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सोमवार, जनवरी 21, 2013

उपाध्यक्ष महोदय


व्यंग्य
उपाध्यक्ष महोदय
                                            वीरेन्द्र जैन
     जब कोई व्यक्ति किसी संस्था के लिए ''उगलत निगलत पीर घनेरी'' वाली दशा को प्राप्त हो जाता है तो उसे उस संस्था का उपाध्यक्ष बना दिया जाता है।
          उपाध्यक्ष पदाधिकारियों में ईश्वर की तरह होता है जो होते हुये भी नहीं होता है और नहीं होते हुये भी होता है। यह टीम का बारहवां खिलाड़ी होता है जो पैड-गार्ड बांधे बल्ले पर ठुड्डी टिकाये किसी के घायल होने की प्रतीक्षा में टायलट तक नहीं जाता और मैच समाप्त होने पर फोटोग्रुप के लिये बुला लिया जाता है।

          वह कार्यकारिणी का 'खामखां' होता है। किसी भी कार्यक्रम के अवसर पर वह ठीक समय पर पहुंच जाता है तथा अध्यक्ष महोदय के स्वास्थ की पूछताछ इस तरह करता है जैसे वह उनका बहुत हितैषी हो। वह संस्था के लॉन में बाहर टहलता रहता है और अध्यक्ष के आने, और खास तौर पर न आने की आहट लेता रहता है। अगर इस बात की पुष्टि हो जाती है कि अध्यक्ष महोदय नहीं आ रहे हैं तो वह इस बात की जानकारी अपने तक ही बनाये रखता है तथा बहुत विनम्रता और गम्भीरता से बिल्कुल पीछे की ओर बैठ जाता है, जैसे उसे कुछ पता ही न हो। जब सचिव आदि अध्यक्ष महोदय के न आने की सूचना देते हैं जिसका कारण आम तौर पर अपरिहार्य होता है और सामान्यतय: बहुवचन में होता है, तो वह ऐसा प्रकट करता है जैसे उसके लिये यह सूचना सभी सर्वेक्षणों के विपरीत चुनाव परिणाम आने की सूचना हो। वह माथे पर चिंता की लकीरें उभारता है और अध्यक्ष महोदय के न आने के पीछे वाले कारणों के प्रति जिज्ञासा उछालता है। फिर कोई गम्भीर बात न होने की घोषणा पर संतोष करके गहरी सांस लेता है। अब वह अध्यक्ष है और संस्था का भार उसके कंधों पर है।

          सामान्यतय: उपाध्यक्ष अध्यक्ष से संख्या में कई गुना अधिक होते हैं। कई संस्थाओं में अध्यक्ष तो एक ही होता है पर उपाध्यक्ष एक दर्जन तक होते हें क्योंकि काम करने वालों की तुलना में काम न करने वालों की संख्या हमेशा ही अधिक रहती है। उपाध्यक्षों के दो ही भविष्य होते हैं, एक तो वे अध्यक्ष के मर जाने, पागल हो जाने या निकाल दिये जाने की स्थिति में अध्यक्ष बना दियें जाते हैं या फिर झींक कर अंतत: दूसरी संस्था में चले जाते हैं जहां पहली संस्था में व्याप्त बनेक अनियमितताओं के बारे में रामायण के अखंड पाठ की तरह लगातार बताते रहते हैं। उपाध्यक्षों का सपना संस्था का अध्यक्ष बनने का होता है और संस्था इस प्रयास में रहती है कि इस व्यक्ति को कैसे निकाल दिया जाये कि वह संस्था की ज्यादा फजीहत न कर सके।

          मंच पर उपाध्यक्षों के लिये कोई कुर्सी नहीं होती है। वहां अध्यक्ष बैठता है ,सचिव बैठता है,विशिष्ट अतिथि बैठता है, और कभी कभी तो अशिष्ट अतिथि तक बैठ जाता है, पर उपाध्यक्ष नहीं बैठता है - केवल उसकी दृष्टि वहां स्थिर होकर बैठी रहती है। कभी कभी मुख्य अतिथि से उसका परिचय कराने के लिये मंच से घोषणा की जाती है कि अब हमारी संस्था के वरिष्ठ उपाध्यक्ष मुख्य अतिथि को माल्यार्पण करेंगे। बेचारा मरे कदमों से मंच पर चढता है और माला डाल कर उतर आता है। फोटोग्राफर उसका फोटो नहीं खींचता इसलिये वह मुंह पर मुस्कान चिपकाने की भी जरूरत नहीं समझता।

          उपाध्यक्ष किसी संस्था का वैसा ही हिस्सा होता है जैसे कि शरीर में फांस चुभ जाये, आंख में तिनका पड़ जाये या दांतों के बीच कोई रेशा फंस जाये। सूखने डाले गये कपड़े पर की गयी चिड़िया की बीट की भांति उसके सूख कर झड़ जाने की प्रतीक्षा में पूरी संस्था सदैव रहती है क्योंकि गीले में छुटाने पर वह दाग दे सकता है।

          उपाध्यक्ष के दस्तखत न चैक पर होते हैं न वार्षिक रिपोर्ट पर! न उसे संस्था के संस्थापक सदस्य पूछते हैं न चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी। न उसे अंत में धन्यवाद ज्ञापन को कहा जाता है और ना ही प्रारम्भ में विषय प्रवर्तन को। न उसका नाम निमंत्रण पत्रों में होता है और न प्रैस रिपोंर्टों में। गलती से यदि कभी अखबार की रिपोर्टों में चला भी जाता है तो समझदार अखबार वाले समाचार बनाते समय उसे काट देते हैं। अगले दिन सुबह वह अखबार देखता है और उसे पलट कर मन ही मन सोचता है कि लोकतंत्र के तीन ही स्तंभ होते हैं।
     वैसे मैं आत्महत्या का पक्षधर नहीं हूं और इस साहस को हमेशा कायरता पूर्ण कृत्य बताकर तथाकथित बहादुर बना घूमता हूं पर फिर भी मेरा यह विश्वास है कि किसी संस्था का उपाघ्यक्ष बनने की तुलना में आत्महत्या कर लेना लाख गुना अच्छा है।
                                  वीरेन्द्र जैन
                   2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
                   अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
                                  फोन 9425श्74श्29


शनिवार, नवंबर 13, 2010

laghukathaa raajaa kee nangaee राजा की नंगई

लघुकथा
राजा की नंगई
वीरेन्द्र जैन
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राजा नंगा है। उपदेश कथा में यह कहने का साहस एक बच्चे को छोड़कर किसी को भी नहीं हुआ था। कथा में उसका बाप उसे बार बार चुप कराने की कोशिश कर रहा था। सब राजा के तथाकथित वस्त्रों की तारीफ करके स्वयं की रक्षा कर रहे थे। अब समय दूसरा है। सारे के सारे लोग कह रहे हैं कि राजा नंगा है और चाहें तो राजा के नंगे होने की जाँच करा के देख लें। पर महाराजा और उसके बच्चे सारा सच जान समझ कर भी कह रहे हैं कि नहीं राजा नंगा नहीं है।
महाराजा ने अगर राजा को नंगा कह दिया तो उसके खुद नंगे हो जाने की सम्भावना है।
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वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

रविवार, जुलाई 18, 2010

लघुकथा -नाक और गरदन कटिंग बनाम आनर किलिंग


लघु कथा [व्यंग्य]
नाक और गरदन कटिंग बनाम आनर किलिंग
वीरेन्द्र जैन
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”मैं उन दोनों को मार डालूंगा” वे गुस्से में भरे हुये थे। ”
क्या बात हो गयी किस को मार डालोगे?” मैंने पूछा
”अपनी बेटी और उस हरामी की औलाद जिससे उसने शादी कर ली है” उन्होंने गुस्से में फनफनाते हुए कहा। गुस्से के मारे उनके मुँह से झाग निकल रहे थे, आँखें फटी पड़ रही थीं। वे दुर्वासा के साक्षात रूप बने हुए थे, पर उनमें श्राप देने की क्षमता नहीं थी इसलिए सीधे सजा देने पर उतर आये थे। किसी जमाने के कथा कहानी में ये बीच का रास्ता हुआ करता था जो अब खतम हो गया है।
” अरे भाई दोनों ही पढे लिखे हैं, दोनों ही नौकरी करते हैं, हमउम्र हैं, एक दूसरे को पसन्द करते हैं, और फिर तुम्हारी ही जाति के हैं इस पर तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि दहेज भी नहीं देना पड़ा और हर तरह से योग्य दामाद भी घर बैठे मिल गया। दावत देने वाली बात पर तुम उन्हें सजा दे रहे हो।“
” पर दोनों का गोत्र तो एक ही है”
”होगा यार अपने हिन्दुओं को छोड़ कर और कौन गोत्र की चिंता करता है, पर उनकी शादियाँ भी सफल होती हैं और उनका औसत स्वास्थ भी अपने औसत स्वास्थ से अच्छा ही रहता है ”
” पर ये जो अपने समाज में मेरी नाक कट रही है सो.........?” उन्होंने आखिरी शब्द पर अतिरिक्त जोर देकर कहा।
” तो अपनी नाक के लिए तुम उनकी गरदन काट दोगे, अपनी बेटी दामाद की जान ले लोगे! और फिर ये गैर कानूनी भी है, कहाँ तक भागोगे, अंततः पुलिस की गिरफ्त में आओगे, हथकड़ियाँ पहिन कर अदालत में जाओगे, अपनी बेटी दामाद के हत्यारे कहलाओगे तो क्या तुम्हारी नाक नहीं कटेगी”
” हाँ.................... नहीं कटेगी, हत्या करने पर समाज में नाक नहीं कटती पर गोत्र में शादी करने पर कटती है” वे गुस्से में बोले।

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

मंगलवार, जून 08, 2010

व्यंग्य - जनता की पेंशन सरकार की टेंसन

व्यंग्य
जनता की पेंशन, सरकार का टेंशन
वीरेन्द्र जैन
वैसे तो जिन्दा लोग सरकारों के लिए हमेशा ही मुसीबत पैदा करते रहते हैं और प्रख्यात समाजवादी चिंतक रामनोहर लोहिया ने कहा भी है कि जिन्दा कौमें पॉच साल तक इन्तजार नहीं करतीं पर ये जिन्दा लोग भिन्न कारण से मुसीबत बन गये हैं॥ जब सरकार ने पेंशन योजना के बारे में सोचा होगा तो उसे यह उम्मीद नहीं रही होगी कि हमारा कर्मचारी बिना रिश्वत खाये तथा आधी तनखा पाकर बीमारियों से घिरे बुढापे को इतना लम्बा खींच ले जायेगा । उसकी सोच रही होगी कि पेंशन को क्लीयर करवाने में ही वह आधा मर जायेगा, फिर क्लीयिर होने के बाद पेंशन लेने जाने के धक्कों में कही टें बोल जायेगा, और रिश्वत न मिलने से हींड हींड कर वह अपनी बाकी जान दे देगा। पर अब ऐसा नहीं हो रहा। रिटायरमेन्ट के बाद भी पट्ठा जिन्दा है, और शान से जिन्दा है। च्ववनप्राश, केशर और शिलाजीत खाकर सीढियॉ चढ रहा है और सुईयों में बिना चश्मा लगाये धागा डाल रहा हैं। पेंशन के बढ़ते बिलों को देखकर सरकारों को टेंशन हो रहा है और पेंशन धारक चैन से सौ रहा है।

सरकारें सोचती हैं ये मरता क्यों नहीं। उसने स्वास्थ सेवाओं को सशुल्क कर दिया, सरकारी, अस्पतालों को नरक में बदल दिया, डॉक्टरों से प्राइवेट प्रेक्टिस कराने लगी, दवाइयों के दाम आसमान में पहुँचा दिये पर ये आदमी है कि कछुआ या काक्रोच जो मरता ही नहीं। पहली तारीख को सुबह से बैंक में लाईन लगा कर खड़ा हो जाता है। लाओ हमारा कर्ज चुकाओ। साहूकार और मकान मालिक भी इतना तिथि और समय का पावन्द नहीं होता जितना कि पेंशन लेने वाला। आदमी मकान मालिक, दूध वाले, अखबार वाले, आदि से इतना नहीं घबराते जितने बैंक वाले पैंशन धारकों से घबराते हैं । साढ़े दस, माने साढे दस काउन्टर वाला, काउन्टर पर नही आ पाता पर पैंशनर आ जाता है। बैंक में अपने जिन्दा होने का प्रमाण पत्र स्वंय देना पड़ता है, वह उसके लिए तैयार है- मै घोषित करता हूँ मै जिन्दा हूँ आप गवाही लीजिए, मैं जिंदा हूँ और सचमुच सम्पूर्ण जिन्दा हूँ। सरकार ने सामूहिक बीमा योजना के अन्तर्गत मेरे एक हाथ के पॉच हजार, दोनो हाथों के दस हजार के अनुपात में पच्चीस हजार तक बीमा करवा रखा था पर मैने उस राशि में से एक पैसा भी नहीं वसूला तथा अपने सारे अंगों प्रत्यंगों के साथ जिन्दा हूँ। बिना टीका लगवाये भी मुझे हैपिटाइटिस - बी नहीं हुआ और कोई सावधानी रखे बिना भी एड्स नहीं हो रहा। नालों का सर्व मिश्रित जल भी मेरे लिए संजीवनी हो रहा है और जो खाने को मिल रहा है उसी में सारे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेड, विटामिन और मिनरल्स निकल आते हैं।
लाईये पेंशन निकालिये।
एक सरकार ने कहा था कि केवल पचहत्तर वर्ष तक ही पेंशन मिलेगी शेष जीवन हिमालय की कन्दराओं में बिताने के लिए जाना होगा तथा कन्दमूल फल खाना होगा, पर पेंशनधारियों ने वह सरकार ही बदल दी। उसके मंत्री ने सोचा था कि सबकी जन्मकुण्डलियों को देखकर ही नियुक्ति दी जायेगी ताकि ज्यादा दिनों तक पेंशन न पा सकने वालों की ही नियुक्ति हो इसके लिए उसने विश्वविद्यालयों में ज्योतिष की पढ़ाई शुरू करवा दी पर उसने अपनी जन्म कुण्डली पता नही किस ज्योतिषी से दिखवायी कि वह खुद ही पराजित होकर मुंह के बल गिरा जबकि उसने महूर्त दिखवाकर ही पर्चा भरा था।

सरकार ने पेंशनधारियों के जमा पर ब्याज दर कम कर दी ताकि कुछ फर्क आये पर वह भी नहीं आया। उसने गैस, मिट्टी का तेल, पेट्रोल डीजल, टेलीफोन, बिजली, सबकी दरें बढ़ा दीं पर पैशनर पहली तारीख को फिर भी बैंक में खड़ा मिला। भूले भटके एकाध पेंशनर मर भी जाता तो सौ दूसरे खड़े हो जाते- लाओ पैंशन, लाओ पेंशन्।
सरकारी कर्मचारी पूरी जिंदगी नौकरी ही इसलिए खीचता है ताकि उसे पेंशन मिल सके। बिना काम किये हुये धन का मिलना किसे अच्छा नही लगता जो मजा वेतन में नही आता वह पेंशन में आता है। वेतन अपनी बीबी है पर पेंशन परायी बीबी लगती है। रहीम आज होते तो कहते-

गौधन गजधन वाजधन
और रतनधन खान
जब मिल जावे पेंशन
सो सबधन धूरि समान

भूतपूर्व सांसदों विद्यायकों ने तो इसीलिए अपनी पैंशन पहले से तय कर ली है।

वीरेन्द्र जैन
21शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425श74श29

शनिवार, जून 05, 2010

व्यंग्य गिफ्ट आइटम


व्यंग्य
गिफ्ट आइटम
वीरेन्द्र जैन

जिस चीज को खरीदते समय गुणवत्ता के प्रति एक गहरा निरपेक्ष भाव और देते समय मुस्कराहट के नीचे मजबूरी का मजबूत आधार छुपा होता है उसे गिफ्ट आइटम कहते हैँ।
गिफ्ट आइटम खरीदना एक कठिन काम होता है। यह साधारण खरीद से भिन्न किस्म की खरीद होती है। आम तौर पर इसका विचार निमंत्रण पत्र की प्राप्ति वाले दिन से जन्म लेता है और आयोजन की तिथि आने तक पलता और टलता रहता है। इस खरीद के टलने में एक सोच तो आयोजन के स्थगन या रद्द होने की सम्भावना की कल्पना के कारण पैदा होता है जो सामान्यतय: पूरा नही होता। अंतत: वह दिन आ ही जाता है जब दफ्तर से लौटने के बाद आप पाते हैं कि पत्नी अपने से ज्यादा आकर्षक वेषभूषा में तैयार बैठी है तथा बच्चे अच्छे कपड़ों के गन्दे हो जाने से बचने के लिए सीधे बैठे बैठे बेचैन हो रहे हैं। यह दृश्य देखकर ही आप पर गिफ्ट आइटम खरीदने की कठिन परीक्षा वाली घबराहट छा जाती है।

गिफ्ट आइटम खरीदने में एक बात तो तय रहती है कि इतने रूपयें से ज्यादा का नहीं खरीदना है, चाहे जो हो जाये। चंन्द्र टरै, सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार पर राजा हरिशचन्द्र का टरै न सत्य विचार - की तरह आप तय की हुयी राशि में गिफ्ट आइटम खरीदने निकलते हैं। आप चाहते हैं कि आइटम दिखने में आकर्षक, चमकीला और आकार में बड़ा हो ताकि आयोजन स्थल पर बड़ा डिब्बा देखकर लगे कि आप कोई बड़ी चीज लेकर आये हैं। आपकी कोशिश रहती है कि यह बड़ी सी चीज आपके द्वारा निर्धारित की गयी छोटी सी राशि में आ जाये ताकि चार लोगों के नियोजित परिवार द्वारा व्यंजनों का अनियोजित भक्षण किया जा सके और कोई शर्म न महसूस हो।

दुकानदार आपकी व्यथा समझता है। वह जानता है कि आपकों उस वस्तु का उपयोग नहीं करना है केवल देना है। वह केवल गिफ्ट देने से पहले न टूटे या अधिक से अधिक एक दो बार काम कर जाये तो बहुत है। नकली माल पर असली का लेबिल लगाना उसे आता है। रेट की स्लिप भी चौगुने दामों की चिपका देता है। सौ रूपयें का माल पॉच सौ रूपयो के स्लिप के साथ मजबूत डिब्बे में पैक करके दिया जाता है जिस पर रंगीन चमकीला रैपर चढ़ा रहता है। डिब्बे पर रिबिन बांधकर फूलदार गांठ लगा दी जाती है। गिफ्ट आइटम तैयार है। दुकानदार गिफ्ट पैकिंग के चार्ज अलग से वसूलना चाहता है। जो आप देना नहीं चाहते क्योकि यह राशि उससे अधिक हो जाती है जो आपने तय कर रखी है। दुकानदार जानता है कि इस आधार पर आप आइटम वापिस नहीं करेंगे। वैसे भी आपको देर हो रही है इसलिए वह अड़ जाता है कि गिफ्ट पैकिंग के पैसे अलग से लगेंगे। अतंत: कुछ घट बढ़ कर सौदा पट जाता है तथा अच्छे रैपर में लोकल (जीवित और अजीवित) माल स्कूटर पर फंसा कर आप चल देते हैं। रस्ते में याद आता है कि आपने पैकिट पर अपने नाम की स्लिप तो लगवायी ही नहीं है इसके बिना सारी मेहनत बेकार जाने वाली है। यदि मंदिरों के पत्थरों पर नाम लिखवाया जाना अधार्मिक घोषित हो जाये तो मूर्तियां हाथ ठेलों पर घर घर र्दशन देने के लिए उपलब्ध हो सकती हैं। आप तुरन्त ही एक दुकान पर रूकते हैं और स्टेपलर मांग कर अपना विजटिंग कार्ड डिब्बे पर स्टेपल कर देते हैं- तीन चार जगह से ।

जब बाजार व्यवस्था में एक सौदा निरंतर चलता रहता है- कम से कम देकर ज्यादा से ज्यादा पाने की तमन्ना दोनों ओर से जारी रहती है तो फिर गिफ्ट आइटम ही क्यों अलग रहें।

वीरेन्द्र जैन
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