बुधवार, मई 26, 2010

व्यंग्य आर्ट आफ स्लीपिंग


व्यंग्य
आर्ट ऑफ स्लीपिंग
वीरेन्द्र जैन


मैं आर्ट ऑफ स्लीपिंग सिखाना चाहता हूं।
जो आदमी बड़ा नहीं बन पाता वह बड़े आदमियों के आस पास रहकर सुख पाता है। मुझे लोगों को यह बताने में बहुत सुख मिलता है कि कुछ आईएएस अधिकारी मेरे मित्र रहे हैं। बांटनहारे को मेंहदी के रंग लग जाने की लालसा में निरंतर मेंहदी बांटता रहता हूं। अगर आप मेरी इस मित्रता से प्रभावित हो रहे हों तो आपको आगे बताऊं कि ऐसे ही एक आईएएस अधिकारी का फोन आया और उसने पूछा- '' तुम सुबह कितने बजे उठ जाते हो ? ''
'' साढ़े पॉच बजे '' मैने उत्तर दिया।
'' इतने सुबह उठ कर क्या करते हों ''
'' रक्त की शक्कर कम करके जिन्दगी में मिठास घोलने की कोशिश करता हूं- आदेश करें। मैं सुबह घूमने जाता हूं।''
'' एक अच्छी जगह चलोगे ''
'' अगर कोई ले चलने वाला हो तो मैं खराब जगह भी चलने को तैयार हूं। ''
'' गोद में थोड़े ही जाओगे। गाड़ी में बैठ जाना और चले चलना ''
'' पर, बाइ-द-वे चलना कहॉ है ''
'' आर्ट ऑफ लिविंग के क्लास में ''
'' तुम इतने बड़े अधिकारी हो गये और तुम्हें जीना भी नहीं आता। वह भी 'सीख' रहे हो।''
'' जीना तो कुत्ते बिल्ली शेर चीते सांप तितली सब को आता है पर हमारे बड़े मंत्री भी सीख रहे हैं सो सारे अधिकारी भी सीखने लगे हैं ''
'' चलो मुफ्त में मिल जाये तो चन्दन घिस लेने में क्या बुराई है! और वह भी मंत्री के सान्निध्य में'' मुझे संतोष हुआ।. बड़े लोगों के निकट चिपकने का सुख अकेले मैं ही नहीं लूटना चाहता हूँ, ये बड़े अधिकारी भी इसी रोग का शिकार है।
'' मुफ्त का नहीं है महानुभाव, पन्द्रह सौ रूपया फीस है तीन दिन के कोर्स की ''
'' मर गये, अगर मेरे पास इतना पैसा फालतू होता तो मैं अकेले क्या सैकड़ों लोगों को काजू वाले बिस्कुट खिला कर उन्हें जीने का तरीका सिखा देता- क्या टीवी के विज्ञापनों से लोग कुछ नही सीखते?
'' तो तुम नही चलोगे ''
'' इस कीमत पर चलना तो मेरे बूते के बाहर है ''

इस बातचीत के बाद मुझे लगा कि इस दुनिया में जिनके पास पैसा है वे कुछ भी नहीं जानते, और उन्हें कुछ भी सिखाया जा सकता है। यही कारण है कि मैं अब 'आर्ट ऑफ स्लीपिंग'' सिखाना चाहता हूं। केवल ग्यारह हजार रूपये की मामूली राशि पर।
सोना एक कला है, जिसे सीखकर ही जाना जा सकता है। नवजात शिशु नहीं जानता, इसलिए दिन में तेइस घंटे सोता रहता है। बूढे लोग भी नहीं जानते इसलिए सुबह चार बजे से ही ''राम-राम'' करने लगते हैं। मजदूर लोग नहीं जानते इसलिए वे सोते नहीं लस्त पस्त होकर गिर पड़ते हैं। पर मैं इनमें से किसी को भी आर्ट ऑफ स्लीपिंग सिखाने नहीं जा रहा हूं ।
यह कला तो मैं आपको सिखाऊंगा। आप जैसे लोग, अर्थात वे जिनकी जेब में ग्यारह हजार रूपयें हैं। जेब में न होंगे, तो सेफ में होगे। और अगर एक नम्बर के हैं तो बैंक में होंगे। और यही पैसा तो आपको सोने नहीं देता। जब इसे आप मेरे यहॉ जमा कराके रसीद जेब में रख लेंगे तो बहुत चैन की नींद आना प्रारम्भ हो जायेगी।
इतना ही नहीं मैं सिखाऊंगा भी आपको। पहले जरा सिर के बाल मुढवा लूं। बाल मुढवाने से ललाट की चौड़ाई बढ़ जाती है और आदमी पहुँचा हुआ नजर आने लगता है, फले ही वह कहीं भी पहुँचा हुआ न हो। पहुँचे हुऐ लोगों की बात सुनने की परम्परा है। और पहुँचा हुआ दिखने के लिए पोषाक होती है। पैन्ट कोट वालों की बातें बाहर ही रह जाती हैं किन्तु धोती बांधने वालों की बातें हवा की तरह भीतर तक जाती है इसलिए धोती पहनने की आदत तो डाल लूं। थोड़ा त्यागी जैसा भी दिखने लगूंगा। लोगों को त्यागी आदमी को पैसा देने में बड़ा सुख मिलता है। बड़ी बड़ी सम्पत्ति वाले आश्रम के बाबा लोग त्याग का बड़ा ढोंग करते हैं और पैसे के प्रति निरपेक्ष दिखने की कोशिश करते हैं पर रात दस बजे के बाद सेक्रेटरी से पूंछते है कि वो झांसी वाला सेठ कितने पैसे दान कर गया।
मेरे भाषण का प्रारूप कुछ कुछ ऐसा होगा। सुनिये!
सोने के लिए लम्बे होकर लेट जाना चाहिए। लेटने के लिए चारपाई, तखत, या सिंगल अथवा डबल बैड, जैसी भी पारिवारिक स्थिति हो, का प्रयोग कर सकते हैं। भक्तो! सोने के इन उपकरणों को पहले जॉच लेना चाहिए कि इनमें कहीं खटमल तो नहीं हैं। फिर इनके ऊपर एक दरी बिछाना चाहिए। दरी पर गद्दा बिछाना चाहिए और उस गद्दे पर चादर बिछाना चाहिए। एक चादर ओढ़ने के लिए रख लेना चाहिए। मच्छरों से बचने के लिए आम तौर पर सोने वाला व्यक्ति मच्छर काटने वाले स्थान पर जोर का हाथ मारता है, ताकि मच्छर को हमेशा के लिए चैन की नींद सुला दे पर हथेली की हवा लगते ही मच्छर उड़ जाता है, तमाचा सोने वाले के शरीर पर ही पड़ता है। ऐसे चांटे खाते रहने से आदमी की नीद टूटती है इसलिए किसी देवता के आगे आप भले ही अगरबत्ती न लगाते हों किंतु कमरे में मच्छर अगरबत्ती या वाष्पीकृत होने वाले द्रव्य को बिजली के स्विच में लगाकर रख देना चाहिए। स्विच को आन कर देना चाहिए। किंतु यह तभी काम करेगा जब बिजली आ रही हो। कुछ लोग मच्छरदानी का प्रयोग भी करते हैं पर कभी कभी रात्रि में लघुशका करते समय भी उसे साथ लपेटे हुये उठ जाते हैं जिससे उनका हवा महल धाराशायी हो जाता है। वे जिन निद्रा देवी की गोद में लेटे होते हैं उन देवी की नींद भी टूट जाती है। यह स्थिति बाहर प्रतीक्षा कर रहे मच्छरों को सुविधा प्रदान करती है। इसलिए मच्छरों से बच कर सोना आर्ट आफ स्लीपिंग का महत्वपूर्ण पार्ट है।
सिर के नीचे तकिया लगाना चाहिए इससे पता चलता है कि सोये हुए आदमी का सिर किस तरफ है, मान लो रात्रि में कोई आपके पैर छूना चाहे तो गलती से सिर न छू ले। यही धोखा आपका गला काटने वाले को भी हो सकता है। गर्मी में पंखा, कूलर, या एसी क़ा प्रयोग किया जा सकता है और सर्दी में हीटर और रज़ाई का।

पर अच्छी नींद होने के लिए अच्छी कंपनी की गोली खाना चाहिऐ। गोली को अंगूठा और अनामिका में पकड़ कर मुंह के अन्दर ले जाना चाहिए और फिर तुरंत ही गिलास से पानी पी लेना चाहिए। जैसे ही गोली के अन्दर जाने का अहसास हो तो- गई - के अन्दाज में सिर हिलाकर संतोष करना चाहिए और इस विश्वास के साथ लेट जाना कि अब अच्छी नींद आयेगी। विश्वासं फल दायकं।

सोने से पहले नींद के आराध्य देव का स्मरण करना चाहिये। आप सब जानते ही होगे कि नींद के आराध्यदेव कौन हैं। यदि नहीं जानते तो जान लीजिए कि नींद के आराध्य देव आचार्य कुम्भकरण हैं। जो लोग भी कुम्भकरण महाराज की प्रार्थना करके सोते हैं उन्हें अच्छी नींद आती है। कुम्भकरण महाराज किसकी प्रार्थना करके सोते थे यह अभी खोज का विषय है। सोने के मामले में शेष शैया पर सोने वाले विष्णु जी को भी उदाहरण् के बतौर लिया जा सकता है जो लक्ष्मी जी से पैर दबवाने के बाद ही सोते हैं। भक्तों ने विष्णु भगवान के बैठे हुए चित्र कम ही देखे होंगे- या तो वे लेटे रहते हैं या फिर सुर्दशन चक्र में उंगली डाल कर खड़े रहते है उनके सोने से ही दुखी होकर भृगु महाराज ने लात मारी थी जिससे उनका कुछ भी नहीं घटा था।
का रहीम हरि को घटयो, जो भृगु भारी लात
एक बार किसी गांव के निवासी के घर में मेहमान आ गये तो उसने पड़ोसी धर्म का निर्वाह करते हुए अपने पड़ोसी से चारपाई मांगी।

'' मेरे पास तो कोई चारपाई फालतू नहीं है क्योकि घर में केवल दो ही चारपाइयॉ हैं जिनमें से एक पर मैं और मेरे पिता सोते हैं तथा दूसरी पर मेरी मॉ और मेरी पत्नी '' पड़ौसी ने अपनी विवशता दर्शायी।
'' चारपाई न देना हो तो मत दो, पर सोया किस तरह जाता है यह तो सीख लो '' पड़ोसी सलाह देकर वापिस चला आया। यह सलाह देने वाले मेरे गुरू थे। यदि ये पड़ोसी आर्ट ऑफ स्लीपिंग के क्लास में आते होते तो उन्हें दुविधा से नहीं गुजरना पड़ता।
सोने के महत्व का हमारे साहित्य में विस्तार से वर्णन मिलता है। कहा गया है कि-
किस किस को याद कीजिये- किस किस को रोइये
आराम बड़ी चीज है मुंह ढ़क के सोइये
एक और शायर ने कहा है कि -
'' है किसी माने में मुफलिस के लिए सोना नही ''
जिस तरह '' कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय '' उसी तरह उस सोने से इस सोने का महत्व ज्यादा है और सही तरीके से सोने की कला सीख कर ही आप सोने में सुहागा की कहावत को “सोने में सुहाग” होने को चरितार्थ कर सकते है। कृपया अपने मित्रों और मंत्रियों को भी इस क्लास के लिए प्रेरित करें। सिर्फ ग्यारह हज़ार रुपये में।

वीरेन्द्र जैन
2/1शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

4 टिप्‍पणियां:

  1. interesting
    मेरा ब्लॉग - http://madhavrai.blogspot.com/

    मेरे बेटे का ब्लॉग -http://qsba.blogspot.com/

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  2. बहुत अच्‍छी रचना है।

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  3. बहुत मस्त!! आते हैं आर्ट ऑफ स्लीपिंग का कोर्स लेने.

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  4. हा.. हा.. हा..
    अच्छा व्यंग्य रचा है आपने आर्ट ऑफ स्लीपिंग का .....

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