मंगलवार, जून 21, 2011

व्यंग्य़ लाशों की खबरें



व्यंग्य लाशों की खबरें
वीरेन्द्र जैन
इन दिनों के अखबार लाशों ही लाशों की खबरों से भरे होते हैं। हालात ये हो गये हैं कि अखबार में जिन्दा बचे लोगों को अपने चमचों से जन्मदिन की बधाई के विज्ञापन छपवाने पड़ते हैं नहीं तो शायद लोग उन्हें जिन्दा मानने से ही इंकार कर दें। अभी पिछले दिनों ही मुखपृष्ठ पर भोपाल के एक अस्पताल की खबर थी जिसके अनुसार वहाँ इस बात पर हंगामा हो गया कि जब तक मृतक के रिश्तेदार बिल चुकाने की व्यवस्था करने गये तब तक एक लाश को चूहों ने कुतर डाला था। मृतक के रिश्तेदार डिफेक्टिव माल लेने को तैयार नहीं थे और अस्पताल के पास फ्रेश माल बचा नहीं था अन्यथा वे उसको बदल के दे देते। बदलने में तो उन्हें कमाल हासिल है। और हो भी क्यों न जब वे आये दिन बच्चे बदलते रहते हैं तो डिफेक्टिव लाश किसी गरीब को यह कहते हुये टिपा देते कि समय पर बाजार से दवाइयाँ नहीं लाये तो देखो उसका क्या हाल हो गया है।
मरीज के रिश्तेदार कहते कि ये तो हमारी लाश नहीं है, तो अस्पताल के कर्मचारी कहते कि तुम्हारी कैसे हो सकती है तुम तो अभी भरती भी नहीं हुये हो। पहले भरती होओ तब तुम्हारी लाश तैयार होगी। हम किसी मंत्री के प्राइवेट कालेज नहीं सच्चे अस्पताल हैं, बिना एडमीशन के डैथ सार्टिफिकेट नहीं देते। “हमारा मतलब है कि हमारे उस रिश्तेदार की लाश नहीं है जिसे भरती कराया था, और यह कटी फटी भी है” वे कहते ।
‘अब जैसी है वैसी ही ले जाओ नहीं तो ये भी नहीं मिलेगी, एक मरीज के भरती होने पर एक लाश देने का नियम है सो तुम्हें दे रहे हैं, जलाने के बाद सभी लाशें राख हो जाती हैं। हम तो जिन्दा में भेद नहीं करते और एक को दिया जाने वाला इंजेक्शन दूसरे को लगा देते हैं, मनुष्य-मनुष्य़ सब बराबर, सब को एक दिन बाया अस्पताल परमात्मा के पास जाना है, और तुम हो कि लाश में भी भेद कर रहे हो।
अस्पताल ने शिकायतकर्ता से कहा कि भाई जब तक यह जिन्दा था हमने चूहे वूहे को नहीं खाने दिया, इसके नाम पर जो कुछ भी सौ पचास रुपये तुमने खिलाये सब अस्पताल के कर्मचारियों ने ही मिल कर खाये। अब सोचो कि काम कितना है कि हम जिन्दा तक की तो देख रेख कर नहीं पाते लाशों की कैसे करें। लाश का जो भी बकाया बिल का पैसा मिलना सब अस्पताल को मिलेगा, हमें क्या मिलेगा। वैसे तुम चाहो तो हम कटी फटी जगह पर पट्टी बगैरह बाँधे देते हैं। ऊपर तो आत्मा जाती है जो न चूहों से कटती है न फटती है, न जलती है, ऐसा गीता में तक कहा गया है। सोचो महाभारत के युद्ध में कितन अक्षोहिणी सेना के सिपाही कट गये होंगे उनकी शिकायत किसने कहाँ की। देह कैसी भी हो वह तो यहीं जल जाती है, डैथ सार्टिफिकेट में भी लाश की कंडीशन का कोई जिक्र नहीं होता। मर गया माने मर गया। जमीन, जायजाद, बैंक, पोस्ट-आफिस, बीमा कहीं भी सार्टिफिकेट ले के चले जाओ और क्लेम सैटिल करा लो। ऐसा नहीं है कि चूहों से कटी लाश का पैसा उसी अनुपात में कम हो जाये, चाय पानी का पैसा देने के बाद वो तो पूरा मिलेगा, और चाय पानी का पैसा तो पूरी लाश वाले का भी उतना ही लगता है जितना कि चूहों से कटी लाश का। नहीं ले जाओगे तो यहाँ मेडिकल कालेज वालों के पास चली जायेगी जहाँ चूहों से छूटे हुये बाकी हिस्सों का भी वही हाल होगा।
लाश पर भी क्या झगड़ा करना, अरे अस्पताल में भरती हो के मरे हैं कोई अनशन करके तो मरे नहीं कि घर वाले और आश्रम वाले आपस में लड़ें कि मुआवजा किसको मिलेगा। इनका तो पता नहीं कि बीमा भी होगा या नहीं। लाश पर झगड़ा तो कारगिल युद्ध के एक शहीद के बारे में हुआ था जिसे पूरा देश श्रद्धांजलि दे रहा था और उसके माँ बाप शिकायत कर रहे थे कि शहीद की पत्नी मुआवजे का पूरा पैसा लेकर मायके चली गयी व बूढे माँ बाप पैसे पैसे को मोहताज हो गये हैं। सरकार लाशों पर ही मुआवजा देती है इसलिए जिन्दा आदमी की कोई फिक्र नहीं करता। भोपाल में गैस काण्ड में मरे लोगों के किसी उत्तराधिकारी ने नहीं कहा कि मेरे माँ बाप मुझ से अलग रहते थे, मैं उनकी कोई सेवा नहीं कर पाया था इसलिए मैं मुआवजे का अधिकारी नहीं हूं। सरकार जिन्दा आदमी का लैटर बाक्स जैसा पेट नहीं भर सकती पर मर जाये तो हिसाब चुकता कर देती है।
यही कारण है कि जहाँ देखो वहाँ लाशें ही लाशें बिछी रहती हैं, कुछ तो मरने के बाद भी सालों अखबार में प्रथम पुण्य़ तिथि से लेकर बीस पच्चीसवीं पुण्यतिथि तक भरे रहते हैं। वहाँ उनको सर्वोत्तम स्थान प्राप्त है।


वीरेन्द्र
जैन
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1 टिप्पणी:

  1. जोरदार है जी, ये भी, लाशों पर ही क्यों ना हो, बात तो सच्ची है।

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