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शुक्रवार, नवंबर 30, 2012

व्यंग्य- सड़क की चिंता, हेमामालिनी की चिंता


व्यंग्य
सड़क की चिंता, हेमामालिनी की चिंता


वीरेन्द्र जैन
       उर्दू शायरी भी क्या चीज है जिसको पढ कर आप यह सच जान सकते हैं कि प्रेम अन्धा होता है जबकि हिन्दी कविता पढ कर पता चलता है कि शादी आँखें खोल देती है। बहरहाल यहाँ मैं हिन्दी-उर्दू कविता या शायरी की बात नहीं कर रहा हूं अपितु आँखें बन्द होने और खुल जाने की बात कर रहा हूं जो किसी नेत्र चिकित्सक की चिंताओं की तरह नहीं है जो आपके नेत्र देखते हुए आपको नेत्रदान की सलाह देने लगते हैं।
       हमारे भारत देश में एक प्रदेश मध्य प्रदेश है और अगर हम पूरे देश को किसी मानव शरीर की तरह देखें तो मध्य प्रदेश देश का पेट नजर आयेगा। जब से इस प्रदेश के नेताओं को अपनी इस स्थिति का भान हुआ है वे निरंतर खाने को अपना परम पुनीत दायित्व समझ रहे हैं। खाये जाओ खाये जाओ यूनाइटिड के गुण गाये जाओ। खेत खालो, खदानें खा लो, बस्तियों की बस्तियां खा लो, पर ‘अपना मध्य प्रदेश’ भरते रहो। एक मंत्री दूसरे को थोड़ा भी उदास देखता है तो पूछता है- ये क्या हाल बना रखा है, कुछ लेते क्यों नहीं? उसे क्या पता कि उसका तो लेते लेते ही हाजमा खराब हो गया है, और इसी से ये हाल बन गया है।
       जब नेता खाते ही रहेंगे और उड़ते रहेंगे तो उन्हें जनता की तकलीफों का ध्यान कहाँ से आयेगा। जो बीजेपी, बीएसपी अर्थात बिजली सड़क पानी के नाम पर सत्त्ता में आयी थी उसने फिर से सत्ता में आने के लिए दस साल बाद भी अपने मुद्दों को बदला नहीं है। सरकार समझ रही थी कि अभी भी सारे मुद्दे जैसे के तैसे हैं और ये ही अगले चुनावों में काम आ जायेंगे पर वह धोखा खा गयी। सारे मुद्दे जैसे के तैसे नहीं हैं अपितु और भी बुरे हो गये हैं। प्रेम अन्धा हो सकता है पर प्रेमिका की तो बड़ी बड़ी और कई बार कजरारी आँखें होती हैं जो तीर वगैरह चलाने से बचे समय में देख भी लेती हैं। प्रदेश में जो सड़कें मध्य प्रदेश के इनवेस्टर मीट दर इनवेस्टर मीट कराते जाने वाले मुख्यमंत्री समेत पूरे मंत्रिमण्डल को नहीं दिख पाती थीं उन्हें हेमामालिनी ने ग्वालियर से दतिया की एक बार की यात्रा में ही देख लिया। तीन घंटे में तिहत्तर किलोमीटर की यात्रा करने में उन्हें पिचासी झटके लगे जिसके बदले में  उन्होंने प्रदेश की सरकार को फटकार लगा दी। प्रदेश सरकार को अपनी स्टार प्रचारक की दृष्टि से देखने को मजबूर होना पड़ा तब उनकी समझ में आया कि प्रदेश में क्या हो रहा है। कहते हैं कि हेमामालिनी दतिया में सरकारी आयोजन में नृत्य करने आयी थीं और मंच पर उन्होंने जो अपनी दैहिक पीड़ा व्यक्त की उसे ही नृत्य समझा गया।
       मध्य प्रदेश में फिल्मों की शूटिंग्स शायद इसलिए ही बढ रही हैं क्योंकि सरकार अपनी तौर पर देखने की क्षमता खो चुकी है और वह जो कुछ भी देखना चाहती है वह फिल्मी कलाकारों की नजर और अनुभवों के आधार पर ही देखना चाहती है। आमिरखान आकर बता जाते हैं कि गाँवों में गरीबी, बेरोजगारी, व आत्महत्याएं बढ रही हैं, तो प्रकाशझा आकर बता जाते हैं कि राजनैतिक हिंसा कितनी बढ रही है। अमिताभ बच्चन बतलाते हैं कि शिक्षा का निजी करण किस तरह से शिक्षा पद्धति का सत्यानाश कर रहा है, और कुछ ही दिनों चोर का शोर भी मचने वाला है । कुल मिला कर सरकार तो धृतराष्ट्र की तरह से सुन भर रही है देख कुछ नहीं रही है। मंत्रिमण्डल में सफेद वर्दी वाले गुण्डे भरे हुए हैं जिनमें से कुछ के कारण तो मुख्यमंत्री को कभी कभी खुद अपनी जान का खतरा महसूस होने लगता है। वरिष्ठ नेता उन्हें घोषणावीर बताते हैं तो किसान नेता वादा तोड़ने वाला बताते हैं, पर जब तक हेमा मालिनी न कह दें वे किसी की बात नहीं सुनेंगे ऐसा तय कर चुके हैं
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629
    

गुरुवार, नवंबर 08, 2012

व्यंग्य किसका कितना आई क्यू


व्यंग्य
किसका कितना आई क्यू
वीरेन्द्र जैन
       अगर आपने लारेल हार्डी की फिल्में नहीं देखीं तो कोई बात नहीं, कुछ ही वर्ष पहले की हास्य अभिनेत्री टुनटुन की फिल्में जरूर ही देखी होंगीं। अगर वे भी नहीं देखीं तो भी कोई बात नहीं आप भाजपा के संघ नामित अध्यक्ष नितिन गडकरी को देख सकते हैं। काश अगर आप उन्हें सुन सकें तो औडियो विजुअल दोनों का ही मजा मिल जायेगा। भले ही देश और दुनिया में भाजपा के नेता साम्प्रदायिक, हिंसक षड़यंत्रकारी, कुटिल असत्यभाषी और भ्रष्ट माने जाते हों पर सच तो यह है कि भाजपा एक मनोरंजन प्रधान फिल्म ............. नहीं नहीं पार्टी है, जिसमें तरह तरह की हीरोइनों, खलनायकों, बहुरूपियों से लेकर हास्य अभिनेता तक सब कुछ मिल जायेगा। वैसे तो कांग्रेस पार्टी के नेता भी जिस क्षेत्र में जाते हैं वहाँ की टोपी से लेकर सींगों के मुकुट तक पहिन कर ढोल बजाने की मुद्रा में फोटो खिंचवाते और प्रकाशित कराते हैं ताकि हाईकमान को दिखा कर बताया जा सके कि वे पार्टी के लिए कितना काम कर रहे हैं। उनके हाईकमान तक को भ्रम रहता है कि ऐसी नौटंकियों से वोट मिलते हैं, जिसे जुटाना उनकी पार्टी का पहला और आखिरी लक्ष्य है।
       यों कहने को आप मुझे ग़डकरीजी का प्रचारक कह सकते हैं, पर फिर भी में उनका इतिहास अवश्य ही बताऊंगा। ‘भए प्रकट कृपाला दीनदयाला’ की तरह दीनदयाल उपाध्याय की इस पार्टी में गडकरीजी का अचानक ही धम्म से अवतरण हो गया था जैसे रंगमंच पर कठपुतलियां उतरती हैं वैसे ही वे सीधे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर ऐसे धमाक से गिरे थे कि बाहर वाले तो बाहर वाले, अन्दर वाले तक हतप्रभ होकर रह गये थे कि यह क्या हो गया। उनकी डोरियां नागपुर के केशवकुंज की उंगलियों में बँधी थीं। अंग्रेजी में एक कहावत है कि आकाश में बिजली चमकने और बादल गरजने की घटना एक साथ होती है पर प्रकाश की गति तेज होने के कारण प्रकाश पहले दिखाई देता है और गरज बाद में सुनाई देती है इसी तरह कुछ लोगों की चमक तब तक ही रहती है जब तक उनकी आवाज नहीं सुनाई देती। गडकरीजी के मुखारविन्दु से जब स्वर फूटे तब उनकी असलियत समझ में आयी। अध्यक्ष बनने के बाद ही उन्होंने भंडारा में बीमार चीनी मिलें खरीद ली थीं और वहाँ एक रैली की थी। इस रैली में बोलते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष महोदय  ने कहा था कि ‘याद है न, अँधेरी रात में दिया तेरे हाथ में. काँग्रेस के हाथ को वोट दिया था अब मजे लो।‘ शरद पवार के कारनामों के बारे में उन्होंने कहा था कि उनका आईपीएल का खेल भी गज़ब का है, जब चौका पड़ता है तो चियर्स लीडर अपनी एक टाँग उठा देती है व छक्का पड़ने पर उसकी दोनों टाँगें उठ जाती हैं। अफज़ल गुरु को तो उन्होंने कांग्रेस का दामाद तक कह दिया था और लालू तथा मुलातम के खिलाफ की गयी गन्दी टिप्पणी के बाद तो उन्हें माफी तक माँगना पड़ी थी। विवेकानन्द के आईक्यू से तुलना करने के लिए उन्हें दाउद इब्राहीम ही मिला था क्योंकि भाजपा वाले जब भी शत्रु की कल्पना करते हैं तो उन्हें मुसलमान ही नजर आते हैं। सब कुछ देखते हुए भी मोहन भागवत का उन्हें अध्यक्ष बनाना, और बनाये रखने के लिए भाजपा के संविधान में परिवर्तन करा देने को देखते हुए इस राष्ट्रवादी संघ प्रमुख के आईक्यू की तुलना धृतराष्ट्र से ही की जा सकती है।
       बहरहाल गडकरीजी अपनी पहली रैली के दौरान ही चक्कर खाकर अडवाणीजी के मजबूत कँधों पर टिक गये थे क्योंकि इससे पहले कड़ी धूप का उन्होंने सामना ही नहीं किया था। कुछ दिनों बाद उन्होंने अपनी चर्बी छिलवाई थी और अब जेठमलानी पिता पुत्र उनकी चमड़ी उधेड़ने पर लगे हुए हैं। कांग्रेस के महा सचिव दिग्विजय सिंह तो गत एक साल से सवाल उठा रहे थे कि उनके पास इतनी सम्पत्ति कहाँ से आयी, पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कांग्रेस के महा सचिव की बातों का जबाब देने की वैसे ही कोई जरूरत नहीं समझी, जैसी कि अरविन्द केजरीवाल ने उनके सवालों के जबाब देने की जरूरत नहीं समझी थी। जेठमलानी तो वकील हैं इसलिए जो उनके वकालतनामा पर दस्तखत कर देता है उसके पक्ष में बात करते हैं। मोदी ने उन्हें चुना है तो वे मोदी को देश का प्रधानमंत्री तो क्या अमेरिका का राष्ट्रपति तक बनवाने के लिए जिरह कर सकते हैं। गडकरी की कलई भी खुली और उन्होंने जेठमलानी की सेवाएं भी नहीं लीं सो उन्हें मजबूरन उनका विरोध करना पड़ा। सुना है कि गडकरी जी स्व. चन्द्रशेखर के उन कार्यकर्ताओं को भाजपा में भरती कराने के प्रयास में जुट गये हैं जिन्होंने जेठमलानीजी द्वारा चन्द्रशेखरजी के घर के सामने धरना रखने के खिलाफ उनका सम्मान कर दिया था।
       गडकरीजी सचमुच ही अभिनन्दनीय हैं, मेरी दिली इच्छा है कि उन्हें एक कार्यकाल और दिया जाये ताकि वे भाजपा के बचे खुचे कपड़े तक उतरवा सकें।
वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, जून 27, 2012

व्यंग्य- राष्ट्रपति पद प्रत्याशी की तलाश


व्यंग्य
राष्ट्रपति पद प्रत्याशी की तलाश
वीरेन्द्र जैन
       पुराने जमाने की कई कहानियों में आता है कि जब किसी राज्य के राजा का निधन हो जाता और उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं होता था तो मंत्रिपरिषद यह तय करती थी कि प्रातः जो भी व्यक्ति सबसे पहले नगर के मुख्य द्वार से प्रवेश करेगा उसे ही हम अपना राजा मान लेंगे। राजा के चुनाव की इस विधि में कई मुंगेरीलालों की किस्मत खुल जाती थी और पूरा राज्य कहानियों के उत्पादन का बड़ा केन्द्र बन जाता था। इन कहानियों को सुन सुन कर हम सोचा करते थे कि हाय हम न हुए वो पहले आदमी जो उस नगर में प्रवेश कर पाये। हमारे देश में भी पुरातन काल से अटूट प्रेम करने वाली एक राजनीतिक पार्टी है जो इसी फार्मूले से राष्ट्राध्यक्ष का चुनाव करने में भरोसा करती है। उसके पास भले ही राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने वाला कोई नेता न हो पर वह किसी न किसी को चुनाव जरूर लड़वाना चाहती है, और प्रत्याशी का चुनाव लगभग इसी तरह करना चाहती है।
       इसी तलाश में वे राम भरोसे के पास भी आये थे और उससे राष्ट्रपति पद प्रत्याशी बनने की विनय करने लगे थे पर रामभरोसे ने साफ मना कर दिया।
        मैंने पूछा कि भाई क्यों नहीं बने तो बोला मुझे खाना बनाना नहीं आता
        मैंने कहा कि भाई वहाँ खाना बनाने की कोई बात नहीं राष्ट्रपति भवन में बहुत सारे रसोइए होते हैं, और फिर यह तो दूसरी पार्टी है यहाँ खाना बनाना जरूरी नहीं यह बम बनाने वाले को भी राष्ट्रपति पद प्रत्याशी बना सकती है।
       तो फिर बम बनाने वाले ने क्यों मना कर दिया? उसने प्रति प्रश्न किया।
      
अरे भाई उन्होंने मना नहीं किया अपितु समझदारी से काम लिया कि जब जीतना ही नहीं है तो एनडीए के विस्तार की सम्भावनाओं के लिए क्यों अपनी इज्जत का कचरा करवाया जाये। इसके बाद ही वे दूसरे उम्मीदवार की तलाश में भटकने लगे और तुम्हारे पास इसलिए आये क्योंकि तुम्हें इज्जत का कोई खतरा नहीं है, वह पहले ही मिट्टी में मिल चुकी है, और तब से ही मिट्टी अपनी इज्जत की चिंता कर रही है मैंने उसे समझाया।  
       पर मेरे साथ समस्या दूसरी थी वह फुसफुसा कर बोला तो मुझे एक्सक्लूजिव स्टोरी सुनते पत्रकार की तरह सतर्क हो जाना पड़ा।
                “वह क्या  समस्या थी? मैंने भी फुसफुसा कर पूछा।
       बात यह है कि मुझे सर्दियों से बहुत डर लगता है और राष्ट्रपति को 26 जनवरी जैसी कड़कड़ाती सर्दी में परेड की सलामी लेनी पड़ती है। इतनी ठंड में सलामी लेना मेरे बस की बात नहीं है, सो मैंने कह दिया कि मुसद्दी लाल को बना दो मुझे नहीं बनना। उसने राज जाहिर किया।
      
पर मुसद्दी लाल को क्यों? मैंने पूछा
      
मैं उससे बदला लेना चाहता हूं उसने वैसे ही फुसफुसा कर कहा। और उसके बाद वे चले गये
       इसके बाद वे कई और जगह भी गये होंगे पर कहीं बात नहीं बनी। एक विवादीलाल से तो उन्होंने कहा कि हम आपको एनडीए की ओर से प्रत्याशी बनाना चाहते हैं तो उसने पूछ लिया कि एनडीए में कौन कौन है। जब उन्होंने अपनी पार्टी के साथ जनता दल [यू], शिव सेना, अकाली दल, आदि का नाम लिया तो उसने एक बुन्देली कहानी ही सुना दी। कहानी कुछ इस प्रकार थी-
       एक बार एक कवि ने जब सब कुछ बेच खाया पर उसकी कविताएं नहीं बिकीं तो घर का आखिरी आइटम बेचने निकला जो कि चारपाई का एक पाया था। अतिरंजना के अभ्यस्त उस कवि ने गलियों में यह कहते हुए आवाज लगायी- 
खाट लो खाट,
सियरा नईंयां, पाटी नईंयां,
बीच का झकझोल नईंयां,
 चार में से तीन नईंयां
खाट लो खाट, खाट लो खाट
जाहिर है कि उसके बाद वे मुसद्दी लाल के यहाँ से भी चले आये क्योंकि उनके साथ भी कुछ कुछ ऐसी ही हालत थी।
       राष्ट्रपति के लिए सहमति बनाने निकले थे, वह तो नहीं बनी, प्रधानमंत्री का सवाल अलग से गले में हड्डी की तरह पड़ गया। नमाज छुड़ाने चले थे रोजे गले पड़ गये।
       फिर संयोग से उन्हें एक बना बनाया प्रत्याशी मिल गया जो प्रस्तावक, समर्थक तलाशे बिना पहले से ही अपने गले में माला डाले फिर रहा था। उसके घर के वोट ने साथ नहीं दिया था, उसकी पार्टी ने साथ नहीं दिया था पर वह प्रत्याशी बना घूम रहा था, सो उन्होंने सोचा कि चलो इसको ही समर्थन दे दो। ईसाई है तो क्या हुआ, नहीं करेंगे कुछ दिनों तक चर्चों पर हमले, नहीं जलायेंगे कुछ पादरियों को उनके मासूम बच्चों सहित जीप में, नहीं करेंगे धर्मांतरण के नाम पर ननों की हत्या कुछ दिन तक , पर लोग ये तो नहीं कह पायेंगे कि 2014 में सरकार बनाने के ख्वाब देख रहे थे एक ठो राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी भी नहीं तलाश पाये।
       वह तो टिका दिया पर अभी उपराष्ट्रपति का चुनाव बाकी है।
वीरेन्द्र जैन
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शनिवार, जून 16, 2012

व्यंग्य- कारन कवन नाथ मोहि मारा


व्यंग्य
कारन कवन नाथ मोहि मारा
वीरेन्द्र जैन
       संजय जोशी निकाल बाहर किये गये। और यह मामला गुपचुप नहीं हुआ, अपितु भरी सभा में हुआ। भीष्म, गुरुद्रोण बगैरह बगैरह सब देखते रह गये और द्रोपदी का चीर हरण हो गया। द्रोपदी का चीर तो कृष्ण ने बढा दिया था पर इस महाभारत की लीला में तो कोई लीलाधर सामने नहीं आया। जिन्होंने संजय जोशी को अन्दर किया था वे ही उसे आया है सो जायेगा, राजा, रंक, फकीर की तरह बाहर जाते देखते रहे। गालिब चचा कह गये हैं कि-
निकलना खल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिन
बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले
पर वहाँ एक कूचे के बाद दूसरी गलियाँ तो मिलती हैं, यहाँ तो जहाँ जहाँ गये वहाँ वहाँ से निकाले गये, मुम्बई से लखनऊ जाने के रास्ते को भी तय करने की कोशिश की गयी कि वो गुजरात से होकर न हो। हवा में गन्ध तक न पहुँचे। तानाशाह की शान में गुस्ताखी न पड़े। ऐसा हुआ भी पर जहाँ भेजा वहाँ भी नहीं रहने दिया गया। वहाँ से भी निकलना पड़ा। चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना। कश्मीरी पंडित तो राज्य के एक हिस्से को छोड़ कर दूसरे हिस्से में रह रहे हैं, उस पर इतनी हाय तोबा है कि सरकार को इन विस्थापित नागरिकों को गत दो दशक से  प्रतिमाह आर्थिक मदद दे रही है जो चार हजार रुपये प्रतिमाह, नौ किलो गेंहूँ, दो किलो चावल, और एक किलो चीनी तक सीमित है। धरती की जन्नत छोड़कर आने वालों को दस गुणा बारह का टीन की छत वाला एक आश्रय उपलब्ध कराया गया है। पर संजय जोशी को तो वह भी नहीं मिला। कश्मीरी पंडितों के लिए स्यापा करने वाले तो बहुत सारे रुदाले हैं पर संजय जोशी के लिए कोई आंसू नहीं बहा रहा कि कहीं मोदी न देख ले। अब वे घर के रहे न घाट के। जिन शिवराज सिंह चौहान का राजतिलक करवाया था वे भी मुँह में दही जमा कर बैठे रहे। जिन उमाभारती के साथ पार्टी में अन्दर किया गया था वे भी ध्यानमग्न हो गयीं।
       जो अपने साथी पर हुए अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठा सके वे कहते हैं कि हम जनता के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएंगे। गर्वीले गुजरात ने मराठा साम्राज्य ध्वस्त कर दिया। अध्यक्ष ने विशेष अधिकार से सम्मेलन गुजरात में नहीं होने दिया था और अपने महाराष्ट्र में आयोजित किया, पर फिर भी चली गुजरात की।
       वैसे भाजपा में ये तो चलता ही रहता है,  यह तो मौल्लिचन्द्र शर्मा के समय से चला आ रहा है, बलराज मधोक ने तो बड़ों बड़ों के खिलाफ किताबें लिख मारी थीं पर दुर्भाग्य कि वे ब्रेल लिपि में नहीं थी और जिनकी दृष्टि बाँध दी गयी हो उन्हें क्या दिखता है? कल्याण सिंह का तो पता है, पर आज मदनलाल खुराना कहाँ हैं, उमाभारती भाजपा में तो चुहिया बनकर वापिस घुस गयीं पर उनके गुरू गोबिन्दाचार्य तो भटक भटक कर रामदेव को भजने को विवश हो गये हैं। थिंक टैंक से सड़ाँध आने लगी है। उमा भारती का भी मध्यप्रदेश निकाला हो गया है, खबरदार जो मध्यप्रदेश की धरती पर झांका। दूर से ही गाती रहो, ‘ये मेरे प्यारे वतन, ये मेरे उजड़े चमन, तुझ पर दिल कुर्बान’। अपने बीमार भाई और देव दर्शन का बहाना बना कर आना पड़ता है तब भी सरकारी सीआईडी सक्रिय रहती है।
       रामचरित मानस में बाली राम से पूछता है – मैं बैरी, सुग्रीव पियारा, कारन कवन नाथ मोहि मारा। बेचारे संजय जोशी तो यह भी नहीं पूछ पा रहे हैं। जिस मध्यप्रदेश की पुलिस से सीडी के बारे में क्लीनचिट मिली थी कहीं फिर से दबाव में आकर वही पुलिस ये न कह दे कि सीडी तो सही थी। ऐसी सीडियाँ आत्मा की तरह होती हैं जो कभी नष्ट नहीं होती भले ही उसके पात्रों को क्लीनचिट मिल गयी हो। जब क्लीनचिट मिलने के बाद भी बनवास झेलना पड़ा था तो दुबारा सीडी खुलने के बाद तो न जाने क्या होगा।
      
भले ही झूठी सही पर सवाल तो यह है कि सीडी बनवाई किसने थी और जिस सीडी को पार्टी की ही एक सरकार फर्जी बता रही है उस फर्जी काम को करवाने का सन्देही सबके सिर पर बैठ गया है। संस्कृत के एक श्लोक में कहा गया है कि जिसके पास पैसा है वही मनुष्य़ कुलीन है, वही विद्वान है, वही पंडित है, वही श्रोता है, वही गुणी है, वही सुदर्शनीय है, सारे के सारे गुण सोने में बसते हैं. [सर्वे गुणः कांचनं आसवंते]। गुजरात में आने वाली परियोजनाओं में पैसा ही पैसा है जनवरी, 2011 में महात्मा (गांधी) मंदिर में गुजरात के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी ने 100 देशों से आये 10,000 अंतर्राष्ट्रीय कारोबारियों के सम्मेलन की अध्यक्षता की थी। मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने गुजरात में 45,000 करोड़ डॉलर निवेश करने का वादा किया है। इसलिए भाजपा गुजरात को कबीर के हीरा पायो गाँठ, गठियाओ की तरह छोड़ना नहीं चाहती चाहे कुछ भी हो जाये इसलिए सारे गुण आजकल मोदी में बसते हैं, जिनके लिए संजय जोशी तो क्या अडवाणी तक को हकाला जा सकता है। नेतृत्व की हालत यह हो गयी है कि सौ सौ जूते खाँय, तमाशा घुस के देखेंगे। अडवाणीजी, प्रधानमंत्री बनें न बनें पर ब्लाग लेखक तो बन ही जायेंगे, ब्लागर्स की ओर से स्वागत है अडवाणीजी।
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, अप्रैल 10, 2012

व्यंग्य- सांसद, विधायक बनाने की फैक्ट्री बन्द


व्यंग्य
सांसद, विधायक बनाने की फैक्ट्री बन्द
वीरेन्द्र जैन
      जब से एसएममएस से संवाद की शुरुआत हुयी है तब से वर्तनी की तो ऐसी की तैसी हो गयी है। युवा पीढी का सोचना है कि संवाद प्रेषित होना वर्तनी अर्थात स्पैलिंग की चिंता से अधिक महत्वपूर्ण है। हिन्दी के लोकप्रिय कवि नीरज कहते हैं कि-
शब्द तो शोर है तमाशा है
भाव के सिन्धु में बताशा है
मर्म की बात होंठ से ना कहो
मौन ही भावना की भाषा है
मुझे लगता है कि वर्तनी को हिकारत की दृष्टि से देखने के इस समय में यह वर्तनी की भूल ही होगी जब भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी पार्टी सदस्यों की एक बैठक में कहते है कि भाजपा सांसद, विधायक बनाने की फैक्ट्री नहीं है। दर असल वे कहना चाहते होंगे कि हे रामलला अब भाजपा सांसद, विधायक बनाने की फैक्ट्री नहीं रही।
      ये फैक्ट्री तो थी, और बकायदा थी। ये बात दूसरी है कि ये फैक्ट्री साइन बोर्ड भले ही किसी और चीज का लगाये बैठी हो पर काम सांसद विधायक उत्पादन का ही करती थी। उनके सारे सैद्धंतिक समझौते सांसद विधायक उत्पादन करने की दृष्टि से ही किये जाते रहे हैं। यह अकेली फैक्ट्री रही है जो सभी संविद सरकारें बनने की स्थिति में अपना आवेदन लेकर सबसे आगे खड़ी नजर आती रही है। सांसद, विधायक बना दो चाहे जैसे बना दो, बाकी भितरघात तो हम करते रहेंगे। 1977 में जनता पार्टी के गठन के समय जब फैक्ट्री को दूसरी फैक्ट्री में मिलाने की बात आयी तो इनकी पुरानी फर्म भारतीय जन संघ ने सबसे पहले अपनी फैक्ट्री को डिसाल्व करने का रिजोल्यूशन पास कर दिया। सांसद विधायक का उत्पादन भर होता रहे, बोर्ड का क्या है उसे उतार कर स्टाक रूम में जमा कर दिया। नई कम्पनी टूटेगी तो झाड़ पोंछ कर फिर से लगा लेंगे, ज्यादा से ज्यादा एकाध अक्षर या शब्द बदल देंगे, पर प्रोडक्शन तो वही रहेगा।
      अगर फैक्ट्री नहीं होती तो सबसे ज्यादा दल बदल कर आये लोग क्यों स्टाक किये जाते । जिस गान्धी नेहरू परिवार को पानी पी पी कर कोसते रहे हैं उसकी बहू रानी क्या गौ सेवा के लिए भाजपा में शामिल हुयी थीं! वह काम तो वे पहले भी कुत्ते, बिल्लियों, गधों और सुअरों की रक्षा के साथ पहले ही एन जी ओ बनाकर करती आ रही थीं। उन्हें टिकिट नहीं देते तो पता लग जाता और अभी भी माँ बेटे किसी का भी टिकिट काट कर देख लेना। देश भर को कांट वाटर प्यूरीफायर का पानी पिलाने वाली स्वप्न सुन्दरी हेमा मालिनी क्या भाजपा शासित राज्यों में नाच नाच कर बत्तीस लाख भुगतान लेने के लिए शामिल हुयी हैं? उनका भी टिकिट काट कर देख लेना? धर्मेन्द्र जी ने तो कह ही दिया था कि फैक्ट्री ने मुझे बहुत इमोशनली ब्लैकमेल किया। हमारे शत्रुघ्न सिन्हाजी भी नशीली मुद्रा में बैगपाइपर सोडा को विज्ञापित करने के लिए फैक्ट्री में नहीं आये थे अपितु सांसद और मौका मिलने पर केन्द्रीय मंत्री बनने के लिए ही आये थे। और ओशो के स्वामी विनोद खन्नाजी भी कोई समाधि की ओर जाने के लिए फैक्ट्री में नहीं आये थे। स्मृति ईरानी, नवजोत सिंह सिद्धू, चेतन चौहान क्या राम मन्दिर बनवाने के लिए शामिल हुए थे? रामायण धारावाहिक की सीताजी को जबसे सांसद नहीं बनाया तब से वे फैक्ट्री की ओर झांकी भी नहीं। यही हाल रावण अरविन्द त्रिवेदी और हनुमान दारासिंह्जी का भी है, वे कोई कीर्तन करने तो फैक्ट्री में नहीं आये थे उद्योगपति गडकरी जी। आपने तो अभी तक उन दिग्विजय सिंह, जिनके भाई को फैक्ट्री के उत्पाद के रूप में निकाला था,  के उस सवाल का भी जबाब नहीं दिया कि इतने कम समय में आपने इतनी दौलत कैसे एकत्रित कर ली। जब इतनी दौलत एकत्रित हो जाती है तो भाषा तो फैक्ट्री वाली हो ही जाना है। राज्यसभा में आपकी फैक्ट्री के नेता की दौलत का विकास भी गत पाँच साल में 23 करोड़ से बढ कर कुल 158 करोढ ही हो पायी है जिसका खुलासा उन्होंने राज्य सभा के लिए अपना नामांकन भरते समय किया है।
      अरे मैं भी कहाँ की बात ले बैठा आप तो ये ही बता दीजिए कि ये जो विदेश में रह कर भाजपा के दोस्त बने रहने और दूसरों को भाजपा का दोस्त बनाने वाले अंशुमान मिश्र जी हैं ये कच्चा माल बनकर भाजपा विधायकों के सहयोग से क्या बनने के लिए झारखण्ड से राज्यसभा के उम्मीदवार बने थे? और जब नहीं बन पाये तो उसी फैक्ट्री को उलटनी की कोशिश करने लगे थे जिसके दोस्त बनाते बनाते उनकी कार के कई टायर घिस गये होंगे। उन्होंने न केवल मुरली मनोहर की धोती ही खोल दी अपितु उत्तर प्रदेश के एक एक नेता की पोल खोलने पर ऐसे उतर आये थे जैसे कि कभी अमर सिंह मुलायम की पोल खोलने पर उतारू हो गये थे, पर अब दोनों के मुँह पर ढक्कन लग गया है। आजकल विज्ञापन भी खूब आ रहा है जिसमें बताया जा रहा है कि ढक्कन लगा कर खाना बनाने से गैस की बचत होती है। बहरहाल आपकी समझ में आ जाना चाहिए कि इस रामलीला पार्टी के चारों ओर जो ये लोग मक्खियों की तरह मंढरा रहे हैं वे सत्ता का लाभ लेने हेतु सांसद विधायक बनने के लिए ही लगे हैं। अब अगर तुम्हारी फैक्ट्री बन्द होने वाली है तो ये दूसरी फैक्ट्री तलाश लेंगे, आप चिंता करके अपना बजन न घटाएं। मैं देख रहा हूं कि आपका बजन बहुत घट गया है।
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, नवंबर 29, 2011

व्यंग्य --- फायर ब्रांड नेता और एफ डी आई की आग


व्यंग्य
                  फायर ब्रांड नेता और एफडीआई की आग
                                                               वीरेन्द्र जैन
      राजनीति में जिन्दा बने रहकर गले में मालाएं डलवाते रहना जरूरी होता है नहीं तो फोटुओं पर माला डलने की नौबत आ जाती है। यही कारण है कि हाशिये पर धकेल दिये गये बूढे बूढे नेता तक पप्पुओं बबलुओं की तरह अपना बर्थडे मनाते रहते हैं और चमचों, दलालों से उस दिन शतायु होने के विज्ञापन छपवाते रहते हैं। मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमन्त्री उमा भारती बहुत दिनों से अखबारों के मुखपृष्ठ पर आने के प्रयास में थीं पर समय का फेर कि दसवें बारहवें पेज पर आने में भी मुश्किलें आ रही थीं। जब तक भाजपा से बाहर थीं और उसके नेताओं को गरियाती हुयी उसे समूल नष्ट करने के बयान देती रहती थीं तब  कम से कम अन्दर घुसने के प्रयासों के समाचार तो छपते रहते थे, पर भाजपा में पुनर्प्रवेश करने के बाद जो प्रदेश निकाला हुआ है, उसने तो स्तिथि बहुत ही खराब कर के रख दी। अब पिंजरे में कितनी भी उछलती कूदती रहें पर कोई नोटिस ही नहीं लेता।
      कभी अंग्रेजी के अखबार उन्हें फायर ब्रांड नेता कहते थे। साध्वियों की वर्दी तो वैसे ही फायर कलर की होती है सो फायर ब्रांड होने के लिए केवल मुँह से आग निकालना रह जाता है और जिसमें वे कोई कमी नहीं छोड़ती हैं। फायर ब्रांड होने से फ्रंट पेज पर जगह मिलने में सुविधा होती है। आखिर उनके इंतजार की घड़ियां खत्म हुयीं और एफडीआई के लिए बन्दनवार सजा कर सरकार ने उन्हें मौका दे ही दिया ताकि वे यह जता सकें कि प्रदेशों में मुख्य मंत्री के पद पर कोई स्थायी नियुक्ति नहीं होती। उन्होंने मुख पृष्ठ पर जगह बनाने के लिए कह ही दिया कि वे एफडीआई के रिटेल स्टोरों में आग लगा देंगीं। फायर ब्रांड नेता के मुख से ऐसे ही वचन शोभा देते हैं। अब फायर ब्रांड के मुख से कोई फूल तो बरसने से रहे बरना ब्रांड पर संकट आ जायेगा।
      जिस तरह दक्षिण में शिवकाशी जिला फायर वर्क्स प्रोडक्ट के लिए विख्यात है उसी तरह धर्म का चोगा ओढने वाले राजनेता अपने मुँह से पटाखे फुलझड़ी छोड़ने के लिए मशहूर हैं। आतिशबाजी की चटाक पटाक आनन्द का सृजन करती है। नेता भी अब भाषण कम और मनोरंजन अधिक करने लगे हैं। राज नारायण से लालू परसाद ही नहीं  कभी अटल बिहारी के चुटकले सुनने के लिए बहुत सारी भीड़ जुटती थी, भले ही वे चुनाव हार जाते थे। एक बार ग्वालियर में जब युवा माधवराव से हार गये तो दो जगह से चुनाव लड़ने लगे थे।       
      उमाजी का बयान पढने के बाद मैंने सपना देखा कि वे अपने बजरंग दल को लंका की तरह खुदरा बाजार की विदेशी दुकानों में आग लगा देने के लिए उकसा रही हैं पर वह वानर सेना महाभारत के अर्जुन की तरह हाथ बाँधे खड़ी है और आदेश पालन में एकमत से असमर्थता व्यक्त कर रही है। यह रुकावट मीडिया के कैमरामेनों के इंतजार वाली रुकावट नहीं है। उनकी शिकायत है कि जब गोबिन्दाचार्य को यही कहने पर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था और उनका स्वदेशी आन्दोलन अध्य्यन अवकाश में बदल गया था तब अब ऐसा क्या हो गया कि दीदी आग लगाने को उकसा रही हैं। जिस दिन अमेरिका से लताड़ आ जायेगी उसी दिन कई अरुण जैटली अमेरिकन राजदूत को सफाई देने पहुँच जायेंगे जिसका खुलासा किसी अगली विक्कीलीक्स से होगा। मनमोहन सिंह जब नई आर्थिक नीति लेकर आये थे तो भाजपा ने कहा ही था कि इन्होंने हमारी नीतियों को हाईजैक कर लिया है जैसे कौआ बच्चे के हाथ से रोटी छेन कर भाग जाता है। राजग के शासन में भी जब कोई नीति नहीं बदली गयी थी तब तो दीदी थोड़े से अंतराल को छोड़कर मंत्रिमण्डल को ही सुशोभित कर रही थीं।
      वैसे भी आग लगाने के बड़े खतरे होते हैं। होम करते हुए तक तो हाथ जल जाते हैं और लंका में आग लगाने के लिए हनुमानजी को अपनी ही पूंछ में आग लगानी पड़ी थी। कबीर तक ने साथ चलने वालों से सबसे पहले अपना घर जलाने का आवाहन किया था, पर दीदी को तो घर ऐसा सता रहा था कि छोड़े हुए घर में वापिसी के लिए उन्होंने अपना नया घर मटियामेट कर दिया। पुराने घर में जगह भी मिली तो नौकरों के कमरे में जहाँ पहले से ही बड़ी भीड़ है। अब आग लगाने के लिए पैट्रोल खरीदना पड़ेगा जो इतना मँहगा हो चुका है कि उसे खरीदने के लिए पहले कोई बैंक लूटना पड़ेगा। वैसे जो एफडीआई वाले रिटेल स्टोर में आग लगा सकते हैं वे बैंक भी लूट सकते हैं, पर उसके लिए बन्दूकों की जरूरत पड़ेगी जो पुरलिया की तरह कोई आसमान से नहीं टपकेंगीं। खैर किसी तरह उनका भी इंतजाम हो जायेगा पर फिर सारा मामला नक्सलवादियों जैसा हो जायेगा। और जब नक्सलवाद की तरह से परिवर्तन लाया जायेगा तो फिर इस भगवा रंग की वर्दी, अयोध्या में राम मन्दिर, और मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी का क्या होगा। अभी तो केवल कुर्सी का ही खतरा रहता है फिर तो जान का खतरा बना रहेगा।
      ऐसा लगता है कि कहीं उन्होंने फायर ब्रांड का मतलब गलत तो नहीं समझ लिया इसमें केवल शब्दों के गोले ही छोड़े जाते हैं। ओजस्वी वक्ता वह होता है जो अपने देश और धर्म के लिए दूसरों को जान देने के लिए उकसाता रहे। इसलिए पहले से घोषणा और सूचना करके आग लगाने के लिए जाइएगा ताकि आपको आग लगाने से रोकने के फोटो अच्छे आयें और सभी अखबारों के मुख पृष्ठ की खबर बनें। मुख्य मंत्री की कुर्सी के लिए रास्ता मुखपृष्ठों से हो कर ही जाता है।
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, नवंबर 11, 2011

व्यंग्य मगर मच्छ के आंसू

व्यंग्य
                              मगरमच्छ के आंसू
                                                              वीरेन्द्र जैन
      आज मैंने जब से अडवाणीजी की भरी हुयी आँखों वाला फोटो देखा है तब से आंसू ही आंसू याद आ रहे हैं। संयोग है कि जिस दिन अडवाणीजी की आंसू भरी खबर छपी उसी दिन के दैनिक भास्कर के आज का शब्द स्तम्भ में लार पर विचार किया गया था। इसमें बताया गया था कि
      हिन्दी का लार शब्द संस्कृत के लाला शब्द से बना है। प्यार और प्रेम की भावना का आद्रता से रिश्ता होता है। आकर्षण हो या अन्य खिंचाव, परिणति आद्रता ही है।, दुलार, दुलारना जैसे शब्द इसी कड़ी से बँधे हैं। दुलारा, या दुलारी वही है जो स्नेहासिक्त है। जिसे प्यार किया गया है। जिसे प्यार किया जाता है वही है लाल। प्रिय, सुन्दर, मनोहर, मधुर, आकर्षक और क्रीड़ाप्रिय ही ललित है।  
      रामभरोसे मेरे यहाँ जब भी आता है चाय आने तक अखबार जरूर पढता है और बुन्देली की कहावत- बनी ना बिगारें तो बुन्देला काय के- की तरह उपरोक्त पढने के बाद पूछने लगा कि क्या लार आँखों से भी टपकती है।
      मैंने कहा, क्यों नहीं सड़क पर लड़कियों को देख कर तुम्हारे जैसे छिछोरों की लार ही तो टपकती रहती है।
      तो फिर ये अखबार वाले उन्हें आँसू क्यों कहते हैं? उसके इस सवाल का मेरे पास कोई जबाब नहीं था।
      अडवाणीजी फिल्मों से जुड़े रहे हैं। उनकी पत्रकारिता का अनुभव यह है कि वे पहले फिल्मी पत्रिकाओं में समीक्षाएं लिखते थे। वे पढते भी खूब हैं पर उनके द्वारा पढी जाने वाली किताबों में स्वेट मार्टिन की सफल कैसे हों जैसी किताबें रहती हैं। वे जब लिखते हैं तो आत्मकथा लिखते हैं जो उतनी ही उतनी ही सत्य है जितनी कि सत्य कथाएं होती हैं। जब पहली बार जनता पार्टी शासन में उन्हें स्थान मिला था, तब उन्होंने सूचना और प्रसारण विभाग ही पसन्द किया था जिससे कि कलाकारों से निकट रहने का अवसर मिल सके। कुल मिला कर वे अभिनय से कैरियर बनाने के क्षेत्र से जुड़े महापुरुष हैं जिन्हें प्रधानमंत्री बनने के लिए इस समय अपनी छवि सुधारना है। भाजपा में वैसे भी चरित्र से ज्यादा छवि सुधारने पर ध्यान दिया जाता है। जो जाम उठा कर पैसा खुदा तो नहीं पर खुदा से कम भी नहीं कहते हुए कैमरे में कैद हो जाते हैं वे छवि सुधारने के लिए ईसाई बन गये आदिवासियों के पैर धो उन्हें हिन्दू बना कर अपनी छवि सुधारने की कोशिश करते हैं तथा रुपयों में लेकर डालर में माँग करने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष स्तीफा देकर छवि सुधारते हैं और अपनी पत्नी को टिकिट दिलवा देते हैं।
      जिगर का दर्द जिगर में रहे तो अच्छा है
      ये घर की बात है, घर में रहे तो अच्छा है
      एक फिल्मी गीत में कहा गया है कि- आँसू मेरे दिल की जुबान हैं, तुम कह दो तो रो दें आंसू, तुम कह दो तो हँस दें आंसू..............। एक दूसरे गीत में भी कहा गया है हजारों तरह के ये होते हैं आंसू, अगर दिल में गम हो तो रोते हैं आंसू, खुशी में भी आँखें भिगोते हैं आंसू , इन्हें जान सकता नहीं ये जमाना। मैं खुश हूं मेरे आंसुओं पै न जाना.............। अभिनय की दुनिया से जुड़े लौहपुरुष भी आँसुओं का तरह तरह से उपयोग करके अपनी कट्टरतावादी छवि का मेकअप करने लगे हैं ताकि कट्टरता मोदी के हिस्से में चली जाय और ये अटल बिहारी का मुखौटा ओढ लें। 6 दिसम्बर 92 को जब रथयात्री का रूप धर कर बाबरी मस्जिद ध्वंस कराने पहुँचे थे तब दिल्ली सम्हालने के लिए नियुक्त अटल बिहारी ने संसद में कहा था कि जब बाबरी मस्जिद टूट रही थी तब अडवाणीजी का चेहरा आँसुओं से भरा हुआ था। समझने वाले समझ सकते हैं कि ये आंसू गम के थे या खुशी के थे। दूसरी बार जब रंग दे बसंती फिल्म को गुजरात में चलने नहीं दिया गया था और फिर भी उस बेहतरीन फिल्म ने रिकार्ड तोड़ सफलता पा ली थी तो अडवाणी जी को लगा था कि आमिर खान की लोकप्रियता से पार्टी को नुकसान हो सकता है। इसकी भरपाई करने के लिए वे उसकी अगली फिल्म तारे जमीं पर देखने पहुँच गये और फिल्म देख कर इस तरह रोये कि पत्रकारों तक को भ्रम हो गया कि अडवाणीजी के सीने में दिल भी है। छवि सुधारने वाली इस यात्रा में भी वे बार बार रो कर अपनी छवि से कट्टरता का धब्बा धुलवा लेना चाह्ते हैं। वे 2002 में गोधरा और उसके बाद हुए गुजरात के नरसंहार पर फैसला आने पर कुछ नहीं कहते जिससे उनके आँसुओं पर हँसी आती है। गुजरात के दंगा पीड़्तों और आस्ट्रेलियन फादर स्टेंस को दो मासूम बच्चों अहित जिन्दा जला दिये जाने पर जब यही काम अटल बिहारी ने किया था तब अडवाणीजी हत्यारों की रक्षा करने की ड्यूटी निभा रहे थे, सो मोदी को सबसे योग्य मुख्यमंत्री बताया था।
      अभिनय तो आवश्यकता अनुसार ही किया जाता है।
वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, जून 29, 2011

व्यंग्य- मांगे मिले न मौत


व्यंग्य

बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले न मौत

वीरेन्द्र जैन

मध्य प्रदेश में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष जानते थे कि जब भी वे केन्द्र सरकार से कुछ मांगेंगे तो वो मिलने वाला नहीं है इसलिए उन्हें मौत मांगते संकोच नहीं हुआ। दूसरी ओर जनता बिना मौत माँगे ही मरी जा रही है। वो चिल्ला चिल्ला कर कह रही है कि मुझे बचाओ, पर सरकार है कि उसके कान पर जूं ही नहीं रेंग रही है।

इससे एक बात तो तय होती है कि भाजपा हमेशा जनता के विपरीत सोचती है, जब जनता जिन्दगी के लिए गुहार लगा रही है तब वे मौत माँग रहे हैं। किसी समय जब पंजाब में आतंकवाद चल रहा था तब कहा जाता है कि उस आतंकवाद को रोकने में मनमोहन सिंह जी की बड़ी भूमिका थी। उन्होंने चुपचाप जाकर आतंकियों से कहा था कि क्यों लोगों को गोलियों से मारते हो कुछ दिनों बाद मैं ऐसी आर्थिक नीतियां लागू करूंगा कि साले अपने आप मर जायेंगे। उनकी बात पर भरोसा करके आतंकियों ने लोगों को मारना छोड़ दिया था। वे अभी भी मनमोहन सिंह पर भरोसा करते हैं। एक पुरानी बोधकथा के अनुसार जब एक लकड़हारा जीवन की कठिनाइयों से बहुत हार गया तो उसने लकड़ी का गट्ठर जमीन पर पटकते हुए कहा कि इससे तो अच्छा ही है कि मौत आ जाये। संयोग मौत कहीं आसपास ही घूम रही थी सो तुरंत ही ऐसे चली आयी जैसे कि 108 नम्बर की एम्बुलेंस हो, और बोली कि कहो मुझे काहे के लिए बुलाया है। लकड़हारे को भी इतनी फास्ट सर्विस का भरोसा नहीं था सो डर गया और बोला कि मैंने इसलिए बुलाया था ताकि ये गट्ठर उठवा कर मेरे सिर पर कोई रखवा दे।

अब वैसे तो सरकार से बिना पूछे दो लाख किसानों ने आत्महत्या कर ली तो सरकार ने कुछ नहीं बोला, पर इसमें अनुमति देने का नियम ही नहीं है। हाथ के चुनाव चिन्ह वाली पार्टी के कानून मंत्री ने हाथ खड़े कर दिये हैं क्योंकि उनके हाथ कानून से बँधे हैं। वैसे आत्महत्या का एक तरीका सचमुच के अनशन पर बैठ जाना भी होता है बशर्ते कोई मुरारी बापू या श्री श्री रविशंकर के आज्ञाकारी न हों। उमाभारती ने गुजरात के विधानसभा चुनावों में भाजश के अपने उम्मीदवार गुरूजी के बहाने से बैठा लिए थे। धर्म और गुरुओं की ओट लेने में भाजपा नेताओं को कमाल हासिल है। शतरंज के खिलाड़ियों को उनसे सीखना चाहिए। सुषमा स्वराज ने सोनिया गान्धी के प्रधानमंत्री बनने की स्तिथि में हिन्दू विधवाओं की तरह सिर घुटा लेने जमीन पर सोने और चने खाने की धमकी दी थी तो उमा भारती ने भी उनसे आगे बढ ऐसा ही करके उन्हें और सोनिया गान्धी दोनों को ही चुनौती दे दी थी।

राजनीति में हथकण्डों के स्तेमाल पर किसी को शोध करना हो तो दुनिया में भाजपा के इतिहास से बेहतर कोई सामग्री नहीं मिल सकती। चार सौ साल पुराने रामजन्म भूमि मन्दिर विवाद को नये राम मन्दिर निर्माण में बदलने, ईंटें जोड़ने को रामशिला पूजन में बदल देने या रामसेतु की चिंता करके देश की अर्थव्यवस्था को होने वाले लाभ को रोकने आदि के नाम वोटों की फसल पैदा करने के वे कुशल कलाकार हैं। पता नहीं कि गिन्नीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड वालों का ध्यान उन तक क्यों नहीं पहुँचा।

हो सकता है कि आमरण अनशन कहने में उन्हें गान्धी की बू आती हो क्योंकि संघ वालों को गान्धी हजम नहीं हो पाते और वैसे भी इन दिनों अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने अनशन का ऐसा कापीराइट ले रखा है कि बाबा रामदेव द्वारा बोतल से ग्लूकोज सेवन करने वाले अस्पताल में ही निगमानन्द अनशन करते करते मर गये पर उनके अनशन को अनशन नहीं ही माना गया। रबीन्द्र नाथ त्यागी ने लिखा है कि आत्महत्या बहुत खतरनाक चीज है, इसमें कभी कभी जान जाने का खतरा भी रहता है।

इन ड्रामों के इंटरवल में दुष्यंत कुमार का एक सलाहनुमा शेर याद आ रहा है, हो सकता है कि किसी के काम आ जाये, बशर्ते वह दिल की जगह राजनीति पढ ले-

इस दिल की बात कर तो सभी दर्द मत उड़ेल

अब लोग पूछते हैं कि गजल है कि मर्सिया

वीरेन्द्र जैन

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रविवार, फ़रवरी 13, 2011

व्यंग्य - ब्लैंक चैक


व्यंग्य
ब्लेंक चैक
वीरेन्द्र जैन
पूंजीवादी युग में राजनीति की भाषा भी मौद्रिक हो जाती है। कभी सन्यासियों से उम्मीद की जाती थी कि वे ध्यान की मुद्रा में बैठे मिलेंगे। कई लोग तो यह भरोसा करने लगे थे कि उनके जैसी मुद्रा बना लो तो ध्यान लग जाता है। लोग बुद्ध महावीर आदि की मुद्राएं बना कर बैठ कर देखते थे, पर अब मुद्रा के नाम पर मुद्राएं अर्थात करैंसी का ही ध्यान आता है। कागजी मुद्राएं आने और बैंकिंग के विकास के बाद तो कागज की मुद्राओं के भी कागज चलने लगे जिन्हें चैक कहा जाता है। किसी जमाने में चेकों का भरोसा नहीं होता था क्योंकि खाते में बैलेंस हो या न हो पर चैक काटी जा सकती थी। फिर सरकार को लगा कि बैंक, जिसका मतलब ही होता है भरोसा, वह चेक के भुगतान न होने पर टूट जाता है, इसलिए बिना बैलेंस के चेक काटने को अपराध घोषित कर दिया। पर इससे बिना बैलेंस के चेक कटना तो बन्द नहीं हुए पर अपराधों के दर्ज होने की संख्या में जरूर वृद्धि हो गयी। आज सबसे ज्यादा लम्बित प्रकरणों की संख्या बिना भुगतान के चैक जारी करने वाले प्रकरणों की है।
लम्बित प्रकरणों की इस ढेरी में एक की वृद्धि और होने जा रही है। भूतपूर्व भाजपा नेत्री उमाभारती जो कभी अपने को साध्वी बताती थीं, अब अपने आप को चेक बताने लगी हैं और उन्होंने भाजपा के पक्ष में कटने की घोषणा कर दी है। यह चेक भी बिना कोई राशि भरे हुए जारी करने जा रही हैं जो उत्तर प्रदेश में पेयेबिल अर्थात भुगतान योग्य होगा। भले ही यह कोर बैंकिंग का जमाना हो जिसमें किसी भी बैंक शाखा के खातेदार का चेक कहीं भी भुगतान हो जाता हो, पर वे चैक को स्पेशियली क्रास्ड करके जारी कर रहीं है जिसका मतलब होता है कि यह किसी खास जगह की खास बैंक शाखा में ही जमा किया जा सकता है।
ब्लेंक चैक का अपना रहस्य होता है, यह चेक पाने वाले का जुआ होता है कि वह उसमें क्या राशि भरे। उमाभारती ने उत्तर प्रदेश के पिछले चुनावों में अपने उम्मीदवारों को वापिस बुला लिया था ताकि हिन्दू एकता बरकरार रहे इसलिए यह तो पता ही नहीं चला कि उनके खाते में बैलेंस था भी या नहीं। पर जब उन्होंने उपचुनाव में सोनिया गान्धी के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारा था और भाजपा को अपना उम्मीदवार बैठा कर उनका समर्थन करने का आवाहन किया था तब उनकी जमानत जब्त होने की सीमा से भी कम बैलेंस निकला था। गुजरात में उन्होंने गुरु के आदेश को बहाना बना कर अपने उम्मीदवार वापिस बुला लिए थे और अपने खाते के राज को राज ही रहने दिया था। मध्य प्रदेश में वे बड़ा मल्हरा और टीकमगढ दोनों ही जगह से हारी थीं। बड़ामल्हरा में तो उन्होंने प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके भाजपा के पुराने साथी शिवराज सिंह पर उनकी हत्या कराने का आरोप लगाया था, पर अब उन्हें अपने स्वास्थ की चिंता को भूलकर किसानों के लिए अपने कातिल के पास बैठने से कोई गुरेज नहीं है। भाजपा के बागियों के सहारे पूरे प्रदेश में उन्हें बारह लाख वोट जरूर मिले थे जो उनके अस्थिर मनोभावों के कारण अपने अपने रस्ते से लग चुके हैं। पर जहाँ उनके खाते में सबसे ज्यादा बैलैंस है वहीं पर उनका चेक भुगतान योग्य नहीं है। जहाँ भुगतान के लायक बताया जा रहा है वहाँ उनके खाते के बैलेंस का पता नहीं है।
ये चेक आखिर ब्लैंक क्यों है। क्या पैन नहीं हैं? और न हो तो भी कोई बात नहीं आजकल तो नेट बैंकिंग आ गयी है। बिना पैन के भी राशि यहाँ की वहाँ की जा सकती है। पर अपने खाते के बैलेंस का पता तो होना चाहिए, और अगर नहीं है तो एटीएम से पता किया जा सकता है क्योंकि अब तो सातों दिन चौबीसों घंटे एटीएम खुला मिलता है। ऐसा लगता है कि यह जीरो बैलेंस खाते का ब्लैंक चैक है। चेक लेने और देने वाले दोनों को पता है कि खाते की औकात क्या है, पर टुच्ची साहित्यिक संस्थाओं द्वारा दिये गये पुरस्कारों की तरह खाली लिफाफों का आदान प्रदान हो रहा है और दोनों ही अपनी जनता को बेबकूफ बना रहे हैं।
ये दीवालिया बैंक के जीरो बैलेंस खाते का ब्लैंक चैक है, जो उसको दिया जा रहा जिसका खाता ही नहीं खुल रहा है।
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, अगस्त 02, 2010

व्यंग्य- उपयोगितानुसार वापिसी

व्यंग्य
उपयोगितानुसार वापिसी
वीरेन्द्र जैन
राम भरोसे आज मूड में था। मेरे पूछने से पहले ही बोल उठा- आज एक मनोरोग चकित्सिक के पास एक स्वस्थ नौजवान आया और मरीजों वाले स्टूल पर बैठ गया। डाक्टर ने बहुत ही नम्रता से पूछा कि किसे दिखाना है तो वह बोला कि खुद को। डाक्टर के यह पूछने पर कि क्या शिकायत है वह बोला
“डाक्साब शिकायत यह है कि मुझे जूते की तुलना में चप्पलें ज्यादा पसन्द हैं।“ डाक्टर ने उसे नीचे से ऊपर तक गौर से देखा तो पाया कि वह बेहद सभ्य और शालीन नजर आ रहा था व उसने करीने से कपड़े पहिन रखे थे, उन्हें उसमें कोई भी असामान्य चीज नहीं दिखाई दी तो वे बोले- इसमें परेशानी की क्या बात है, मुझे भी जूते की तुलना में चप्पलें ज्यादा पसन्द हैं।“
“वो तो ठीक है डाक्साब, पर आप उन्हें भून कर खाना पसन्द करते होंगे और मैं उबाल कर खाना।“ अब डाक्टर कभी उस की तरफ देख रहा था और कभी मेरी तरफ।
इतना कह कर राम भरोसे हो हो हो कह कर हँस दिया। मैंने कहा राम भरोसे ये पुराना लतीफा है
राम भरोसे गम्भीर होते हुये बोला होगा, पर सन्दर्भ नया है।
“कैसे?” मुझे उत्सुकता जगी।
“अरे भाई तुमने एम जी वैद्य का वह बयान नहीं पढा जिसमें उन्होंने कहा है कि जसवंत सिंह की तुलना में उमा भारती ज्यादा उपयोगी थीं, पर उन्हें पुनर्प्रवेश देने की जगह जसवंत सिंह को पुनर्प्रवेश दे दिया गया। बकौल शायर- रहा न दिल में वो बेदर्द, और दर्द रहा
मकीम कौन हुआ है, मकाम किसका था”
“तो इसमें गलत ही क्या है यह उपयोगितावाद का ही युग है- यूज एंड थ्रो। भाजपा में लोगों का महत्व उपयोगिता से ही है न कि उनके त्याग, तपस्या, बलिदान, समर्पण, और सिद्धांतवादिता से। हेमा मालिनी, स्मृति ईरानी, वाणी त्रिपाठी, शत्रुघ्न सिंन्हा, विनोद खन्ना, दारा सिंह, अरविन्द त्रिवेदी, दीपिका चिखलिया, नवजोत सिंह सिद्धू, चेतन चौहान, मनेका गान्धी, वरुण गान्धी, वसुन्धरा राजे, यशोधरा राजे, सब उपयोगी वस्तु की तरह ही आयात किये जाते हैं।
चुनाव जिताने के लिए उपयोगी होने तक धर्मेन्द्र को उम्मीदवार बना दिया, बाद में उन्हें कहना पड़ा कि भाजपा ने मुझे इमोशनली ब्लेकमेल किया। अब जब भाजपा अध्यक्ष खुद ही धर्मेन्द्र के डायलोग बोलने लगे हैं तो धर्मेन्द्र की क्या जरूरत!अब तो कुत्ते का खून पी जाने वाले और भी हैं काके। गोबिन्दाचार्य तो जिन्दगी भर भाजपा के टेंक होने का भ्रम पाले रहे किंतु उपयोगिता घटते ही उन्हें नाली के पानी की तरह बाहर का रास्ता दिखा गया। लम्बे समय तक वे समझते रहे कि वे भाजपा को रास्ता दिखाते हैं किंतु अब स्वयं रोड मैप पूछते नजर आ रहे हैं, कौन से रस्ते से आऊँ, खिड़की से, दरवाजे से, रोशनदान से, या छत से। बता दे कोई कौन गली गये श्याम – रोड मैप का पुराना प्रश्न।“ सर्व श्रेष्ठ सांसद का सम्मान पाने वाले जसवंत सिंह की तुलना में उमा भारती की उपयोगिता सचमुच ही अब ज्यादा होना चाहिए बरना विवादित स्थलों पर मस्जिद गिराने की खुशी में मुरली मनोहर जोशी के कंधों पर कौन सवार होगा! विवादित ईदगाह मैदान पर तिरंगा फहराने के बहाने साम्प्रदायिकता की भूमि कौन तैयार करेगा! किसी लिब्राहन आयोग के आगे गवाही के लिए बुलाये जाने पर कौन सब कुछ भूल जायेगा और कहेगा कि मुझे कुछ भी याद नहीं है कि उस दिन क्या हुआ था!
याद नहीं अब कुछ,
भूल गयी सब कुछ
बस ये ही बात न भूली, जूली........ नहीं नहीं कुर्सी.......।
आज नेताओं के मुँह से जो गालियाँ निकल रही हैं उसकी शुरुआत तो उमा जी बरसों पहले कर चुकी थीं जब उन्होंने अपने विरोधी दल के मुख्यमंत्री से हेलीकाप्टर माँगते हुये अपने सन्देह में घिरे साथी से कहा था कि वे देंगे कैसे नहीं, हेलीकोप्टर क्या उनके बाप का है! चुनावी भाषणों में वे कहती रही हैं कि इस दिग्विजय सिंह को तो सड़क के गड्ढों में पटक पटक कर बिजली का करंट लगाना चाहिए। सच कह रहे हैं वैद्य साब कि उनकी उपयोगिता अब जसवंत सिंह से ज्यादा है, अब जब तक सरकार नहीं है तो कौन सा आतंकवादियों को कन्धार छोड़ने जाना है। अरे अगर भविष्य में सोनिया गान्धी प्रधान मंत्री चुनी जाती हैं, तो सिर मुढा कर, चने खाकर, जमीन में सोने की धमकी क्या जसवंत सिंह देंगे!
उमाजी ही क्यों हमारे वैद्य साब तो संजय जोशी को भी वापिस लेने के लिए उतावले हैं जबकि देश की जनता को यह भी नहीं पता कि उन्हें कब पार्टी से बाहर कर दिया गया था और अगर कर दिया गया था तो मध्य प्रदेश पुलिस से क्लीन चिट प्राप्त इस नेता को किस आरोप में बाहर किया गया था ये तो बता ही देते।
इसलिए भैय्या राम भरोसे ये उनकी समस्या है कि वे जूते से चप्पल को ज्यादा पसन्द करें और भूनने के बजाय उबाल कर खाने को बेहतर समझें। और कहें- मेरी मर्जी।

सोमवार, जुलाई 12, 2010

व्यंग्य- असली साहित्य सेवी


व्यंग्य
असली साहित्य सेवी
वीरेन्द्र जैन

हे हिन्दी के साहित्यकारो, तुम कहाँ हो! कौन सी दुनिया में मस्त हो! तुम्हे पता भी है कि तुम्हारी दुनिया में क्या चल रहा है। अरे इतना मस्त तो इन्द्र भी नहीं रहता था जिसके पास जगत की श्रेष्ठ नृत्यांगनाएं थीं । उसने भी तकनीक का सहारा लेकर ऐसा सिस्टम बना रखा था कि जब भी कोई तपस्या आदि में जी जान से ऐसा जुट जाता था जैसे कि मध्य प्रदेश के मंत्री पैसा लूटने में जुटे हुये हैं, तो उसका आसन डोलने लगता था और वह उनकी तपस्या भंग करने के लिए दस पाँच ठौ मेनका रम्भाएं मृत्युलोक में टपका देता था जिससे कि ऋषि मुनि सारी तपस्या भूल जाते थे। पर तुम्हारा खोयापन तो ऐसा लगता है जैसा कि किसी शायर ने कहा है-
खोये हुये से बैठे तिरी बज्म में हमें
ये भी नहीं है याद कि क्या भूल गये हैं
क्या तुम किसी सेमिनार में भाड़ झौंक रहे हो या किसी पुरस्कार की जुगाड़ में लगे हुये हो या अपने किताबें कोर्स में ठुसवाने के प्रयास में हो और इधर तुम्हारी दुनिया पर दूसरे कब्जा करते जा रहे हैं। एक दिन ऐसा भी आ जायेगा जब तुम्हारे हाथ में प्रदेश के दलितों की तरह केवल पट्टा रह जायेगा और कब्जा फिसल जायेगा।
अगर अब भी नहीं समझे तो समझ जाओ कि देश की इकलौती सांस्कृतिक संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अब साहित्य पर उतर आयी है और उसने भाजपा में अध्यक्ष के सर्वोच्च पद पर ऐसा साहित्य प्रेमी थोपा है जो हिन्दी की बिन्दी लगा कर भाषा और साहित्य की अनूठी सेवा कर रहा है। उसकी वाइफ तक भाषा की विदुषी है [ बड़े लोगों की पत्नी नहीं होती वाइफ होती है] और जब हिन्दी भाषी प्रदेश के विद्वान सेवकों ने इन्दौर में उसके फाइव स्टार टेंट के बाहर नितिन गडकरी की जगह नितीन लिखवा दिया था तो उसकी वाइफ़ ने बोला था कि ओह गाड! इन्हें शुद्ध भाषा भी नहीं आती।
पिछले दिनों इन्हीं अध्यक्ष महोदय ने लालू प्रसाद और मुलायम सिंह को सोनिया के तलुवे चाटने वाला कुत्ता बतलाया था। जब उनसे पूछा गया तो उनका उत्तर था कि उन्होंने तो मुहावरे में कुत्ता कहा था। यह बतलाता है कि उन्हें व्याकरण का कितना अच्छा ज्ञान है और ये हिन्दी भाषी प्रदेश के लोग मुहावरे भी नहीं जानते। इसके बाद लालू प्रसाद यादव के राम कृपाल ने गडकरी को छछूंदर कह दिया तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी क्योंकि वे विद्वान जानते थे कि छछूंदर के सिर में चमेली का तेल भी एक मुहावरा है।
जब इन्हीं भाषा विज्ञानी गडकरी ने अफजल को कांग्रेस का दामाद बताया और मूर्खों को दामाद शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुये कहा कि दामाद उसे कहते हैं जिसे अपनी बेटी दी जाती है सो कांग्रेस से सवाल किया कि क्या उन्होंने अफजल को अपनी बेटी दी हुयी है? जब इस पर नासमझ कांग्रेसियों ने अपने पिंजरे में बँधे बँधे फूँ फाँ की तो राजीव प्रताप रूडी ने कालिदास काल के पंडितों की तरह विद्योतमाओं को अर्थ बताते हुये कहा कि यह कांग्रेस की रचनात्मक आलोचना है इसलिए माफी माँगने का कोई सवाल ही नहीं। अब हिन्दी के साहित्यकारों को सीखना चाहिए कि रचना क्या होती है, आलोचना क्या होती है और रचनात्मक आलोचना किसे कहते हैं।
इधर मध्य प्रदेश में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव भाजापा के प्रदेश अध्यक्ष को समझा रहे हैं कि औकात का अर्थ हिन्दी में क्षमता और अंग्रेजी में कैपिसिटी होता है। हालांकि उन्होंने शब्दार्थ तो बता ही दिया साथ ही उदाहरण देकर उनकी औकात भी बता दी कि इसी प्रदेश में एक पत्रकार के रूप में अर्जुन सिंह से अपने निजी काम कराने के लिए किस तरह गिड़गिड़ाते थे।
राजनीति में जहाँ देखो वहाँ भाषा व्याकरण और साहित्य चल रहा है किंतु हिन्दी के साहित्य सेवी शायद आगामी चौदह सितम्बर तक के लिये सोये हुये हैं जब वे हिन्दी सेवा के लिए इस या उस सरकारी संस्था से धैर्य धन्य नत मस्तक हो शाल ओढ कर शालीन होंगे, और अगले साल तक बने रहेंगे।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

मंगलवार, जून 29, 2010

व्यंग्य - लौट के जसवंत वापिस आये

व्यंग्य
लौट के जसवंत वापिस आये
वीरेन्द्र जैन
जसवंत सिंह के लौटने को एज यूजुअल घर वापिसी कहा जा रहा है। ऐसा अन्धविश्वास है कि जो लोग लौटते हैं सब घर ही लौटते हैं।

“पर लौटता तो वह है जो गया हो। जसवंत भैय्या ने भाजपा छोड़ी ही कब थी” राम भरोसे कहता है।
“ हाँ सच कह रहे हो, उन्हें तो निकाला गया था और धकियाये जाने के बाद तो विभीषण भी रावण के रहते लंका नहीं लौटा था और उन्होंने बार बार कहा था कि उन्हें निकालने से पहले औपचारिक शिष्टाचार तक नहीं बरता गया। फिर वैसे भी यह उनका घर थोड़े ही है, घर तो उनका है जो इसमें शाखा से प्रकट हुये हैं। सो इसे घर वापिसी कहना ठीक नहीं है। इसे तो कह सकते हैं कि-
शायद मुझे निकाल कर पछता रहे हैं आप
महफिल में इस ख्याल से फिर आ गया हूं मैं”
एक सम्भावना यह भी हो सकती है कि जसवंत सिंह इसे ससुराल समझते हों, क्योंकि जब भाजपा ने उन्हें निकाल बाहर करने के बाद उनसे लोक लेखा समिति के पद से स्तीफा देने को कहा था तो उन्होंने लगभग डाँटते हुए कहा था कि इस मामले में भाजपा को शोर मचाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि लोक लेखा समिति के अध्यक्ष का पद कोई उसका दिया दहेज नहीं है।
घर तो इसलिए भी नहीं हो सकता कि जिसके बारे में उन्होंने कहा हो कि इस में भ्रष्टाचार चरम पर है और उसे आडवाणी और राजनाथ सिंह को बता देने का दावा भी किया हो उस चरम भ्रष्ट घर को ठीक किये बिना कोई ईमानदार और स्वाभिमानी कैसे जा सकता है।
बहरहाल इस वापिसी में पब्लिक को यह पता नहीं चला कि आखिर मुद्दा क्या था और वह कैसे सुलझा। पहले लोगों को ऐसा लगा था कि मुद्दा ज़िन्ना थे। जिन्ना भी क्या जिन्दा शख्शियत है कि जो मुर्दा होकर भी मुद्दा बनी रह्ती है और जिसका जिन्न पाकिस्तान , हिन्दुस्तान कहीं भी चैन से नहीं बैठने देता। जिस जिन्ना के एक भाषण की तारीफ के कारण आडवाणीजी को अध्यक्ष की कुर्सी छोड़नी पड़ी हो उस पर पूरी किताब लिख कर मुँह पर मार देने से निकाले जाने का असली कारण छुप गया था। जिस भाजपा ने उनकी योग्यता मापते हुये कहा था कि उन्हें पद इसलिए दिया गया था क्योंकि उनकी अंग्रेजी अच्छी है और वे अटलजी के साथ ड्रिंक किया करते थे। अब उस भाजपा ने उनकी कौन सी योग्यता फिर से पहचान ली पता ही नहीं चला। शायद अब विपक्ष के नेता का पद पक्ष के व्यक्ति द्वारा भरा जा चुका है और उसमें कोई फेर बदल नहीं हो सकता सो उसके अंडर में काम करने के लिए आ जाओ। बाकी के सारे पद भरे जा चुके हैं केवल झाड़ू पौंछा करने वाले की जगह खाली है।

किताब तो निकाले जाने के कारणों पर पर्दा डालने के लिए निकाली गयी थी। उन्हें निकाला तो इसलिए जाना था क्योंकि वे फौज से निकल कर आये थे, शाखा से नहीं निकले थे, और इसके प्रमाण स्वरूप वे हमेशा कन्धे पर फित्ती लगी कमीज पहिनते थे। समर्थन करते रहने तक तो ठीक है पर यह भी क्या बात कि अपनी वरिष्ठता के आधार पर आप विपक्ष के नेता पद के भी दावेदार बन जायें। यह नहीं चलेगा, वहाँ तो संघ के आदेश बिना शाखा भी नहीं चलती तो पत्ता क्या हिलेगा। पांचजन्य ने तो सितम्बर 09 अंक में लिखा ही था कि जसवंत को निकाल कर उन्हें खलनायक से नायक बना दिया जिससे उनकी किताब की 49000 प्रतियाँ बिक गयीं। अब क्या नायक से फिर खलनायक बनाना है।

ये कैसा घर है, ये कैसी वापिसी है जहाँ के लोग कि चाहे जहाँ थूक देते हैं और फिर.....................। आप स्वयं समझदार हैं।
वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, जनवरी 06, 2010

व्यंग्य -मर्द हो जाना शीला दीदी का

व्यंग्य
मर्द हो जाना शीला दीदी का
वीरेन्द्र जैन
में जब भी बाल ठाकरे के बारे में कोई बात करता हूं तो राम भरोसे हमेशा पूछता है- ये कहाँ के बाल हैं और मुझे हमेशा बताना पड़ता है कि महाराष्ट्र की बम्बई...... नहीं नहीं मुम्बई के। ठाकरेजी की उम्र अस्सी से आगे निकल गयी है और अब ज़ेंडर भेद भूल जाना चाहिये था पर उनकी भाषा अभी तक भी जवानी के दिनों में ही अटकी हुयी है। पिछले दिनों जब उन्होंने दिल्ली की मुख्यमंत्री के उस बयान पर टिप्पणी की तो उसकी प्रशंसा के लिये उन्हें ज़ेंडर वाली शब्दावली ही मिली और उन्होंने उन्हें कांग्रेस के अंन्दर अकेला मर्द बताया। उनके अनुसार मर्द अर्थात जो बिहारियों को अपने प्रदेश से बाहर का रास्ता दिखाये। पता नहीं कि उन्होंने मध्य प्रदेश के शिव राज ठाकरे का बयान पढा कि नहीं और यदि पढा तो उन्हें कोई उपाधि क्यों नहीं दी! हो सकता है कि इसलिये नहीं दी हो कि उन्हें एक बिहारी को अपने प्रदेश से राज्य सभा में भेजने के लिये विवश होना पढा हो और अब उसे प्रदेश अध्यक्ष बनने से रोकने में उन्हें दांतों पसीने आ रहे हों।
जब राम भरोसे को मैंने बाल ठाकरे का बयान सुनाया था उसके अगले ही दिन वह सुबह सुबह मेरे दरवाजे पर आ गया और वह भी केवल अदरक वाली चाय पीने के लिये नहीं आया था अपितु रात में देखे गये अपने एक सपने को सुनाने के लिये आया। अपने सपने में वह भविष्य में चला गया था और वह देख रहा था कि देश में महिला आरक्षण कानून लागू होने के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव आ गये हैं। चुनाव में शीला दीक्षित के बेटे वाली सीट महिला आरक्षण में चली गयी है और कांग्रेस हाई कमान ने उस सीट पर शीला दीक्षित को उम्मीदवार बनाया है। दिल्ली की वे महिलायें जो अन्य में नहीं आतीं किंतु कांग्रेस उम्मीदवार के फारम भरने, प्रचार पर जाने और जीत जाने पर ढोल धमाकों के साथ नाचने गाने का राजनीतिक काम वर्षों से करती आ रहीं हैं, शीला दीदी को फार्म भरवाने के लिये नाचते गाते हुये ले जाती हैं। पीछे से धक्का मुक्की वाली परंपरा का निर्वाह करते हुये कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के साथ जब दीदी अपना फार्म निर्वाचन अधिकारी के सामने प्रस्तुत करती हैं तो वह बड़े सम्मान के साथ कहता है- मैडम यह सीट तो रिजर्व हो चुकी है।
- हाँ इसीलिये तो दिल्ली प्रदेश का मुख्य मंत्री पद छोड़ कर मुझे लोकसभा के लिये फार्म भरना पड़ रहा है वे विनम्रता से कहती हैं।
निर्वाचन अधिकारी फिर कुटिलता से मुस्कराता है और कहता है कि यह सीट तो महिलाओं के लिये आरक्षित है और आप कांग्रेस में अकेली मर्द हैं, यह सीट तो किसी महिला के लिये है इसलिये हो सकता है कि आपका फार्म रिजेक्ट हो जाये क्योंकि डाक्टर बाल ठाकरे साब ने तो सार्टिफिकेट दिया है कि आप कांग्रेस में मर्द हैं।
-अरे आप किस की बातों में आ रहे हैं इस देश में कानून का शासन चलता है कि न कि बाल ठाकरों का- वे बोलीं
- मैडम अगर ऐसा होता तो श्री कृष्ण आयोग की रिपोर्ट पर कार्यवाही के बाद उन्हें जेल में होना चाहिये था, पर वे तो मुम्बई के तानाशाह बने बैठे हैं।
........ इतने में भाजापा के हुड़दंगिये आ गये और उनके हुड़दंग से सपना टूट गया, आगे क्या हुआ पता ही नहीं चला- राम भरोसे ने अदरक वाली चाय पीते हुये बताया।
- पर राम भरोसे बाल ठाकरे तो भाजपा को भी नहीं बख्शते, तुम्हें याद नहीं कि पिछले दिनों राष्ट्रपति के चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार के खिलाफ वोट दिया था और लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा के प्रधानमंत्री पदप्रत्याशी श्री लाल कृष्ण आडवाणी को मिलने का समय नहीं दिया था। इतना ही नहीं जब भाजपा ने मायावती के साथ छह छह महीने की सत्ता लूट का प्रयोग किया था तो उस पर भी सारी दुनिया के साथ उन्होंने भी हँसते हुये कहा था कि इस छह छह महीने का प्रयोग का क्या मतलब अगर कुछ उम्मीद ही करनी थी तो कम से कम नौ नौ महीने का प्रयोग तो करना चाहिये था।
- यही तो मैं भी कहता हूं कि वे अच्छे भले कार्टूनिस्ट हैं पर राजनीति में आकर वे खुद ही कार्टून बन जाते हैं- राम भरोसे बोला।
कभी कभी रामभरोसे भी समझदारी की बात कर जाता है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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