गुरुवार, जून 27, 2013

और मोदी ने दिये दो करोड़..........

व्यंग्य
और मोदी ने दिये दो करोड़ ..............
वीरेन्द्र जैन
                पता नहीं आपको पता है कि नहीं कि उत्तराखण्ड के केदारनाथ में कितना भयानक हादसा हुआ क्योंकि आप तो क्रिकेट मैच देखने और उस पर सट्टा लगाने में व्यस्त होंगे। आपको तो यह भी पता नहीं होगा कि इस आपदा से निबटने के लिए भाजपा की चुनाव प्रचार समिति के चेयरमैन श्री नरेन्द्र मोदी ने दो करोड़ रुपये की सहायता देने की घोषणा की है।
       इस हादसे से व्यथित सेक्युलर प्रधानमंत्री मन मोहन सिंह ने सरकार की ओर से एक हजार करोड़ दिये हैं और अयोध्या में मन्दिर वहीं बनाने के लिए सोमनाथ से रथयात्रा निकलवाने के लिए अडवाणीजी को उकसाने वाले  मोदी ने दो................. करोड़ रुपये दिये हैं। मनमोहन सिंह की सरकार के पर्यटन विभाग ने सरकारी विश्राम गृहों आदि के पुनर्निर्माण के लिए सौ करोड़ दिये हैं और गुजरात के पर्यटन प्रचार के लिए अमिताभ बच्चन को ब्रांड एम्बेसडर बनाने वाले नरेन्द्र भाई मोदी ने दो करोड़ छिनक दिये हैं।
       उत्तरप्रदेश की सेक्युलर सरकार के मुख्यमंत्री ने पच्चीस करोड़ रुपये दिये हैं और गुजरात में दूसरे धर्म के मानने वाले परिवार में पैदा हुये लोगों की जड़ से सफाई करवाने वाले मोदीजी ने अपने धर्म के धर्मस्थल में हुए भीषणतम हादसे के लिए दो........ करोड़ रुपये दिये हैं।
       सेक्युलर महाराष्ट्र सरकार, हरियाणा सरकार, राजस्थान सरकार ने दस करोड़ रुपये की सहायता दी है पर गुजरात के हिन्दू ह्रदय सम्राट नरेन्द्र मोदी ने देश के एक हिन्दू तीर्थ में हुये हादसे के लिए दो करोड़ रुपये देने की उदारता प्रदर्शित की है।
       जब पिछड़े मध्यप्रदेश के भाजपा मुख्यमंत्रियों में नम्बर तीन मुख्यमंत्री तक ने पाँच करोड़ रुपये दिये हैं, तब विकास में सबसे आगे होने का ढिंढोरा पीटने वाले मोदीजी ने दो करोड़ घोषित किये हैं।
       जब टाटा समूह जो मोदी के चश्मे से देखने पर पारसियों का माना जाना चाहिए , उसने अपने सभी कर्मचारियों के एक दिन का वेतन विनम्रतापूर्वक देने का फैसला किया है जो कुल 74 करोड़ होता है तब अपने को छोटा सरदार प्रचारित करने वाले मोदीजी ने दो करोड़ दिये हैं।
       जब मौलाना मुलायम सिंह के निकट समझे जाने वाले सहारा समूह ने उत्तराखण्ड में दस हजार मकान बनवा कर देने का वादा किया है तब मोदीजी ने दो करोड़ रुपयों का दान देकर छुट्टी पा ली है। फिल्म स्टार अक्षय कुमार ने बीस करोड़ देने की घोषणा करदी व भाजपा के स्टार ने कुल दो करोड़ दिये। भोपाल की भारत हैवी एलेक्ट्रीकल्स के करमचारियों ने ही नहीं मध्य प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों ने भी मोदी द्वारा गुजरात सरकार की ओर से दी गयी रकम से ज्यादा देने की घोषणा की है।
      
       एक कहानी है कि जब एक भिखारी सारा दिन एक धर्मस्थल के बाहर बैठ कर भीख माँगता रहा पर उसके कटोरे में शाम को खाना खाने लायक पैसे भी नहीं जुटे तो वह उठकर किसी मयखाने के बाहर आकर बैठ गया। मयखाने से एक शराबी बाहर निकला और उसने उदास व भूखे भिखारी को देख कर अपनी पूरी जेब उलट दी जिसमें सौ से ज्यादा रुपये थे और यह कहता हुआ चला गया कि जाओ ऐश करो। अचम्भित भिखारी ऊपर की ओर हाथ उठाकर बोला- भगवान तू भी बहुत चालाक है, रहता कहीं और है और पता कहीं और का देता है।
       मोदीजी आप चाहें तो अपनी दो करोड़ की घोषणा से फिर भी सकते हैं, आपके बाबू बजरंगियों के काम आयेंगे।       
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, फ़रवरी 25, 2013

व्यंग्य- सामूहिक चेतना संतुष्टि मीटर


व्यंग्य
सामूहिक चेतना संतुष्टि मीटर
वीरेन्द्र जैन
       शायद आपने नाम नहीं सुना होगा। सुनेंगे भी कहाँ तक रोज ही नये नये उपकरण बन रहे हैं , मालिश करने से लेकर नहलाने तक की मशीनें आ गयी हैं। बच्चे को मशीन में डाल दो तो नहला धुला कर ही वापिस निकालेंगी और कुछ दिनों बाद तो इंडिया के लिए विशेष ब्रांड आने वाला है जिसमें बच्चे को नहलाने धुलाने के बाद नज़र से बचाने के लिए डिठौना भी लगा कर निकालेंगीं।
       हमारी सम्मानीय अदालतें भी अब अपने फैसले नये नये उपकरणों से देने लगी हैं। ऐसा लगता है कि उन्होंने कोई सामूहिक चेतना संतुष्टि का मीटर प्राप्त कर लिया है जिससे गवाहों सबूतों और बहसों आदि की जरूरत ही खत्म हो गयी है। सामूहिक चेतना मीटर से नापा और सुना दिया फाँसी का फैसला, लटका दो तब तक के लिए जब तक कि जान न निकल जाये- हेंग टिल डैथ।
       भाजपा को ऐसे उपकरण का जल्दी ही पता लग गया था इसलिए उसने भी सामूहिक चेतना बनाने के ‘एनजियोज’ खोल लिये हैं, जो सामूहिक चेतना बनाने का काम करते रहते हैं कि सामूहिक चेतना को तो इसी से संतुष्टि मिलेगी। अब जिसको चाहें उसको फाँसी दिला सकते हैं। अब वे जिसको चाहे उसको धमका सकते हैं कि अगर हमारी बात नहीं मानी तो सामूहिक चेतना की संतुष्टि की दिशा ही बदल देंगे, और अदालत को फाँसी का फैसला देना ही देना पड़ेगा क्योंकि मीटर में आ रहा है। यह वैसा ही होगा जैसा कि दुकानदार एमआरपी दिखाता है और हम खुदा की किताब में लिखे वचन की तरह उस एमआरपी के आगे सिर झुका देते हैं। आगे से अदालतें भी कहेंगीं कि क्या करें गवाहों के बयान तो आपस में विरोधी हैं, सबूत भी नकली लगते हैं पर सामूहिक चेतना मीटर बोल रहा है सो सजा तो देना ही पड़ेगी। वैसे तुम्हारी जान जाने का हमें दुख है पर मशीन का कहा तो टाल नहीं सकते।
       संघी लोग बैठकर पुराने समय को याद कर रहे थे कि काश यह मीटर पहले आ जाता तो हम गोडसे की जान बचा लेते। सामूहिक चेतना को ऐसी भड़काते कि संतुष्टि का मीटर तक भड़भड़ाने लगता व न्यायालय गोडसे को बाइज्जत बरी कर देता और संघ पर प्रतिबन्ध लगने की नौबत ही नहीं आती। अब वे लोग माले गाँव, मडगाँव, समझौता एक्सप्रैस, अजमेरशरीफ, हैदराबाद, जामा मस्जिद आदि आदि के पकड़े गये साधु साध्वियों के भेष में रहने वालों के पक्ष में सामूहिक चेतना बना रहे हैं ताकि अदालतें कह सकें कि सबूत तो सारे हैं पर क्या करें ये सामूहिक चेतना की संतुष्टि का मीटर ही नहीं बोल रहा है।
       मशीनों का एकदम से दौर आ गया है, बैंकों ने एटीएम लगवा लिए हैं, पासबुक और चेक जमा करने वाली मशीनें आ गयी हैं। रेल टिकिट मशीनों से निकल रहे हैं, सारे के सारे दफ्तर मशीनों से चल रहे हैं तो बेचारा न्याय भी कब तक सिर खपाता। उसने भी ठुकवा ली मशीन। जय हो।      
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, फ़रवरी 08, 2013

व्यंग्य- संत का सीकरी में काम [तमाम]


व्यंग्य
सन्त का सीकरी में काम [तमाम]
वीरेन्द्र जैन


      संन्त को सीकरी आना पड़ा है। मजबूरी है। पहले के सन्त की बात और थी। तब उन्हें भक्ति काव्य रचने, सुलेख में उसकी उम्दा नकल करने के अलावा ज्यादा से ज्यादा घाट के पत्थरों पर चन्दन घिसने का काम करना पड़ता था, जिससे घाट के पत्थर दिन प्रति दिन चिकने होते जाते थे। इन पत्थरों पर भक्तगण गौधूलि बेला में ठन्डाई घोंटने के काम में प्रयोग करते थे व कुछ विशेष भक्तगण उन्हीं पत्थरों पर भंग घोंट कर ठन्डाई के साथ सेवन करते थे। बड़ी शन्ति थी। नदी के जल को प्रदूषित करने के लिए उद्योग नहीं थे तथा नदी का जल पीने, नहाने और शौचादि कर्म में प्रयुक्त होने के बाद संतो के हित सतत प्रवाहमान रहता था। संत  जब भंग सेवन कर लेते थे तो उनकी दृष्टि में नदियां रंग  बदलने लगती थीं। किसी को उनमें दूध बहता नजर आता था तो किसी को दही। उनके इसी भाव को याद कर आज के अतीत जीवी कहते है कि हमारे देश में दूध दही की नदियॉ बहती थीं। (सुन कर बच्चे पूछते हैं- बाबा तब तो आइसक्रीम के पहाड होते होंगे तथा संत हिमालय पर इसी लालच में जाते होगे )

      ऐसी दशा में सन्त को सीकरी से कोई काम नहीं पड़ता था।

      आज का सन्त विवश है। सारे प्रकाशक सीकरी में जम गये हैं। साहित्य का दरिया, दरियागंज में बहता है वह लिखता दतिया में बैठकर है पर पुस्तक छपवाने सीकरी ही जाना पड़ता है। प्रकाशक कोई पुराने समय के लैम्प पोस्ट के लैम्प जलाने वाला नौकरी शुदा आदमी तो है नहीं, बेचारा धंधा करता है (वह बुरा नहीं मानता जब यही क्रिया रन्डियों के लिए भी प्रयुक्त होती है) जब दो लगाता है, तब चार कमाने का सपना पालता है और केवल  एक वापिस पाने पर सन्त की मॉ बहिन एक करता रहता है। प्रकाशक का काम बेचना है, वह हरितिमा को घास के नाम पर ही बेच सकता है और आयुर्वेद को कविता के नाम पर ही खपा सकता है। लोगों ने साहित्य खरीदना बन्द कर दिया है इसलिए वह सन्त की कृति को सरकारी खरीद के कुएं में झोंकने के लिए वर्जिश करता रहता है। सरकारी अफसरों के इर्द गिर्द घिघयाना उसके दैनिंदिन कार्यक्रम में शमिल है। अत: उसे सीकरी में रहना पड़ता है। सन्त की पनहियां टूटती हैं तो टूटती रहें वह सेल में से दूसरी खरीदवा देगा। संत की तो मजबूरी है प्रकाशक जहॉ जहॉ भी जायेगा वह पीछे पीछे फिरेगा। मुझे विश्वास है कि इस युग के सारे सन्त नर्क में ही तलाशे जा सकते हैं क्योकि सारे प्रकाशक वहीं पर है।

      संत पैसे उधार लेकर सीकरी का टिकिट कटाता है। पाण्डुलिपि और पन्हियॉ सिरहाने लगा कर बर्थ पर टांगें पसार कर सो जाता है और सपने देखने लगता है कि वह एक बड़े प्रकाशक के यहॉ सोफे पर बिराजमान हो कर एसी क़ी ठंडक खा रहा है।

      प्रकाशक केबिन में बैठता है। जिसने प्रकाशन अर्थात मुद्रित करके प्रसार करने का धंधा खोला हुआ है वह पहले  प्राइवेसी बरतता है। छप कर आने से पहले हवा नहीं लगने देना चाहता गोया कृति न हो सट्टे का नम्बर हो। उसने केबिन में ऐसा कांच लगवाया है जिसमें से बाहर दिखता है पर बाहर से अन्दर नहीं दिखता। सीकरी  आने से पहले सन्त को यह पता नही था। पाण्डुलिपि को  सीने से चिपकाये बाहर बैठे सन्त की बैचेनियों का मजा लेता रहता है अन्दर केबिन में बैठा प्रकाशक। फिर वह लंच पर चला जाता है। उसका लंच एक घंटे खिंचता है और सन्त भूखे पेट कुडकुड़ाता रहता है। भरा पेट प्रकाशक वापिस आकर ओढ़ी हुयी विनम्रता के साथ संत को केबिन तक ले जाता है। अपने हाथ से वाटर कूलर से पानी भरकर पेश करता है और सेवा पूंछता है। संत पाण्डुलिपि पेश करता है।

      '' ये क्या है संत जी ? प्रकाशक जानते हुए भी पूंछता है।
      '' पाण्डुलिपि है सेठ जी ''  संत गिडगिड़ाने वाले स्वर में बोलता है।
      '' काहें की ''
      '' कविता की है सेठ जी '' संत का स्वर और दरिद्र हो जाता है।
      प्रकाशक ऐसे देखता है जैसे हँस रहा हों । और वह हँस भी रहा होता है बस चेहरे पर हँसने के प्रचलित चिन्ह प्रकट नहीं होने देता। कविता हँसने की ही चीज होकर रह गयी है। प्रकाशक के लिये।
      '' संत जी दया कीजिये'' वह ऐसे भाव में कहता है जिसका प्रश्नवाचक रूप यह होता है कि- अबे तू  बेवकूफ है या मुझें समझता है।
      '' क्या मतलब सेठ जी '' सन्त इस तरह पूछते हैं कि कोई देखता तो उन्हें परम गधा माने बिना नहीं रहता।
      '' संत जी '' प्रकाशक गुरू गंभीर वाणी में कहता है '' अब ये कविता की ऐयाशी हमारे आपके वश की बात नहीं रही ''
      '' तो किसके वश की बात रहीं '' सीकरी आकर पछताता भोला संत पूछता है। ''

      '' अब ये काम तो केवल  आईएएस अधिकारियों, पुस्तकों की खरीद से जुड़े परिषदों के सचिवों, विश्वविद्यालय में ऊॅचे पदो से चिपकी जोंकों और नम्बर दो की कमाइयों पर छपवा कर सादर सप्रेम भैंट करने वाली नव धनाडयों की पत्न्यिों का रह गया है। हमारे तुलसी बाबा तो भविष्य दूष्टा थे, अत: उन्होने ' स्वान्त: सुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा '' कहकर खुद गढ़ा, खुद लिखा, खुद पढ़ा फिर गाया, तब जाकर लोगों तक पहुँचा पाया। पर अब तो संवेदना इतनी मर गयी है कि लोगों को संत तो क्या अपने घर परिवार पर भी दया नहीं आती ।

            संत जी। हम प्रकाशक तो अब केवल निमित्त मात्र हैं। अब तो लोग खुद ही पैसा लेकर आते हैं, हमारी सेवा करते है और छपवा कर अपने हिस्से की प्रतियॉ ले जाते है। शेष हम रद्दी में बेच देते है उसी से हमारी दाल रोटी चलती है। रद्दी वाले इसे मुफ्त बांटने वाले लोगों को घटी दरों पर बेच देते हैं जहॉ से दीमकों को भोजन बनने के लिए ये पुस्तकालयों में फिंकवा दी जाती हैं। हमारे आलोचक कालीदास के काल के पंडितों की तरह प्रकाशित कृतियों के नये नये अर्थ खोज कर लोगों को मूर्ख बनाते रहते हैं।

            आप भी सन्त जी कहॉ के चक्कर में पड़ गये। आप तो धर्म  की दुकान खोल लेते, आजकल खूब चल रही है। चढ़ावा मुफ्त में आता। उधार करने वालों पर कविता पेलते रहते, उससे दोहरा लाभ होता या तो वे पैसे दे जाते या कविता भुगतते। ''

            सन्त को इस जमाने में भी सीकरी रास नहीं  आती। वह पाण्डुलिपि सहित भागता है। कबीरदास जी ने भी शायद सीकरी जाते समय ही लुकाठी हाथ में ली होगी और उन्हीं लोगों को साथ चलने  के लिए ललकारा होगा जो अपना  घर बार छोड कर आ सकते हों।

            एक बार फिर सन्त का सीकरी में काम तमाम हो चुका है।
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, जनवरी 28, 2013

मर्यादामुक्त मर्द की मर्दानगी


व्यंग्य
मर्यादामुक्त मर्द की मर्दानगी
वीरेन्द्र जैन

       चचा गालिब को जिस इश्क ने निकम्मा कर दिया था , वही हाल गडकरी जी का भाजपा के अध्यक्ष पद पर रहते हुए हुआ। पर जैसे ही उन्हें पद से बड़े बे-आबरू कर के हटाया गया वैसे ही वे मर्द में बदल गये और आयकर अधिकारियों को चुनौती दे डाली कि सालो अभी तक तो में पद की मर्यादा में था इसलिए चुप था पर अब मुँह पर से ढक्कन उठ गया है और अब मेरे अन्दर जो कुछ भी सड़ रहा है उसका भभूका उठेगा। अब तो बोतल की सील टूट चुकी है, अब काहे का परदा। लगता है कुछ दिनों बाद आप से, मेरा मतलब आमआदमी के केजरीवाल से पूछेंगे- तेरा क्या होगा केजरीवाल? तूने ही तो ये ढक्कन उठाया है! केजरीवाल कहेंगे- हुजूर मैंने आपके लोगों की सहायता और सहयोग से दिल्ली में कई रैलियां की हैं। मर्द कहेगा कि- अब वकील कर ! क्योंकि वीके सिंह और किरन बेदी तो आप से दूर जा चुके हैं तेरी रक्षा कानून ही करे तो करे।
       कांग्रेस देश की सबसे बड़ी आस्तिक पार्टी है जो सारे काम प्रभु की मर्जी पर छोड़े हुए है इसलिए स्वयं कुछ भी नहीं करती। जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, और जो होगा वो अच्छा होगा। जब खाना पक जायेगा तो आपस में कुत्तों की तरह लड़ते हुए खाने आ जायेंगे। खुद कुछ करना भगवान की मर्जी में दखल देना है इसलिए जो हो रहा है सो होने दो। गडकरी स्वतंत्र हैं कि किसी भी अधिकारी को धमकावें या कुछ भी करें। वो तो उन्होंने सौजन्यतावश वैसे ही कह दिया कि जब 2014 में हमारी सरकार आयेगी तब सोनिया गान्धी या मनमोहन सिंह तुम्हें बचाने नहीं आयेंगे, अन्यथा अभी कौन से आ रहे हैं। मध्य प्रदेश में तो आये दिन अधिकारी, पुलिस और प्रोफेसर पिट रहे हैं या मारे जा रहे हैं पर कांग्रेस चूं भी नहीं कर रही। तुम्हारे अधिकारी तुम्हारी पुलिस चाहे जो करो। ज्यादातर अधिकारियों और पुलिस ने तो वह रवैया अपना लिया है जिसकी कल्पना कभी हिन्दी के यशस्वी कवि स्व. ओमप्रकाश आदित्य ने बहुत पहले ही कर ली थी। उन्होंने लिखा था-

एक आदमी बीच सड़क पर तोड़ रहा था ताला
पकड़ो इसको पुलिसमैन से बोले जाकर लाला
लाला की सुन कर के उनसे कहने लगा सिपाही
कुछ भी कर लो मैं तो इसको नहीं पकड़ता भाई
आगे जाकर के ये मेरी सर्विस खो सकता है
सरे आम चोरी करता है नेता हो सकता है  

       यही कारण है कि मध्यप्रदेश में पुलिस किसी पर भी हाथ नहीं डालती, गडकरी तो आयकर अधिकारियों को 2014 के बाद देखेंगे पर प्रदेश के नेता तो अभी के अभी देख लेंगे, या सव्वरवाल गति तक पहुँचा देंगे।
       भाजपा में जिन लोगों की कृपा से गडकरी इस मर्यादाहीन दशा को पहुँचे हैं उनका विरोध भी उनके पद तक ही था। इसके बाद तो वे उनके यार हैं सो पिता-पुत्र जेठमलानी, यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा, आदि किसी ने भी उनकी मर्दानगी की समीक्षा नहीं की। पद से मुक्त होते ही उन्होंने मुखौटा उतार कर इतनी दूर फेंका कि वह किसी भी तरह की अनैतिकता के प्रति असहनशील होने का आवाहन करते अडवाणी जी के मुँह पर लगा, और अडवाणीजी तुरंत उनके प्रति सहनशील हो गये।
       वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, जनवरी 21, 2013

उपाध्यक्ष महोदय


व्यंग्य
उपाध्यक्ष महोदय
                                            वीरेन्द्र जैन
     जब कोई व्यक्ति किसी संस्था के लिए ''उगलत निगलत पीर घनेरी'' वाली दशा को प्राप्त हो जाता है तो उसे उस संस्था का उपाध्यक्ष बना दिया जाता है।
          उपाध्यक्ष पदाधिकारियों में ईश्वर की तरह होता है जो होते हुये भी नहीं होता है और नहीं होते हुये भी होता है। यह टीम का बारहवां खिलाड़ी होता है जो पैड-गार्ड बांधे बल्ले पर ठुड्डी टिकाये किसी के घायल होने की प्रतीक्षा में टायलट तक नहीं जाता और मैच समाप्त होने पर फोटोग्रुप के लिये बुला लिया जाता है।

          वह कार्यकारिणी का 'खामखां' होता है। किसी भी कार्यक्रम के अवसर पर वह ठीक समय पर पहुंच जाता है तथा अध्यक्ष महोदय के स्वास्थ की पूछताछ इस तरह करता है जैसे वह उनका बहुत हितैषी हो। वह संस्था के लॉन में बाहर टहलता रहता है और अध्यक्ष के आने, और खास तौर पर न आने की आहट लेता रहता है। अगर इस बात की पुष्टि हो जाती है कि अध्यक्ष महोदय नहीं आ रहे हैं तो वह इस बात की जानकारी अपने तक ही बनाये रखता है तथा बहुत विनम्रता और गम्भीरता से बिल्कुल पीछे की ओर बैठ जाता है, जैसे उसे कुछ पता ही न हो। जब सचिव आदि अध्यक्ष महोदय के न आने की सूचना देते हैं जिसका कारण आम तौर पर अपरिहार्य होता है और सामान्यतय: बहुवचन में होता है, तो वह ऐसा प्रकट करता है जैसे उसके लिये यह सूचना सभी सर्वेक्षणों के विपरीत चुनाव परिणाम आने की सूचना हो। वह माथे पर चिंता की लकीरें उभारता है और अध्यक्ष महोदय के न आने के पीछे वाले कारणों के प्रति जिज्ञासा उछालता है। फिर कोई गम्भीर बात न होने की घोषणा पर संतोष करके गहरी सांस लेता है। अब वह अध्यक्ष है और संस्था का भार उसके कंधों पर है।

          सामान्यतय: उपाध्यक्ष अध्यक्ष से संख्या में कई गुना अधिक होते हैं। कई संस्थाओं में अध्यक्ष तो एक ही होता है पर उपाध्यक्ष एक दर्जन तक होते हें क्योंकि काम करने वालों की तुलना में काम न करने वालों की संख्या हमेशा ही अधिक रहती है। उपाध्यक्षों के दो ही भविष्य होते हैं, एक तो वे अध्यक्ष के मर जाने, पागल हो जाने या निकाल दिये जाने की स्थिति में अध्यक्ष बना दियें जाते हैं या फिर झींक कर अंतत: दूसरी संस्था में चले जाते हैं जहां पहली संस्था में व्याप्त बनेक अनियमितताओं के बारे में रामायण के अखंड पाठ की तरह लगातार बताते रहते हैं। उपाध्यक्षों का सपना संस्था का अध्यक्ष बनने का होता है और संस्था इस प्रयास में रहती है कि इस व्यक्ति को कैसे निकाल दिया जाये कि वह संस्था की ज्यादा फजीहत न कर सके।

          मंच पर उपाध्यक्षों के लिये कोई कुर्सी नहीं होती है। वहां अध्यक्ष बैठता है ,सचिव बैठता है,विशिष्ट अतिथि बैठता है, और कभी कभी तो अशिष्ट अतिथि तक बैठ जाता है, पर उपाध्यक्ष नहीं बैठता है - केवल उसकी दृष्टि वहां स्थिर होकर बैठी रहती है। कभी कभी मुख्य अतिथि से उसका परिचय कराने के लिये मंच से घोषणा की जाती है कि अब हमारी संस्था के वरिष्ठ उपाध्यक्ष मुख्य अतिथि को माल्यार्पण करेंगे। बेचारा मरे कदमों से मंच पर चढता है और माला डाल कर उतर आता है। फोटोग्राफर उसका फोटो नहीं खींचता इसलिये वह मुंह पर मुस्कान चिपकाने की भी जरूरत नहीं समझता।

          उपाध्यक्ष किसी संस्था का वैसा ही हिस्सा होता है जैसे कि शरीर में फांस चुभ जाये, आंख में तिनका पड़ जाये या दांतों के बीच कोई रेशा फंस जाये। सूखने डाले गये कपड़े पर की गयी चिड़िया की बीट की भांति उसके सूख कर झड़ जाने की प्रतीक्षा में पूरी संस्था सदैव रहती है क्योंकि गीले में छुटाने पर वह दाग दे सकता है।

          उपाध्यक्ष के दस्तखत न चैक पर होते हैं न वार्षिक रिपोर्ट पर! न उसे संस्था के संस्थापक सदस्य पूछते हैं न चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी। न उसे अंत में धन्यवाद ज्ञापन को कहा जाता है और ना ही प्रारम्भ में विषय प्रवर्तन को। न उसका नाम निमंत्रण पत्रों में होता है और न प्रैस रिपोंर्टों में। गलती से यदि कभी अखबार की रिपोर्टों में चला भी जाता है तो समझदार अखबार वाले समाचार बनाते समय उसे काट देते हैं। अगले दिन सुबह वह अखबार देखता है और उसे पलट कर मन ही मन सोचता है कि लोकतंत्र के तीन ही स्तंभ होते हैं।
     वैसे मैं आत्महत्या का पक्षधर नहीं हूं और इस साहस को हमेशा कायरता पूर्ण कृत्य बताकर तथाकथित बहादुर बना घूमता हूं पर फिर भी मेरा यह विश्वास है कि किसी संस्था का उपाघ्यक्ष बनने की तुलना में आत्महत्या कर लेना लाख गुना अच्छा है।
                                  वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, दिसंबर 12, 2012

व्यंग्य- टंकी का गिरना उर्फ चप्पलों कीचाह में अनुरक्त


व्यंग्य
टंकी का गिरना उर्फ चप्पलों की चाह में अनुरक्त
वीरेन्द्र जैन
       पिछले दिनों मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आधी रात के दौरान एक टंकी गिर गयी थी जिससे सात लोगों की मौत हो गयी थी व 33 लोग घायल हो गये थे। टंकी पानी की थी और उस पानी की टंकी के नीचे लोगों ने घर बना लिए थे और सरकार ने स्कूल बना लिया था। लोग अतिक्रमणकारी थे पर सरकार तो सरकार है वह कुछ भी कर सकती है। पर गलती उन लोगों की थी जिन्होंने रहने के लिए घर न होने के कारण टंकी को ही छत मानकर उसके पास अपनी झोपड़ी डाल ली थी और आठ डिग्री तापमान वाली सर्दी की रात में अपने झोपड़े और बाल बच्चों समेत टंकी के नीचे दब गये। सरकार की कोई जिम्मेवारी नहीं है कि वे टंकी के नीचे वर्षों से कैसे रह रहे थे और उन्हें वे छोटे छोटे घर भी क्यों नहीं मिल सके जिसके विज्ञापन पर करोड़ों रुपया लुटा कर अपने आप को गरीबनवाज बताती रहती है। अगर उन्हें सही जगह रहने और उसके पास ही रोजगार के अवसर मिले होते तो वे टंकी के नीचे क्यों रहते। सरकार की कोई जिम्मेवारी नहीं बनती कि वह देखे कि टंकी के बनने में ठेकेदार ने कितना पैसा इंजीनियर के रास्ते मंत्रीजी तक पहुँचाया और उसके जर्जर हो जाने के बाद भी उसको उपयोग में क्यों लाया गया।

       पर क्षमा करें सरकार चूंकि एक हिन्दुत्व वाली पार्टी की है इसलिए उसका काम तो लोगों को तीर्थयात्रा कराना है ताकि वे अपना परलोक सुधारने के चक्कर में इन्हें वोट देकर इनका इसी लोक में उद्धार कर दें। विधानसभा में नगरीय प्रशासन मंत्री के बयान तो टंकी के पतन से भी ज्यादा पतित रहे। उन्होंने कहा कि न तो टंकी ही जर्जर थी और न ही कोई अफसर ही जिम्मेवार है। अफसरों के लिए तो उनका कहना था कि दूध देती गाय को टोंचा नहीं जाता। वैसे तो भाजपा के लोग शर्म प्रूफ होते हैं पर मंत्रीजी के इन उत्तरों से तो भोपाल क्षेत्र के दो भाजपा विधायकों तक को शर्म आ गयी, और उन्होंने आगामी चुनावों को देखते हुए अपनी ही पार्टी के मंत्री से सवाल कर डाले।
       वैसे भाजपा के मंत्रियों के ऐसे जबाब कोई खास आश्चर्य की बात नहीं हैं। अयोध्या में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बारे में गत बीस साल से लिब्राहन आयोग करोड़ों रुपया खर्च कराके भी किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँच सका था। मस्जिद ध्वंस की एक आरोपी उमा भारती हैं जिनका राजनीति में प्रवेश इस कारण से हुआ था क्योंकि उन्हें बचपन में ही रामायण याद हो गयी थी और वे एक बच्ची के रूप में जब रामायण पाठ करती थीं तो कौतुहलवश भीड़ जुट जाती थी और वे लोकप्रिय हो गयी थीं। भाजपा हर लोकप्रियता को वोटों के रूप में भुनाने की कला जानती है इसलिए उन्होंने उमाभारती को राजनेता बना दिया था। उन्होंने आयोग को उत्तर दिया था कि उन्हें कुछ याद नहीं कि छह दिसम्बर 92 को अयोध्या में क्या हुआ था। बाद में मस्जिद किसने तोड़ी के जबाब में उन्होंने कहा था कि मस्जिद तो भगवान ने तोड़ी। उल्लेखनीय है कि नगरीय प्रशासन मंत्री उनके ही उत्तराधिकारी के रूप में मुख्यमंत्री भी रहे हैं सो उनका उत्तर भी ऐसा ही था कि न तो अफसर जिम्मेवार हैं, न ठेकेदार जिम्मेवार हैं अर्थात टंकी तो भगवान ने तोड़ी। अब आप चाहें तो भगावान को मीमो दे सकते हैं या सस्पेन्ड कर सकते हैं। कुछ दिनों पहले एक फिल्म आयी थी ‘ओह माई गाड’ इस फिल्म में जब एक दुकानदार की भूकम्प से ध्वस्त दुकान का बीमा क्लेम इस कारण से निरस्त हो जाता है क्योंकि उसमें ‘एक्ट आफ गाड’ के कारण हुआ नुकसान कवर नहीं होता। तब वह भगवान की तलाश में निकलता है और इन दिनों जो लोग थोक के भाव में  भगवान बने घूम रहे हैं उन सब को कानूनी नोटिस भिजवा देता है। अदालत में चली इस बहस में वह इनके सारे पाखण्डों और कुतर्कों की धज्जियां उड़ा देता है। उल्लेखनीय है कि भाजपा को इस फिल्म के कारण अपनी भी धज्जियां उड़ने का खतरा पैदा हो गया था इसलिए लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने इस फिल्म को हिन्दुत्व विरोधी बता कर इसके खिलाफ बयान दिया था।
       वैसे ईश्वर की तलाश हिन्दी के एक हास्यकवि काका हाथरसी ने भी की थी और उन्होंने मन्दिर से चप्पलें  चुराने का कारण ईश्वर के किसी भौतिक स्वरूप तक पहुँचने के प्रयास से जोड़ा था। वे कहते हैं-

प्रेम से तुम नित्य ही हरि कीर्तन में जाइए
खूबसूरत चप्पलों को छाँट कर ले आइए
बात कहता हूं पते की कल्पना कोरी नहीं
सब प्रभू की वस्तु जग में, इसलिए चोरी नहीं
विश्व ढूंढा टार्च लेकर, पर प्रभू पाया नहीं
चिट्ठियां डालीं बहुत उत्तर कभी आया नहीं
हर मुहल्ला छान मारा, पर न उसका घर मिला
किसी टेलीफोन ग़ाइड में नहीं नम्बर मिला
प्रभू को फिर छोड़ कर मैं भक्त के आया शरण
भक्त से भी अधिक समझे भक्त के प्यारे चरण
चरण से भी अधिक उनकी पादुका का भक्त हूं
इसलिए मैं चप्पलों की चाह में अनुरक्त हूं  
       लगता है कि मध्यप्रदेश के मंत्री भी इसी तरह चप्पलों की चाह में अनुरक्त होकर प्रभु तक पहुँचने की कोशिश में हैं। देखना होगा कि उनकी यह इच्छा कैसे पूरी होती है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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शुक्रवार, नवंबर 30, 2012

व्यंग्य- सड़क की चिंता, हेमामालिनी की चिंता


व्यंग्य
सड़क की चिंता, हेमामालिनी की चिंता


वीरेन्द्र जैन
       उर्दू शायरी भी क्या चीज है जिसको पढ कर आप यह सच जान सकते हैं कि प्रेम अन्धा होता है जबकि हिन्दी कविता पढ कर पता चलता है कि शादी आँखें खोल देती है। बहरहाल यहाँ मैं हिन्दी-उर्दू कविता या शायरी की बात नहीं कर रहा हूं अपितु आँखें बन्द होने और खुल जाने की बात कर रहा हूं जो किसी नेत्र चिकित्सक की चिंताओं की तरह नहीं है जो आपके नेत्र देखते हुए आपको नेत्रदान की सलाह देने लगते हैं।
       हमारे भारत देश में एक प्रदेश मध्य प्रदेश है और अगर हम पूरे देश को किसी मानव शरीर की तरह देखें तो मध्य प्रदेश देश का पेट नजर आयेगा। जब से इस प्रदेश के नेताओं को अपनी इस स्थिति का भान हुआ है वे निरंतर खाने को अपना परम पुनीत दायित्व समझ रहे हैं। खाये जाओ खाये जाओ यूनाइटिड के गुण गाये जाओ। खेत खालो, खदानें खा लो, बस्तियों की बस्तियां खा लो, पर ‘अपना मध्य प्रदेश’ भरते रहो। एक मंत्री दूसरे को थोड़ा भी उदास देखता है तो पूछता है- ये क्या हाल बना रखा है, कुछ लेते क्यों नहीं? उसे क्या पता कि उसका तो लेते लेते ही हाजमा खराब हो गया है, और इसी से ये हाल बन गया है।
       जब नेता खाते ही रहेंगे और उड़ते रहेंगे तो उन्हें जनता की तकलीफों का ध्यान कहाँ से आयेगा। जो बीजेपी, बीएसपी अर्थात बिजली सड़क पानी के नाम पर सत्त्ता में आयी थी उसने फिर से सत्ता में आने के लिए दस साल बाद भी अपने मुद्दों को बदला नहीं है। सरकार समझ रही थी कि अभी भी सारे मुद्दे जैसे के तैसे हैं और ये ही अगले चुनावों में काम आ जायेंगे पर वह धोखा खा गयी। सारे मुद्दे जैसे के तैसे नहीं हैं अपितु और भी बुरे हो गये हैं। प्रेम अन्धा हो सकता है पर प्रेमिका की तो बड़ी बड़ी और कई बार कजरारी आँखें होती हैं जो तीर वगैरह चलाने से बचे समय में देख भी लेती हैं। प्रदेश में जो सड़कें मध्य प्रदेश के इनवेस्टर मीट दर इनवेस्टर मीट कराते जाने वाले मुख्यमंत्री समेत पूरे मंत्रिमण्डल को नहीं दिख पाती थीं उन्हें हेमामालिनी ने ग्वालियर से दतिया की एक बार की यात्रा में ही देख लिया। तीन घंटे में तिहत्तर किलोमीटर की यात्रा करने में उन्हें पिचासी झटके लगे जिसके बदले में  उन्होंने प्रदेश की सरकार को फटकार लगा दी। प्रदेश सरकार को अपनी स्टार प्रचारक की दृष्टि से देखने को मजबूर होना पड़ा तब उनकी समझ में आया कि प्रदेश में क्या हो रहा है। कहते हैं कि हेमामालिनी दतिया में सरकारी आयोजन में नृत्य करने आयी थीं और मंच पर उन्होंने जो अपनी दैहिक पीड़ा व्यक्त की उसे ही नृत्य समझा गया।
       मध्य प्रदेश में फिल्मों की शूटिंग्स शायद इसलिए ही बढ रही हैं क्योंकि सरकार अपनी तौर पर देखने की क्षमता खो चुकी है और वह जो कुछ भी देखना चाहती है वह फिल्मी कलाकारों की नजर और अनुभवों के आधार पर ही देखना चाहती है। आमिरखान आकर बता जाते हैं कि गाँवों में गरीबी, बेरोजगारी, व आत्महत्याएं बढ रही हैं, तो प्रकाशझा आकर बता जाते हैं कि राजनैतिक हिंसा कितनी बढ रही है। अमिताभ बच्चन बतलाते हैं कि शिक्षा का निजी करण किस तरह से शिक्षा पद्धति का सत्यानाश कर रहा है, और कुछ ही दिनों चोर का शोर भी मचने वाला है । कुल मिला कर सरकार तो धृतराष्ट्र की तरह से सुन भर रही है देख कुछ नहीं रही है। मंत्रिमण्डल में सफेद वर्दी वाले गुण्डे भरे हुए हैं जिनमें से कुछ के कारण तो मुख्यमंत्री को कभी कभी खुद अपनी जान का खतरा महसूस होने लगता है। वरिष्ठ नेता उन्हें घोषणावीर बताते हैं तो किसान नेता वादा तोड़ने वाला बताते हैं, पर जब तक हेमा मालिनी न कह दें वे किसी की बात नहीं सुनेंगे ऐसा तय कर चुके हैं
वीरेन्द्र जैन
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