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गुरुवार, नवंबर 08, 2012

व्यंग्य किसका कितना आई क्यू


व्यंग्य
किसका कितना आई क्यू
वीरेन्द्र जैन
       अगर आपने लारेल हार्डी की फिल्में नहीं देखीं तो कोई बात नहीं, कुछ ही वर्ष पहले की हास्य अभिनेत्री टुनटुन की फिल्में जरूर ही देखी होंगीं। अगर वे भी नहीं देखीं तो भी कोई बात नहीं आप भाजपा के संघ नामित अध्यक्ष नितिन गडकरी को देख सकते हैं। काश अगर आप उन्हें सुन सकें तो औडियो विजुअल दोनों का ही मजा मिल जायेगा। भले ही देश और दुनिया में भाजपा के नेता साम्प्रदायिक, हिंसक षड़यंत्रकारी, कुटिल असत्यभाषी और भ्रष्ट माने जाते हों पर सच तो यह है कि भाजपा एक मनोरंजन प्रधान फिल्म ............. नहीं नहीं पार्टी है, जिसमें तरह तरह की हीरोइनों, खलनायकों, बहुरूपियों से लेकर हास्य अभिनेता तक सब कुछ मिल जायेगा। वैसे तो कांग्रेस पार्टी के नेता भी जिस क्षेत्र में जाते हैं वहाँ की टोपी से लेकर सींगों के मुकुट तक पहिन कर ढोल बजाने की मुद्रा में फोटो खिंचवाते और प्रकाशित कराते हैं ताकि हाईकमान को दिखा कर बताया जा सके कि वे पार्टी के लिए कितना काम कर रहे हैं। उनके हाईकमान तक को भ्रम रहता है कि ऐसी नौटंकियों से वोट मिलते हैं, जिसे जुटाना उनकी पार्टी का पहला और आखिरी लक्ष्य है।
       यों कहने को आप मुझे ग़डकरीजी का प्रचारक कह सकते हैं, पर फिर भी में उनका इतिहास अवश्य ही बताऊंगा। ‘भए प्रकट कृपाला दीनदयाला’ की तरह दीनदयाल उपाध्याय की इस पार्टी में गडकरीजी का अचानक ही धम्म से अवतरण हो गया था जैसे रंगमंच पर कठपुतलियां उतरती हैं वैसे ही वे सीधे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर ऐसे धमाक से गिरे थे कि बाहर वाले तो बाहर वाले, अन्दर वाले तक हतप्रभ होकर रह गये थे कि यह क्या हो गया। उनकी डोरियां नागपुर के केशवकुंज की उंगलियों में बँधी थीं। अंग्रेजी में एक कहावत है कि आकाश में बिजली चमकने और बादल गरजने की घटना एक साथ होती है पर प्रकाश की गति तेज होने के कारण प्रकाश पहले दिखाई देता है और गरज बाद में सुनाई देती है इसी तरह कुछ लोगों की चमक तब तक ही रहती है जब तक उनकी आवाज नहीं सुनाई देती। गडकरीजी के मुखारविन्दु से जब स्वर फूटे तब उनकी असलियत समझ में आयी। अध्यक्ष बनने के बाद ही उन्होंने भंडारा में बीमार चीनी मिलें खरीद ली थीं और वहाँ एक रैली की थी। इस रैली में बोलते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष महोदय  ने कहा था कि ‘याद है न, अँधेरी रात में दिया तेरे हाथ में. काँग्रेस के हाथ को वोट दिया था अब मजे लो।‘ शरद पवार के कारनामों के बारे में उन्होंने कहा था कि उनका आईपीएल का खेल भी गज़ब का है, जब चौका पड़ता है तो चियर्स लीडर अपनी एक टाँग उठा देती है व छक्का पड़ने पर उसकी दोनों टाँगें उठ जाती हैं। अफज़ल गुरु को तो उन्होंने कांग्रेस का दामाद तक कह दिया था और लालू तथा मुलातम के खिलाफ की गयी गन्दी टिप्पणी के बाद तो उन्हें माफी तक माँगना पड़ी थी। विवेकानन्द के आईक्यू से तुलना करने के लिए उन्हें दाउद इब्राहीम ही मिला था क्योंकि भाजपा वाले जब भी शत्रु की कल्पना करते हैं तो उन्हें मुसलमान ही नजर आते हैं। सब कुछ देखते हुए भी मोहन भागवत का उन्हें अध्यक्ष बनाना, और बनाये रखने के लिए भाजपा के संविधान में परिवर्तन करा देने को देखते हुए इस राष्ट्रवादी संघ प्रमुख के आईक्यू की तुलना धृतराष्ट्र से ही की जा सकती है।
       बहरहाल गडकरीजी अपनी पहली रैली के दौरान ही चक्कर खाकर अडवाणीजी के मजबूत कँधों पर टिक गये थे क्योंकि इससे पहले कड़ी धूप का उन्होंने सामना ही नहीं किया था। कुछ दिनों बाद उन्होंने अपनी चर्बी छिलवाई थी और अब जेठमलानी पिता पुत्र उनकी चमड़ी उधेड़ने पर लगे हुए हैं। कांग्रेस के महा सचिव दिग्विजय सिंह तो गत एक साल से सवाल उठा रहे थे कि उनके पास इतनी सम्पत्ति कहाँ से आयी, पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कांग्रेस के महा सचिव की बातों का जबाब देने की वैसे ही कोई जरूरत नहीं समझी, जैसी कि अरविन्द केजरीवाल ने उनके सवालों के जबाब देने की जरूरत नहीं समझी थी। जेठमलानी तो वकील हैं इसलिए जो उनके वकालतनामा पर दस्तखत कर देता है उसके पक्ष में बात करते हैं। मोदी ने उन्हें चुना है तो वे मोदी को देश का प्रधानमंत्री तो क्या अमेरिका का राष्ट्रपति तक बनवाने के लिए जिरह कर सकते हैं। गडकरी की कलई भी खुली और उन्होंने जेठमलानी की सेवाएं भी नहीं लीं सो उन्हें मजबूरन उनका विरोध करना पड़ा। सुना है कि गडकरी जी स्व. चन्द्रशेखर के उन कार्यकर्ताओं को भाजपा में भरती कराने के प्रयास में जुट गये हैं जिन्होंने जेठमलानीजी द्वारा चन्द्रशेखरजी के घर के सामने धरना रखने के खिलाफ उनका सम्मान कर दिया था।
       गडकरीजी सचमुच ही अभिनन्दनीय हैं, मेरी दिली इच्छा है कि उन्हें एक कार्यकाल और दिया जाये ताकि वे भाजपा के बचे खुचे कपड़े तक उतरवा सकें।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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सोमवार, मई 14, 2012

व्यंग्य- पत्नी सी पत्नी, मामा सा मामा


व्यंग्य
पत्नी सी पत्नी मामा सा मामा
वीरेन्द्र जैन
      औपचारिक पत्नियों को देखते देखते बहुत दिन हो गये थे, पर पिछले दिनों एक खरी पत्नी जैसी पत्नी देखने को मिली तब समझ में आया कि तुमने कैसे ये मान लिया, धरती वीरों से खाली है । ये नकली पत्नियाँ बाहर बाहर तो ताजमहल के सामने वाली बेंच पर फोटो खिंचवाने वाली मुद्रा बनाये रहतीं हैं और अन्दर अपनी वाली पर आती रहती हैं। सन्दर्भित ‘पत्नी’ ने इस द्वैत को तोड़ दिया है। कवि ने कहा है-
तन गोरा मन सांवला, बगुले जैसा भेक
तासे तो कागा भला बाहर भीतर एक  
हुआ ये कि लोकायुक्त पुलिस ने बहुत दिनों बाद अंगड़ाई ली और भोपाल में एक मोटी मछली के यहाँ छापा मार दिया। छापे में उनकी उम्मीद से भी ज्यादा नोट निकलते चले गये, सोना, चाँदी, मकान, जमीन, शेयर, और न जाने क्या क्या निकला जो सौ सवा सौ करोड़ की सीमा को भी पार करता चला गया। यही वह अवसर था जब उस अफसर की पत्नी ने स्वाभाविक पत्नी धर्म का निर्वाह करते हुए लोकायुक्त पुलिस की क्लास ले डाली और उनसे सवाल किया कि हमारे यहाँ तो छापा मारते हो पर उस मंत्री के यहाँ छापा क्यों नहीं मारते जो हर महीने एक करोड़ रुपये लेता है। दृष्य देखने वाला ही रहा होगा जब पतिदेव महोदय उनके मुँह पर हाथ रखते हुए उन्हें घसीटकर अन्दर ले गये पर परम्परागत  पत्नी का मुँह तो पानी की लाइन में हुए लीकेज की तरह होता है जिसमें से एक बार निकलना शुरू होने के बाद शब्द की धार लगातार बहती रहती है। उसने चीख चीख कर पतिदेव से कहा कि मैं कहती थी कि सन्युक्त संचालक ही बने रहो, पर आप नहीं माने संचालक बन गये तो खुद फँस गये, जबकि बाँटना सबको पड़ता था। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में जिस गहराई से मन्दोदरी विलाप का चित्रण किया है उसे पढ कर तो सन्देह होने लगता है कि वे कथा में किसके पक्ष में हैं। ठीक उसी तरह एक ठीक ठाक तरह की पत्नी अपने राक्षस पति के पराभव पर याद दिलाती है कि उसने समय रहते कैसी कैसी समझाइशें दी थीं।
      ग्रहणी लिखने में लोग सामान्यतयः वर्तनी की भूल कर जाते हैं, उसे ‘गृहणी’ लिखते हैं जबकि मेरे अनुसार यह शब्द ग्रहण करने से बना होगा। वो एक बार पैसा ग्रहण कर ले तो वो उसका अपना हो जाता है और लूट के पैसे को जाते देख कर भी ऐसा लगता है कि जैसे खुद ही लुट गये। अफसर की पत्नी में अगर ईर्षा न हो तो उसका जीवन बेकार है, उसे अपने सौ सवा सौ करोड़ से ज्यादा तकलीफ अपने विभाग के मंत्री को एक करोड़ रुपये प्रतिमाह पँहुचाने पर होती रही है। हमारे तो लुट गये पर उसके सही सलामत हैं, उसका बालबाँका भी नहीं हुआ। क्या दुनिया है कमाये हमारा पति और मंत्री मुफ्त में ही लेता जाये। लुटे हमारा पति और मंत्री चैन करे। नौकरी हमारे पति की जाये और मंत्री को एक मलाईदार विभाग और मिल जाये। तेरी जय जय कार जमाने।
      अफसर के साथ एक बाबूनुमा आडिटर के घर पर भी छापा पड़ा जो सच्चा रामभक्त निकला। वह पूरे छपे के दौरान हँसता मुस्कराता रहा जैसे नानक के शब्दों में कह रहा हो कि-
 राम की चिड़ियाँ राम के खेत     
चुग लो चिड़ियाँ भर भर पेट
यह रहस्य बाद में खुला कि वह मामा का भी मामा है। नहीं समझे! अरे भाई अपने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का सगा मामा अर्थात पिता का साला। पहले मामा को मुख्यमंत्री के बंगले पर ही सेवा करने का मौका मिला था जहाँ उसने जरूरत से ज्यादा ही सेवा कर दी थी तो उसे खुला खेत चरने को भेज दिया गया था। इस रामभक्त ने कहा कि मैंने तो अपने मोबाइल की रिंगटोन भी रामजी करेंगे बेड़ा पार डाल रखी है। हमारा कुछ नहीं होगा। उसका अत्मविश्वास देखने लायक था।
      मामा को कुछ व्याकरणाचार्य माँ से जोड़ कर कहते हैं कि इस शब्द में दो मा हैं इसलिए यह दो माँ के बराबर होता है, पर गणित के लोग इसे गलत ठहराते हैं। वे कहते हैं कि दो माइनस मिल कर के प्लस में बदल जाते हैं और परिणाम को उलट देते हैं। किसी शायर ने कहा है-
दो माइनस मिलकर के होता है एक प्लस
जालिम दो बार ही कह दे नहीं नहीं
जब एक ही मामा से पूरा प्रदेश परेशान हो तब फिर मामाओं के भी मामा निकलते जायेंगे तो क्या होगा। पता नहीं अभी कितने मामा और बाकी हैं और उन मामाओं के भी और और मामा बाकी हैं।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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गुरुवार, नवंबर 24, 2011

व्यंग्य - नेता सीना जेल और दर्द






व्यंग्य
                         नेता सीना जेल और दर्द
                                                               वीरेन्द्र जैन
      आजादी के बाद हमारे देश के नेताओं के पास सीने का इकलौता उपयोग है कि जेल जाते समय उसमें दर्द हो सके।
      स्वतंत्रता मिलने के पहले की बात और थी क्योंकि तब स्वतंत्रता संग्राम चल रहा था और इस संग्राम को लड़ने वाले नेता सेनानी माने गये हैं। इन सेनानियों के नाम पर अब हजारों लोग बिना कैंटीन सुविधा के पेंशन जुगाड़ रहे हैं जिनमें से कई तो सच्चे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी हैं। सच्चे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, जिनका सीना जेल जाते समय फूल जाता था, तो इसलिए पेंशन ले रहे हैं ताकि स्वतंत्रता के दौरान बरबाद कर दी अपनी जवानी के बाद उनके पास आय का दूसरा कोई साधन नहीं है, पर झूठे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तो इसलिए पेंशन ले रहे हैं ताकि उससे स्वतंत्रता के मूल्यों को नष्ट कर सकें। वे ही पाँचवें सवार की तरह मौका वक्त माला डलवाने में आगे आगे आगे रहते हैं। इनमें से कई तो आजादी मिलने के समय गोद में ही सू सू करने की उम्र के रहे होंगे।
      स्वतंत्रता संग्राम में सच्चे सेनानियों के सीने गोली इत्यादि खाने के काम भी आते थे इसलिए आन्दोलन में भरती करते समय ठोक बजा कर देखा जाता था कि सीना है कि नहीं। बाद में जब आजादी मिलने के कुछ दिनों बाद तक इस सीने का कोई उपयोग नहीं हुआ तो आशंका होने लगी थी कि मानव की पूंछ की तरह कहीं यह भी विलीन ही न हो जाये। पर ऐसा नहीं हुआ, देर सबेर सीना काम आने लगा। जेल जाने के परिणाम तक पहुँचाने का काम शुरू करने के साथ ही नेता अपने क्षेत्र में अपने पाँव छूने वाला थानेदार और अपनी जाति का डाक्टर पोस्ट कराने लगे। वैसे तो नेता की करतूत पकड़ी ही नहीं जाती पर जब बात हद से गुजर जाती है तो नेता की गिरफ्तारी के साथ ही सीने में दर्द उठता है और डाक्टर डिग्री लेते समय ली गयी शपथ को प्रणाम करके नेता के सीने में दर्द का सार्टिफिकेट पहले से तैयार करके पीछे पीछे पहुँच जाता है। कहता है कि मैं तो इनका फेमिली डाक्टर हूं और मुझे तो पहले से पता था कि जेल जाते समय भैय्याजी के सीने में दर्द उठेगा।
      नेता के सीने का दर्द सामान्य किस्म का दर्द नहीं होता है जो जेल के डाक्टर  समझ सकें। इसके लिए विशिष्ट सुविधाओं वाले अस्पताल और डाक्टर ही जरूरी होते हैं। खग जाने खग ही की भाषा की तरह उनका डाक्टर ही समझता है कि जेल जाने वाले सीने के दर्द की तीव्रता कितनी है और यह कैसे ठीक होगा।  दूसरे डाक्टरों से तो वे दुष्यंत कुमार के एक शेर की तरह कहने लगते हैं-
            सिर से सीने में कभी, पेट से पैरों में कभी
            इक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है
उनकी बातें सुन-सुन कर तो जेल के डाक्टर के सिर में दर्द होने लगता है। नेताजी का अपना डाक्टर आकर उनके सारे रोग ठीक कर देता है। वो ही इंजेक्शन दवाइयाँ लिखता है, वो ही मँगवाता है और वो ही उन्हें इंजेक्शन लगा कर खुद ही दवाइयाँ खिलाता भी है। एक नेता के प्रताप से शरीर का तापक्रम मापक यंत्र से लेकर रक्तचाप बताने वाले यंत्र तक इच्छानुसार परिणाम देने लगते हैं। इस देश के डाक्टर लोगों का इलाज करने से ज्यादा दौलत तो मेडिकल सार्टिफिकेट बना कर पीट रहे हैं। डिग्री से रजिस्ट्रेशन होता है जिसका उपयोग एक लैटरहैड छपवाने के लिए होता है ताकि मरीज द्वारा बताये गये रोग, औषधि और समय के अनुसार उस पर मेडिकल सार्टिफिकेट बना कर रबर स्टाम्प लगायी जा सके। बीस बीस लाख डोनेशन देकर क्या इलाज करने के लिए डिग्रियां लेगा कोई!
      कानून कहता है कि चाहे निन्नावे दोषी छूट जायें पर एक निर्दोष को सजा नहीं होना चाहिए, पर डाक्टरों की कृपा से सौ के सौ प्रतिशत छूट रहे हैं। जो अन्दर हैं वे अस्थायी तौर पर हैं जरा जनता की स्मृति का लोप हो जाये सब बाहर आकर अपने समर्थकों की भीड़ के आगे उंगलियों से वी का निशान बना रहे होंगे, जैसे कि कोई मैच जीत कर आये हों। स्थायी तौर पर तो अन्दर वे ही हैं जिन्हें वहाँ कम से कम रोटी तो मिल रही है बरना बाहर आकर वे अपनी आजादी को कितने दिन चाट चाट कर काम चलाते।
      जेल में जब वीआईपी कैदी आता है तो उत्सव का सा माहौल होता है। जेलर से लेकर स्वीपर तक सब खुश नजर आते हैं। वीआईपी आया है तो जेलर के लिए सौगातें भी आयेंगीं, कैदियों के लिए बीड़ी के बन्डल भी आयेंगे। वीआईपी के लिए घर से आये खाने से दर्जन भर कैदी अपनी रसना को तर कर सकते हैं। वीआईपी के आने से बैरकों में सफाई होती है और खाने के मीनू झाड़ा पौंछा जाने लगता है। कई जगह तो उस फिनायल की महक भी आने लगती है जिसका अभी तक केवल बिल आता था।
      सीने के दर्द वाले नेता को डाक्टर, दबाओं और जाँच रिपोर्टों की जगह अपने वकीलों और जमानत के फैसले की प्रतीक्षा करते देखा जा सकता है। उनके आते ही उनके सीने में उम्मीदों का ज्वारभाटा हिलोरें मारने लगता है। अगर उसी समय डाक्टर आ जाये तो वे उसे बाहर बैठने के लिये कह सकते हैं।
      जेल जाते हुए वीआईपी नेता के सीने में दर्द का वही वैसा ही रिश्ता होता है जैसा पहली बार ससुराल जाती हुयी लड़की का आँसुओं से होता है। वैसे लड़कियों के आंसू तो कई बार असली भी होते हैं।
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, अप्रैल 11, 2011

व्यंग्य - चट्टों बट्टॉं में आखिर कौन किसके खिलाफ है


व्यंग्य
चट्टों- बट्टों में आखिर कौन किसके खिलाफ है
वीरेन्द्र जैन
पिछले दिनों दिल्ली के जंतर मंतर पर अनशन अनशन खेला गया। जिन दिनों दिल्ली में राम लीला खेली जाती है उन्हीं दिनों दूसरे नगरों में भी रामलीला रामलीला चलती है। जिधर देखो उधर हनुमानजी पूँछ उठाये लंका में आग लगाते फिरते हैं सो देश के दूसरे नगरों में भी अनशन अनशन खेला गया। हम भी अनशन पर तुम भी अनशन पर। ये भी अगर लोकपाल विधेयक पास कराना चाहते हैं तो वो भी लोकपाल विधेयक पास कराना चाहते हैं। समझ में नहीं आ रहा कि जब सभी साहुकार हैं तो चोर कौन है।
“वैसे तुम पास कराना चाहते हो तो तब क्यों नहीं करा लिया जब तुम्हारी सरकार थी”
“पर तुम्हारी तो अब है तुम्हीं पास करा लो”

“ तुम बिल तो लाओ”
“तुम समर्थन दोगे?”
“ हाँ देंगे, क्योंकि तुम्हारे लोग पकड़े जायेंगे तो हमें राजनीतिक लाभ मिलेगा”
“ पर जब बिल आयेगा तो तुम्हारे कौन से बचे रहेंगे। येदुरप्पा की अम्मा कब तक खैर मनायेगी। मध्य प्रदेश में 14 मंत्रियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज है उन्हें कब तक बचाओगे! टूजी की जाँच का दायरा 2001 से इसीलिए शुरू किया गया है कि हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे। पंजाब में जब अकालियों का काल आयेगा तो तेरा क्या होगा कालिया? राजस्थान में झक मार कर वसुन्धरा को ही विपक्ष की नेता बनाना पड़ा है वरना संघ परिवार को जमीनें देने की जो जाँच चल रही है वो उसका कच्चा चिट्ठा खोल देतीं।“
“ हमारी चिंता छोड़ो, तुम अपनी करो अभी तो जो कुछ चल रहा है वह तुम्हारे खिलाफ जा रहा है, हमारे यहाँ ऊपर से लेकर नीचे तक वकील ही वकील भरे हैं, वे ऐसे पेंच निकालेंगे कि बिल का विरोध करके भी पाक साफ कहलाएंगे। कमेटी के सदस्यों के नाम पर ही झगड़ा शुरू करवा देंगे।”
“हमने तो सारी माँगें मानने का ढोंग पहले ही कर दिया है जिससे यह सन्देश गया है कि हम तो डिटर्जेंट मिले दूध के धुले हैं। विधानसभा के चुनाव निबट जाने दो फिर हमारे यहाँ भी कौन से वकीलों की कमी है।“
“ वैसे तो ये अन्ना भी है जोरदार आदमी, इसने मशाल पकड़ने को उतारू हो रहे हाथों में मोमबत्तियां पकड़ा दीं” “ और बाबा राम देव उन्हें अगरबत्तियां पकड़ा देंगे।“
“ क्या इस अनशन से कोई भ्रष्टाचारी भी डरा? क्या किसी विभाग के अधिकारी ने यह कहा कि मुझे रिश्वत नहीं चाहिए मैं अब बिना रिश्वत के ही काम कर दूंगा। क्या किसी मंत्री ने ठेकेदार और उद्योगपतियों से ब्रीफकेस लेने से मना कर दिया? क्या किसी ने किसी को पकड़वाया। क्या किसी ने शिकायतें कीं! क्या किसी का ह्रदय परिवर्तन हुआ और उसने आगे आकर अपना भ्रष्टाचार कबूलते हुए अपने स्विस बैंक में जमा की सूची दी?”
“ किसी ने कुछ नहीं किया, सबने मोमबत्तियां जलायीं और शाम को देवी के मन्दिर में जाकर पुजारी को बतलाया कि नवरात्रि पर मैंने दो दिन का उपवास किया। एक पंथ दो काज। ऊपर वालों को गाली देना बहुत आसान होता है, सब कुछ अमूर्तन में चला जाता है, पर किसी ने स्थानीय भ्रष्टाचारियों की सूची नहीं बनायी। किसी के पास भी अपने विधायक सांसद की बेनामी सम्पत्ति की सूची नहीं है।“
मशालों को मोमबत्ती में बदल दिया गया मोमबत्तियों को अगरबत्तियों में बदल दिया जायेगा जो दो चार मिनिट में राख में बदल जायेगी।
मिरी सरकार ने वादा किया है पाँचवें दिन का
किसी से सुन लिया होगा, ये अनशन चार दिन का है



वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, सितंबर 10, 2010

व्यंग्य- मनमोहिनी राष्ट्रीय पर्व


व्यंग्य
मनमोहिनी राष्ट्रीय पर्व
वीरेन्द्र जैन
शेक्सपियर ने कहा था- आई डू नाट फालो इंगलिश, इंगलिश फालोस मी अर्थात मैं अंग्रेजी का अनुशरण नहीं करता अंग्रेजी मेरा अनुशरण करती है।
हिन्दी के साहित्यकार समझते हों या न समझते हों किंतु हमारे देश के नेता भाषा को ऐसी ही चेरी समझते हैं। आदरणीय अडवाणी जी डीसीएम टोयटा को रथ कहते हैं, तो संघ परिवार स्कूलों को मन्दिर का नाम देती है- सरस्वती शिशु मन्दिर- तय है कि मन्दिरों में कोई मस्जिद वाला तो जायेगा नहीं सो अपने आप ही बँटवारा हो गया। अब हमारे [कांग्रेस]जन प्रिय प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह जी भी कम थोड़े ही हैं सो वे कामन वैल्थ गेम्स को राष्ट्रीय पर्व कहते हैं तो क्या गलत कहते हैं, आखिरकार हैं तो वर्ल्ड बैंक के पूर्व कर्मचारी।
हमारे यहाँ तो छोटे से छोटा मजदूर भी पर्व त्योहार जरूर मनाता है भले ही उधार लेकर मनाये। वह और दिन पेट काट लेगा पर कहेगा- वा साब तेहार तो मनाना ही पड़ता है। छोटे आदमी का छोटा त्योहार सौ पचास रुपये में निबट जाता है पर वर्ल्ड बैंक वाले मनमोहनजी का राष्ट्रीय पर्व तो एक लाख करोड़ में ही मन पायेगा। आप ठीक से पढ रहे हैं न एक......लाख.....करोड़..। आशिक का जनाजा है जरा धूम से निकले। कंजूस चीन ने बीस हजार करोड़ में ओलम्पिक करा लिये थे पर हमारे यहाँ एक लाख करोड़ में कामन वैल्थ गेम्स हो रहे हैं जो उन देशों का समूह है जो कभी अंग्रेजों के गुलाम थे। यह ऐसा ही है जैसे कभी जेल में साथ रहे कैदी अपना सम्मेलन करें। ब्रिट्रेन ने भी बहुत उदारता दिखाते हुये अपने ओलम्पिक 72000 करोड़ में निबटा लिये थे जिनमें 11000 खिलाड़ियों ने भाग लिया था जबकि हमारे कामन वैल्थ गेम्स में तो कुल 72 देश और दो हजार खिलाड़ी ही भाग ले रहे हैं।
जब इसके मेडल बाँटे जायेंगे तो हमें खेल में भले ही मेडल न मिलें पर खेल की तैय्यारियों में किये गये भ्रष्टाचार के लिए जरूर ही सबसे ज्यादा मेडल मिलेंगें। कैसे कैसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं हमारे कर्ता धर्ता कि एक एक आदमी तीन तीन नामों से लूट रहा था। पहलवान तो डोपिंग टेस्ट में फँस गये अब कौन कहाँ कहाँ फँसा है यह बाद में पता लगायेंगे। एक खेल होना चाहिए कामन वैल्थ तैयारी गेम जिसमें दिल्ली से पशु भगाओ प्रतियोगिता हो, भिखारी भगाओ प्रतियोगिता हो, झुग्गी बस्ती उजाड़ो प्रतियोगिता हो। इससे बिल्डरों को बहुत सुविधा होगी। उजड़ी झुग्गी दुबारा तो बनने नहीं देंगे। रहमान को इसका संगीत रचने के लिए छह करोड़ दिये गये हैं तो मोदी के बाइब्रेंट गुजरात के ब्रांड एम्बेसडर अमिताभ बच्चन और समाजवादी पूर्व सांसद जया बच्चन की बहू ऐश्वर्या राय को प्रमोशन के लिए कई कई करोड़ दिये जायेंगे। राम नाम की लूट है लूट सके सो लूट अंत काल पछतायेगा जब पोस्ट जायेगी छूट। दनादन कंडोम ढाले जा रहे हैं, दुनिया भर से आने वाली काल गर्लों के लिए पलक पाँवड़े बिछाये जा रहे हैं, आखिर विदेशी मेहमान जो आने हैं। यह अलग बात है कि हम जनता को सड़ता हुआ गेंहूं भी मुफ्त नहीं दे सकते, पीने को साफ पानी नहीं दे सकते, निरक्षरों को साक्षर नहीं बना सकते सफाई स्वास्थ आदि की बातें तो जाने ही दीजिए। यह भीष्म साहनी की कहानी चीफ की दावत की तरह हो रहा है जिसमें चीफ के स्वागत के लिए पूरे घर और घर वालों को सजाया संवारा जाता है पर बूढी माँ को घर की एक कोठरी में बन्द कर दिया जाता है, आखिर चीफ को कुछ भी असुन्दर नहीं दिखना चाहिए।

वीरेन्द्र जैन
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