस प्रूफ हुआ करती थीं पर अब तो भावनाएं ही भावनाएं और ठेसों ही ठेसों की वैसी भरमार है जैसे जून के मौसम में ठेलों ठेलों पर आम ही आम भरे पड़े रहते हैं- बादाम, दशहरी, लंगड़े बम्बइंया-पता नहीं अब उन्हें मुम्बइया कहा जाने लगा या नहीं- आदि।
भावना को ठेस लगने की कई विधियां होती हैं। अब कहां तक गिनाउं ये इतनी ज्यादा हैं कि मैं कितनी भी गिनाउं कोई ना कोई छूट ही जायेगी। इसलिए गिनती पहाड़ों में भरोसा नहीं करना चाहिये।
आपके कोई महापुरूष हैं? हैं क्या, होंगे ही ! आजकल सबके होते हैं। आदमी बिना रोटी के तो रह लेगा पर बिना महापुरूष के नहीं रह सकता। वह जो भी महापुरूष है आपकी जाति का हो तो ठीक रहता है उससे भावना को ठेस लगने में बहुत सुविधा रहती है। हां तो जो वो महापुरूष है उसकी मूर्ति चौराहे पर लगी होगी और यदि नहीं लगी है तो और भी सुविधा है क्योंकि इसी से आपकी भावना ठेसित हो सकती है। साले इन टुच्चे फुच्चे लोगों के महापुरूषों की तो मूर्तियां चौराहों पर ठुकी हैं और आपके इतने महा महापुरूष की मूर्ति चौराहे पर नहीं है। लो लग गई भावना को ठेस। बस अब यही ठेस अपने जातिभाइयों को भी लगवा दो और इस सरकार की तो..........।
लोकतंत्र में सरकार मन्दिर में लटके घंटे की तरह होती है जो भी वहां से गुजरता है वही ठोकता हुआ निकल जाता है। टन् न् न् न् न् न्न। भावना को ठेस भर लगने की देर है बस फिर तो आप कुछ भी करने के लिए परम स्वतंत्र हैं। पहुंचिये चौराहे पर रोकिये रस्ता और जलाकर रख दीजिये दस पांच वाहनों को । पुतला फूंक दीजिए, टायरों में आग लगाइये क्योंकि वे ज्यादा धुंए के साथ देर तक जल कर आपकी ठेसित भावना को दूर दूर तक प्रवाहित करते हैं।

यदि आपके महापुरूष की मूर्ति चौराहे पर लगी है तो भी कोई बात नहीं तब अन्धेरे में उसके मुंह पर कालिख मलने से भावना को ठेस पहुंचायी जा सकती है या उस मूर्ति की एकाध उंगली तोड़ी जा सकती है ताकि दस पांच सिर तोड़े जाने का बहाना मिल सके। इस आधार पर आप फिर सरकार का घन्टा बजा सकते हैं कि यह सरकार महापुरूषों की मूर्तियों की चौकीदारी क्यों नहीं करती!
यदि आप मूर्तिपूजक नहीं हैं तो भी कोई बात नहीं । आप के पास या आपके जातिभाई के पास अपने महापुरूष का कोई चित्र तो है नहीं इसलिए आप किसी पत्रिका में कहीं पर छपे किसी चित्र या कार्टून को अपने महापुरूष का बता कर भावना को ठेसित मान सकते हैं और चाहे जहां आग लगाते फिर सकते हैं। चूंकि आपकी भावना को ठेस लगी हुयी है इसलिए कोई ये भी पूछने की हिम्मत नहीं करेगा कि आप कैसे कह सकते हैं कि ये आपके ही महापुरूष का कार्टून है।

कोई अपनी पूजापद्धति बदल ले तो भावना ठेसित हो सकती है, कोई अपनी पसंद से विवाह कर ले तो भावना ठेसित हो सकती है कोई खास तरह के कपड़े पहिन ले तो भावना ठेसित हो सकती है और कोई चुम्बन ले ले, जिस पर चुम्बित को कोई आपत्ति नहीं हो, तब भी भावना ठेसित हो सकती है। ये भावना वर्तमान पर ही ठेसित हो यह जरूरी नहीं है यह इतिहास की ‘सच्चाइयों’ से भी ठेसित हो सकती है।

आप भले ही मार्डन आर्ट की एबीसीडी भी नहीं जानते हों और आपको यह समझ में भी नहीं आता हो कि ये जो बनाया गया है वह क्या बला है पर आप उस चित्र में नग्नता ढूंढ कर भावना को ठेसित कर सकते हैं। यदि कोई प्रसिद्ध आलोचक किसी के साहित्य का मूल्यांकन करते हुये उसे खारिज कर दे तो उससे भी आप अपनी भावनाओं को ठेसित करवाने का खेल खेल सकते हैं। आप फिल्मों के विषयों से भावना को ठेसित करा सकते हैं, आप कविता से, कहानी से, व्यंग्य से या साहित्य की किसी भी विधा से भावना को ठेस लगवा सकते हैं। अस्सी के दशक में दूरर्दशन के एक सीरियल में दिये जाने वाले टाइटिल में हिन्दी के सुप्रसिद्ध लेखक डा राही मासूम रजा की बहू का नाम पार्वती खान आने से एक की भावना ठेसित हुयीं और उससे डरकर दूरर्दशन ने पार्वतीखान का नाम टाइटिल से हटा दिया था। कभी भाषा के रूप में भावना ठेसित होती है तो कभी क्षेत्र के रूप में।

हमारी भावना तो भीड़ भरे मेले में लहंगा फैलाये घूम रही है और अपेक्षा कर रही है कि उसे ठेस ना लगे। आप फिर भी बचा कर निकलेंगे तो वह खुद टकरा जायेगी क्योंकि उसके भड़ुवे उसके साथ लाठी लेकर जो चल रहे हैं।

हमारी भावना पड़ोस में भूखे बैठे आदमी की विवशता से ठेसित नहीं होती और न सड़क पर दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को देख कर। हमारी भावना कचरा बीनने वाले बच्चों को देखकर भी ठेस नहीं खाती और घर में शौचालय के अभाव में सड़क किनारे धोती उठा कर शौच करती गृहलक्षमियों को देख कर।

कुछ लोग सुबह से भावना को ठेस लगवाने के लिए ही बैठे रहते हैं, गोलमालकरजी अखबार बांचते भावुकजी से दांत कुरेदते हुये पूछते हैं-क्यों भाउ ठेस लगी क्या?
भावुकजी कहते हैं -ढूंढ रहा हूं भाउ आज तो कुछ नजर नहीं आ रहा ।
गोलमालकरजी कहते हैं- ढूंढों ढूंढों यदि नहीं मिले तो बताना! बरना किसी मूर्ति का अंग भंग करा कर ठेस लगवा लेंगे।

वीरेन्द्र जैन
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