शुक्रवार, नवंबर 11, 2011

व्यंग्य मगर मच्छ के आंसू

व्यंग्य
                              मगरमच्छ के आंसू
                                                              वीरेन्द्र जैन
      आज मैंने जब से अडवाणीजी की भरी हुयी आँखों वाला फोटो देखा है तब से आंसू ही आंसू याद आ रहे हैं। संयोग है कि जिस दिन अडवाणीजी की आंसू भरी खबर छपी उसी दिन के दैनिक भास्कर के आज का शब्द स्तम्भ में लार पर विचार किया गया था। इसमें बताया गया था कि
      हिन्दी का लार शब्द संस्कृत के लाला शब्द से बना है। प्यार और प्रेम की भावना का आद्रता से रिश्ता होता है। आकर्षण हो या अन्य खिंचाव, परिणति आद्रता ही है।, दुलार, दुलारना जैसे शब्द इसी कड़ी से बँधे हैं। दुलारा, या दुलारी वही है जो स्नेहासिक्त है। जिसे प्यार किया गया है। जिसे प्यार किया जाता है वही है लाल। प्रिय, सुन्दर, मनोहर, मधुर, आकर्षक और क्रीड़ाप्रिय ही ललित है।  
      रामभरोसे मेरे यहाँ जब भी आता है चाय आने तक अखबार जरूर पढता है और बुन्देली की कहावत- बनी ना बिगारें तो बुन्देला काय के- की तरह उपरोक्त पढने के बाद पूछने लगा कि क्या लार आँखों से भी टपकती है।
      मैंने कहा, क्यों नहीं सड़क पर लड़कियों को देख कर तुम्हारे जैसे छिछोरों की लार ही तो टपकती रहती है।
      तो फिर ये अखबार वाले उन्हें आँसू क्यों कहते हैं? उसके इस सवाल का मेरे पास कोई जबाब नहीं था।
      अडवाणीजी फिल्मों से जुड़े रहे हैं। उनकी पत्रकारिता का अनुभव यह है कि वे पहले फिल्मी पत्रिकाओं में समीक्षाएं लिखते थे। वे पढते भी खूब हैं पर उनके द्वारा पढी जाने वाली किताबों में स्वेट मार्टिन की सफल कैसे हों जैसी किताबें रहती हैं। वे जब लिखते हैं तो आत्मकथा लिखते हैं जो उतनी ही उतनी ही सत्य है जितनी कि सत्य कथाएं होती हैं। जब पहली बार जनता पार्टी शासन में उन्हें स्थान मिला था, तब उन्होंने सूचना और प्रसारण विभाग ही पसन्द किया था जिससे कि कलाकारों से निकट रहने का अवसर मिल सके। कुल मिला कर वे अभिनय से कैरियर बनाने के क्षेत्र से जुड़े महापुरुष हैं जिन्हें प्रधानमंत्री बनने के लिए इस समय अपनी छवि सुधारना है। भाजपा में वैसे भी चरित्र से ज्यादा छवि सुधारने पर ध्यान दिया जाता है। जो जाम उठा कर पैसा खुदा तो नहीं पर खुदा से कम भी नहीं कहते हुए कैमरे में कैद हो जाते हैं वे छवि सुधारने के लिए ईसाई बन गये आदिवासियों के पैर धो उन्हें हिन्दू बना कर अपनी छवि सुधारने की कोशिश करते हैं तथा रुपयों में लेकर डालर में माँग करने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष स्तीफा देकर छवि सुधारते हैं और अपनी पत्नी को टिकिट दिलवा देते हैं।
      जिगर का दर्द जिगर में रहे तो अच्छा है
      ये घर की बात है, घर में रहे तो अच्छा है
      एक फिल्मी गीत में कहा गया है कि- आँसू मेरे दिल की जुबान हैं, तुम कह दो तो रो दें आंसू, तुम कह दो तो हँस दें आंसू..............। एक दूसरे गीत में भी कहा गया है हजारों तरह के ये होते हैं आंसू, अगर दिल में गम हो तो रोते हैं आंसू, खुशी में भी आँखें भिगोते हैं आंसू , इन्हें जान सकता नहीं ये जमाना। मैं खुश हूं मेरे आंसुओं पै न जाना.............। अभिनय की दुनिया से जुड़े लौहपुरुष भी आँसुओं का तरह तरह से उपयोग करके अपनी कट्टरतावादी छवि का मेकअप करने लगे हैं ताकि कट्टरता मोदी के हिस्से में चली जाय और ये अटल बिहारी का मुखौटा ओढ लें। 6 दिसम्बर 92 को जब रथयात्री का रूप धर कर बाबरी मस्जिद ध्वंस कराने पहुँचे थे तब दिल्ली सम्हालने के लिए नियुक्त अटल बिहारी ने संसद में कहा था कि जब बाबरी मस्जिद टूट रही थी तब अडवाणीजी का चेहरा आँसुओं से भरा हुआ था। समझने वाले समझ सकते हैं कि ये आंसू गम के थे या खुशी के थे। दूसरी बार जब रंग दे बसंती फिल्म को गुजरात में चलने नहीं दिया गया था और फिर भी उस बेहतरीन फिल्म ने रिकार्ड तोड़ सफलता पा ली थी तो अडवाणी जी को लगा था कि आमिर खान की लोकप्रियता से पार्टी को नुकसान हो सकता है। इसकी भरपाई करने के लिए वे उसकी अगली फिल्म तारे जमीं पर देखने पहुँच गये और फिल्म देख कर इस तरह रोये कि पत्रकारों तक को भ्रम हो गया कि अडवाणीजी के सीने में दिल भी है। छवि सुधारने वाली इस यात्रा में भी वे बार बार रो कर अपनी छवि से कट्टरता का धब्बा धुलवा लेना चाह्ते हैं। वे 2002 में गोधरा और उसके बाद हुए गुजरात के नरसंहार पर फैसला आने पर कुछ नहीं कहते जिससे उनके आँसुओं पर हँसी आती है। गुजरात के दंगा पीड़्तों और आस्ट्रेलियन फादर स्टेंस को दो मासूम बच्चों अहित जिन्दा जला दिये जाने पर जब यही काम अटल बिहारी ने किया था तब अडवाणीजी हत्यारों की रक्षा करने की ड्यूटी निभा रहे थे, सो मोदी को सबसे योग्य मुख्यमंत्री बताया था।
      अभिनय तो आवश्यकता अनुसार ही किया जाता है।
वीरेन्द्र जैन
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रविवार, नवंबर 06, 2011

ज्ञानपीठ देने वाले कर कमल


व्यंग्य
                      ज्ञानपीठ देने वाले कर कमल
                                                            वीरेन्द्र जैन
      अगर मुझे ज्ञान पीठ पुरस्कार मिला तो..............
      मेरी बात पूरी होने से पहले ही मेरा साहित्यिक मित्र इस विश्वास से हँसने लगा जैसे कि मैंने कोई बहुत बड़ा मजाक कर दिया हो। कुछ लोग अन्ध विश्वास की हद तक आश्वस्त हैं कि मुझे ज्ञान पीठ नहीं मिल सकता, इसलिए वे मेरा वाक्य ही पूरा नहीं होने देते, भले ही उसके पहले अगर लगा रहता हो।
     
पर भाई मैं कह रहा हूं, अगर मिला तो ...
      तो क्या करोगे वापिस कर दोगे! याद है कि जब दिनकर को पुरस्कार मिला था उसी समय ज्याँ पाल सात्र ने नोबुल पुरस्कार को आलू का बोरा कह कर लेने से इंकार कर दिया था, तब पत्रकारों ने दिनकर जी से पूछा था कि क्या आप इसे स्वीकार कर लेंगे! तब उन्होंने उत्तर दिया था कि पुरस्कार को ठुकराना उसे दुबारा माँगना है
      अगर तुम अपना उथला ज्ञान झाड़ चुके हो तो बताऊँ कि अगर मिला तो मैं किसके कर कमलों से लेना पसन्द करूंगा।
      मिलेगा तब न, दूसरी बात यह है कि जैसा अंग्रेजी में कहा है कि बैगर्स आर नेवर चूजर्स या हिन्दी में ही समझ लो कि दान की बछिया के दाँत नहीं देखे जाते। लेने वाले तो कटोरा लिये बैठे रहते हैं कि कोई भी दे दे। वो एक फिल्मी गाना है कि रुपया नहीं तो डालर चलेगा, कमीज नहीं तो कमीज का कालर चलेगा पर दे दे इंटरनेशनल फकीर आये हैं। पर चलो बता ही दो कि अ..ग..र.. तुम्हें मिलेगा तो किसके कर कमलों से लेना पसन्द करोगे!
      मैं किसी राजनेता की जगह किसी साहित्यकार के हाथों लेना पसन्द करूंगा, जैसा कि अज्ञेय जी ने किया था। मैंने गरदन को जिराफ की तरह ऊंची करते हुए कहा। ऐसा करने से गरदन में लगी पिछली चोट दर्द करने लगी।
     
वैसे तो अभी बहुत लम्बी लाइन लगी हुयी है जो ज्ञानपीठ के लिए मुँह इत्यादि बाये हुए बैठे हैं, और ज्ञानपीठ मुँह में गंगाजल की तरह डालने की परम्परा है इसलिए अ..ग..र.. तुम्हारा नम्बर आया भी तो.... ऐसा कौन सा महान साहित्यकार होगा जो ऐसा दुर्दिन देखने के लिए बचा होगा? मित्र ने अपना मित्रता धर्म निभाते हुए सारा जहर उगल दिया।
      तो क्या हुआ मैं किसी दिवंगत साहित्यकार के सुपुत्र के हाथों ग्रहण कर लूंगा जैसे अभी अभी एक राष्ट्रीय स्तर के शहरयार ने ग्रहण किया है।  मैं सम्भावना को खारिज नहीं होने देना चाहता था।
     
तब ठीक है। जब एक रुपये में परमानन्दा कराने वाले, और यूनियन कार्बाइड की एवरेडी बैटरी बेच कर नरेन्द्र मोदी के ब्रांड एम्बेसडर के हाथों जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पुरस्कार ले सकते हैं तो तुम्हारी क्या औकात! पर हाँ मैं तुम्हारे लिए एक नाम सुझा सकता हूं वह बोला।
      मैं जानता था कि वह जब भी बोलेगा तब जला कटा ही बोलेगा पर फिर भी कहा कि सुझाओ!
      तुम अभिषेक के हाथों से पुरस्कार ले सकते हो वह बोला।
      मुझे लगा कि अब बारी मेरी है इसलिए छूटते ही कहा कि वह तो साहित्यकार का बेटा नहीं है अपितु मेरे अंगने में तुम्हारे काम के बारे में पूछने वाले का बेटा है
      तुम जब भी सोचोगे उल्टा ही सोचोगे अरे भइ मैं उस अभिषेक की बात नहीं कर रहा हूं जिसकी गिनती बच्चन में आती है.....
      तो किस अभिषेक की बात कर रहे हो? मैं चकराया
      मैं तो सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीकांत वर्मा के बेटे अभिषेक की बात कर रहा हूं ऐसा कह कर वह कुटिलता से मुस्कराया। मैंने भी नजरें झुका कर कहा अरे मिलने तो दो।
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, अक्टूबर 24, 2011

हनुमतभक्ति के पुनर्जागरण का समय

      व्यंग्य
                     ओबामा की हनुमत भक्ति क्या फिर से जगेगी
                                                               वीरेन्द्र जैन
      अमेरिका में फिर से चुनाव आने वाले हैं और बराक ओबामा हमारे अडवाणीजी की तरह फिर से उम्मीदवार बनने के लिए नारद लीला खेलेंगे। चुनावी अभियान में अमेरिका के मतदाता तो उनसे हिसाब माँगेंगे ही माँगेंगे पर इस अवसर पर कुछ हिसाब उनसे हमें भी माँगना है। लोकतंत्र में हिसाब चुकता करने की दीवाली आमचुनाव ही होते हैं।
      पिछले चुनाव में उन्होंने अमेरिका में रह रहे हिन्दुस्तान के लाखों प्रवासियों के साथ साथ हिन्दुस्तान के धर्मप्रेमियों का दिल वगैरह जीत लिया था। जब ये पता चला था कि वे पवन सुत अंजनिनन्दन हनुमानजी के भक्त हैं और पेंट की जेब में जो टोटके डाल कर चलते हैं उनमें चाबी के छल्ले जैसी एक धातु से बनी पर्वत लेकर उड़ते हुए हनुमानजी की मूर्ति भी है, तो हम उनकी बलैयां लेने लग गये थे। दिल्ली में रहने वाले बजरंगबली के भक्तों ने तो पीतल की एक बड़ी मूर्ति भी उन्हें फ्री भेजी थी। वे सोचते थे कि अमरीका में भी
वहीं अर्थात व्हाइट हाउस में मन्दिर बन जायेगा। पर चुनाव जीतने के बाद वे भी भाजपा हो गये और उनकी हनुमत भक्ति का कहीं कोई अता पता नहीं चला, जबकि बजरंगदल वाले तो उन्हें अपना सदस्य बनाने कट्टा लेकर जाने वाले थे, कट्टा माने वो वाला कट्टा नहीं, रसीद कट्टा। सोचते थे कि लगे हाथ दुनिया के सबसे बड़े सेठ से गौशालाओं, रामलीला, गणेश भगवान और दुर्गाजी की झाँकियों के लिए चन्दा भी लेते आयेंगे। धर्म के काम में कोई मना कैसे कर सकता है! पर वे नहीं गये। हो सकता है कि वे ये सोच के रुक गये हों कि ओबामाजी के समय में न केवल वहाँ के बैंक ही धड़ाधड़ रूप से फेल हुए अपितु पूरी वित्त व्यवस्था ही मन्दी के दौर में आ गयी। अब इन गरीबों से क्या तो माँगना, जो खुद ही दूसरे देशों की लुटाई करने के लिए कभी ओसामा के छुपे होने का बहाना लेता है तो कभी जैविक हथियारों के बहाने ईराक पर हमला कर सद्दाम को फाँसी चढा देते हैं।
      भाजपा वाले उन्हें विदेशी मदद की ओट लेने वाली अपनी जेबी संस्था अब्राड फ्रैंड्स आफ बीजेपी में शामिल करना चाहते थे क्योंकि ओबामा को इसलिए वे संस्था की सदस्यता के लिए सुपात्र समझते थे कि वे भी उन्हीं की तरह चुनावों के समय धार्मिक प्रतीकों से मतदाता को बहकाने की कूटनीति अपनाते हैं। जैसे भाजपा ने केन्द्र में सत्ता पाने के बाद राममन्दिर के मुद्दे को फिलहाल दबा कर रख दिया था वैसे ही ओबामाजी ने व्हाइट हाउस में दिल्ली वालों की भेजी गयी मूर्ति को उठाकर रख दिया होगा। हो सकता है कि अब चुनाव आने पर उसे फिर से धो पौंछ कर सामने ले आयें। विश्व हिन्दू परिषद को चन्दा देने वाली जिस सोनल शाह को उन्होंने अपना सलाहकार बनाया था उन्होंने बाद में उन्हें कौन कौन सी सलाहें दीं ये पता ही नहीं चला, पर अमेरिका का भट्टा जरूर बैठ गया और अगर हिन्दुस्तान अमेरिका की सलाहों पर चलता रहेगा तो उसका भट्टा जो अभी खड़ा भी नहीं हुआ है वह बिल्कुल ही धसक जायेगा। हो सकता है कि ये सोनल शाह की ही सलाह हो कि हिन्दुस्तान में अगला चुनाव नरेन्द्र मोदी और राहुल गान्धी के बीच करा दिया जाये। हो सकता है कि उन्होंने मोदी का वीजा भी क्लीयर करवा दिया हो, क्योंकि मत्था टेकने तो वहीं जायेंगे।
      हाँ जाने से पहले वे जार्ज फर्नांडीज के साथ उनके अनुभवों को साझा कर सकते हैं बशर्ते कि जार्ज की याददाश्त वापिस लौट आयी हो, और वे अपनी सगी पत्नी व सगी मित्र और सगे इकलौते मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बोलने की अनुमति प्राप्त कर सकें।
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, अक्टूबर 11, 2011

व्यंग्य- टोपी और सद्भावना

व्यंग्य
टोपी और सद्भावना
वीरेन्द्र जैन
      नरेन्द्र मोदी ने अपने सद्भावना उपवास में टोपी न पहिन कर अपनी सद्भावना की रक्षा कर ली। ठीक किया। ये भी कोई बात हुयी कि नौटंकी की स्क्रिप्ट हमारी और डायलाग आप अपने डालने लगें। ये तो मौलाना थे, कल के दिन कोई दिगम्बर जैन मुनि आ जाता और अपने अनुसार आग्रह करने लगता तो क्या होता। वैसे भी दुनिया भरके मीडिया और जाँच आयोगों ने कौनसी कसर छोड़ रखी है।  छह करोड़ गुजरातियों के गर्वीले मुख्यमंत्री जैसी चाहें सद्भावना बनायें और जैसी चाहें बिगाड़ें उनकी मर्जी। उनका हर काम प्रतिनिधित्व में होता है, पिछले दिनों उन्हें दस्त लग गये थे तब उन्होंने एक पत्रकार से फोन पर बात करते हुए बताया था कि छह करोड़ गुजरातियों को दस्त लग रहे हैं।
      वैसे भी सद्भावना का कोई तयशुदा मौसम या त्योहार तो होता नहीं है इसलिए भाजपा के मुख्यमंत्री को ही तय करना होता है कि अपने प्रदेश में कब सद्भावना बिगाड़ना है और कब बनाना है। वे कोई कांग्रेस के मुख्यमन्त्री तो हैं नहीं कि ईद के दिन जालीदार गोल टोपी पहिनकर गले मिल लिये और हो गयी सद्भावना, बाकी समय संघ और सिमि पर छोड़ दिया कि जितनी बिगड़ना हो सो बिगाड़ लो। इतना ही नहीं कैसे बनाना है और कैसे बिगाड़ना है यह भी मुख्यमंत्री के ही विभागों में आता है। पिछले दिनों गलती हो गयी थी सद्भावना बनाने बिगाड़ने का काम दूसरे मंत्रियों पर छोड़ दिया था सो एक जेल में है और दूसरे को तड़ीपार रहने के आदेश हुए हैं। कानून के लम्बे हाथों से बचने के तरीके सब को तो नहीं आते।  
      उन्होंने सद्भावना के लिए उपवास करना तय किया जबकि बिगाड़ने के लिए क्रिया की प्रतिक्रिया तय की थी। अब ये बात दूसरी है कि क्रिया किसी ने की हो और प्रतिक्रिया किसी पर की जा रही हो। जब एक मुख्यमंत्री क्रिया की अन्धी प्रतिक्रिया करा रहा हो तो वह अपनी सरकार की नाकामी तो पहले ही से मानकर चल रहा होगा, बरना प्रतिक्रिया के लिए तो पुलिस और न्याय विभाग बनाये ही गये हैं। क्रिया प्रतिक्रिया के लिए किसी धर्म के सभी अनुयायियों को एक मान लेते हैं पर संसाधनों के बंटवारे के लिए सब अलग अलग हैं। खीर मैं सौंझ, महेरी में न्यारे। ये भी नहीं कहते कि सारे मुसलमानों की सम्पत्ति को भी एक कर दें और सारे हिन्दुओं की सम्पत्तियों को एक कर दें जिससे लोग कम से कम अपनी मौलिक जरूरतें पूरी कर सकें। पूरे गुजरात की सद्भावना बनाना है तो छह करोड़ गर्वीले गुजरातियों की सम्पत्ति को ही एक कर दें। पर यह वे सोचते भी नहीं।
      वैसे 2002 के समय जब सद्भावना बिगाड़ी गयी थी तो जो लोग मारे गये थे वे भी गर्वीले गुजराती ही थे और जो पुलिस उनकी रक्षा करने की जगह जब हाथ पर धरे बैठने को मजबूर कर दी गयी थी, वह भी गर्वीले गुजरात की ही थी। जो लोग मार रहे थे वे भी गुजराती ही थे और जो मर रहे थे वे भी गुजराती ही थे। गली गली में गीता का पाठ गूँज रहा था। सब में एक ही आत्मा का बास है। वैसे गोधरा घटना के कुछ ही घंटों बाद देश के तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने इसमें पाकिस्तान का हाथ बता दिया था जिससे उम्मीद बँधती थी कि प्रतिक्रिया पाकिस्तान के खिलाफ होगी पर हुयी गर्वीले गुजरातियों के एक हिस्से पर। पता नहीं उनका पाकिस्तान कहाँ पर है। मोदीजी किस गुजरात की अस्मिता पर किससे खतरा महसूस करते हैं। वे कहने लगते हैं कि वे केन्द्र सरकार को टैक्स देना बन्द कर देंगे, जैसे गुजरात देश से बाहर हो। उन्हीं की तर्ज पर बिगड़े मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अपना स्वर्णिम मध्य प्रदेश अलग बना कर उसका अलग से मध्य प्रदेश गान बनवा लेते हैं। अपने पार्टी हित में देश को छोटे छोटे राज्यों में तोड़े जाने की हिमायती यही पार्टी राष्ट्रभक्ति का लबादा ओढे फिरती है। छोटे राज्यों में सामान्य तौर पर बहुमत क्षीण होता है जिससे कुछ ही विधायक खरीदने पर सरकार बनाने का मौका मिल जाता है। एक बार सरकार बनाने का मौका मिल जाये तो मधु कौड़ा बनते देर नहीं लगती, सब वसूल हो जाता है।
      नरेन्द्र भाई दामोदरदास मोदीजी ने सद्भावना के लिए उपवास करने का तब सोचा जब सद्भावना के सामने कोई बड़ा खतरा नहीं था। गान्धी जयंती के दिन एक तथाकथित गान्धीवादी नेता गान्धी की मूर्ति के नीचे मगरमच्छी आंसू बहाते हुए कह रहे थे, बापू आप क्यों चले गये, हम अनाथ हो गये हैं............. वगैरह वगैरह। बापू को उनके आंसू देख कर दया आ गयी और वे मूर्ति में से प्रकट हो कर बोले बेटे मैं आ गया हूं। गान्धी को देख कर नेता सकते में आ गया और उसने जेब से पिस्तौल निकाल कर पूरी छह गोलियां गान्धी के सीने में उतार दीं।
      मोदी की सद्भावना भी ऐसी ही आभासी थी। टोपी पहिनाने वाले को गलतफहमी हो गयी थी सो मोदी ने सुधार दी। भोले भाले लोग जीवन और अभिनय में फर्क ही नहीं समझते।
वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, सितंबर 14, 2011

अडवाणीजी, पधारो म्हारे मध्य प्रदेश

व्यंग्य
                      अडवाणीजी, पधारो म्हारे मध्य प्रदेश
                                                               वीरेन्द्र जैन 

      भाजपा के पूर्व प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी लोहपुरुष अडवाणीजी ने एक और रथ यात्रा निकालने का फैसला कर लिया है। यह रथ यात्रा भ्रष्टाचार मिटाने के लिए होगी। उनकी पहली रथ यात्रा बाबरी मस्जिद मिटाने के लिए थी और यह भ्रष्टाचार मिटाने के लिए है। कभी देश से भाईचारा मिटाना चाहते हैं, तो कभी इतिहास की सच्चाई मिटाना चाहते हैं। ये अलग बात है बाबरी मस्जिद को छोड़ कर बाकी सब कुछ किसी तरह सुरक्षित बचा हुआ है।
      लोहपुरुष वाणी के धनी है, इसलिए उनकी बातों के कई कई अर्थ निकल सकते हैं, रही मंतव्य की सो वो तो आप समझ ही नहीं सकते। कहीं पै निगाहें कहीं पै निशाना वाला गाना तो आपने सुना ही होगा। जब नोट फार वोट में अमर सिंह के साथ भाजपा के भगौरा और कुलस्ते ही नहीं अपितु अडवाणीजी के सुधीन्द्र कुलकर्णी भी पुलिस पूछ्ताछ के घेरे में आ गये तो लोहपुरुष ने खुद ही दहाड़ लगा दी कि मुझे भी गिरफ्तार करो क्योंकि मैंने ही उन्हें संसद में नोट लहराने की अनुमति दी थी। जब सच को सामने आना ही है तो उसे खुद ही कह कर बहादुर बन जाने में क्या बुराई है। पर हाय री दुनिया, जिसके बारे में चचा गालिब कह ही गये हैं कि-
सियह बख्ती में गालिब कौन किसका साथ देता है
कि तारीकी में साया भी जुदा रहता है इंसा से
सो जिनके लिए यह सब किया उस पार्टी के लोगों ने भी किनारा कर लिया और उनकी प्रैस कांफ्रेंस में उनके ही चार लोग नजर आये। उन्हें कहना पड़ा कि वे यह काम पार्टी अध्यक्ष से अनुमति लेकर करने जा रहे हैं। इससे पहले कि जलूस निकले, रथयात्रा निकाल लो, और उसे भ्रष्टाचार विरोध का नाम दे दो ताकि जो दुखी लोग अन्ना हजारे की अपील पर निकल आये थे उन दुखी लोगों का समर्थन तो मिल जाये। जय श्री राम।
      आओ आओ लोहपुरुषजी पधारो म्हारे देश। देश यानि कि स्वर्णिम मध्य प्रदेश, यानि कि भारत का दिल नहीं तो पेट तो है ही। इस पेट में भ्रष्टाचार गैस की तरह फूल रहा है और नेताओं के लिए फल भी रहा है। वो गैस नहीं जो भोपाल में फैल गयी थी और उस कम्पनी से आपकी पार्टी चुनावी चन्दा लेती रही है, यह तो भ्रष्ट अचार से पैदा होने वाली गैस है, सो इसे निकालो। यहाँ मंत्री से लेकर संत्री तक और उद्योगपति से लेकर व्यापारी तक, अफसरों से लेकर अप्सराओं तक यह गैस इतनी बन रही है कि जब भी इनकम टैक्स वाले किसी के पेट को खोलते हैं तो अम्बार निकलता है। इस सड़ांध में आपका स्वागत है। आइए पहले अपने घर से ही श्री गणेश कीजिए। बुरा जो देखन मैं चल्या की तर्ज पर मुझ से बुरा न कोय के फैसले पर पहुँचने के लिए काहे को सड़कें नापते हैं, वहाँ कोई नहीं मिलेगा, वे मनरेगा में काम पर गये होंगे या अपने ड्राइंग़ रूम में क्रिकेट का मैच देख रहे होंगे। सड़कें अब वाहनों की अनियंत्रित दौड़ कराने के काम आ रही हैं।  यहाँ के सरकारी नेताओं ने अपनी विश्वसनीयता इतनी खो दी है कि आप पुकारने की हदों तक पुकार आइए पर लोग कानों में इयर फोन लगाये एफएम बेंड पर पुराने गाने सुनना ज्यादा ठीक समझते हैं। और तो और अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के लिए जुट जाने वाले भी आपकी सुनने नहीं आयेंगे।
      वैसे अगर मेरी मानो तो यात्रा नहीं वकील करो, पर रामजेठमलानी पर भरोसा मत करना। उन्हें अमर सिंह ने पहले ही तय कर लिया है और आपकी पार्टी से सांसद होते हुए भी उन्होंने गेंद को आपके पाले में उछाल दी है। नरेन्द्र मोदी ने पहले आपके सिन्धी बहुल चुनाव क्षेत्र से आशाराम बापू को नाराज कर दिया और अब रामजेठमलानी को आपके खिलाफ खड़ा कर दिया। गडकरी ने भी कह दिया कि पार्टी पहले से कोई प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित नहीं करेगी। लगता है कि मोदी को प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी बनने के लिए आपकी सम्भावनाओं को कम करना जरूरी लग रहा है।
 वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, सितंबर 01, 2011

व्यंग्य धर्म का रास्ता और रास्ते पर धर्म


व्यंग्य
                          धर्म का रास्ता और रास्ते पर धर्म
                                                            वीरेन्द्र जैन
      इस दुनिया में पता नहीं कब क्या हो जाये। अब इसी को देख लो कि मुझ जैसे नास्तिक के सीने में अचानक एक धार्मिक आत्मा अंगड़ाई लेने लगी है। अंगड़ाई की तुक लड़ाई से मिलती है इसलिए अंगड़ाई जैसे शुद्ध श्रंगार रस के शब्द के साथ लड़ाई जैसा वीर रस का शब्द जुड़ ही जाता है।
                     अभी तो ये अंगड़ाई है
                     आगे और लड़ाई है
सो आत्मा के अंगड़ाई लेते ही वह लड़ाई की तलाश करने लगी। अब मेरी समझ में आया कि जिनके अन्दर धार्मिक आत्माएं अंगड़ाइयां लेती हैं वे लड़ाइयां करने पर क्यों उतर आते हैं। ये सब तुकों का खेल है।
      एक धार्मिक व्यक्ति परहित की बहुत चिंता करता है सो वह दूसरों को स्वर्ग भिजवाने की चिंता में  दुबला हुआ जाता है। वह बहुत जोर से चिल्लाता है कि धर्म की रक्षा करो, धर्म के लिए जान दे दो जिससे तुम्हें स्वर्ग मिलेगा। तुम अपनी बीबी बच्चों को छोड़ कर मर जाओगे तो स्वर्ग में तुम्हें अप्सराएं मिलेंगीं। यहाँ पर तुम्हारी बीबी का खयाल हम और बच्चों का खयाल बीमा कम्पनी कर लेगी जो नई आर्थिक नीति आने के बाद विदेशों से फेल होकर अपने देश में कुकरमुत्तों सी उग आयी हैं। धार्मिक व्यक्ति इतना उदार होता है कि वह स्वर्ग जाने का अवसर दूसरों को ही देना चाहता है, जब अयोध्या में एक धर्म स्थल के लिए जान देने का पवित्र अवसर आया था तब उस के लिए आवाहन करने वाली पार्टी के नेताओं ने दरिद्र नारायणों के बच्चों को यह अवसर देने के लिए अपने बच्चों को घरों में कैद कर लिया था, या अमरीका भेज दिया था। अंत्योदय जैसा कुछ कुछ था जिसमें स्वर्ग जैसे सर्वोत्तम के लिए गरीबों का पहला हक बनता है।  
      देश में रथों की संख्या मनुष्यों की आबादी से होड़ ले रही है। बिना कोई मशीनरी बदले डीसीएम टोयटा रथ में मोटर साइकिलें उड़न तश्तरियों में बदलती जा रही हैं। जो वाहन पैट्रोल से चलने के लिए बनाये गये थे वे डीजल से चल रहे हैं और जो वाहन डीजल से चलने के लिए बनाये गये थे वे मिट्टी के तेल से चल रहे हैं जो राशन की दुकानों के लिए चलता है और सीधे पैट्रोल पम्प में पहुँच जाता है। जो चीज जहाँ से निकलना चाहिए वह वहाँ से नहीं निकल रही अपितु किसी बड़े बड़े बालों वाले बाबा की तरह हवा से निकल रही है। आप एक बाबा के खजाने और सेंटों के लिए रोते रहते हैं और यहाँ साईं ही साईं हैं जो डीजल पम्पों से मिट्टी का तेल निकाल कर दिखा रहे हैं। पर्यावरण के लिए काम करने वाले एनजीओ कहते हैं कि इससे पर्यावरण प्रदूषित होता है, और स्वास्थ का प्रोजेक्ट लिए हुए एनजीओ इस प्रदूषण से होने वाली बीमारियों की जो सूची गिनाते हैं उसे सुन कर तो मैं गिनती ही भूल जाता हूं।
अपने भीतर धार्मिक आत्मा अंगड़ाई लेते ही मुझे सड़क के किनारे बने धर्म स्थलों में बिराजे देवताओं के स्वास्थ की चिंता सताने लगती है। वे किस सीमा तक प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं यह सोच सोच कर अंगड़ाई लेती हुयी आत्मा काँप काँप जाती है। जो देवता कूलर लगा कर शयन करते हैं, निर्मल जल से स्नान करते हैं, शुद्धता पूर्वक बना परसाद ग्रहण करते हैं, वे साँस भी लेते ही होंगे तो उनके फेफड़ों में कितनी कार्बन डाई आक्साइड पहुँचती होगी। इस प्रदूषण से खाँसी से लेकर दमे तक कैसी कैसी बीमारियां हो सकती हैं। आखिर ये धर्मस्थल सड़क के किनारे क्या कर रहे हैं, इन्हें यहाँ से हटा कर किसी प्रदूषण मुक्त जगह में ले जाने के लिए मैं आवाहन करता हूं। मैं अगर सत्तर पार का होता तो आमरण अनशन के लिए रामलीला मैदान में बैठ जाता और दूसरों को इंतजाम का मौका देता, पर, अब इसके लिए मुझे किसी अन्ना को पकड़ना पड़ेगा।  
      देवताओं का सम्भावित दुख मुझसे देखा नहीं जाता। जब प्रदूषण कम था तब भी पहले वाले देवता ज्यादा समझदार थे सो कोई हिमालय पर चला गया तो किसी ने सागर की लहरों पर अपनी सेज सजा ली। पर अब तो सब कुछ सड़कों पर ले आया गया है दुकानें हों या धर्मस्थल अपनी सीमा से आगे अतिक्रमण किये बिना नहीं रह सकते। इसमें बाजार का नियम लागू होता है, जो दिखता है सो बिकता है। गली वाले धर्मस्थल पर भक्त भी नहीं पहुँचते।  
      दिखने के लिए झांकियों के पण्डाल बड़े बड़े बनाने पड़ते हैं, उनमें बड़ी बड़ी मूर्तियां
लगवानी पड़ती हैं। बिजली की कमी से रोते देश में दूर से दिखाई देने के लिए ये झांकियां कितनी बिजली पी जाती हैं इसका हिसाब लगाया जा सकता था अगर इसके लिए विधिवत कनेक्शन लेकर बिजली ली जाती होती।
      मैं आवाहन करता हूं कि धर्म प्रेमियो आओ और अपने आराध्यों को प्रदूषण से बचाने के लिए जुट जाओ। जिन पुजारियों ने तुम्हारे देवताओं को सड़क पर ला दिया है और अपने पेट के लिए उन्हें प्रदूषण की चपेट में ले आये हैं, उनसे मुक्त कराके उन्हें बाग बगीचों, हरेभरे पेड़ों. कल कल करते झरनों, लुभाती पर्वत मालाओं की ओर ले चलो यह मेरी अंगड़ाई लेती हुयी आत्मा कह रही है और इसके लड़ाई छेड़ने के लिए उकसा रही है।
अगर तुम में आत्मा है तो उकसो भाई थोड़ा तो उकसो। जन्नत में हूरें तुम्हारा इंतजार कर रही हैं।  
वीरेन्द्र जैन
2/1   शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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मंगलवार, जुलाई 26, 2011

vyangya- aur pyaare ye kaangres ek sarakas hai व्यंग्य- और प्यारे ये कांग्रेस एक सरकस है


व्यंग्य

और प्यारे ये कांग्रेस एक सरकस है,

वीरेन्द्र जैन

बरसों पहले राजकपूर की एक आत्मकथात्मक फिल्म आयी थी जिसका नाम था- मेरा नाम जोकर। इस फिल्म में नीरज का लिखा एक गीत था- ये भाई जरा देख कर चलो। इस गीत में जीवन दर्शन को व्यक्त करती कुछ पंक्तियां थीं-

और प्यारे ये दुनिया एक सरकस है,

और यहाँ सरकस में

बड़े को भी छोटे को भी

खरे को भी खोटे को भी

दुबले को भी मोटे को भी

नीचे से ऊपर को

ऊपर से नीचे को

आना जाना पड़ता है

और रिंग मास्टर के कोड़े पै

कोड़ा जो भूख है

कोड़ा जो पैसा है

कोड़ा जो किस्मत है

तरह तरह नाच के दिखाना यहाँ पड़ता है

हीरो से जोकर बन जाना पड़ता है....................

अब यदि मणिशंकर अय्यर ने कांग्रेस को सरकस कहा है तो क्या गलत कहा है। इस सरकस में भी दिवंगत अर्जुन सिंह जैसे बफादारों को भी गाना पड़ा था कि यहाँ बदला बफा का बेबफाई के सिवा क्या है और नारायन दत्त तिवारी को भी राज्यपाल से द्वारपाल तक नीचे से ऊपर को ऊपर से नीचे को आना जाना पड़ता है। बेचारे नारायन दत्त तो ऐसे मचल रहे हैं जैसे स्कूल में कभी छोटे बच्चे टीका न लगवाने के लिए मचला करते थे कि नहीं लगवायेंगे टीका। वे भी अपनी बाँह छुपाये छुपाये कह रहे हैं कि नहीं कराएंगे डीएनए टेस्ट । इस सरकस में कलमाड़ी की गाड़ी सीधे संसद से तिहाड़ के अगाड़ी तक चली जाती है। महाराष्ट्र के च्वहाण चूक कर दूसरे च्वहाण को तिजोरी की चाबी यह कहते हुए सौंप देते हैं कि खा चुके पेट भर कर के हम साथियो, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो। जगन मोहन को जब मुख्यमंत्री की विरासत नहीं मिलती तो सबसे ज्यादा इनकम टैक्स का टुकड़ा फेंक कर मैदान में खम्भ ठोकने लगते हैं। प्रणव मुखर्जी ममता बनर्जी के आगे दण्डवत हो जाते हैं और तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो, तुम्ही हो बन्धु सखा तुम्ही हो गाने लगते हैं। धर्मनिरपेक्षता की तूती बजाते बजाते केरल में कांग्रेस मुस्लिम लीग और ईसाइयों की पार्टी केरल कांग्रेस के आगे इतना झुक जाती है कि मुख्यमंत्री भले ही चाण्डी हों पर मुस्लिमलीग तय करने लगती है कि उसके कोटे से कितने मंत्री होंगे और पाँचवें मंत्री को कौन सा विभाग मिलेगा। हर प्रदेश में हर नेता की अपनी कांग्रेस होती है। मध्य प्रदेश में अगर किसी ने किसी से राजनीतिक सम्बद्धता के बारे में पूछ लिया और उसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस उत्तर मिला तो वो फटाक से पूछेगा कि कौन सी कांग्रेस, दिग्विजय सिंह, की या सिन्धिया या कमल नाथ की, या पचौरी की, या श्री निवास तिवारी की ? सबकी अपनी अपनी कांग्रेस है। यहाँ विपक्ष की नेता जब उपचुनाव लड़ती हैं तो कांग्रेस का उम्मीदवार अपना पर्चा गलत भर कर उनके जीतने की राह आसान कर देता है, भले ही लोकतंत्र को मजबूत करने वाले इस कदम के लिए लोग उसे भ्रष्ट समझते रहें। पजाब में मैडम दिलजीत कौर अकाली दल से कम लड़ती हैं पर महाराजा अमरेन्द्र सिंह से अधिक लड़ती हैं। एक कांग्रेस के हार जाने से दूसरी कांग्रेस की जीत हो जाती है। सबसे बड़े पद पर पार्टी में सबसे दूर के नौकरशाह को बैठा दिया जाता है जो लोकसभा का कोई चुनाव नहीं जीत सकता इसलिए अपने निवास के बारे में गलत बयानी करके उस राज्य से राज्यसभा में पहुँचता जहाँ वह कभी नहीं रहता। उसकी निष्ठा पार्टी में कम और वर्ल्ड बैंक में अधिक रहती है। सरकार गठबन्धन के लिए जिन दलों पर निर्भर रहती है वे गाड़ी में अपना अपना पहिया लगाये रहते हैं इसलिए कोई पहिया छोटा और कोई बड़ा रहता है। इस सरकस में सिंह बाहर घूमते रहते हैं और रिंग मास्टर पिंजरे से बाहर नहीं निकलते। जब मंत्रीमण्डल में परिवर्तन होता है तो पार्टी के नेता कहते हैं कि प्रधानमंत्री खो-खो खेल रहे हैं। पार्टी के नटवर नागर नटवरलाल साबित होते हैं।

नेता इस रिंग से उस रिंग में कूदने के लिए तैयार रहते हैं क्योंकि सबको भरोसा है कि नीचे कुछ लोग जाल पकड़े हुये हैं और नीचे गिरेंगे तो उछल के और ऊपर जायेंगे इसलिए नीचे गिरने से कोई नहीं डरता।

पर राजकपूर की फिल्म के गीत के अनुसार भी ये शो तीन घंटे का है और ये तीसरा घंटा चल रहा है जिसके बाद रहता है जो कुछ वो खाली खाली पिंजरे हैं, खाली खाली कुसियां हैं, और खोयी हुयी याद्दाश्त है। अगर याद्दाश्त खो जाये तो पता ही नहीं चलता कि हम पहाड़ में रह रहे हैं कि तिहाड़ में रह रहे हैं।

बहरहाल सरकस में ऊपरवाला वेरी गुड वेरी गुड, नीचे वाला वेरी बेड वेरी बेड, चल रहा है। पर कबीरदास कह गये हैं कि -

माटी कहे कुम्हार से तू क्या रूंदे मोय

इक दिन ऐसो आयगो मैं रूंदूंगीं तोय

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

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मोबाइल 9425674629