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बुधवार, सितंबर 14, 2011

अडवाणीजी, पधारो म्हारे मध्य प्रदेश

व्यंग्य
                      अडवाणीजी, पधारो म्हारे मध्य प्रदेश
                                                               वीरेन्द्र जैन 

      भाजपा के पूर्व प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी लोहपुरुष अडवाणीजी ने एक और रथ यात्रा निकालने का फैसला कर लिया है। यह रथ यात्रा भ्रष्टाचार मिटाने के लिए होगी। उनकी पहली रथ यात्रा बाबरी मस्जिद मिटाने के लिए थी और यह भ्रष्टाचार मिटाने के लिए है। कभी देश से भाईचारा मिटाना चाहते हैं, तो कभी इतिहास की सच्चाई मिटाना चाहते हैं। ये अलग बात है बाबरी मस्जिद को छोड़ कर बाकी सब कुछ किसी तरह सुरक्षित बचा हुआ है।
      लोहपुरुष वाणी के धनी है, इसलिए उनकी बातों के कई कई अर्थ निकल सकते हैं, रही मंतव्य की सो वो तो आप समझ ही नहीं सकते। कहीं पै निगाहें कहीं पै निशाना वाला गाना तो आपने सुना ही होगा। जब नोट फार वोट में अमर सिंह के साथ भाजपा के भगौरा और कुलस्ते ही नहीं अपितु अडवाणीजी के सुधीन्द्र कुलकर्णी भी पुलिस पूछ्ताछ के घेरे में आ गये तो लोहपुरुष ने खुद ही दहाड़ लगा दी कि मुझे भी गिरफ्तार करो क्योंकि मैंने ही उन्हें संसद में नोट लहराने की अनुमति दी थी। जब सच को सामने आना ही है तो उसे खुद ही कह कर बहादुर बन जाने में क्या बुराई है। पर हाय री दुनिया, जिसके बारे में चचा गालिब कह ही गये हैं कि-
सियह बख्ती में गालिब कौन किसका साथ देता है
कि तारीकी में साया भी जुदा रहता है इंसा से
सो जिनके लिए यह सब किया उस पार्टी के लोगों ने भी किनारा कर लिया और उनकी प्रैस कांफ्रेंस में उनके ही चार लोग नजर आये। उन्हें कहना पड़ा कि वे यह काम पार्टी अध्यक्ष से अनुमति लेकर करने जा रहे हैं। इससे पहले कि जलूस निकले, रथयात्रा निकाल लो, और उसे भ्रष्टाचार विरोध का नाम दे दो ताकि जो दुखी लोग अन्ना हजारे की अपील पर निकल आये थे उन दुखी लोगों का समर्थन तो मिल जाये। जय श्री राम।
      आओ आओ लोहपुरुषजी पधारो म्हारे देश। देश यानि कि स्वर्णिम मध्य प्रदेश, यानि कि भारत का दिल नहीं तो पेट तो है ही। इस पेट में भ्रष्टाचार गैस की तरह फूल रहा है और नेताओं के लिए फल भी रहा है। वो गैस नहीं जो भोपाल में फैल गयी थी और उस कम्पनी से आपकी पार्टी चुनावी चन्दा लेती रही है, यह तो भ्रष्ट अचार से पैदा होने वाली गैस है, सो इसे निकालो। यहाँ मंत्री से लेकर संत्री तक और उद्योगपति से लेकर व्यापारी तक, अफसरों से लेकर अप्सराओं तक यह गैस इतनी बन रही है कि जब भी इनकम टैक्स वाले किसी के पेट को खोलते हैं तो अम्बार निकलता है। इस सड़ांध में आपका स्वागत है। आइए पहले अपने घर से ही श्री गणेश कीजिए। बुरा जो देखन मैं चल्या की तर्ज पर मुझ से बुरा न कोय के फैसले पर पहुँचने के लिए काहे को सड़कें नापते हैं, वहाँ कोई नहीं मिलेगा, वे मनरेगा में काम पर गये होंगे या अपने ड्राइंग़ रूम में क्रिकेट का मैच देख रहे होंगे। सड़कें अब वाहनों की अनियंत्रित दौड़ कराने के काम आ रही हैं।  यहाँ के सरकारी नेताओं ने अपनी विश्वसनीयता इतनी खो दी है कि आप पुकारने की हदों तक पुकार आइए पर लोग कानों में इयर फोन लगाये एफएम बेंड पर पुराने गाने सुनना ज्यादा ठीक समझते हैं। और तो और अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के लिए जुट जाने वाले भी आपकी सुनने नहीं आयेंगे।
      वैसे अगर मेरी मानो तो यात्रा नहीं वकील करो, पर रामजेठमलानी पर भरोसा मत करना। उन्हें अमर सिंह ने पहले ही तय कर लिया है और आपकी पार्टी से सांसद होते हुए भी उन्होंने गेंद को आपके पाले में उछाल दी है। नरेन्द्र मोदी ने पहले आपके सिन्धी बहुल चुनाव क्षेत्र से आशाराम बापू को नाराज कर दिया और अब रामजेठमलानी को आपके खिलाफ खड़ा कर दिया। गडकरी ने भी कह दिया कि पार्टी पहले से कोई प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित नहीं करेगी। लगता है कि मोदी को प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी बनने के लिए आपकी सम्भावनाओं को कम करना जरूरी लग रहा है।
 वीरेन्द्र जैन
2/1   शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629
       

शुक्रवार, जुलाई 02, 2010

व्यंग्य- जार्ज जया और जे डी [यू]


व्यंग्य
जार्ज, जया और जे डी [यू]
वीरेन्द्र जैन
पता नहीं अब लिखा रहता है या नहीं पर पहले बसों में लिखा रहता था कि अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करें बस वालों की कोई ज़िम्मेवारी नहीं होगी। जो अपना सामान दूसरों के यहाँ छोड़ कर चले आते हैं उनके साथ यही होता है। जेडी[यू] की जया जैटली के साथ भी यही हो रहा है, उनका सामान जार्ज के घर में रखा है और लैला उस थैला को उठाने के लिए उन्हें घर में नहीं घुसने दे रहीं हैं।
जब तक लैला अपना सामान खुला छोड़े हुये थीं तब तक उनके सामान के साथ भी यही हो रहा था, पर भला हो चुनाव आयोग का कि उसने चुनाव लड़ने के लिये अपने सामान की सूची घोषित करना जरूरी कर दिया और जिससे लैला को पता चला कि जिसे वे मामूली सामान समझ रही थीं वह तो बहुत मूल्यवान है और उस पर कानूनी हक उनका है। जार्ज के मुड़े तुड़े बिना प्रेस के कपड़े और हवा में उड़ते बालों वाले समाजवादी के पास पन्द्रह करोड़ की दौलत का पता होता तो लैला क्यों अपना घर ऐसा खुला छोड़तीं कि कोई भी आकर अपना सामान वहाँ रख जाये। अब जब गलती समझ में आ गयी तो सुधार ली। भूल करना तो मानव का स्वभाव है और उसे ठीक करना समझदारी। सामान सम्पत्ति के मामले में असली चीज होती है कब्जा। मायावती समझदार थीं कि उन्होंने कब्जा बनाये रखा सो कानूनी हकदार भी अपना सामान नहीं ले जा सके। याद रखने वालों को याद होगा कि जब एमजी रामचन्द्रन की शव यात्रा के समय जय ललिता उनके शव वाहन पर बैठ कर जाने लगीं थीं तो राम चन्द्रन के भांजे ने उनके साथ कैसा दुर्व्यवहार किया था। उस समय उन्होंने जय ललिता को कब्जा नहीं लेने दिया था पर बाद में जयललिता ने पूरे तामिलनाडु पर कब्जा कर के दिखा दिया था। रामा राव के दामाद चन्द्रबाबू नायडू और उनकी सौतेली सास के साथ भी कुर्सी के लिए कुछ कुछ ऐसा ही हुआ था। इन्दिरा गान्धी और मनेका गान्धी को संजय गान्धी की सम्पत्ति के लिए अदालत के दरवाजे पर दस्तक देनी पड़ी थी। जब भाजपा सांसद के एल शर्मा का देहांत हुआ था तब भी उनकी एक महिला मित्र ने उनके घर में रखी एक अलमारी पर अपना दावा किया था जबकि भाजपा नेतृत्व का कहना था कि अलमारी किसी की हो पर पैसा पार्टी का है, और वह महिला दिवंगत के साथ अपनी मित्रता रही होने का गलत फायदा उठा रही है। लैला के इस व्यवहार के बाद देश की सभी लैलाओं को सावधान हो जाना चाहिए और अपने अपने सामानों को अपने अपने घरों में सुरक्षित रखते हुये भर को खुला न छोड़ें। भला यह भी कोई बात हुयी कि किसी के घर में किसी की अलमारी रखी हुयी हो। अरे भाई दुनिया में स्विजरलेंड भी एक जगह है जहाँ के बैंकों में हिन्दुस्तानियों के खाते खुलने की सुविधाएं हैं सो लाकर भी होंगे जिसे भी रखना हो वह अपना सामान वहाँ रखे। हमारे देश के जिन समझदार लोगों ने वहाँ 1456 अरब डालर रखे हैं उनसे सीख क्यों नहीं लेते। कम से कम इस मामले में तो हम सारी दुनिया से आगे हैं क्योंकि दूसरे किसी देश के लोगों ने अपने सामान इस तरह से सुरक्षित नहीं रखे हैं।

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

गुरुवार, जुलाई 01, 2010

व्यंग्य -------जाने कब


व्यंग्य
जाने कब!
वीरेन्द्र जैन
आज से बहुत पहले मौत और ग्राहक का कोई ठिकाना नहीं होता था कि वह जाने कब आ जाये। आज जाने कब आ जाने वाली इस इस सूची में वृद्धि होती जा रही है ।
पहले बरसात समय से होती थी, जून के महीने से ही पुराने अन्डरवियर बनियानें और जूते आदि धो पौंछ कर रख लिए जाते थे ताकि बाहर से निचुड़ते हुये लौट कर बदल लिए जायें क्योंकि सुबह वाले तो दो दिन में सूखने वाले होते थे। आज कल तो बरसात कभी भी किसी भी महीने में हो सकती है और ज्यादातर तो प्रतीक्षा ही रहती है कि जाने कब होगी।
बरसात की तो छोड़ दीजिए, नल का कोई ठिकाना नहीं रहता कि कब आ जायें! सुबह, शाम, दोपहर, देर रात, कभी भी नल आ सकते हैं, जो हमारे कस्बे में वैसे भी दो या तीन दिन में एकाध बार ही आते हैं और उसी एकाध बार का ठिकाना नहीं। जब पूरे मुहल्ले में 'आ गये आ गये' का शोर उठने लगे तो समझो नल ही आ गये क्योंकि जिस उत्साहपूर्ण स्वागत के साथ नल आते हैं उस तरह से मुहल्ले में और कोई नहीं आता, नेता भी नहीं, जमाई भी नहीं। इस पर भी सावधानी के लिए पूरे नगर ने नलों में टोंटियां नहीं लगवायी हैं जिससे तेजी से हवा की सूं सूं सुनकर उनके आने का पता चल सके।
नल ही नहीं नाली साफ करने आने वाले कर्मचारी के आने की भी कोई नियमितता नहीं हैं। लबालब भर जाने और उस पानी में मच्छरों की दो तीन पीढियों के बड़े हो जाने पर जब कभी वह आ जाता है तो किसी अहसान की तरह नाली का कचरा उठा कर बाहर सड़क पर ढेर लगा देता है। फिर उसे उठाने के लिए आने वाली गाड़ी की भी उसी तरह अनिश्चितता बनी रहती है जैसी कि नल और नाली सफाई कर्मचारी की रहती है। जब वह कीचड़ दसों दिशाओं में अपना यश फैला चुका होता है तो उम्मीद की जाने लगती है कि वह जाने कब अचानक कचरा उठाने आ जाये। और वह तब आ भी जाता है जब उसके आने की सारी प्रतीक्षा मर चुकी होती है।
वैसे नलों के आने में राज्य सरकार की जिम्मेवारी होती है क्योंकि जब बिजली आयेगी तब ही तो नल सप्लाई करने वाली पानी की टंकी में पानी चढाया जा सकेगा। अब किसी को पता नहीं रहता कि बिजली कब आयेगी। जिससे भी पूछो वह यही कहता है कि पता नहीं साब ,जाने कब आयेगी। जब बिजली आ जाती है तो नल से पानी चढाने वाले का पता नहीं होता। उसके बारे में चौकीदार बताता है कि वह टेंकर सप्लाई करने वालों से हप्ता वसूलने गया है। पता नहीं वह जाने कब आयेगा ।
बिस्तर पर पड़े पड़े सोच रहे हैं कि नींद जाने कब आ जाये! और जब नींद आती है तभी चौकीदार चिल्लाता है जागते रहो! [चोर जाने कब आ जाये।]
बारह बजे की ट्रेन दो घन्टे लेट होती है तीन घन्टे हो चुकने के बाद स्टेशन पर पता नहीं रहता कि कब आ जाये! प्लेटफार्म के इस कोने से उस कोने तक सारे मुसाफिर सोचते रहते हैं कि जाने कब आ जाये। कोई इन्क्वारी तक नहीं जाना चाहता क्योंकि पता नहीं हम वहाँ पूछने गये और इधर ट्रेन आ जाये। वैसे इंक्वारी वाला पूछने पर हमेशा राइट टाइम बताता है या कहता है कि आने वाली है। उसके लिए जब आ जाती है वही तो राइट टाइम है।
दिन में डाकिये का कुछ निश्चित नहीं रहता कि कब आयेगा और उससे भी ज्यादा तो कोरियर वाले का पता नहीं कि जाने कब आ जाये। सम्पादक की रचना की स्वीकृति अस्वीकृति का पता नहीं रहता कब आ जाये और फिर रचना छप जाने के बाद उसके पारिश्रमिक का भी पता नहीं रहता कि कब आ जाये ज्यादातर तो नहीं ही आता क्योंकि सम्पादक एक टुच्ची सी राशि भेजकर आपका अपमान नहीं करना चाहता, और अगर ज्यादा मिलना होता तो उसके रिश्तेदार क्या मर गये थे जो वो आपसे लिखवाता।
टेलीफोन ऐसा ही उपकरण है कि जाने कब उसकी घन्टी बज जाये। जाने कब मोबाइल पर एसएमएस आ जाये भले ही वो ऐसी रिंगटोन का हो जिसे सुनकर आपको भी शर्म आये और आपसे वार्तालाप करने वाले को भी।
समय बदल जाने से मेहमान तो अब अतिथि नहीं रहे और वे फोन करके ही आते हैं पर अब घर के लोगों का पता नहीं रहता कि वे कब आयेंगे! अपना घर है कभी भी चले चलेंगे।
सरकारें अविश्वास प्रस्ताव के बारे में सोचती रहती हैं कि वह जाने कब आ जाये।
संत कहते हैं कि- राम नाम रटते रहो धरे रहो मन ध्यान, कबहुँ दीन दयाल के भनक परेगी कान। जाने कब उनके कान में हमारे द्वारा लिया हुआ उनका नाम पड़ जाये। जाने कब सीप के मुँह में स्वाति की बूंद पड़ जाये। दीन दयाल की अदालत में कोई र्रोज रोज सुनवाई थोड़े ही होती है। वहाँ भी कम अन्धेर नहीं है। जाने कब, जाने कब, कहीं कोई ठिकाना नहीं अब तो आठ बजने का भी ठिकाना नहीं रहता कि जाने कब बज़ जायें!
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

मंगलवार, जून 08, 2010

व्यंग्य - जनता की पेंशन सरकार की टेंसन

व्यंग्य
जनता की पेंशन, सरकार का टेंशन
वीरेन्द्र जैन
वैसे तो जिन्दा लोग सरकारों के लिए हमेशा ही मुसीबत पैदा करते रहते हैं और प्रख्यात समाजवादी चिंतक रामनोहर लोहिया ने कहा भी है कि जिन्दा कौमें पॉच साल तक इन्तजार नहीं करतीं पर ये जिन्दा लोग भिन्न कारण से मुसीबत बन गये हैं॥ जब सरकार ने पेंशन योजना के बारे में सोचा होगा तो उसे यह उम्मीद नहीं रही होगी कि हमारा कर्मचारी बिना रिश्वत खाये तथा आधी तनखा पाकर बीमारियों से घिरे बुढापे को इतना लम्बा खींच ले जायेगा । उसकी सोच रही होगी कि पेंशन को क्लीयर करवाने में ही वह आधा मर जायेगा, फिर क्लीयिर होने के बाद पेंशन लेने जाने के धक्कों में कही टें बोल जायेगा, और रिश्वत न मिलने से हींड हींड कर वह अपनी बाकी जान दे देगा। पर अब ऐसा नहीं हो रहा। रिटायरमेन्ट के बाद भी पट्ठा जिन्दा है, और शान से जिन्दा है। च्ववनप्राश, केशर और शिलाजीत खाकर सीढियॉ चढ रहा है और सुईयों में बिना चश्मा लगाये धागा डाल रहा हैं। पेंशन के बढ़ते बिलों को देखकर सरकारों को टेंशन हो रहा है और पेंशन धारक चैन से सौ रहा है।

सरकारें सोचती हैं ये मरता क्यों नहीं। उसने स्वास्थ सेवाओं को सशुल्क कर दिया, सरकारी, अस्पतालों को नरक में बदल दिया, डॉक्टरों से प्राइवेट प्रेक्टिस कराने लगी, दवाइयों के दाम आसमान में पहुँचा दिये पर ये आदमी है कि कछुआ या काक्रोच जो मरता ही नहीं। पहली तारीख को सुबह से बैंक में लाईन लगा कर खड़ा हो जाता है। लाओ हमारा कर्ज चुकाओ। साहूकार और मकान मालिक भी इतना तिथि और समय का पावन्द नहीं होता जितना कि पेंशन लेने वाला। आदमी मकान मालिक, दूध वाले, अखबार वाले, आदि से इतना नहीं घबराते जितने बैंक वाले पैंशन धारकों से घबराते हैं । साढ़े दस, माने साढे दस काउन्टर वाला, काउन्टर पर नही आ पाता पर पैंशनर आ जाता है। बैंक में अपने जिन्दा होने का प्रमाण पत्र स्वंय देना पड़ता है, वह उसके लिए तैयार है- मै घोषित करता हूँ मै जिन्दा हूँ आप गवाही लीजिए, मैं जिंदा हूँ और सचमुच सम्पूर्ण जिन्दा हूँ। सरकार ने सामूहिक बीमा योजना के अन्तर्गत मेरे एक हाथ के पॉच हजार, दोनो हाथों के दस हजार के अनुपात में पच्चीस हजार तक बीमा करवा रखा था पर मैने उस राशि में से एक पैसा भी नहीं वसूला तथा अपने सारे अंगों प्रत्यंगों के साथ जिन्दा हूँ। बिना टीका लगवाये भी मुझे हैपिटाइटिस - बी नहीं हुआ और कोई सावधानी रखे बिना भी एड्स नहीं हो रहा। नालों का सर्व मिश्रित जल भी मेरे लिए संजीवनी हो रहा है और जो खाने को मिल रहा है उसी में सारे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेड, विटामिन और मिनरल्स निकल आते हैं।
लाईये पेंशन निकालिये।
एक सरकार ने कहा था कि केवल पचहत्तर वर्ष तक ही पेंशन मिलेगी शेष जीवन हिमालय की कन्दराओं में बिताने के लिए जाना होगा तथा कन्दमूल फल खाना होगा, पर पेंशनधारियों ने वह सरकार ही बदल दी। उसके मंत्री ने सोचा था कि सबकी जन्मकुण्डलियों को देखकर ही नियुक्ति दी जायेगी ताकि ज्यादा दिनों तक पेंशन न पा सकने वालों की ही नियुक्ति हो इसके लिए उसने विश्वविद्यालयों में ज्योतिष की पढ़ाई शुरू करवा दी पर उसने अपनी जन्म कुण्डली पता नही किस ज्योतिषी से दिखवायी कि वह खुद ही पराजित होकर मुंह के बल गिरा जबकि उसने महूर्त दिखवाकर ही पर्चा भरा था।

सरकार ने पेंशनधारियों के जमा पर ब्याज दर कम कर दी ताकि कुछ फर्क आये पर वह भी नहीं आया। उसने गैस, मिट्टी का तेल, पेट्रोल डीजल, टेलीफोन, बिजली, सबकी दरें बढ़ा दीं पर पैशनर पहली तारीख को फिर भी बैंक में खड़ा मिला। भूले भटके एकाध पेंशनर मर भी जाता तो सौ दूसरे खड़े हो जाते- लाओ पैंशन, लाओ पेंशन्।
सरकारी कर्मचारी पूरी जिंदगी नौकरी ही इसलिए खीचता है ताकि उसे पेंशन मिल सके। बिना काम किये हुये धन का मिलना किसे अच्छा नही लगता जो मजा वेतन में नही आता वह पेंशन में आता है। वेतन अपनी बीबी है पर पेंशन परायी बीबी लगती है। रहीम आज होते तो कहते-

गौधन गजधन वाजधन
और रतनधन खान
जब मिल जावे पेंशन
सो सबधन धूरि समान

भूतपूर्व सांसदों विद्यायकों ने तो इसीलिए अपनी पैंशन पहले से तय कर ली है।

वीरेन्द्र जैन
21शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425श74श29

शुक्रवार, मई 14, 2010

व्यंग्य- मुहावरे में कुत्ता


व्यंग्य
मुहावरे में कुत्ता
वीरेन्द्र जैन
कुत्ता बहुत पुरानी जाति है। पाण्डव स्वर्ग जाते हुये अपने कुत्ते को स्वर्ग में भी साथ ले गये थे और उसके बिना युधिष्टर ने स्वर्ग में जाने से भी मना कर दिया था। तब से ही यह परम्परा चल पड़ी है कि जो भी बड़ा आदमी कहीं जा रहा है उसके पीछे पीछे उसके कुत्ते भी जाते हैं। परम्परा बड़ी खराब चीज़ होती है जो चलती चली जाती है। पिछले दिनों जब अमेरिका के प्रेसीडेंट भारत आये थे तब गान्धीजी की समाधि पर जाने से पहले उनके कुत्तों ने गान्धीजी की पूरी समधि को सूंघा था। वे सोचते होंगे कि क्या पता ये गान्धी अब पुराने गान्धी न हों और अचानक ही समाधि से उठ कर धायँ धायँ कर दें। अमेरिका ने इतने पाप किये हैं कि उसके पदाधिकारियों को हरेक से डर लगता रहता है।
किसी ज़माने में कुत्ते पुलिस के विशेषण की तरह याद किये जाते थे किंतु बहुत दिनों से पुलिस वालों ने उस विशेषण से पीछा छुड़ा लिया है क्योंकि अब राठौर जैसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ और भी बड़े बड़े विशेषण जुड़ने लगे हैं। किसी ज़माने में किसी कवि ने लिखा था कि - कुत्ता कहने से बुरा मानते पुलिस वाले
रक्खा निज ठौर का फिर नाम कुतवाली क्यों
राजनीति को सर्वग्रासी कहा जाता है सो वो अब विशेषणों से लेकर गालियों तक सब कुछ हज़म करने लगी है। गालिब पहले ही कह गये हैं कि – गालियाँ खा के बेमज़ा न हुआ। किसी ज़माने में जब राम जेठमलानी भाजपा में थे तब उन्होंने बोफोर्स काण्ड पर राजीव गान्धी से प्रति दिन दस सवाल पूछने का सिलसिला शुरू किया था शायद वे राजीव जी की क्षमता पहचानते थे और नहीं चाहते होंगे कि एक दिन में ज्यादा सवाल पूछ कर सारे उत्तर एक साथ माँगे जायें। राजीवजी ने उनके किसी सवाल का तो उत्तर नहीं दिया था अपितु इतना भर कहा था कि कुत्ते भौंकते ही रहते हैं। प्रति उत्तर में अपने समय के नामी वकील जो अभी मनु शर्मा की वकालत करने में भी बिल्कुल नहीं शरमाये थे उत्तर में कहा था कि कुत्ता चोर को देखकर ही भौंकता है।
लोगों के शौकों का पता धीरे धीरे ही चलता है हाल ही में पता चला है कि भाजपा के नये अध्यक्ष नितिन गडकरी को मुहावरे दार भाषा बोलने का बहुत शौक है और इसी शौक के वशीभूत उन्होंने कह दिया कि लालू और मुलायम कुत्ते की तरह सोनिया जी के तलुवे चांटते है। अब ये बात काँग्रेसियों को कैसे हज़म हो सकती है कि उनके हक़ को दूसरी पार्टी के लोग हड़प जाएं। उन्होंने विरोध किया तो भारतीय संस्कृति के गौरव माननीय गडकरी जी ने कहा कि उन्होंने तो मुहावरे में कुत्ता कहा था। कल्पना करें कि अगर उन्होंने उक्त स्पष्टीकरण नहीं दिया होता तो हो सकता था कि लोग सोचते कि सोनिया जी के तलुवे इतने साफ सुथरे इसलिए रहते हैं। यह् रहस्य अब समझ में आया।
आदरणीय गडकरीजी जब मुहावरेदार भाषा का प्रयोग करते हैं तो उन्हें पता ही होगा कि हिन्दी में मुहावरों का भण्डार भरा हुआ है। इनमें से कुछ हैं- राम नाम जपना पराया माल अपना मुँह में राम बगल में छुरी राम मिलायी जोड़ी, इक अन्धा इक कोड़ी राम नाम ले हज़म कर गये, गौशाला के चन्दे इत्यादि मुहावरे कम पड़ जायें तो इस अकिंचन को सेवा का अवसर दें। आप जैसे मुहावरेदार महानुभाव की सेवा करके मुझे बड़ी खुशी होगी।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629