व्यंग्य
उपयोगितानुसार वापिसी
वीरेन्द्र जैन
राम भरोसे आज मूड में था। मेरे पूछने से पहले ही बोल उठा- आज एक मनोरोग चकित्सिक के पास एक स्वस्थ नौजवान आया और मरीजों वाले स्टूल पर बैठ गया। डाक्टर ने बहुत ही नम्रता से पूछा कि किसे दिखाना है तो वह बोला कि खुद को। डाक्टर के यह पूछने पर कि क्या शिकायत है वह बोला
“डाक्साब शिकायत यह है कि मुझे जूते की तुलना में चप्पलें ज्यादा पसन्द हैं।“ डाक्टर ने उसे नीचे से ऊपर तक गौर से देखा तो पाया कि वह बेहद सभ्य और शालीन नजर आ रहा था व उसने करीने से कपड़े पहिन रखे थे, उन्हें उसमें कोई भी असामान्य चीज नहीं दिखाई दी तो वे बोले- इसमें परेशानी की क्या बात है, मुझे भी जूते की तुलना में चप्पलें ज्यादा पसन्द हैं।“
“वो तो ठीक है डाक्साब, पर आप उन्हें भून कर खाना पसन्द करते होंगे और मैं उबाल कर खाना।“ अब डाक्टर कभी उस की तरफ देख रहा था और कभी मेरी तरफ।
इतना कह कर राम भरोसे हो हो हो कह कर हँस दिया। मैंने कहा राम भरोसे ये पुराना लतीफा है
राम भरोसे गम्भीर होते हुये बोला होगा, पर सन्दर्भ नया है।
“कैसे?” मुझे उत्सुकता जगी।
“अरे भाई तुमने एम जी वैद्य का वह बयान नहीं पढा जिसमें उन्होंने कहा है कि जसवंत सिंह की तुलना में उमा भारती ज्यादा उपयोगी थीं, पर उन्हें पुनर्प्रवेश देने की जगह जसवंत सिंह को पुनर्प्रवेश दे दिया गया। बकौल शायर- रहा न दिल में वो बेदर्द, और दर्द रहा
मकीम कौन हुआ है, मकाम किसका था”
“तो इसमें गलत ही क्या है यह उपयोगितावाद का ही युग है- यूज एंड थ्रो। भाजपा में लोगों का महत्व उपयोगिता से ही है न कि उनके त्याग, तपस्या, बलिदान, समर्पण, और सिद्धांतवादिता से। हेमा मालिनी, स्मृति ईरानी, वाणी त्रिपाठी, शत्रुघ्न सिंन्हा, विनोद खन्ना, दारा सिंह, अरविन्द त्रिवेदी, दीपिका चिखलिया, नवजोत सिंह सिद्धू, चेतन चौहान, मनेका गान्धी, वरुण गान्धी, वसुन्धरा राजे, यशोधरा राजे, सब उपयोगी वस्तु की तरह ही आयात किये जाते हैं।
चुनाव जिताने के लिए उपयोगी होने तक धर्मेन्द्र को उम्मीदवार बना दिया, बाद में उन्हें कहना पड़ा कि भाजपा ने मुझे इमोशनली ब्लेकमेल किया। अब जब भाजपा अध्यक्ष खुद ही धर्मेन्द्र के डायलोग बोलने लगे हैं तो धर्मेन्द्र की क्या जरूरत!अब तो कुत्ते का खून पी जाने वाले और भी हैं काके। गोबिन्दाचार्य तो जिन्दगी भर भाजपा के टेंक होने का भ्रम पाले रहे किंतु उपयोगिता घटते ही उन्हें नाली के पानी की तरह बाहर का रास्ता दिखा गया। लम्बे समय तक वे समझते रहे कि वे भाजपा को रास्ता दिखाते हैं किंतु अब स्वयं रोड मैप पूछते नजर आ रहे हैं, कौन से रस्ते से आऊँ, खिड़की से, दरवाजे से, रोशनदान से, या छत से। बता दे कोई कौन गली गये श्याम – रोड मैप का पुराना प्रश्न।“ सर्व श्रेष्ठ सांसद का सम्मान पाने वाले जसवंत सिंह की तुलना में उमा भारती की उपयोगिता सचमुच ही अब ज्यादा होना चाहिए बरना विवादित स्थलों पर मस्जिद गिराने की खुशी में मुरली मनोहर जोशी के कंधों पर कौन सवार होगा! विवादित ईदगाह मैदान पर तिरंगा फहराने के बहाने साम्प्रदायिकता की भूमि कौन तैयार करेगा! किसी लिब्राहन आयोग के आगे गवाही के लिए बुलाये जाने पर कौन सब कुछ भूल जायेगा और कहेगा कि मुझे कुछ भी याद नहीं है कि उस दिन क्या हुआ था!
याद नहीं अब कुछ,
भूल गयी सब कुछ
बस ये ही बात न भूली, जूली........ नहीं नहीं कुर्सी.......।
आज नेताओं के मुँह से जो गालियाँ निकल रही हैं उसकी शुरुआत तो उमा जी बरसों पहले कर चुकी थीं जब उन्होंने अपने विरोधी दल के मुख्यमंत्री से हेलीकाप्टर माँगते हुये अपने सन्देह में घिरे साथी से कहा था कि वे देंगे कैसे नहीं, हेलीकोप्टर क्या उनके बाप का है! चुनावी भाषणों में वे कहती रही हैं कि इस दिग्विजय सिंह को तो सड़क के गड्ढों में पटक पटक कर बिजली का करंट लगाना चाहिए। सच कह रहे हैं वैद्य साब कि उनकी उपयोगिता अब जसवंत सिंह से ज्यादा है, अब जब तक सरकार नहीं है तो कौन सा आतंकवादियों को कन्धार छोड़ने जाना है। अरे अगर भविष्य में सोनिया गान्धी प्रधान मंत्री चुनी जाती हैं, तो सिर मुढा कर, चने खाकर, जमीन में सोने की धमकी क्या जसवंत सिंह देंगे!
उमाजी ही क्यों हमारे वैद्य साब तो संजय जोशी को भी वापिस लेने के लिए उतावले हैं जबकि देश की जनता को यह भी नहीं पता कि उन्हें कब पार्टी से बाहर कर दिया गया था और अगर कर दिया गया था तो मध्य प्रदेश पुलिस से क्लीन चिट प्राप्त इस नेता को किस आरोप में बाहर किया गया था ये तो बता ही देते।
इसलिए भैय्या राम भरोसे ये उनकी समस्या है कि वे जूते से चप्पल को ज्यादा पसन्द करें और भूनने के बजाय उबाल कर खाने को बेहतर समझें। और कहें- मेरी मर्जी।
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सोमवार, अगस्त 02, 2010
मंगलवार, जून 29, 2010
व्यंग्य - लौट के जसवंत वापिस आये
व्यंग्य
लौट के जसवंत वापिस आये
वीरेन्द्र जैन
जसवंत सिंह के लौटने को एज यूजुअल घर वापिसी कहा जा रहा है। ऐसा अन्धविश्वास है कि जो लोग लौटते हैं सब घर ही लौटते हैं।
“पर लौटता तो वह है जो गया हो। जसवंत भैय्या ने भाजपा छोड़ी ही कब थी” राम भरोसे कहता है।
“ हाँ सच कह रहे हो, उन्हें तो निकाला गया था और धकियाये जाने के बाद तो विभीषण भी रावण के रहते लंका नहीं लौटा था और उन्होंने बार बार कहा था कि उन्हें निकालने से पहले औपचारिक शिष्टाचार तक नहीं बरता गया। फिर वैसे भी यह उनका घर थोड़े ही है, घर तो उनका है जो इसमें शाखा से प्रकट हुये हैं। सो इसे घर वापिसी कहना ठीक नहीं है। इसे तो कह सकते हैं कि-
शायद मुझे निकाल कर पछता रहे हैं आप
महफिल में इस ख्याल से फिर आ गया हूं मैं”
एक सम्भावना यह भी हो सकती है कि जसवंत सिंह इसे ससुराल समझते हों, क्योंकि जब भाजपा ने उन्हें निकाल बाहर करने के बाद उनसे लोक लेखा समिति के पद से स्तीफा देने को कहा था तो उन्होंने लगभग डाँटते हुए कहा था कि इस मामले में भाजपा को शोर मचाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि लोक लेखा समिति के अध्यक्ष का पद कोई उसका दिया दहेज नहीं है।
घर तो इसलिए भी नहीं हो सकता कि जिसके बारे में उन्होंने कहा हो कि इस में भ्रष्टाचार चरम पर है और उसे आडवाणी और राजनाथ सिंह को बता देने का दावा भी किया हो उस चरम भ्रष्ट घर को ठीक किये बिना कोई ईमानदार और स्वाभिमानी कैसे जा सकता है।
बहरहाल इस वापिसी में पब्लिक को यह पता नहीं चला कि आखिर मुद्दा क्या था और वह कैसे सुलझा। पहले लोगों को ऐसा लगा था कि मुद्दा ज़िन्ना थे। जिन्ना भी क्या जिन्दा शख्शियत है कि जो मुर्दा होकर भी मुद्दा बनी रह्ती है और जिसका जिन्न पाकिस्तान , हिन्दुस्तान कहीं भी चैन से नहीं बैठने देता। जिस जिन्ना के एक भाषण की तारीफ के कारण आडवाणीजी को अध्यक्ष की कुर्सी छोड़नी पड़ी हो उस पर पूरी किताब लिख कर मुँह पर मार देने से निकाले जाने का असली कारण छुप गया था। जिस भाजपा ने उनकी योग्यता मापते हुये कहा था कि उन्हें पद इसलिए दिया गया था क्योंकि उनकी अंग्रेजी अच्छी है और वे अटलजी के साथ ड्रिंक किया करते थे। अब उस भाजपा ने उनकी कौन सी योग्यता फिर से पहचान ली पता ही नहीं चला। शायद अब विपक्ष के नेता का पद पक्ष के व्यक्ति द्वारा भरा जा चुका है और उसमें कोई फेर बदल नहीं हो सकता सो उसके अंडर में काम करने के लिए आ जाओ। बाकी के सारे पद भरे जा चुके हैं केवल झाड़ू पौंछा करने वाले की जगह खाली है।
किताब तो निकाले जाने के कारणों पर पर्दा डालने के लिए निकाली गयी थी। उन्हें निकाला तो इसलिए जाना था क्योंकि वे फौज से निकल कर आये थे, शाखा से नहीं निकले थे, और इसके प्रमाण स्वरूप वे हमेशा कन्धे पर फित्ती लगी कमीज पहिनते थे। समर्थन करते रहने तक तो ठीक है पर यह भी क्या बात कि अपनी वरिष्ठता के आधार पर आप विपक्ष के नेता पद के भी दावेदार बन जायें। यह नहीं चलेगा, वहाँ तो संघ के आदेश बिना शाखा भी नहीं चलती तो पत्ता क्या हिलेगा। पांचजन्य ने तो सितम्बर 09 अंक में लिखा ही था कि जसवंत को निकाल कर उन्हें खलनायक से नायक बना दिया जिससे उनकी किताब की 49000 प्रतियाँ बिक गयीं। अब क्या नायक से फिर खलनायक बनाना है।
ये कैसा घर है, ये कैसी वापिसी है जहाँ के लोग कि चाहे जहाँ थूक देते हैं और फिर.....................। आप स्वयं समझदार हैं।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629
लौट के जसवंत वापिस आये
वीरेन्द्र जैन
जसवंत सिंह के लौटने को एज यूजुअल घर वापिसी कहा जा रहा है। ऐसा अन्धविश्वास है कि जो लोग लौटते हैं सब घर ही लौटते हैं।
“पर लौटता तो वह है जो गया हो। जसवंत भैय्या ने भाजपा छोड़ी ही कब थी” राम भरोसे कहता है।
“ हाँ सच कह रहे हो, उन्हें तो निकाला गया था और धकियाये जाने के बाद तो विभीषण भी रावण के रहते लंका नहीं लौटा था और उन्होंने बार बार कहा था कि उन्हें निकालने से पहले औपचारिक शिष्टाचार तक नहीं बरता गया। फिर वैसे भी यह उनका घर थोड़े ही है, घर तो उनका है जो इसमें शाखा से प्रकट हुये हैं। सो इसे घर वापिसी कहना ठीक नहीं है। इसे तो कह सकते हैं कि-
शायद मुझे निकाल कर पछता रहे हैं आप
महफिल में इस ख्याल से फिर आ गया हूं मैं”
एक सम्भावना यह भी हो सकती है कि जसवंत सिंह इसे ससुराल समझते हों, क्योंकि जब भाजपा ने उन्हें निकाल बाहर करने के बाद उनसे लोक लेखा समिति के पद से स्तीफा देने को कहा था तो उन्होंने लगभग डाँटते हुए कहा था कि इस मामले में भाजपा को शोर मचाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि लोक लेखा समिति के अध्यक्ष का पद कोई उसका दिया दहेज नहीं है।
घर तो इसलिए भी नहीं हो सकता कि जिसके बारे में उन्होंने कहा हो कि इस में भ्रष्टाचार चरम पर है और उसे आडवाणी और राजनाथ सिंह को बता देने का दावा भी किया हो उस चरम भ्रष्ट घर को ठीक किये बिना कोई ईमानदार और स्वाभिमानी कैसे जा सकता है।
बहरहाल इस वापिसी में पब्लिक को यह पता नहीं चला कि आखिर मुद्दा क्या था और वह कैसे सुलझा। पहले लोगों को ऐसा लगा था कि मुद्दा ज़िन्ना थे। जिन्ना भी क्या जिन्दा शख्शियत है कि जो मुर्दा होकर भी मुद्दा बनी रह्ती है और जिसका जिन्न पाकिस्तान , हिन्दुस्तान कहीं भी चैन से नहीं बैठने देता। जिस जिन्ना के एक भाषण की तारीफ के कारण आडवाणीजी को अध्यक्ष की कुर्सी छोड़नी पड़ी हो उस पर पूरी किताब लिख कर मुँह पर मार देने से निकाले जाने का असली कारण छुप गया था। जिस भाजपा ने उनकी योग्यता मापते हुये कहा था कि उन्हें पद इसलिए दिया गया था क्योंकि उनकी अंग्रेजी अच्छी है और वे अटलजी के साथ ड्रिंक किया करते थे। अब उस भाजपा ने उनकी कौन सी योग्यता फिर से पहचान ली पता ही नहीं चला। शायद अब विपक्ष के नेता का पद पक्ष के व्यक्ति द्वारा भरा जा चुका है और उसमें कोई फेर बदल नहीं हो सकता सो उसके अंडर में काम करने के लिए आ जाओ। बाकी के सारे पद भरे जा चुके हैं केवल झाड़ू पौंछा करने वाले की जगह खाली है।
किताब तो निकाले जाने के कारणों पर पर्दा डालने के लिए निकाली गयी थी। उन्हें निकाला तो इसलिए जाना था क्योंकि वे फौज से निकल कर आये थे, शाखा से नहीं निकले थे, और इसके प्रमाण स्वरूप वे हमेशा कन्धे पर फित्ती लगी कमीज पहिनते थे। समर्थन करते रहने तक तो ठीक है पर यह भी क्या बात कि अपनी वरिष्ठता के आधार पर आप विपक्ष के नेता पद के भी दावेदार बन जायें। यह नहीं चलेगा, वहाँ तो संघ के आदेश बिना शाखा भी नहीं चलती तो पत्ता क्या हिलेगा। पांचजन्य ने तो सितम्बर 09 अंक में लिखा ही था कि जसवंत को निकाल कर उन्हें खलनायक से नायक बना दिया जिससे उनकी किताब की 49000 प्रतियाँ बिक गयीं। अब क्या नायक से फिर खलनायक बनाना है।
ये कैसा घर है, ये कैसी वापिसी है जहाँ के लोग कि चाहे जहाँ थूक देते हैं और फिर.....................। आप स्वयं समझदार हैं।
वीरेन्द्र जैन
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अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629
लेबल:
जसवंत,
भाजपा,
वापिसी,
व्यंग्य हास्यव्यंग्य
बुधवार, जून 02, 2010
व्यंग्य मानसून प्लीज कम सून

व्यंग्य
मानसून प्लीज़ कम सून
वीरेन्द्र जैन
संसद का मानसून सत्र तक आने वाला है पर मानसून नहीं आया। बलवीर सिंह रंग की पंक्तियाँ हैं-
उबासी आ गयी अंगड़ाइयों तक तुम नहीं आये
कवियों की जून महीने में पावस की फुहारों पर लिखी गई कविताओं से हवा करके सम्पादक लोग पसीना सुखा रहे हैं। मैंढक और केंचुए ज़मीन में दबे दबे परेशान हो चुके हैं। वे छुपाछुप्पुअल खेलने वाले छुपे बच्चों की तरह बाहर निकलने को बैचैन हो रहे हैं। जिन दिनों मैंढकों की टर्र टर्र सुनायी देती थी, उन दिनों कूलरों की आवाज़ें आ रही हैं। कज़री गाने वाली बालाएं बीजना डुला रही हैं। जिन पेड़ों पर झूले डाले जाते थे उन पर गिद्धों का बसेरा हो चुका है। मेघों को दूत बना कर सन्देशा भेजने वाले कोरियर सर्विस के चक्कर लगा रहे हैं क्योंकि स्पीड पोस्ट के आगे स्कूलों में एडमीशन के लिए लगी लम्बी लाइनों से भी लम्बी लाइन लगी हुयी है। इस साल जामुन की फसल नहीं आ पायी और गर्मी के मारे गोरी गोरी लड़कियाँ जामुनी हुयी जा रही हैं, पाउडर लगा लेने पर ऐसी लगती हैं जैसे जामुनों पर नमक लगा हो।
मानसून, तुम कहाँ चले गये हो। तुम नगर पालिका के नलों की तरह या मध्य प्रदेश की बिजली की तरह हो गये लगते हो। तुम्हें पता है कि मध्य प्रदेश में गाँव गाँव बिजली के खम्भे लगे हैं, जो ढोरों के बाँधने के काम आते हैं, या कुत्तों के मूतने के। उनके तारों पर चिड़ियाँ बैठती हैं फिर उड़ती हैं, उड़ कर फिर बैठ जाती हैं, बैठ कर फिर उड़ जाती हैं। अपना कमीशन बनाने के लिए उचित समय पर ट्यूब लाइट या बल्ब बदल दिये जाते हैं भले ही उनने नवलेखकों की रचनाओं की तरह कभी भी प्रकाशन का सुख नहीं देखा हो। अगर नहीं बदली जायेंगीं तो नगर पालिका अध्यक्ष और पार्षदों का चुनाव में फूंका पैसा कैसे वापिस मिलेगा।
क्षमा करना मैं मीठी मीठी बातों से तुम्हें बहला रहा हूं मानसून! तुम हमारे क्षेत्र का भ्रष्टाचार देखने के बहाने ही आ जाओ, या साम्प्रदायिक हिंसा में हमारे द्वारा जलाए गए घरों की आग बुझाने ही आ जाओ। कुछ न हो तो हमारे उन मौसम वैज्ञानिकों की भविष्यवाणियों की लाज रखने के लिए ही आ जाओ, जिन्होंने अच्छी वर्षा की भविष्यवाणी की थी। तुम नहीं आओगे तो हमारे मुख्य मंत्री यज्ञ और हवन के नाम पर जनता की गाड़ी कमाई का न जाने कितना रुपया फूंक देंगे जिनके पास शिक्षा का अधिकार लागू करवाने के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं है। इनके पाखण्ड की आग बुझाने ही आ जाओ। ज्योतिषी लोग ज़ज़मानों की गर्मी से बचे बचे फिर रहे हैं, अखबारों में उनकी नौकरी की रक्षा के लिए ही आ जाओ।
हमने भी तुम्हारे स्वागत में कुछ गीत चुरा कर रखे थे। चोरी से बचने के लिए चार पंक्तियां इसके गीत की और चार उसके गीत की उड़ा कर कई नये गीत जोड़ लिए थे, किंतु तुम तो किसी मंत्री की तरह वादा करके भी नहीं आ रहे हो और में मानपत्र वाचक की तरह बैचैनी में टहल रहा हूं। तुम्हारे न आने से छातों को छाती से लगा कर रखने की रितु ही नहीं आयी है, और् बरसाती की तहें ही नहीं खुल पा रहीं। प्रभु इच्छा से एक मन्दिर में बदल गये अपेक्षाकृत अच्छे जूतों को पहचान लिए जाने के डर से बरसात में प्रयोग के लिए सुरक्षित रख छोड़ा था, जो तुम्हारे न आने पर पावस गीत लिखने और गाने वालों के लिए काम में आने वाले हैं। छत पर टपकने वाली जगह में भरने हेतु लाया गया तारकोल पिघल कर बहने लगा है, जो पकौड़े खाने को उतावले मुँह पर मलने के काम आयेगा। इन कवियों और पकौड़ों वालों की इज़्ज़त के लिए ही आ जाओ।
तुम तो परिदृष्य से ऐसे गायब हो जैसे अखबारों के पृष्ठों से अटल, ज़ार्ज़, या अर्जुन सिंह गायब हो गये हैं। हमारे राज्यपाल बनकर ही आ जाओ। पर आओ, मानसून प्लीज़ कम सून! तुम्हारे न आने से मम्मी पापा, भैया दीदी और और भी कोई सब दुखी हैं, कोई तुमसे कुछ नहीं कहेगा, तुम आ जाओ।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629
मानसून प्लीज़ कम सून
वीरेन्द्र जैन
संसद का मानसून सत्र तक आने वाला है पर मानसून नहीं आया। बलवीर सिंह रंग की पंक्तियाँ हैं-
उबासी आ गयी अंगड़ाइयों तक तुम नहीं आये
कवियों की जून महीने में पावस की फुहारों पर लिखी गई कविताओं से हवा करके सम्पादक लोग पसीना सुखा रहे हैं। मैंढक और केंचुए ज़मीन में दबे दबे परेशान हो चुके हैं। वे छुपाछुप्पुअल खेलने वाले छुपे बच्चों की तरह बाहर निकलने को बैचैन हो रहे हैं। जिन दिनों मैंढकों की टर्र टर्र सुनायी देती थी, उन दिनों कूलरों की आवाज़ें आ रही हैं। कज़री गाने वाली बालाएं बीजना डुला रही हैं। जिन पेड़ों पर झूले डाले जाते थे उन पर गिद्धों का बसेरा हो चुका है। मेघों को दूत बना कर सन्देशा भेजने वाले कोरियर सर्विस के चक्कर लगा रहे हैं क्योंकि स्पीड पोस्ट के आगे स्कूलों में एडमीशन के लिए लगी लम्बी लाइनों से भी लम्बी लाइन लगी हुयी है। इस साल जामुन की फसल नहीं आ पायी और गर्मी के मारे गोरी गोरी लड़कियाँ जामुनी हुयी जा रही हैं, पाउडर लगा लेने पर ऐसी लगती हैं जैसे जामुनों पर नमक लगा हो।
मानसून, तुम कहाँ चले गये हो। तुम नगर पालिका के नलों की तरह या मध्य प्रदेश की बिजली की तरह हो गये लगते हो। तुम्हें पता है कि मध्य प्रदेश में गाँव गाँव बिजली के खम्भे लगे हैं, जो ढोरों के बाँधने के काम आते हैं, या कुत्तों के मूतने के। उनके तारों पर चिड़ियाँ बैठती हैं फिर उड़ती हैं, उड़ कर फिर बैठ जाती हैं, बैठ कर फिर उड़ जाती हैं। अपना कमीशन बनाने के लिए उचित समय पर ट्यूब लाइट या बल्ब बदल दिये जाते हैं भले ही उनने नवलेखकों की रचनाओं की तरह कभी भी प्रकाशन का सुख नहीं देखा हो। अगर नहीं बदली जायेंगीं तो नगर पालिका अध्यक्ष और पार्षदों का चुनाव में फूंका पैसा कैसे वापिस मिलेगा।
क्षमा करना मैं मीठी मीठी बातों से तुम्हें बहला रहा हूं मानसून! तुम हमारे क्षेत्र का भ्रष्टाचार देखने के बहाने ही आ जाओ, या साम्प्रदायिक हिंसा में हमारे द्वारा जलाए गए घरों की आग बुझाने ही आ जाओ। कुछ न हो तो हमारे उन मौसम वैज्ञानिकों की भविष्यवाणियों की लाज रखने के लिए ही आ जाओ, जिन्होंने अच्छी वर्षा की भविष्यवाणी की थी। तुम नहीं आओगे तो हमारे मुख्य मंत्री यज्ञ और हवन के नाम पर जनता की गाड़ी कमाई का न जाने कितना रुपया फूंक देंगे जिनके पास शिक्षा का अधिकार लागू करवाने के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं है। इनके पाखण्ड की आग बुझाने ही आ जाओ। ज्योतिषी लोग ज़ज़मानों की गर्मी से बचे बचे फिर रहे हैं, अखबारों में उनकी नौकरी की रक्षा के लिए ही आ जाओ।
हमने भी तुम्हारे स्वागत में कुछ गीत चुरा कर रखे थे। चोरी से बचने के लिए चार पंक्तियां इसके गीत की और चार उसके गीत की उड़ा कर कई नये गीत जोड़ लिए थे, किंतु तुम तो किसी मंत्री की तरह वादा करके भी नहीं आ रहे हो और में मानपत्र वाचक की तरह बैचैनी में टहल रहा हूं। तुम्हारे न आने से छातों को छाती से लगा कर रखने की रितु ही नहीं आयी है, और् बरसाती की तहें ही नहीं खुल पा रहीं। प्रभु इच्छा से एक मन्दिर में बदल गये अपेक्षाकृत अच्छे जूतों को पहचान लिए जाने के डर से बरसात में प्रयोग के लिए सुरक्षित रख छोड़ा था, जो तुम्हारे न आने पर पावस गीत लिखने और गाने वालों के लिए काम में आने वाले हैं। छत पर टपकने वाली जगह में भरने हेतु लाया गया तारकोल पिघल कर बहने लगा है, जो पकौड़े खाने को उतावले मुँह पर मलने के काम आयेगा। इन कवियों और पकौड़ों वालों की इज़्ज़त के लिए ही आ जाओ।
तुम तो परिदृष्य से ऐसे गायब हो जैसे अखबारों के पृष्ठों से अटल, ज़ार्ज़, या अर्जुन सिंह गायब हो गये हैं। हमारे राज्यपाल बनकर ही आ जाओ। पर आओ, मानसून प्लीज़ कम सून! तुम्हारे न आने से मम्मी पापा, भैया दीदी और और भी कोई सब दुखी हैं, कोई तुमसे कुछ नहीं कहेगा, तुम आ जाओ।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629
मंगलवार, जून 01, 2010
व्यंग्य - लगे रहो बाबा भाई

व्यंग्य
लगे रहो बाबा भाई
जहॉ जितने अधिक भ्रष्ट अधिकारी और टैक्सचोर, व्यापारी, ठेकेदार पाये जाते हैं वहीं बाबाओं की दुकानें भी बड़ी बड़ी लगती हैं। बडे बाबा ना तो कस्बों में जाना पसंद करते हैं और ना गॉवों में। आखिर क्लाइन्टेल का सवाल है। ग्राहकी ही नहीं होगी तो बाबा क्या झक मारेंगे। जब तक एकाध ठो राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्री, ठेकेदार चेम्बर ऑफ कामर्स के अध्यक्ष आदि को चरणों में नही पटक लेते तब तक बाबा जी की आत्मा बैचैन रहती है। दबे कुचले लूले लंगड़े बीमार गरीब गुरवा तो कीड़े मकोड़ों की तरह हर बाबा के चरणों में बिलबिलाते ही रहते हैं पर असली भक्त तो वीआईपी ही होतें हैं। बाबा की निगाहें टकटकी लगाये देखती रहती हैं कि कोई वीआईपी ग़िरा कि नही गिरा। जब तक नही गिरे तब तक भजन चलने दो। बाबाजी के नल रूपी मुंह में प्रवचन का जल तभी प्रवाहित होता है जब वीआईपी सफेद मसनद से पीठ टिका ले।
गॉव कस्बे फुटकर दुकानदारों के लिए छोड़ रखे हैं, जहॉ सौ दो सौ से मूड़ मारो तब कहीं दस पॉच हजार खींच पाते हैं। राजधानी में एकाध को ही चित कर लिया तो लाख दो लाख फेंक जाता है। इस दशा को प्राप्त होने के लिए भी बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं। अलग अलग भावपूर्ण मुद्राओं में रंग बिरंगे फोटो और चिकने कागजों पर पोस्टर छपवाने पड़ते हैं। हजारों रूपयें महीने के तो प्रवचन तैयार करने वाले लगाये जाते हैं और अखबारों में मय फोटो के दार्शनिक चिंतन छपवाने के लिए पीआरओ लगाने पड़ते हैं। सम्पादकों उपसम्पादकों को परसाद के नाम पर मिठाई और मेवों के डिब्बे देना होते हैं। चमत्कारों की झूठी कहानियों फैलाने वालों को लगातार सक्रिय रखना होता है। जहॉ प्रवचन का डौल जमाया जाता है वहॉ पर लाखों की पब्लिसिटी लगती है। अखबारों में बड़े बड़े विज्ञापन, पोस्टर, भित्तिलेखन पम्फलेट से लेकर चुनाव प्रचार में लगने वाले सारे साधन झौंक दिये जाते हैं। बच्चों की जिज्ञासा जगाने वाले हाथी घोड़ों के जलूस से भीड़ भड़क्का जुटा कर नगर के सारे बैण्ड बाजे वालों को लाईन से लगा दिया जाता है कि ठोके जाओं मरे चमड़े पर डम डमा डम , ये साले प्रेस वाले तभी आयेंगे। और फिर बाबा के दरबार से कोई खाली हाथ थोड़े ही जायेगा।
बाबा, वैरागी हैं । फल के प्रति उदासीनता से ओत प्रोत। प्रवचन रूपी कर्म कर दिया फल की चिन्ता नहीं है कि उन प्रवचनों पर कोई कभी कहीं अमल भी कर रहा है या नहीं। बाबाजी पेले जा रहे हैं प्रवचन पर प्रवचन और अच्छे अच्छे बाद्य यंत्रों पर भजनों का गायन चल रहा है। शेम्पू से धुले बिना डैन्ट्रिफ वालें केश और चमकदार भगवा पोषाक मेवा और पौष्टिक पदार्थो से पुष्ट देह बाबा जी का वैराट्य प्रदर्शित कर रही है।
आखिर ये रिटायर्ड बूढे क़हॉ जायें! प्रवचन ही सुन लें! क्या जाता है। दिन भर मिनमिनाती सासें क्या करें? घंटे के लिए बहुओं को भी छुट्टी दें और खुद भी छुट्टी काटें, बाबा की बकवास सुन कर कौन सा बदलाव लाना है। जीवन तो जैसा हांकना है वैसा ही हांकेगे। बाबा भी कहॉ पूछने आते है कि पिछले प्रवचन से क्या निकला था जो इस बार फिर गधे की तरह मुँह लटकाए फिर आ बैठते हो। साल-दर-साल बाबा- दर बाबा पिले पड़े हैं और अपना कर्तब्य कर रहे हैं पर नगर उस दिशा में बदल रहा है, जो कोई बाबा नही बतलाता।
बाबा की कही कोई बात, कोई भी नही मानता। मानते होते तो कम से कम माईक वाले शमियाने वाले, सजावट वालों में ही कुछ परिवर्तन देखने को मिलता जो प्रत्येक बाबा के लिए सजाते हैं, बिछाते हैं और फिट करते हैं व बदइंतजामी की आशांका से लगातार सजग रह कर डियूटी देते रहते हैं। उनके लिए भी वह अर्थहीन स्वर होता है जो श्रोताओं के लिए भी होता है। बाबा मंन्दिर में लगे लाउडस्पीकर की तरह बजे जा रहे हैं। उन्हें रोका नही जा सकता इसलिए बज लेने दो।
एक बाबा दूसरे की सार्वजनिक निन्दा नहीं करता है, उनमें सहकारिता है। मोबाइल से डेटें तय करते रहते हैं। सब की अपनी अपनी तारीखें होती हैं। एक के पोस्टर फट नही पाते कि दूसरे के चिपक जाते हैं। एक के बैनरों के अन्डरवियर सिल के नहीं आ पाते है कि दूसरा बैनर बनियानों के लिए आ जाता हैं। गरीबों को बाबा का यही प्रसाद है। लगे रहा बाबा भाई- हम भी लगे हुऐ हैं। एक गांधी बाबा था जिसकी बात का असर होता था क्योंकि वह स्वंयं भी पहले वही करता था जो बोलता था। हरिजन बस्तियों में आश्रम बनाना हो या अपना शौचालय स्वंयं साफ करना, कोढ़ियों की सेवा हो या चरखा कातना, वह खुद करके दिखाता था। उसके कहने पर लाखों लोगों ने खादी पहनी और विदेशी कपड़ों की होली जलायी। वह एक चादर में इंग्लैण्ड गया और सूरज न डुबोने वाले साम्राज्य की बत्ती गुल कर दी। पर आज के बड़े बड़े बाबाओं के चेले दिन में प्रवचन सुनने के बाद शाम को बार में पाये जाते हैं और बाबा अपने वकीलों से मुलाकात कर रहे होते हैं ताकि हत्या, बलात्कार, अतिक्रमण या टैक्स चोरी के प्रकरणों की सुनवाई की तारीखें बढ़वाने की रणनीति पर सलाह मशविरा कर सकें।
गांधी बाबा को इन्ही बाबाओं के भक्तों जैसे लोगों ने गोली दगवा दी थी। गांधी बाबा होता तो शायद इन बाबाओं की दाल नहीं गल पाती। अगर किसी बाबा में कभी गांधी बाबा जैसा सच जग जाये, जिसकी सम्भावना ना के बराबर है तो सच्ची आत्म कथा लिखकर दिखाएं- गांधी बाबा जैसी। किसी ने नहीं लिखी, कोई नहीं लिख सकेगा।
वीरेन्द्र जैन
2\1, शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629
लगे रहो बाबा भाई
जहॉ जितने अधिक भ्रष्ट अधिकारी और टैक्सचोर, व्यापारी, ठेकेदार पाये जाते हैं वहीं बाबाओं की दुकानें भी बड़ी बड़ी लगती हैं। बडे बाबा ना तो कस्बों में जाना पसंद करते हैं और ना गॉवों में। आखिर क्लाइन्टेल का सवाल है। ग्राहकी ही नहीं होगी तो बाबा क्या झक मारेंगे। जब तक एकाध ठो राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्री, ठेकेदार चेम्बर ऑफ कामर्स के अध्यक्ष आदि को चरणों में नही पटक लेते तब तक बाबा जी की आत्मा बैचैन रहती है। दबे कुचले लूले लंगड़े बीमार गरीब गुरवा तो कीड़े मकोड़ों की तरह हर बाबा के चरणों में बिलबिलाते ही रहते हैं पर असली भक्त तो वीआईपी ही होतें हैं। बाबा की निगाहें टकटकी लगाये देखती रहती हैं कि कोई वीआईपी ग़िरा कि नही गिरा। जब तक नही गिरे तब तक भजन चलने दो। बाबाजी के नल रूपी मुंह में प्रवचन का जल तभी प्रवाहित होता है जब वीआईपी सफेद मसनद से पीठ टिका ले।
गॉव कस्बे फुटकर दुकानदारों के लिए छोड़ रखे हैं, जहॉ सौ दो सौ से मूड़ मारो तब कहीं दस पॉच हजार खींच पाते हैं। राजधानी में एकाध को ही चित कर लिया तो लाख दो लाख फेंक जाता है। इस दशा को प्राप्त होने के लिए भी बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं। अलग अलग भावपूर्ण मुद्राओं में रंग बिरंगे फोटो और चिकने कागजों पर पोस्टर छपवाने पड़ते हैं। हजारों रूपयें महीने के तो प्रवचन तैयार करने वाले लगाये जाते हैं और अखबारों में मय फोटो के दार्शनिक चिंतन छपवाने के लिए पीआरओ लगाने पड़ते हैं। सम्पादकों उपसम्पादकों को परसाद के नाम पर मिठाई और मेवों के डिब्बे देना होते हैं। चमत्कारों की झूठी कहानियों फैलाने वालों को लगातार सक्रिय रखना होता है। जहॉ प्रवचन का डौल जमाया जाता है वहॉ पर लाखों की पब्लिसिटी लगती है। अखबारों में बड़े बड़े विज्ञापन, पोस्टर, भित्तिलेखन पम्फलेट से लेकर चुनाव प्रचार में लगने वाले सारे साधन झौंक दिये जाते हैं। बच्चों की जिज्ञासा जगाने वाले हाथी घोड़ों के जलूस से भीड़ भड़क्का जुटा कर नगर के सारे बैण्ड बाजे वालों को लाईन से लगा दिया जाता है कि ठोके जाओं मरे चमड़े पर डम डमा डम , ये साले प्रेस वाले तभी आयेंगे। और फिर बाबा के दरबार से कोई खाली हाथ थोड़े ही जायेगा।
बाबा, वैरागी हैं । फल के प्रति उदासीनता से ओत प्रोत। प्रवचन रूपी कर्म कर दिया फल की चिन्ता नहीं है कि उन प्रवचनों पर कोई कभी कहीं अमल भी कर रहा है या नहीं। बाबाजी पेले जा रहे हैं प्रवचन पर प्रवचन और अच्छे अच्छे बाद्य यंत्रों पर भजनों का गायन चल रहा है। शेम्पू से धुले बिना डैन्ट्रिफ वालें केश और चमकदार भगवा पोषाक मेवा और पौष्टिक पदार्थो से पुष्ट देह बाबा जी का वैराट्य प्रदर्शित कर रही है।
आखिर ये रिटायर्ड बूढे क़हॉ जायें! प्रवचन ही सुन लें! क्या जाता है। दिन भर मिनमिनाती सासें क्या करें? घंटे के लिए बहुओं को भी छुट्टी दें और खुद भी छुट्टी काटें, बाबा की बकवास सुन कर कौन सा बदलाव लाना है। जीवन तो जैसा हांकना है वैसा ही हांकेगे। बाबा भी कहॉ पूछने आते है कि पिछले प्रवचन से क्या निकला था जो इस बार फिर गधे की तरह मुँह लटकाए फिर आ बैठते हो। साल-दर-साल बाबा- दर बाबा पिले पड़े हैं और अपना कर्तब्य कर रहे हैं पर नगर उस दिशा में बदल रहा है, जो कोई बाबा नही बतलाता।
बाबा की कही कोई बात, कोई भी नही मानता। मानते होते तो कम से कम माईक वाले शमियाने वाले, सजावट वालों में ही कुछ परिवर्तन देखने को मिलता जो प्रत्येक बाबा के लिए सजाते हैं, बिछाते हैं और फिट करते हैं व बदइंतजामी की आशांका से लगातार सजग रह कर डियूटी देते रहते हैं। उनके लिए भी वह अर्थहीन स्वर होता है जो श्रोताओं के लिए भी होता है। बाबा मंन्दिर में लगे लाउडस्पीकर की तरह बजे जा रहे हैं। उन्हें रोका नही जा सकता इसलिए बज लेने दो।
एक बाबा दूसरे की सार्वजनिक निन्दा नहीं करता है, उनमें सहकारिता है। मोबाइल से डेटें तय करते रहते हैं। सब की अपनी अपनी तारीखें होती हैं। एक के पोस्टर फट नही पाते कि दूसरे के चिपक जाते हैं। एक के बैनरों के अन्डरवियर सिल के नहीं आ पाते है कि दूसरा बैनर बनियानों के लिए आ जाता हैं। गरीबों को बाबा का यही प्रसाद है। लगे रहा बाबा भाई- हम भी लगे हुऐ हैं। एक गांधी बाबा था जिसकी बात का असर होता था क्योंकि वह स्वंयं भी पहले वही करता था जो बोलता था। हरिजन बस्तियों में आश्रम बनाना हो या अपना शौचालय स्वंयं साफ करना, कोढ़ियों की सेवा हो या चरखा कातना, वह खुद करके दिखाता था। उसके कहने पर लाखों लोगों ने खादी पहनी और विदेशी कपड़ों की होली जलायी। वह एक चादर में इंग्लैण्ड गया और सूरज न डुबोने वाले साम्राज्य की बत्ती गुल कर दी। पर आज के बड़े बड़े बाबाओं के चेले दिन में प्रवचन सुनने के बाद शाम को बार में पाये जाते हैं और बाबा अपने वकीलों से मुलाकात कर रहे होते हैं ताकि हत्या, बलात्कार, अतिक्रमण या टैक्स चोरी के प्रकरणों की सुनवाई की तारीखें बढ़वाने की रणनीति पर सलाह मशविरा कर सकें।
गांधी बाबा को इन्ही बाबाओं के भक्तों जैसे लोगों ने गोली दगवा दी थी। गांधी बाबा होता तो शायद इन बाबाओं की दाल नहीं गल पाती। अगर किसी बाबा में कभी गांधी बाबा जैसा सच जग जाये, जिसकी सम्भावना ना के बराबर है तो सच्ची आत्म कथा लिखकर दिखाएं- गांधी बाबा जैसी। किसी ने नहीं लिखी, कोई नहीं लिख सकेगा।
वीरेन्द्र जैन
2\1, शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
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लेबल:
धार्मिक पाखण्ड,
बाबा,
व्यंग्य हास्यव्यंग्य
शनिवार, मई 22, 2010
व्यंग्य--- छोटा मुंह बड़ी बात

व्यंग्य
छोटा मुँह बड़ी बात
वीरेन्द्र जैन
शासकों ने अभिव्यक्ति पर रोक लगाने के हजारों तरीके समय- समय पर विकसित और प्रयुक्त किए हैं, उनमें से सबसे बारीक तरीका साहित्यकारों, लेखकों द्वारा वाणी पर प्रतिबंध का संवेदनात्मक प्रचार कराना भी है।
अंग्रेजी में कहावत है कि '' इफ स्पीच इज सिल्वर देन साइलेंस इस गोल्ड '' वहीं, अपने यहॉ कहा गया है कि '' एक चुप सौ को हराती है ''। वाणी स्वातंत्र के इस युग में भी कहावत प्रचलित है कि '' मूर्ख अधिक बोलता है''। कवियों शायरों ने भी वाणी की जगह मौन रखने का प्रचार किया है। एक कवि कहते है:-
शब्द तो शोर है तमाशा है
भाव के सिंधु में बताशा है,
मर्म की बात होंठ से न कहो
मौन ही भावना की भाषा है।
शब्द की जगह इशारों की अधिक तारीफ करते हुए एक गीतकार कहता है कि '' इशारों- इशारों में दिल लेने वाले बता, ये हुनर तूने सीखा कहॉ से । ''
या -
नैन मिले उठे झुके, प्यार की रात हो गई,
मौन का मौन रह गया बात की बात हो गई।
आज के रैप और पॉप के युग में भी फिल्मी गीतकार
'' कुछ न कहो, कुछ भी ना कहो'' का राग अलाप रहे हैं जबकि पहले तो फिल्मों के नाम तक ''मैं चुप रहूँगी'' ''खामोशीी'' आदि हुआ करते थे और गीतकार कहते है कि
''सिर्फ अहसास है ये रूह से महसूस करो,
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो ''
शब्द की शक्ति को समाप्त करने का सुन्दर षडयंत्र इस गीत में निहित है कि '' ऑखों- ऑखों में बात होने दो। ''
कुछ लोग अपने आप ही अनुशासन पर्व मनाने और गाने लगते हैं
'' अपनी तो ये आदत है कि हम कुछ नही कहते''
कुछ न बोलते हुए भी बोलने की धमकी देते है कि '' हम बोलेगा तो बोलेगा कि बोलता है। ''
मेरी समझ में नही आता है कि यदि सारी बातें इसके बिना ही हो सकती थीं तो परमपिता परमात्मा ने असीम अनुकंपा आदि करके मुँह का निर्माण क्यों किया ? मेरे सवाल के जवाब में नास्तिक प्रतिप्रश्न दाग सकते हैं कि उन्हैं '' मेड बाई परमात्मा '' की मुहर दिखाई जाए कि उसने ही औरिजनल मनुष्य और अंगों का निर्माण किया है, तब ही वे यह आरोप स्वीकारेंगे अन्यथा यह तो उस राजनीतिक षडयंत्र जैसा हुआ कि भ्रष्टाचार के सारे आरोप स्वर्गीय नेताओं पर सिद्व करके खुद बरी हो जाओ।
पर में तो सबसे भला बना रहना चाहता हूँ और मुझे जगतगति नहीं व्यापती, (सबसे भाले मूढ, जिन्हें न व्यापे जगत गति) अत: मान लेताहूँ कि जैसे समाज रूपी शरीर में मुँह में भी मुँह ऊपर है और श्रेष्ठ माना गया है।
अंग्रेजी में कहा गया है कि '' फेस इस द इंडेक्स ऑफ हर्ट '' अर्थात मुँह दिल की दुकान का साईन बोर्ड या दिलरूपी रेस्तरां का मीनू कार्ड है। मुँह की सीमा संकुचित नही है, अर्थात चाय सुड़कने, रोटियाँ निगलने, रसगुल्ले से सराबोर होने, आइसक्रीम चूसने, गालियॉ बकने, चापलूसी करने या उधार मॉगने के काम आने वाला शरीर का भाग ही मुंह नही है अपितु उपरोक्त कार्य करने वाला हिस्सा जहॉ स्थित होता है उस पूरे भाग को मुँह कहते हैं। यही कारण है कि सुबह उठते ही जिस क्षेत्रफल को सबसे पहले धोया जाता है उसे मुँह ही कहते हैं और उसमें पूरा चेहरा सम्मिलित होता है।
अगर ऐसा नहीं होता तो नई ब्याही दुल्हिन को मुँह दिखाई करने के लिए पूरा घूँघट उठाने की जरूरत ही नहीं पड़ती, वह तो बिना घूँघट उठाए भी दिख जाता। कोई लड़की यदि बिना दहेज के अपनी इच्छा से अपना जीवनसाथी चुन लेती तो मॉ- बाप यह नहीं कहते कि उसने हमारे मुँह पर कालिख पोत दी है और हम मुँह दिखाने लायक ही नही रहे।
पुरानी परंपराओं में कुछ लोग प्रकृति प्रदत्त शरीर के अधूरेपन या पिता प्रदत्त जाति के कारण भी प्रात: काल में मुँह देखने लायक नहीं समझे जाते थे, भले ही उनकी बहिन- बेटियॉ लंबे समय तक दहेज तय होने पर ही विवाह करती थीं। मूलत: शदियॉ तो ऊपर आसमानों में परमपिता द्वारा तय की हुयी होती हैं। अधम पिताओं का काम तो केवल दहेज तय करना होता है, जिसके लिए लड़के का बाप पूरा मुँह फाड़कर खड़ा हो जाता है। आम तौर पर लडकियां ऐसे संभावित ससुर को घर से निकल जाने को कहना चाहती हैं पर लाज के मारे वे मुँह नहीं खोल पातीं और बात मुँह की मुँह में रह जाती है। विवाह कराने के मध्यस्थ ऐसे मौके पर या तो मुँह सिलकर बैठ जाते हैं या मुँह देखे की कहते हैं जो इस बात पर निर्भर करता है कि उनका मुँह मीठा कराने की क्षमता किसमें कितनी है। अगर मध्यस्थ कोई ब्राम्हण हुआ तो उसका मुँह मीठा कराना बहुत श्रमसाध्य होता है क्योकि वह अग्निमुख होता है जिससे मीठा करने की सारी सामग्री उसके मुखरूपी अग्निकांड में भस्म होती जाती है।
मुँह बोले भाई या बहिन के सबंध अधिक प्रगाढ़ होते हैं जैसे लक्ष्मी बाई कानपुर के नाना की मुँहबोली बहिन छबीली थीं और उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संगाम में उन्हैं सर्वाधिक मदद की थी। दोनो ने मिलकर अंग्रेजों के मुँह का स्वाद बिगाड़ दिया था। यदि सिंधिया ने साथ दिया होता तो अंग्रेजों ने उसी समय मुँह की खाई होती।
आम तौर पर बड़े आदमी किसी को ज्यादा मुँह नही लगाते पर जिन नेताओं की सार्वजनिक शत्रुता जगजाहिर होती है वे चुनाव के अवसर पर मुँह से मुँह लगा कर बातें करते हुए फोटो खिंचवाते हैं तथा आम जनता को एकता का धोखा देते हैं, भले ही उनक मुँह में राम और बगल में छुरी हो।
कुछ लोग मुँह उठाकर चलते हैं तो कुछ लोग मुँह बाकर सोते हैं। किसी के मुँह पर हवाइयॉ उड़ती हैं तो किसी के मुँह पर मक्खियॉ भिनभिनाती हैं। मुँह का रंग गोरा हो या काला पर जब अचानक ही कोई हादसा घटित हो जाता है तो मुँह पर एक रंग आता है और एक जाता है।
आम तौर पर लोग मुँह से ही बोलते है पर टेलीफोन के दूसरी ओर बात करने वाला अक्सर ही पूछता है कि कहॉ से बोल रहे हैं ? अब उत्तर देने वाले की मजबूरी होती है कि वो कहे कि मैं तो मुँह से बोल रहा हूँ और आप कहॉ से बोल रहे हैं।
मुँह खाद्य एंव पेय पदार्थो के आने जाने का मार्ग ही नही है अपितु इसके द्वारा अंग प्रत्यंग भी आते जाते रहते हैं। बचपन में दांत आते हैं और बुढापे में चले जाते हैं। कइयों की तो ऑतें भी साथ में ले जाते हैं और कहा जाता है कि 'न मुँह में दॉत न पेट में ऑत'। कभी कभी किसी का कलेजा भी मुँह को आने लगता है तथा जिनका नहीं भी आता उनके मुँह में भी मिठाइयों को देखकर पानी आ जाता है।
आम तौर पर मानव जाति में एक ही मुँह होता है पर साँपों के दो मुँहे भी होने का भ्रम प्रचलित है। ब्रम्हा विष्णु, महेश नाम के एक ही धड़ में तीन सिर लगे कलैंडर भी बाजार में मिलते हैं, चतुर्मुखी विष्णु, पंचमुखी महादेव के साथ साथ दस मुँह वाले रावण के चित्र भी प्राप्त होते हैं।
कवियों ने नायिका को चंद्रमुखी कहते कहते इस उपमा को इतना घिसा कि मुक्तिबांध को''चॉद मुँह टेढ़ा है'' कहकर उन्हें झटका देना पड़ा। किन्तु मुक्तिबोध से भी काफी पहिले बुंदेलों की एक कहावत इस एकरूपता को तोड़ रही थी। कहावत है कि '' मौं तौ थपरियन लाख दुर खौं बिरजीं ''।
(अर्थात मुंह तो चॉटों के लायक है पर नाक में पहिने जाने वाले गहने 'दुर' के लिए रूठी- मचली हुई हैं।)
कुछ मुँह तो खाद्य पदार्थो की विशोषताओं के अनुरूप ही बने होते हैं जैसे कि मसूर की दाल खाने के लिए कुछ खास तरह के मुँहों की दरकार होती है जिससे अलग होने पर मसूर की दाल की अपेक्षा रखने वाले से कहॉ जाता है कि ये मुँह और मसूर की दाल। कुछ मुँह आकार में बड़ी चीजों के लिए ही होते है ओर छोटे आइटमों से उनकी संगति नही बैठती तथा ऐसी स्थिति आने पर 'ऊँट के मुँह में जीरा' कहकर आयटम के छोटे होने के साथ साथ उन्हैं बेडोल पशु की उपाधि भी दे दी जाती है। सरकारी इंसपेक्टर, चाहै वे सेल्सटैक्स के हों या लेबर के जगह जगह मुँह मारते रहते हैं दुकानदार भी उनके मुँह का नाप अपने पास रखते हैं और उन्हैं मुँहमॉगी राशि प्रतिमाह बॉध देते हैं।
वैसे तो मैं कुछ और भी कहना चाहता था पर जानता हूँ कि आप ही अब कह देंगे कि तू छोटे मुँह बड़ी बात करता है, इसलिए चुप हूँ।
---- वीरेन्द्र जैन
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