बुधवार, सितंबर 23, 2009

व्यंग्य - परमेश्वर की रिपोर्ट

व्यंग्य
परमेश्वर की रिपोर्ट
वीरेन्द्र जैन
''थानेदार साब कहां हैं?'' एक महिला ने थाने में प्रवेश करने के बाद कुर्सी पर बैठे हुये हैड कानिस्टबिल से पूछा।
''वे काम से गये हैं, कहिये आपको क्या काम है?'' कानिस्टबिल बोला।
''मुझे रिपोर्ट लिखानी है'' महिला ने कठोर स्वर में कहा।
''क्या हुआ है, किसके खिलाफ रिपोर्ट लिखाना है?'' कानिस्टबिल ने उसे कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुये कहा।
''परमेश्वर के खिलाफ लिखाना है'' महिला बोली।
कानिस्टबिल समझ नहीं पाया कि वह व्यक्तिवाचक संज्ञा का प्रयोग कर रही है या जातिवाचक संज्ञा का। उसने पूछा-''ये कौन हैं? कहां रहते हैं?और आपका इनसे क्या रिश्ता है?''
''ये पुरूष हैं, घर में रहते हैं और मेरे पति लगते हैं'' वह बोली
''पूरा नाम बताइये, परमेश्वर दास, या परमेश्वर सिंह, व उसके आगे क्या लगाते हें , मेरा मतलब जाति से है'' कानिस्टबिल ने पुलिसिया मनोविज्ञान के अनुसार सामने वाले को तोड़ने के लिये उपयुक्त कठोर स्वर का प्रयोग किया।
''देखिये मेरे पति का नाम तो आरबी यानि राम भरोसे शुक्ला है पर वे हमारे पति परमेश्वर हैं इसलिये मैं कह रही थी कि परमेश्वर के खिलाफ रिपोर्ट लिखाना है''
कानिस्टबिल ने महिला को घूर कर देखा और पूछा-''क्या शिकायत है तुम्हें उन से?''
''जी रात में उन्होंने मुझे जोर से डांटा, मूर्ख और गंवार कहा, मेरी शिक्षा को बेकार बतलाया जिससे मुझे बहुत मानसिक आघात पहुंचा। में रात भर रोती रही। सुबह मेरी पड़ोसिन ने बतलाया कि नया कानून लागू हो गया है जिसके अनुसार जोर से बोलने और डांटने पर भी रिपोर्ट लिखायी जा सकती है। मैं तो रात भर सो भी नहीं सकी और पड़ोसिन कह रही थी कि यह भी लिखा देना कि आत्महत्या करने का मन हुआ।''
''आखिर ऐसा तुम्हारे पति ने क्यों किया, क्या दहेज प्रताड़ना का मामला है?''
''नहीं दीवानजी ऐसा कुछ नहीं है। बात असल में ये है कि कल करवा चौथ थी सो मैंने सारे दिन उपवास रखा और शाम को परमेश्वर की प्रतीक्षा करने लगी ताकि उनकी पूजा करके व्रत तोड़ूं। पर वे जाने कहां कहां के कामों में फंसे रहते हैं सो देर से लौटे। और जब मैंने शिकायत के साथ पूजा के लिये कहा तो डांटने लगे और मुझे मूर्ख व दकियानूस बताने लगे। बिना पूजा कराये मेरा व्रत तुड़वा दिया व खाना खाकर सो गये। बस मैंने सोच लिया कि इन्हें सबक सिखा कर रहूंगी।''
''मैं अभी साले को पकड़ कर लाता हूं और घर से ही जूते मारता हुआ लाउंगा'' कानिस्टबिल बोला।
'' नहीं नहीं, ऐसा न करना दीवानजी। आप तो केवल इतना ही समझा दें कि जब मैं जैसा कहूं वे वैसा ही आचरण करते रहें- बस!''
कानिस्टबिल की समझ में सब आ गया। उसने अन्दर ले जाकर उसके बयान लिये और आश्वस्त किया कि पति की रिपोर्ट बताने के लिये कभी भी चली आया करे, वो उसके पति को ठीक कर देगा। हां अपनी पड़ोसिन को भेज दे ताकि थानेदार साब उसकी गवाही ले सकें
महिला की समझ में आ गया था कि कानून की मदद से घर के बाहर निकल कर 'घरेलू' हिंसा से मुक्ति पायी जा सकती है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र फ़ोन 9425674629

3 टिप्‍पणियां:

  1. जैन साहब,
    बहुत ही बढि़या लगी आपकी ये चिकोटी। बिलकुल नाम के अनुरूप। व्‍यंग्‍य की धार तेज होने के बाद भी लगती एकदम चिकोटी की तरह ही। थाने में महिला के होने का आशय है रेगिस्‍तान में पानी का मिलना। बधाई एक बेहतर कोशिश के लिए
    डॉ महेश परिमल

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