रविवार, अप्रैल 12, 2009

अपनी अपनी छातियाँ

व्यंग्य
छाती पर रोड रौलर
वीरेन्द्र जैन
मुझे भी तब बहुत खुशी होती है जब कोई मेरे दुशमनों को गाली देता है या चुनौती देता है। अगर उनके बीच में मारपीट हो जाये तो मुझे और भी सुख मिलता है। मेरी ही क्या सारी दुनिया के कायरों की इसी कमजाोरी का लाभ बहुत से बयान बहादुर उठाते रहते हैं। जिन्हें मुझसे काम निकालना होता है वे पहले मेरे दुशमन तलाशते हेैं और फिर मेरी उपस्थिति में उसे भला बुरा कहते हुये चुनौती देते हैं। बस इतने से ही उनका काम बन जाता है। लालू परसाद जी ने भी चुनाव के पवित्र महीने में इसी एक बयान से अपने दोनों जहाँ साध लिये हेैं। वरूण के बयान से जिनकी छाती पर साँप लोट रहा था और अपनी अल्पसंख्यक होने की मजबूरी में मन मसोस कर रह जाते थे वे पड़ोसी से मालूम करने लगे हैं कि लालूप्रसाद का चुनावचिन्ह लालटेन ही है न।
अंग्रेजी में कहावत है कि अगर इच्छाएं घोड़े होतीं तो मूर्ख भी उन पर सवारी करते। पर मैं इससे आगे कहना चाहता हूँ कि अगर इच्छाएं घोड़े होती तो समझदार उन्हें रेस के मैदान में ले जाते और सरपट दौड़ाते। पर वे घोड़े तो छोड़िये खच्चर भी नहीं होतीं और पिंजरों के पक्षियों की तरह पिंजरों में ही फड़फड़ाती रहती हैं।
लालू जी ने कहा हेै कि अगर वे गृहमंत्री होते तो(!) वरूण गांधी की छाती पर रौडरौलर चलवा देते। उनके इस बयान में गृहमंत्री होने की पहली शर्त पर कई लोग हँसे और घन्टों तक हँसते रहे। जिनकी स्मृति का लोप नहीं हुआ है उन्हें याद होगा कि कभी लालूजी यूपीए सरकार के गठन के समय गृहमंत्री बनने के लिए अड़े थे जिससे समझौते में कम से कम रेल तो ले ही गिरे थे व उनके पुराने दुशमन व नये मित्रराम विलास पासवान टपियाते रह गये थे वे तभी से छाती पर पत्थर रखे हुये हैं। रेल का बिहार से पुराना सम्बंध है। बाबू जगजीवनराम से लेकर नीतीश कुमार रामविलास पासवान और लालू सभी रेल पर सवार हुये हैं।
रेल अपने स्टेशन से दूर तक ले जा सकती है पर किसी की छाती पर चढाई नहीं जा सकती, कोई अपने आप ही सामने आ जाये तो आ जाये। छाती पर चढाने के लिए बस कार ट्रक आदि चाहिये होते हेैं। वैसे भी मैनेजमेंट गुरू सिखाते ही हैं कि सोचो तो बड़ा सोचो सो छाती पर चढाने के लिए डम्पर रोडरौलर आदि भारी भरकम होते हेैं। डम्पर तो एक राज्य के मुख्यमंत्री से जुड़ गया इसलिए नये मैनेजमेंट गुरू को रोडरौलर ही उपयुक्त लगा होगा। 'वचने किं दरिद्रताम्' जैसा कुछ है।
पता नहीं लालू जी ने छाती पर रोडरौलर चलाने के लिए गृहमंत्री होने की शर्त क्यों रखी। इसमें एक संदेश तो यह है कि जो अभी गृहमंत्री है वह नाकारा है और जब तक लालूजी को गृहमंत्रालय नहीं मिलता तब तक साम्प्रदायिक लफंगे ऐसे ही देश की छाती पर मूंग दलते रहेंगे। वैसे लालूजी से पहले बहिन मायावती ने भी कुछ अस्पष्ट शब्दों में नारा लगाया ही था कि ''चढ गुंडों की छाती पर मुहर लगाना हाथी पर''। वैसे भी हाथी इतना ऊॅंचा होता कि उस पर सवार होने के लिए कहीं न कहीं तो चढना ही पड़ेगा।अब ये बात अलग है कि वे स्वयं ही गुन्डों की छाती पर चढने की जगह उनके कंघों पर सवार होकर प्रधानमंत्री पद की कुर्सी पर पहुंचने का प्रयास कर रही हैं। कहने को तो कभी पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी कह दिया था कि सारे भष्टाचारियों और ब्लैकमार्केट करने वालों को बिजली के खंभों पर लटकवा देना चाहिये पर वो जमाना दूसरा था।
परेशानी तो बेचारे प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी लालकृष्ण आडवाणीजी की है भावी संभावनाओं को देखते हुये बेचारे छाती ठोक कर कुछ कह भी नहीं पाते। चुनाव के बाद न जाने किसका हाथ मांगने जाना पड़े। अगर अभी विरोध मोल ले लेंगे तो कल के रोज कौन सा मुखौटा लगा कर जायेंगे! जिन्दगी का आखिरी चुनाव और आाखिरी मौका है और हर तरफ से हालात दिन प्रति दिन खराब होने की रिपोटर्ें आ रही हैं। अगर अभी लालू और बहिन मायावती से बुराई ले ली तो बाद में क्या करेंगे। रामजी को भी इतने दिन से खुले में छोड़ रखा है सो उनसे भी कोई उम्मीद नहीं है। हे राम!
नेताओं पर सरे आम जूतेबाजी होने लगी है। लालूजी को शायद अब समझ में आ गया होगा कि अगर गृहमंत्री होते तो और क्या क्या संभावनाएं थीं।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

3 टिप्‍पणियां:

  1. aapka kehna bilkul saahi hai...
    lekin ye bhi sach hai ki chhati to sab thokh rahe hain...
    dam kisi me bhi nahi hai..
    sab fate hue dhol hain....

    robinrajonline.blogspot.com

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  2. ape apngy es bayng kay madhayam say apsar badi netaw per bayan kar samaj ko desha detay rahay gay, ape kay aglay ank ka entjar ho ga.
    pradeep kushwaha BHOPAL

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