शनिवार, जून 05, 2010

व्यंग्य गिफ्ट आइटम


व्यंग्य
गिफ्ट आइटम
वीरेन्द्र जैन

जिस चीज को खरीदते समय गुणवत्ता के प्रति एक गहरा निरपेक्ष भाव और देते समय मुस्कराहट के नीचे मजबूरी का मजबूत आधार छुपा होता है उसे गिफ्ट आइटम कहते हैँ।
गिफ्ट आइटम खरीदना एक कठिन काम होता है। यह साधारण खरीद से भिन्न किस्म की खरीद होती है। आम तौर पर इसका विचार निमंत्रण पत्र की प्राप्ति वाले दिन से जन्म लेता है और आयोजन की तिथि आने तक पलता और टलता रहता है। इस खरीद के टलने में एक सोच तो आयोजन के स्थगन या रद्द होने की सम्भावना की कल्पना के कारण पैदा होता है जो सामान्यतय: पूरा नही होता। अंतत: वह दिन आ ही जाता है जब दफ्तर से लौटने के बाद आप पाते हैं कि पत्नी अपने से ज्यादा आकर्षक वेषभूषा में तैयार बैठी है तथा बच्चे अच्छे कपड़ों के गन्दे हो जाने से बचने के लिए सीधे बैठे बैठे बेचैन हो रहे हैं। यह दृश्य देखकर ही आप पर गिफ्ट आइटम खरीदने की कठिन परीक्षा वाली घबराहट छा जाती है।

गिफ्ट आइटम खरीदने में एक बात तो तय रहती है कि इतने रूपयें से ज्यादा का नहीं खरीदना है, चाहे जो हो जाये। चंन्द्र टरै, सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार पर राजा हरिशचन्द्र का टरै न सत्य विचार - की तरह आप तय की हुयी राशि में गिफ्ट आइटम खरीदने निकलते हैं। आप चाहते हैं कि आइटम दिखने में आकर्षक, चमकीला और आकार में बड़ा हो ताकि आयोजन स्थल पर बड़ा डिब्बा देखकर लगे कि आप कोई बड़ी चीज लेकर आये हैं। आपकी कोशिश रहती है कि यह बड़ी सी चीज आपके द्वारा निर्धारित की गयी छोटी सी राशि में आ जाये ताकि चार लोगों के नियोजित परिवार द्वारा व्यंजनों का अनियोजित भक्षण किया जा सके और कोई शर्म न महसूस हो।

दुकानदार आपकी व्यथा समझता है। वह जानता है कि आपकों उस वस्तु का उपयोग नहीं करना है केवल देना है। वह केवल गिफ्ट देने से पहले न टूटे या अधिक से अधिक एक दो बार काम कर जाये तो बहुत है। नकली माल पर असली का लेबिल लगाना उसे आता है। रेट की स्लिप भी चौगुने दामों की चिपका देता है। सौ रूपयें का माल पॉच सौ रूपयो के स्लिप के साथ मजबूत डिब्बे में पैक करके दिया जाता है जिस पर रंगीन चमकीला रैपर चढ़ा रहता है। डिब्बे पर रिबिन बांधकर फूलदार गांठ लगा दी जाती है। गिफ्ट आइटम तैयार है। दुकानदार गिफ्ट पैकिंग के चार्ज अलग से वसूलना चाहता है। जो आप देना नहीं चाहते क्योकि यह राशि उससे अधिक हो जाती है जो आपने तय कर रखी है। दुकानदार जानता है कि इस आधार पर आप आइटम वापिस नहीं करेंगे। वैसे भी आपको देर हो रही है इसलिए वह अड़ जाता है कि गिफ्ट पैकिंग के पैसे अलग से लगेंगे। अतंत: कुछ घट बढ़ कर सौदा पट जाता है तथा अच्छे रैपर में लोकल (जीवित और अजीवित) माल स्कूटर पर फंसा कर आप चल देते हैं। रस्ते में याद आता है कि आपने पैकिट पर अपने नाम की स्लिप तो लगवायी ही नहीं है इसके बिना सारी मेहनत बेकार जाने वाली है। यदि मंदिरों के पत्थरों पर नाम लिखवाया जाना अधार्मिक घोषित हो जाये तो मूर्तियां हाथ ठेलों पर घर घर र्दशन देने के लिए उपलब्ध हो सकती हैं। आप तुरन्त ही एक दुकान पर रूकते हैं और स्टेपलर मांग कर अपना विजटिंग कार्ड डिब्बे पर स्टेपल कर देते हैं- तीन चार जगह से ।

जब बाजार व्यवस्था में एक सौदा निरंतर चलता रहता है- कम से कम देकर ज्यादा से ज्यादा पाने की तमन्ना दोनों ओर से जारी रहती है तो फिर गिफ्ट आइटम ही क्यों अलग रहें।

वीरेन्द्र जैन
2-1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629


1 टिप्पणी: