मंगलवार, सितंबर 29, 2009

भ्रष्टाचार को जड़ से ख़त्म करने का दर्शन

व्यंग्य
भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने का र्दशन
वीरेन्द्र जैन
हमारे कानून मंत्री ने कहा है कि भ्रष्टाचार का जड़ से खात्मा जरूरी है। वे भ्रष्टाचार से जुड़े अपराधों पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार में बोल रहे थे। मैंने बहुत खोज की पर कोई भी ऐसा नहीं मिला जो उनसे असहमत हो। उनके धुर विरोधियों ने भी उनके बयान के बाद यह नहीं कहा कि भ्रष्टाचार को पत्तियों से, या फलों से या तने से खत्म करके अपना काम चलाना चाहिये। भ्रष्ट से भ्रष्ट व्यक्ति ने भी यही कहा कि अगर जड़ से खत्म हो तो हम सबसे आगे हैं। करो न भाई जड़ से खत्म करो और अगर जनता को बता दो कि भ्रष्टाचार की जड़ कहाँ पर है तो वो भी थोड़ा बहुत मट्ठा उसमें डालने की कोशिश करेगी। राष्ट्रीय सुरक्षा कोष की तरह पूरे देश में से मट्ठा एकत्रित कर भ्रष्टाचार की जड़ों में डलवाया जा सकता है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री टीवी पर राष्ट्र के नाम संदेश दे सकते हैं ।
प्यारे देश वासियो, मैलाओ(महिलाओ), और बच्चो,
आज बहुत खुशी की गल्ल(बात) है कि हमारे देश में भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने का विचार बना है। इस महायज्ञ में हम सबको आहुति देनी है इसलिए आप सब अपने अपने घर से यथा सम्भव मट्ठा लेकर प्रधानमंत्री कोष में जमा करवायें ताकि हम भ्रष्टाचार की जड़ों में डाल कर उसको जड़ से खत्म कर सकें। ध्यान रखें कि मट्ठा शुद्ध दूध से जमाये दही से निकाला गया हो।
प्रधानमंत्री आमने सामने होते तो जनता पूछती कि मट्ठा तो हम दे दें पर आप हमें भ्रष्टाचार की जड़ तो बता दो हम खुद ही डाल देंगे। दरअसल जनता को सरकार पर भरोसा नहीं है कि वह उसका दिया मट्ठा भ्रष्टाचार की जड़ों में डालेगी या धर ले जाकर कड़ी बनायेगी।
बस यही वह बिन्दु है जहाँ से दार्शनिक चिंतन प्रारंभ होता है, जिसका मतलब होता है कि बस चिंतन चिंतन करते रहो और किसी निष्कर्ष पर न खुद पँहुचो और ना ही किसी को पहँचने दो। दार्ाशनिक कहते हैं कि इस दुनिया में दो तरह के पदार्थ होते हैं एक जड़ तो दूसरा चेतन किंतु भ्रष्टाचार के मामले में देखा गया है कि जितना भी भ्रष्टाचार होता है वह सब चेतन ही करते हैं जड़ नहीं करते। जड़ तो केवल भ्रष्टाचार का माध्यम बनता है। मुद्राएं चाहे धातु की हों या कागज की हों वे ही भ्रष्टाचार का माध्यम बनती हैं। किंतु हमारी संस्कृति में उन्हें भी लक्ष्मी कहा गया है और चंचला कह कर उनकी दिशाहीन गति की ओर फिसलती रहने वाली माना गया है। फिर जड़ क्या है? यह शाश्वत चिंतन का विषय है।
पर कानून मंत्री को र्दशन से कोई मतलब नहीं है वे तो कानूनी भाषा में जड़ जिसे मूल कहा जाता है, वहाँ से सम्बंध जोड़ रहे थे। बीज जब अंकुरित होता है तो उसकी दो दिशाएं होती हैं एक तरफ उसका विकास नीचे की तरफ होता है तो दूसरी तरफ ऊपर की तरफ जिसे तना कहा जाता है जिसमें बाद में पत्तियां फूल व फल लगते हैं। फूल व फल तोड़ लिए जाते हैं पत्तियां झड़ जाती हैं और तना ठूंठ सा अपनी शाखाएं चारों ओर लगाये खड़ा रहता है पर ऐसे में भी जड़ें अपना काम निरंतर करती रहती हैं। वे नीचे की तरफ चुपचाप गति करती रहती हैं और अपना जाल फैलाते रहने के साथ तने को ताकत पहुँचाती रहती हैं। उनका आशय ऐसी ही जड़ों से रहा होगा। वे वहीं पर मट्ठा डालकर खत्म कर देना चाहते हैं- न होगा बांस न बजेगी बांसुरी।
पर सवाल यह है कि जड़ कहाँ है? किससे पूछूँ? सुखराम से पूछ कर उनके सुख में दखल देना नहीं चाहता तो क्या अमरेन्दर सिंह से पूछूँ या प्रकाश सिंह बादल के उत्तराधिकारी सुखवीर से पूछूँ? लालू प्रसाद से पूछूँ या शिबू सोरेन से पूछूं? जार्ज से पूछूं या जया जेटली से पूछूँ? शरद पवार से पूछना क्या ठीक रहेगा? डालर पसंद करने वाले बंगारू लक्ष्मण से पूछूं या पैसे को खुदा मानने वाले जूदेवों से पूछूं? अमरसिंह बीमार हैं और सचमुच में हैं ऐसे में ऐसे सवाल पूछना ठीक नहीं है? संसद में सवाल पूछने वालों से पूछूँ या सांसद निधि स्वीकृत करने वालों से पूछूं। कबूतरबाजी करने वालों से पूछूं या अविश्वास प्रस्ताव पर बीमार हो जाने वालों से पूछूं? तेलगी से पूछूं या राजू से पूछूं? शंकराचार्यों से पूछूँ या काले पैसे को सफेद करने वाले जादूगर बाबाओं से पूछूं? शेयर घोटाला करने वालों से पूछूं या नकली नोट बनाने वालों से? जब जिन्दा लोगों से नहीं पूछ पा रहे हैं तो मर जाने वालों से वैसे भी कुछ नहीं पूछा जाता बरना प्रमोद महाजन से पूछा जा सकता था। अजहरूद्दीन ने अब क्रिकेट खेलना छोड़ दिया है और अब उस क्षेत्र के बारे में बात भी नहीं करना चाहते बरना उनसे पूछता! फिर फिल्म वाले तो किसी को कुछ नहीं बताते कहते हैं कि हमारे क्षेत्र में तो सब कुछ गॉसिप पर चलता है। अफसरों से पूछूं या ठेकेदारों से पूछूं? सप्लायरों से पूछूँ या डुप्लीकेटरों से पूछूं? मध्यप्रदेश के मंत्रियों, भूतपूर्व मंत्रियों से पूछूँ या जन्मदिन मनाने वाली मायावती से पूछूं? जमाखोरों से पूछूं या मुनाफाखोरों से पूछूं? कहाँ जाऊँ किससे पूछूँ?
हे जड़ो! तुम कहाँ हो? हम लोग मट्ठा लिये खड़े हैं, कोई तो बतलाये कि कहाँ डालें? भारत के गड़े खजानों में डालें या स्विस बैंक में डालें? कोई भी कुछ नहीं बता रहा। और ठीक इसी अवस्था को र्दशन और इसे अपनाने वाले को दार्शनिक कहा जाने लगता है। जिसे कोई उत्तर नहीं मिलता कहीं से वह दार्शनिक होने लगता है। यदि जनता को इसी तरह मट्ठा लिये हुये बहुत देर हो गयी तो हो सकता है कि वह इस उम्मीद में बयान देने वालों के मुँह में ही मट्ठा डालने लगे कि शायद जड़ों तक पहुँच जाये।

3 टिप्‍पणियां:

  1. सबसे पहले मट्ठा अपने मन में डालना चाहिये , मट्ठा लेकर घूमने वालों को । जब तक नियम तोडने के लिये जेब की गरमी दिखाने वाले लोग रहेंगे , कुछ होनेवाला नहीं ।

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  2. बहुत सटीक कटाक्ष किया है. काश!! जड़ मिल पाती!!

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  3. वाह, वीरेंद्र जी बहुत खूब....वो लोग भ्रष्टाचार की जड़ ढूढ़ने चले है, जो उसी पेड़ का फल फूल खा कर बड़े हुए है..
    बढ़िया कटाक्ष..धन्यवाद!!!

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