बुधवार, नवंबर 25, 2009

व्यंग्य उनके पास माँ है

व्यंग्य
उनके पास माँ है
वीरेन्द्र जैन
किसी हिन्दी फिल्म का एक डायलाग बहुत प्रसिद्ध हुआ था जिसमें नायक का भाई कहता है कि आज मेरे पास गाड़ी है, बंगला है, दौलत है, तुम्हारे पास क्या है?
इस पर नायक कहता है कि- मेरे पास माँ है।
डन डनन डन डनन डन डिन।
हिन्दी फिल्में हमारे देश के लोगों पर बहुत प्रभाव डालती हैं, इन लोगों में साधारण जन से लेकर कांग्रेस जन भी होते हैं। कांग्रेस जन दर असल अन्य केटेगरी में आते हैं। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरि शंकर परसाई कहते थे कि आदमी तीन तरह के होते हैं, एक सज्जन दूसरे दुर्जन और तीसरे कांग्रेस जन।
कभी वर्ल्ड बैंक के प्रतिनिधि रहे हमारे प्रधान मंत्री, जिन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि वे कभी प्रधान मंत्री बनेंगे, जब अमेरिका गये तो उन्होंने वहां पर कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि चीन का अर्थिक विकास हमारे आर्थिक विकास से बेहतर है फिर भी हमारे यहां मानव अधिकारों का आदर व कानून के सम्मान के अलावा बहु सांस्कृतिक, बहुप्रजातीय, बहुधार्मिक अधिकारों को महत्व देने जैसे कुछ अन्य मूल्य हैं, जो जीडीपी की वृद्धि से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
यह वैसा ही था जैसे वे कह रहे हों कि हमारे पास माँ है।
शायद उन्हें विनायक सेन और इरोम शर्मीला के मानव अधिकार याद नहीं आ रहे होंगे या गुजरात के 2002 के और दिल्ली के 1984 के नरसंहारों की याद नहीं रही होगी।उन्हें याद नहीं रहा होगा कि सलमान खान ही नहीं शबाना आज़मी को भी मुम्बई में मकान नहीं मिलता।उन्हें याद नहीं रहा होगा कि हरियाना में अपनी मर्जी से शादी करने वालों को अदालत द्वारा दिये गये सुरक्षा आदेश के बाद भी मार डाला जाता है और हत्यारों का कुछ नहीं बिगड़ता क्यों कि आगामी विधान सभा चुनावों में वे जाट मतदाताओं को नाराज़ नहीं करना चाहते थे। अपने मन से अपने धर्म का चुनाव करने वालों को ज़िन्दा जला दिया जाता है।
हमारे प्रधान मंत्री अमेरिका से लौट कर आयेंगे और उनके पास कोई प्रतिनिधि मण्डल जाकर कहेगा कि हम उन 72 करोड़ लोगों में से एक हैं जो अर्जुन सेन गुप्ता की रिपोर्ट के अनुसार बीस रुपये रोज़ में गुज़ारा चलाने वालों में से आते हैं तो वे कहेंगे बोलो रोटी चाहिये या मानव अधिकार?
दोनों ही चाहिये हुज़ूर- वे कहेंगे
दोनों नहीं मिल सकते, चाहे रोटी ले लो या मानव अधिकार ले लो! जल्दी बोलो अभी मुझे वर्ल्ड बैंक के प्रतिनिधि से बात करने जाना है।
रोटी पहले चाहिये हुज़ूर क्योंकि अगर रोटी नहीं मिली तो फिर मानव अधिकार क्या लाश-अधिकार में नहीं बदल जायेगा और लाश का कोई अधिकार नहीं होता सिवाय बदबू फैलाने के अगर उसे जल जाने या दफन हो जाने की सुविधा नहीं मिले।
अरे भाई थोड़ा इंतज़ार कर लो अगले साल हमारे यहाँ एशियन गेम्स होने वाले हैं उन्हें देखना, मेट्रो में सफर करना, 2015 तक हम हर गाँव में बिजली पहुँचा देंगे 2020 तक हम खाद्य में आत्मनिर्भर हो जायेंगे।
हो सकता है हम इंतज़ार कर भी लें पर 2014 में तो आप चुनाव हार जायेंगे।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

1 टिप्पणी:

  1. २०१४ में चुनाव हार जायेंगे?? ऐसा लगता तो नहीं...

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