शनिवार, नवंबर 14, 2009

व्यंग्य - उंगली के कारनामे

व्यंग्य
उँगली
वीरेन्द्र जैन

वैसे तो रीढ़ की हड्डी का अंतिम मनका छोड़कर किसी भी अंग को अनुपयोगी नही कहा जा सकता है और हो सकता है कि चमचागिरी के चरम क्षणों में परम चमचों के लिए वह भी दाएँ-बाएँ हिलाने के काम आता हो पर उँगलियॉ शरीर का अति महत्वपूर्ण अंग होती हैं। एक फेफड़े या किडनी के न होने पर आप विकलांगता का प्रमाण-पत्र और सुविधाएँ नही पा सकते जबकि उँगलियों के न होने पर आप इस तरह की सुविधा पाने के अधिकारी हैं जो इस बात का प्रमाण हैं कि उँगलियॉ शरीर का अंग हैं फेफडे और किडनी नही हैं।

आदमी को लाश हो जाने से बचने के लिए जिंदा होना परम आवशयक है व जिंदा रहने के लिए उसे भोजन करना पड़ता है। भोजन चाहे छुरी- कांटे से किया जाए या उनके बिना, पर भोजन करने के लिए उंगलियॉ नितांत आवश्यक हैं। जो पॉच होती हैं तथा समान नही होतीं, किन्तु खाते समय विषयवस्तु पर समान रूप से केन्द्रित होती हैं, बिल्कुल उसी तरह जैसे कि सत्तारूढ पार्टियों के पॉचों गुट चुनाव के समय एक हो जाते हैं जिससे कि दूसरी कोई पार्टी देश को न खा सके।

उँगलियॉ खाने व लिखने के काम ही नही आतीं, ये इशारे करने के काम भी आती हैं। रेल्वे स्टेशनों के संडासों पर, महिला व पुरूष शौचालयों पर उंगली के इशारे से इंगित करने वाले प्रतीक इतने अधिक प्रचलित हैं कि कई बार तो साधारण इशारा करने वाला भी ऐसा लगता हैं कि जैसे किसी शौचालय की ओर इशारा कर रहा हो। शायद यही कारण हैं कि कक्षाओं में बच्चों को लघुशंका का विश्वास होने पर अपनी छोटी उँगली उठाकर अनुमति मांगना सिखाया जाता हैं। वैसे इस बारे मैं मैं कुछ नही कह सकता कि इसके लिए छोटी उँॅगली से ही इशारे का नियम क्यों और कैसे बना। पर यदि ऐसा नियम नही होता तो मुझे क्रिकेट का एम्पायर भी किसी खिलाड़ी को आउट देते समय ऐसा लगता जैसे कि खिलाड़ियों से लघुशंका के लिए अनुमति मांग रहा हो। यूँ इशारे तो ऑखो- ऑखों और गर्दन का यथा संभव मोड़ देकर भी किए जाते हैं पर उंगलियों के इशारों से जितना व्यापक संप्रेषण संभव हैं उतना ऑखों और गर्दन के हिलाने - डुलाने से नही। यही कारण हैं कि हमारे दूरर्दशन पर बधिरों के लिए केवल उँगलियों के इशारे से सारी दुनिया की जानकारी दे दी जाती हैं।

उँगलियों केवल तिलक या चंदन लगाने के काम ही नही आतीं, इनसे आप किसी की मांग में सिंदूर भी भर सकते हैं औैर घूँघट भी उठा सकते हैं। जिनका घूँघट उठा नही होता हैं वे बंद घूघट में से दो उँगलियों के सहारे से घूँघट के बाहर का नजारा भी देख सकती हैं।
टूथ-पेस्ट को ब्रश पर रखकर 'ब्रश' करने का कार्य हम- आप नितप्रति करते हैं, पर जिन्हैं बासी और जूठा ब्रश करना पसंद नही वे यही श्रेय उंगली को प्रदान करते हैं और किसी गलतफहमी के न पैदा होने की दृष्टि से इस क्रिया को मंजन करना कहा जाता है।

आश्चर्य की स्थिति में उंगली दांतो तले दबाने के काम भी आती है। इन क्षणों में आम तौर पर दांतों तले अपनी ही उंगली दबाई जाती हैं। जिससे दांतों के दबाव पर अपना नियंत्रण रहता है किंतु कुछ परजीवी व्यक्ति ऐसे क्षणों में दूसरों की उंगली दबाते हैं और इतने आश्चर्य चकित दिखने का प्रयास करते हैं कि दांतों पर अपना सारा नियंत्रण खो देते हैं।

उंगलियाँ नही होतीं तो ऑखों में काजल देके अंखियों को बड़ी बड़ी और कजरारी कैसे किया जाता ? और कई ऑखें तो इतनी धरदार होती रही हैं कि पुरातन काल के हिन्दी कवियों ने कहा ही है
काजर दे ना ऐ री सुहागन
आंगुरी तेरी कटेगी कटाछन।

उँगलियॉ नहीं होतीं तो वोट डालने से पहले किस अंग को कलंकित किया जाता। उँगलियाँ नहीं होतीं तो रूपए कैसे गिने जाते और उन रूपयों से भरे सूटकेस कैसे उठाए जाते। उंगलियॉ नही होतीं तो कांग्रेस का चुनाव चिन्ह् जाने कैसा नजर आता। यूँ छिद्रान्वेषी व्यक्ति उंगलियों में कुछ कमियॉ भी बताते हैं, कहते हैं कि सीधी उंगली से घी नहीं निकलता, पर घी निकालने के लिए उंगली को टेढ़ी करने की सुविधा भी उपलब्ध होती है। इसके लिए केवल मजबूत इरादे की जरूरत भर होती है। मजबूत इरादे वाले लोग ठसाठस भरी बसों या बाजारों में सीधी उंगली से न जाने कितनी जेबों से नोट व बटुए निकाल लेते हैं और उससे घी घरीदते हैं, जिसे उंगली को टेढी करके निकालते रहते हैं।

यदि पौराणिक कथाओं पर भरोसा करें तो कृष्ण कन्हैंया ने एक उंगली पर गोवर्धन उठा लिया था तथा विष्णु का सुर्दशन चक्र भी एक उंगली पर ही घूमता था। यह कैकेयी की उंगली का ही कमाल था जो उन्होने युद्वरत दशरथ के रथ में ठीक समय पर डालकर रामकथा का सूत्रपात किया था।

हमारे इतिहास में एक भी उंगली विहीन महापुरूष नही हुआ। यदि उंगलीमाल अपने उद्देशय में सफल हो जाता तो गौतमबुद्व का कभी भगवान होना संभव नही हो पाता। गॉधीजी ने भी अपना पहला सफल आंदोलन उंगलियों के निशानों को लेकर ही अफ्रीका में चलाया था और फिर उसे वापिस लेकर उन्ही उंगलियों से उसका परिणाम भी झेला था। देशभर में लगी बाबा साहब अम्बेडकर की आदमकद प्रतिमाएँ एक उंगली उठाकर संवैधानिक सत्ता की महत्ता को दर्शाती रहती हैं और चुनाव या मैच जीतने वाले सारे विजेता दो उंगलियों से 'वी' बनाकर विजय का उल्लास व्यक्त करते हैं।

चतुर पत्नियॉ अपने पति को उंगलियों पर ही नचाती हैं। उंगलियों ही चोटियों गूंथती हैं, जुएँ बीनती हैं, या प्यार से अपने पति के कोट के बटन लगाती हैं। किसी डिटर्जेट के विज्ञापन में यदि दाग धब्बों को ढूंढते रह जाने की बात भी कहनी हो तो उसमें भी उंगली घुमाने की कला आना आवश्यक होती है।
लखनऊ में ककड़ियाँ बेचने वाले उन्हैं लैला की उंगलियॉ कहकर बेचते हैं और खरीदने वाले इसी धोखे में पहले उन्हैं खरीदते हैं, फिर खा जाते हैं। अंग्रेजी वालों ने यही श्रेय भिंडी को दिया हैं और उसे लेडिज फिंगर का नाम दिया हैं।

संगीत की सारी दुनिया ही उंगलियों से गूंजती है, सितार हो या वीणा, तबला हो या हारमोनियम सभी उंगलीयों की कला से ही गुंजायमान होते हैं। और तो और चुटकी तक बिना उंगलियों के नही बजाई जा सकती।

फीस लेने और उसे उंगलियों के सहारे से गिनने के बाद डाक्टरों की उंगलियॉ नब्ज पर पड़ते ही भीतर की सारी गतिविधि का अंदाज कर लेती हैं। इन्ही उंगलियों की सहायता से वह शरीर के अनावश्यक बीमार हिस्सों को अलग कर देता है और उसी से इंजेक्शन भी लगता है। उंगलियों के सहारे आज लाखों टाईपिस्ट और कम्प्यूटर आपरेटर देशभर के दफ्तर चला रहे हैं जिनमें रिश्वत की फसलें लहलहा रही हैं। बच्चा सबसे पहले उंगली पकड़कर ही चलना सीखता है और गिनती भी। विवाह बंधन में बंधने से पूर्व उंगली में अंगूठी पहनाने की सबसे पहली रस्म होती है।

बंदूक के ट्रिगर पर रखी हुई उंगली अपराधियों को पास नही फटकने देती। स्कूटर के क्लिच पर रखी उंगलियां आपको कहॉ से कहॉ ले जाती हैं व जरूरत पड़ने पर हार्न भी बजाती हैं। उंगलियों नही होतीं तो कारों और बसों के स्टीयरिंग कैसे संभाले जाते ? उंगलियों नही होतीं तो आप दरवाजे का हैंडिल कैसे घुमाते या दफ्तर से घर आकर घर की घन्टी कैसे बजाते ? शर्ट के बटन लगाने हों या पाजामें के नारे की गांठ लगानी हो, उंगलियों के बिना संभव नही हो सकता हैं। उंगलियों के बिना ना तो बोतल का ढक्कन खोला जा सकता हैं और ना ही गिलास उठाया जा सकता है। यहॉ तक कि दांतों में फॅसा हुआ तिनका भी उंगलियों के बिना नही निकाला जा सकता है। सिगरेट के निकालने से लेकर सुलगाने और पीने तक उंगलियों का अपना महत्व है।

उंगलियों का महत्व कहाँ तक गिनाउं ! इसलिए अंत में मेरी यही शुभकामना हैं कि आपकी पॉचों उंॅगलियों सही सलामत ही नही घी में भी रहैं और ऐसा घी गर्म कड़ाही में न हो।

4 टिप्‍पणियां:

  1. सर जी इतनी भी उपयोगी होती है ये ऊगलियाँ ये आपके द्वारा पता चला। सुन्दर लेख, आभार

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  2. Ungliyan na hoti to is lekh ko hum tak pahuncha bhi nahi pate! Bahut khub.

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  3. *सन्ध्याजी धन्यवाद! वैसे सम्भावनायें तो अनंत हैं पर सभी लिख सकना कहां सम्भव है?

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  4. किसी ने कहा था
    जब से मैं गिनने लगा इन पर तेरे आने के दिन
    मुझको अपनी उंगलियां अच्छी लगीं..........

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