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शनिवार, दिसंबर 20, 2014

व्यंग्य कथा - लौट के हिन्दू घर को आये



व्यंग्य कथा

लौट के हिन्दू घर को आये



वीरेन्द्र जैन
       ये हिन्दुओं की घर वापिसी का युग है, पिछले आठसौ साल के बाद कोई हिन्दू राज आया है। वे लोग भी घर लौट रहे हैं जिन्हें पता ही नहीं है कि उनका घर कहाँ है और वे किस घर से कब और कहाँ गये थे। पर लौट रहे हैं। ऐसे ही एक घर लौटे हिन्दू ने एक विहिप वाले ठाकुरसाब की कोठी का दरवाजा खटखटा दिया।
कौन है बे? कोठी वाले हिन्दू वीर की आवाज़ गरजी।
मैं हूं शेख मुहम्मद उसने उत्तर दिया
क्या बात है?, तुम्हें क्या घर वापिसी करना है? उन्होंने पूछा
नहीं, वह तो मैं आपके साथ ही हवन करके कर चुका हूं
तो क्या पैसे नहीं मिले?
नहीं नहीं वैसी कोई बात नहीं
तो क्या बात है? उन्होंने खिड़की से मुँह निकाल कर पूछा
मैं पूछ रहा था कि अपना सामान कहाँ रख दूं वह बोला
कैसा सामान?
यही घरेलू सामान
घरेलू सामान! क्या मतलब है तेरा?
अब पुराना घर छोड़ आया हूं तो सामान साथ ले कर आ गया हूं, उसे कैसे छोड़ आता?
घर छोड़ने की क्या जरूरत थी?
बिना घर छोड़े घर वापिसी कैसे होती? अब उस पुराने घर में कैसे रह सकता हूं! उसने सिर का बोझ नीचे पटकते हुए कहा।
अरे नहीं नहीं यह घर वापिसी वैसी नहीं है, इसका यह मतलब नहीं कि तुम अपना झोपड़ा छोड़ कर आ जाओ। वैसे जहाँ तुम रहते थे, वहाँ क्या तकलीफ थी?
तकलीफ तो कोई नहीं थी पर अब जब आपकी इमदाद से ठाकुर बन कर घर वापिस आ गया हूं तो उन मुसलमानों के मुहल्ले में कैसे रह सकता हूं जहाँ थोड़ी सी दूर पर ही नीची जातियों के मकान भी हैं। क़्या यह एक ठाकुर की आन को ठेस पहुँचाने वाली बात नहीं होती!  
घर वापिसी करने का यह मतलब थोड़ी ही है कि तुम हमारे घर में घुस आओ!  
घर में वापिस आने के बाद और कहाँ जायें अब? उसने वहीं तीतर लड़ाने की मुद्रा में उकड़ूं बैठते हुए कहा। पैर पसार कर उसकी बीबी और बच्चे भी वहीं बैठ गये। उन्होंने डिब्बे से रोटी निकाली और खाने लगे।
हिन्दू वीर परेशान हो गये। वहाँ से गुजर रहे एक चैनल के स्ट्रिंगर दृश्य देख कर फिल्माने लगे। यह तो मुसीबत गले पड़ गयी। उन्होंने कोठी से बाहर बहुत सारी ज़मीन पर अतिक्रमण करके लान बना रखा था उस पर नये बने ठाकुर हिन्दू के बच्चे खेलने लगे थे। उन्होंने पुलिस को फोन किया कि कुछ लोग उनके घर में जबरदस्ती घुस आये  हैं। पुलिस दौड़ी दौड़ी आयी क्योंकि धर्मांतरण के मामले में उसकी काफी किरकिरी पहले ही हो चुकी थी। उसने मामले को समझा और शेख मुहम्मद से पूछा तुम यहाँ कैसे अपना डेरा डंडा लेकर आ गये?
हमारी घर वापिसी हुयी है हुजूर, और हम अपने घर वापिस लौट कर आ गये हैं। वह बोला
क्या पहले तुम्हारा यही घर था?
यही होगा, साब
होगा से क्या मतलब कोई प्रमाण है तुम्हारे पास?
नहीं हुजूर पर जब एक घर से दूसरे घर गये हैं तो कोई घर तो रहा ही होगा। शायद यही हो। मुझे तो याद नहीं पर ठाकुरसाब ने हमारे पिछले घर की याद रखी है तो इनके आसपास ही होगा। इसलिए हम यहाँ आ गये
क्या तुम्हारे पास कोई कागज हैं जो यहाँ आ गये, जबकि इनके पास हैं
ठाकुरसाब तुरंत अन्दर गये अपने कागज़ ले आये और दिखाने लगे। पुलिस के लोग शेख मुहम्मद से बोले देख लो
अब हम क्या देखें साब आप ही कागज से नाप कर इनकी जगह तय कर दें, हम उसके बाद अपना डेरा बना लेंगे।
ठाकुरसाब कहने लगे अब यह काम पुलिस के अफसर थोड़े ही करेंगे। उन्हें डर था कि अभी उनके अतिक्रमण की पोल खुल जायेगी। पर पुलिस वालों को उनकी बात अपमानजनक लगी, बोले अगर विवाद सुलझता है तो हम नाप जोख भी कर सकते हैं
शेख मुहम्मद बोला साब जब ठाकुर बन कर लौट आये हैं तो रहना तो ठाकुरवाड़ी में ही होगा। इनकी जमीन के पास से हम अपना डेरा शुरू कर देंगे। ठाकुरसाब ने अपना माथा पीट लिया।
वीरेन्द्र जैन                                                                          
2 /1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल म.प्र. [462023]
मोबाइल 9425674629
     

गुरुवार, अक्टूबर 11, 2012

अगर पैसे पेड़ पर लगते तो ...........


व्यंग्य
अगर पैसे पेड़ पर लगते तो...................... 


वीरेन्द्र जैन
                राम भरोसे के हाथ में हमेशा अखबार रहता है और उसकी हथेलियों की गरमी से ठंडी ठंडी खबरें भी गर्म हो जाती हैं। हमेशा की तरह मुझे आज भी उम्मीद थी कि वह अखबार फैला कर कोई गरम-गरम या मसालेदार खबर पढवायेगा, पर उसने ऐसा नहीं किया। कुर्सी पर बैठ कर सीधा सवाल दाग दिया ये बताओ कि ये वाक्य वनस्पति शास्त्र का है, अर्थ शास्त्र का है, राजनीति शास्त्र का है, या पर्यावरण से सम्बन्धित है!
       ‘पहले सवाल तो बताओ? मैंने उसकी पहेली से उलझते हुए पूछा
                “ अरे तुम कौन सी दुनिया में रहते हो तुम्हें आज के ताजा घटनाक्रम की भी खबर नहीं रहती! मैं अपने मौन मोहन सिंह जी के ताजा बयान की बात कर रहा हूं जो सोनिया जी के चाहने तक देश के प्रधानमंत्री हैं। वह ऐसे बोला जैसे बहुत रहस्य की बात बता रहा हो, बरना ये बत किसे नहीं पता।
                “अच्छा, अच्छा, वही पैसों के पेड़ पर लगने वाली बात, हाँ भाई कहा तो उन्होंने सही है, पेड़ों पर पत्तियां लगती हैं, फूल लगते हैं, शाखाएं लगती हैं, कभी कभी फल लगते हैं, घोंसले लगते हैं, अमर बेलें चढी रहती हैं, दीमक लगती है, मकड़ी के जाले लगते हैं, कीलें ठोंक कर विज्ञापन लगते हैं, कट कर गिरी पतंगें अटक जाती हैं, और अटकी रहती हैं, पर पैसे नहीं लगते। मैंने अपना ज्ञान बघारा।
                “ पर पेड़ों पर वोट भी नहीं लगते, जिनके अचार से सरकार बनती है, उन्हें भी बड़े जतन से कबाड़ने पड़ते हैं। पर मैंने तुम से पूछा था कि इस विषय का शास्त्र क्या है जो सम्भवतः तुम नहीं जानते। अच्छा छोड़ो ये बताओ कि अगर पैसे पेड़ पर लगते होते तो क्या होता। रामभरोसे ने कहा तो प्रतिउत्तर में मैंने प्रस्तावित किया कि इस चिंतन को ज्वाइंट वेंचर में किया जाये। मैं और राम भरोसे दोनों ही उसी तरह चिंतन की मुद्रा में बैठ गये जैसे कभी जवाहरलाल नेहरू की फोटो छपा करती थी, जिसमें एक उंगली गाल पर और बाकी ठोड़ी के नीचे रहती थीं। इस चिंतन से जो गहरे मोती निकाले वो इस तरह थे।
·         अगर पैसे पेड़ों पर लगते तो देश में जंगल ही जंगल होते, क्योंकि जंगल के पैसों पर सरकार का अधिकार होता  
·         अगर पैसे पेड़ों पर लगते तो ज्यादातर गैराअदिवासी लोग. आदिवासी कहलाना चाहते और कहते कि गर्व से कहो हम जंगली हैं,   
·         अगर पैसे पेड़ों पर लगते तो नगरों गाँवों के घरों में एक, दो पाँच, दस, पचास, सौ, पाँच सौ और हजार रुपयों के अलग अलग पेड़ लगे होते। सबको घरों में पेड़ लगाने के लिए सरकार से अनुमति लेनी पड़ती और वीआईपी लोग पाँच सौ या हजार से नीचे का पेड़ ही नहीं लगाते। एक दो रुप्यों के पेड़ तो इमली, बेरों की तरह रस्तों पर लगे रहते,  
·         कुछ लोग बिना अनुमति के चोरी से हजार पाँच सौ रुपयों के पेड़ लगा लेते जिन्हें काले पेड़ कहा जाता और छापों में पकड़े जाने पर पता लगता कि किसने कितने पेड़ लगाये हुए थे।
·         बाबा रामदेव जैसे लोग कहते कि हजार पाँच सौ के पेड़ों के बीज ही खत्म कर दो तब काले पेड़ों की समस्या से मुक्ति मिलेगी। वे खुद दवाओं के नाम पर अपने आश्रम कम दवा उद्योग में ऐसे सैकड़ों पेड़ लगा कर रखते।    
·         अगर पैसे पेड़ों पर लगते तो नीति वाक्य सिखाने वाले कहते कि जैसा कर्म करेगा वैसा पेड़ देगा भगवान क्योंकि तब लोग फलों के पेड़ ज्यादा नहीं लगाते और फल देने का मुहावरा नहीं बनता
·         अगर पैसे पेड़ों पर लगते तो फिर अलग से पर्यावरण मंत्रालय बनाने की जरूरत ही नहीं रहती क्योंकि कोई कालिदास भी कालिदास की तरह व्यवहार नहीं करता
·         वन विभाग और वित्त विभाग के बीच मुकदमा चल रहा होता
·         वगैरह
·         अगर पैसे पेड़ों पर लगते होते तो सबसे बड़ी बात यह होती कि श्री मनमोहन सिंह्जी प्रधानमंत्री नहीं होते
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, मई 30, 2011

व्यंग्य - बहिनजी, दीदी और अम्मा आदि के रिश्ते


व्यंग्य
बहिनजी और दीदी और अम्मा आदि के रिश्ते
वीरेन्द्र जैन
अगर उत्तर प्रदेश और बंगाल के बीच अंतर पहचानना हो तो एक अंतर तो सीधा सीधा यह समझ में आता है कि उत्तर प्रदेश में बहिनजी का शासन है और बंगाल में दीदी आ गयी हैं। वैसे हिन्दी का कोई प्रकांड विद्वान कह सकता है कि दोनों में क्या अन्त्तर है दोनों ही पर्यायवाची हैं, किंतु एकमत न होने के लिए विवश दूसरे विद्वान कह सकते हैं किसी एक शब्द के होते हुए जब दूसरा शब्द जन्म लेता है तो वह किसी न किसी भिन्नता के कारण ही जन्म लेता है। बहिनजी शब्द से पुरातन पंथ की गन्ध आती है तो दीदी शब्द कुछ कुछ आधुनिक सा हो जाता है।
मायावती दीदी नहीं हुयीं और ममताजी बहिनजी नहीं हो सकतीं। बहिनजी केवल मुँह की जबर हैं किंतु दीदी ने कभी जयप्रकाश नारायण की कार के ऊपर कूद कर अपने लिए बंगाल की शेरनी का खिताब हासिल किया था ये बात अलग है कि बाद में इसी के भ्रम में वे खट्टे अंगूर वाली बिल्ली की तरह उछल कूद करती रहीं।
बहिनजी ने खुद के नाम पर करोड़ों की जायजाद खड़ी कर ली है किंतु दीदी ने जायजाद खड़ी करने वालों को ही चुनाव में खड़ा किया। बहिनजी टिकिट देने से पहले ही उम्मीदवार से धन निचोड़ लेती हैं, पर दीदी उनका धन उन्हीं के पास रहने देती हैं ताकि सनद रहे वक़्त जरूरत पर काम आये। वे इसे गान्धीजी के ट्रस्टीशिप वाले सिद्धांत का अनुशरण भी कह सकती हैं। बंगाल में जहाँ पहले कुल दो प्रतिशत करोड़पति विधायक थे पर गरीब दीदी के राज्य में सोलह प्रतिशत करोड़पति विधायक हो गये और एकाध अपवाद को छोड़कर सब के सब उन्हीं के मोर्चे के हैं।
बहिनजी हाथी पर सवार रहती हैं तो दीदी तृणमूल नाम रखकर फूल और पत्तियां दिखाती हैं जिनमें न तृण होता है और न मूल अर्थात जड़।
अमूल बेबी, तृणमूल बेबी का सहारा तलाशते हैं किंतु हाथी वाली बहिनजी के साथ दो दो हाथ करने को उतावले नजर आते हैं। भले ही भट्टा पारसौल में अपनी विश्वसनीयता का भट्टा बैठा लेते हैं।
दीदी ने अपने मंत्रिमण्डल को ऐसा साधा है कि उनके वित्तमंत्री हैं फिक्की के पूर्व् अध्यक्ष और जाने माने पूंजीवादी अर्थशास्त्री अमित मित्रा और श्रममंत्री हैं पूर्व नक्सलवादी पूर्णेन्द्र घोष। बुन्देली में एक कहावत है- दोई पलरियन दै दओ तेल, तुम नाचो हम देखें खेल, अर्थात तराजू के दोनों ही पलड़ों पर क्रमशः तेल दे दिया जिससे वे नाचते रहें और हम नाच देखते रहें। पर बहिनजी किसी स्वतंत्र अस्तित्व रखने वाले को मंत्री नहीं बनातीं।
बहिनजी, बहिनजी रहेंगीं, और दीदी, दीदी। ये बात अलग है दोनों की पूंजी ही नफरत की पूंजी हो। वैसे पूंजी तो अम्मा के पास भी नफरत की ही है जिन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद पहला बड़ा खुलासा यह किया कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गान्धी की हत्या में डीएमके का हाथ था। उम्मीद करना चाहिए कि जल्दी ही कोई दिन ऐसा भी आयेगा जब करुणानिधि के फेमिली डाक्टर को जगह जगह नहीं भटकना पड़ेगा एक ही जेल में पूरी फेमिली की जाँच कर लिया करेगा। अब पता नहीं अम्मा बहिनजी का चुनाव चिन्ह [हाथी] दान करने के लिए कौन से मन्दिर में कब जाने वाली हैं, जैसे कि पिछली बार गयी थीं, जैसे उमा भारती तिरुपति के मन्दिर में मुण्डन कराने के लिए गयी थीं भले ही इसके बाद भी पूरे समय मुख्य मंत्री नहीं रह पायीं। वैसे अम्मा ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में नफरत के अवतार नरेन्द्र मोदी को आमंत्रित करके अपनी लाइन का सन्देश तो दे ही दिया है। भाजपा के ये स्टार प्रचारक यों तो असम में भाजपा की सरकार बनवाने गये थे किंतु सीटें आधी करवा दीं।
बहिनजियो दीदियो अम्मा के लिए दुआ करो, जो अपनी जनता को अपने महल की बालकनी से ही दर्शन देती हैं। रिश्तों के बारे में मुनव्वर राना का एक शेर है-
अमीरे शहर को रिश्ते में कोई कुछ नहीं लगता
गरीबी चाँद को भी अपना मामा मान लेती है
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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रविवार, फ़रवरी 13, 2011

व्यंग्य - ब्लैंक चैक


व्यंग्य
ब्लेंक चैक
वीरेन्द्र जैन
पूंजीवादी युग में राजनीति की भाषा भी मौद्रिक हो जाती है। कभी सन्यासियों से उम्मीद की जाती थी कि वे ध्यान की मुद्रा में बैठे मिलेंगे। कई लोग तो यह भरोसा करने लगे थे कि उनके जैसी मुद्रा बना लो तो ध्यान लग जाता है। लोग बुद्ध महावीर आदि की मुद्राएं बना कर बैठ कर देखते थे, पर अब मुद्रा के नाम पर मुद्राएं अर्थात करैंसी का ही ध्यान आता है। कागजी मुद्राएं आने और बैंकिंग के विकास के बाद तो कागज की मुद्राओं के भी कागज चलने लगे जिन्हें चैक कहा जाता है। किसी जमाने में चेकों का भरोसा नहीं होता था क्योंकि खाते में बैलेंस हो या न हो पर चैक काटी जा सकती थी। फिर सरकार को लगा कि बैंक, जिसका मतलब ही होता है भरोसा, वह चेक के भुगतान न होने पर टूट जाता है, इसलिए बिना बैलेंस के चेक काटने को अपराध घोषित कर दिया। पर इससे बिना बैलेंस के चेक कटना तो बन्द नहीं हुए पर अपराधों के दर्ज होने की संख्या में जरूर वृद्धि हो गयी। आज सबसे ज्यादा लम्बित प्रकरणों की संख्या बिना भुगतान के चैक जारी करने वाले प्रकरणों की है।
लम्बित प्रकरणों की इस ढेरी में एक की वृद्धि और होने जा रही है। भूतपूर्व भाजपा नेत्री उमाभारती जो कभी अपने को साध्वी बताती थीं, अब अपने आप को चेक बताने लगी हैं और उन्होंने भाजपा के पक्ष में कटने की घोषणा कर दी है। यह चेक भी बिना कोई राशि भरे हुए जारी करने जा रही हैं जो उत्तर प्रदेश में पेयेबिल अर्थात भुगतान योग्य होगा। भले ही यह कोर बैंकिंग का जमाना हो जिसमें किसी भी बैंक शाखा के खातेदार का चेक कहीं भी भुगतान हो जाता हो, पर वे चैक को स्पेशियली क्रास्ड करके जारी कर रहीं है जिसका मतलब होता है कि यह किसी खास जगह की खास बैंक शाखा में ही जमा किया जा सकता है।
ब्लेंक चैक का अपना रहस्य होता है, यह चेक पाने वाले का जुआ होता है कि वह उसमें क्या राशि भरे। उमाभारती ने उत्तर प्रदेश के पिछले चुनावों में अपने उम्मीदवारों को वापिस बुला लिया था ताकि हिन्दू एकता बरकरार रहे इसलिए यह तो पता ही नहीं चला कि उनके खाते में बैलेंस था भी या नहीं। पर जब उन्होंने उपचुनाव में सोनिया गान्धी के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारा था और भाजपा को अपना उम्मीदवार बैठा कर उनका समर्थन करने का आवाहन किया था तब उनकी जमानत जब्त होने की सीमा से भी कम बैलेंस निकला था। गुजरात में उन्होंने गुरु के आदेश को बहाना बना कर अपने उम्मीदवार वापिस बुला लिए थे और अपने खाते के राज को राज ही रहने दिया था। मध्य प्रदेश में वे बड़ा मल्हरा और टीकमगढ दोनों ही जगह से हारी थीं। बड़ामल्हरा में तो उन्होंने प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके भाजपा के पुराने साथी शिवराज सिंह पर उनकी हत्या कराने का आरोप लगाया था, पर अब उन्हें अपने स्वास्थ की चिंता को भूलकर किसानों के लिए अपने कातिल के पास बैठने से कोई गुरेज नहीं है। भाजपा के बागियों के सहारे पूरे प्रदेश में उन्हें बारह लाख वोट जरूर मिले थे जो उनके अस्थिर मनोभावों के कारण अपने अपने रस्ते से लग चुके हैं। पर जहाँ उनके खाते में सबसे ज्यादा बैलैंस है वहीं पर उनका चेक भुगतान योग्य नहीं है। जहाँ भुगतान के लायक बताया जा रहा है वहाँ उनके खाते के बैलेंस का पता नहीं है।
ये चेक आखिर ब्लैंक क्यों है। क्या पैन नहीं हैं? और न हो तो भी कोई बात नहीं आजकल तो नेट बैंकिंग आ गयी है। बिना पैन के भी राशि यहाँ की वहाँ की जा सकती है। पर अपने खाते के बैलेंस का पता तो होना चाहिए, और अगर नहीं है तो एटीएम से पता किया जा सकता है क्योंकि अब तो सातों दिन चौबीसों घंटे एटीएम खुला मिलता है। ऐसा लगता है कि यह जीरो बैलेंस खाते का ब्लैंक चैक है। चेक लेने और देने वाले दोनों को पता है कि खाते की औकात क्या है, पर टुच्ची साहित्यिक संस्थाओं द्वारा दिये गये पुरस्कारों की तरह खाली लिफाफों का आदान प्रदान हो रहा है और दोनों ही अपनी जनता को बेबकूफ बना रहे हैं।
ये दीवालिया बैंक के जीरो बैलेंस खाते का ब्लैंक चैक है, जो उसको दिया जा रहा जिसका खाता ही नहीं खुल रहा है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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शनिवार, अगस्त 21, 2010

व्यंग्य- पाकिस्तान में बाढ़


व्यंग्य
पाकिस्तान में बाढ
वीरेन्द्र जैन
“पाकिस्तान में बाढ आयी है और हमारे नेता परेशान हैं” राम भरोसे कुछ खीझ कर बोला।
“मानवीयता के नाते यह स्वाभाविक है” मेरी प्रतिक्रिया थी।
इसे सुनकर राम भरोसे कुटिलितापूर्वक मुस्कराया और बोला- इस सरकार के नेता, जो कहते हैं कि गेंहूं सड़ा देंगे पर गरीबों में नहीं बाँटेंगे, और मानवीयता?
“तो फिर?” मैने उसका मन टटोलना चाहा।
“उनमें से कई सोच रहे होंगे कि कामन वैल्थ गेम्स की तरह वहाँ से भी बाढ राहत का चेक देने पर दस परसेंट कमीशन मिल जायेगा जैसा अपने यहाँ से मिलता है”
“पर उन्होंने तो लेने से मना कर दिया था”
“उनके राष्ट्रपति खुद ही मिस्टर दस परसेंट के नाम से जाने जाते हैं और ऐसा ही क्रम चलता तो अंत में प्रार्थना ही बचती सो उन्होंने सोचा होगा कि प्रार्थना के लिए फालतू का अहसान क्यों लिया जाये”
“सुना है इसके लिए भी अमेरिका से सिफारिश लगवाना पड़ी है”
“अब इस महाद्वीप में अमेरिका की सिफारिश के बिना कुछ भी नहीं हो पाता, पाकिस्तान के प्रधान मंत्री की पत्नी पूछती होगी कि आज लंच के लिए चिकिन बिरयानी बनवा लें तो वे उत्तर देते होंगे हमसे क्या पूछती हो अमेरिका से पूछ लो, वे कह दें तो बनवा लेना। इसी तरह भारत की ओर से पचास लाख डालर की सहायता के लिये जब अमेरिका ने हाँ कह दी तभी उन्होंने स्वीकारी। हमारे नेता कहते हैं कि गेंहूं सड़ा देंगे पर गरीबों को नहीं देंगे और वहाँ के नेता कहते हैं कि चाहे बाढ पीढित मर जायें पर भारत की सहायता नहीं लेने देंगे। निदा फाजली ने कहा है न-
खूंखार दरिन्दों के फकत नाम अलग हैं
इंसान में शैतान यहाँ भी है वहाँ भी “
“पर डर है कि अगर बाढ पीढितों को सहायता नहीं मिली तो वे चालीस लाख लोग तालिबानों के प्रभाव में आ जायेंगे” “पता नहीं यह उनका डर है या अमेरिका को डराने का तरीका है। अभी जितने लोग तालिबानों के प्रभाव में आ गये हैं वे क्या बाढ पीढित हैं या अमेरिका पीढित!”
“पर हमारे यहाँ के नेता क्यों परेशान है?”
“इसलिए, क्योंकि बाढ हमारे यहाँ नहीं आयी और सूखे के न आने की भी भविष्यवाणियाँ की जा रही हैं! बेचारे! सूखी तनखा पर गुजर करेंगे “

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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मंगलवार, मई 04, 2010

शौचालय और मोबाइल की क्या तुलना

शौचालय और मोबाइल की क्या तुलना
वीरेन्द्र जैन


कभी आदमी की मौलिक ज़रूरतों में रोटी कपड़ा और मकान हुआ करता था किंतु अब प्रथिमिकताएं बदल गई हैं, रोटी कपड़ा और मकान की जगह रोटी कपड़ा और मोबाइल ने ले ली है।
मकान न हो तो चलेगा। वैसे भी अगर मोबाइल आ जाये तो आदमी मकान से बाहर ही निकलता है। ओशो रजनीश की भाषा में कह सकते हैं कि मकान से मोबाइल तक अर्थात मकान पहला कदम है और मोबाइल उसकी मंज़िल। जो पहले कदम पर ही जम कर बैठ गया तो उसे मंज़िल कैसे मिलेगी। पहला कदम ज़रूरी है पर उसी पर टिक कर नहीं रह जाना है। ओशो यही सिखा गये हैं।जड़ से चेतन की ओर यात्रा।
मकान है और मोबाइल आ गया तो पड़ोसियों को कैसे पता लगेगा कि हमारे पास मोबाइल आ गया है तो सिग्नल बाहर आकर ही मिलते हैं और इसी बाहर आने से सिग्नल बाहर तक पहुँचते भी हैं। मोबाइल आ गया तो अपनों के प्यार भरे फोन भी आयेंगे और फोन आयेंगे तो बातें भी होंगीं अब वे बातें ऐसी तो होती नहीं जैसे कि सास बहू के सीरियल हों या झगड़े हों, जो घर परिवार के सभी सदस्यों के बीच कह-सुन ली जायें सो बाहर तो निकलना ही पड़ेगा। कहने का मतलब यह कि मोबाइल ने आदमी को मोबाइल अर्थात गतिवान बनाया है। घर से बाहर निकल खेत की ओर चल.....[निदा फाज़ली से क्षमा याचना सहित]
मोबाइल के कई उपयोग होते हैं जैसे कि आप उसे कान से लगाकर प्राणांतक कवि गोष्ठी से बाहर निकल कर सुख-संतोष की सांस ले सकते हैं, और कोई आपको सींग पुच्छविहीन पशु भी नहीं कह सकता है, क्योंकि ज़रूरी काल आया है। इसकी कालर ट्यून तो मरघट तक में हो गयी तेरी बल्ले बल्ले कर सकती है।
कितने गिनवाऊँ मोबाइल के फायदे ही फायदे हैं, पर कुछ लोग हैं जिन्हें तुलना करने की बीमारी होती है वे तुलना ही करते रहते हैं जैसे कि कोई कांग्रेसी कहे कि भाजपा ने गुजरात में गुजरात में तीन हज़ार मुसलमान मार डाले तो वे पलट कर कहते हैं कि इससे ज्यादा तो तुमने 1984 में सिख मार डाले थे। ऐसे ही लोग कहते हैं कि देश में शौचालय से अधिक मोबाइल हो गये हैं। अरे भाई शौचालय अपनी जगह और मोबाइल अपनी जगह। यही देखो कि शौचालय मोबाइल में तो आ नहीं सकता किंतु मोबाइल शौचालय में जा सकता है। छोटे बच्चे तक अपनी मम्मी से कहने लगे हैं कि मम्मी तुम टायलेट से बाहर रहो और मोबाइल से पूछती रहो कि छिछ्छी की या नहीं। शौचालय का उपयोग दिन में एक दो बार होता है किंतु मोबाइल का उपयोग दिन में दो सौ बार हो सकता है। शौचालय में तो अनावश्यक रूप से पानी की बरबादी होती है क्योंकि किये कराये पै पानी फेरना होता है किंतु मोबाइल में एक बून्द भी पानी की चली जाये तो उसकी बोलती बन्द हो जाती है। यही कारण है कि पानी बचाओ आन्दोलन वाले उसी पेज पर मोबाइल के दस बीस विज्ञापन छापते रहते हैं जिस पेज पर पानी बचाने की दस बीस लाइनें छपी होती हैं। पानी बचाने की यह भी एक तरक़ीब है कि मोबाइल को पास रखो जिसे पानी से दूर रखना पड़ता है। शौचालय को गन्दा स्थान समझा जाता रहा है कि जिसमें आदमी को मजबूरी में ही जाना होता है और वह वहाँ से शीघ्रातिशीघ्र बाहर आना चाहता है किंतु मोबाइल ऐसी चीज होती है जिसे दिन में तो क्या रात में भी दूर नहीं रखा जाता। साइलेंट या बाइब्रेशन मूड में तो इसे दिल के और ज्यादा करीब रखा जाता है। क्या कभी किसी ने मोबाइल में से बदबू आने की शिकायत की है या मोबाइल सुधारने वाले को किसी ने कभी अछूत समझा है? शौचालय जड़ है जबकि मोबाइल चेतन होने के सारे गुण रखता है वह धड़कता है, बोलता है, गाता है, संगीत सुनाता है, मनोरंजन करता है, सन्देशों का आदान प्रदान करता है। अब आप ही बताइए कि मोबाइल की शौचालय से क्या तुलना?
हमारे ऋषि मुनि जब हिमालय पर तपस्या करने जाते थे तो महीनों सालों तक शौचालय के बारे में सोचते तक नहीं थे किंतु अपनी आत्मा के मोबाइल से परम पिता परमात्मा से डायलोग करते रहते थे। यह हमारी पुरानी परम्परा का थ्री जी सिस्टम था जिससे संजय युद्ध का ताजा हाल महल-बैठे अन्धे धृतराष्ट्र को सुनाता रहता था। अनेकानेक जगहों को हमने महाभारत काल, रामायण काल के स्मारकों की तरह संरक्षित कर रखा है किंतु इन पौराणिक काल की पांडव कुटीरों आदि में कहीं भी शौचालय नज़र नहीं आते। ये गन्दी सोच तो आज के लोगों की है कि शौचालय के बारे में सोचते हैं। हमारे किसी भी काल के किसी भी पौराणिक ग्रंथ में इसे समस्या के रूप में नहीं लिया गया और ना ही वर्णन किया गया। जबकि बाकी के सारे काम किये जाने के श्लोक मिल जाते हैं। इसलिए अगर शौचालय की तुलना में मोबाइल बढ रहे हैं तो स्वाभाविक है। दर असल जिनके यहाँ शौचालय नहीं हैं उन्होंने कभी चिंता प्रकट नहीं की, आज तक कोई आन्दोलन शौचालय की माँग को लेकर नहीं हुआ, जबकि यह खुरापात तो उनके दिमागों की उपज है जिनके यहाँ एक बैड रूम से अटैच रहता है और दूसरा बाथ रूम से। जिनके यहाँ शौचालय नहीं हैं वे पक्के राष्ट्रवादी हैं और पूरे देश को माँ की गोद समझते हैं। मिनरल वाटर की बोतल में सादा पानी भरा और लोगों की नज़रें बचा के जहाँ जगह मिली सो हज़रते दाग की तरह बैठ गये, बैठ गये। और एक बार जहाँ बैठे वहाँ दुबारा नहीं देखा। हर बार एक नई जगह की तलाश में कोलम्बस की तरह निकल पड़ते हैं।
इसलिए प्यारे भाइयो, बहिनो और पत्रकार बन्धुओ, कृपया मोबाइल से शौचालय की तुलना न करें अपितु शौचालय से शौचालय की और मोबाइल से मोबाइल की तुलना करें। तुलना बराबरी वालों में ही ठीक रहती है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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रविवार, जनवरी 24, 2010

व्यंग्य -बसंत में बीमारी




व्यंग्य
बसंत में बीमारी
वीरेन्द्र जैन
कभी कभी प्रभु की मति भी मारी जाती है। जैसे कोई ढीठ मक्खी बार- बार उड़ाने पर भी किसी चरित्रवान व्यक्ति की नाक पर बैठने की गुस्ताखी करती है और चरित्रवान व्यक्ति को इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता नही सूझता कि मक्खी को मार दिया जाए इसी तरह मति भी मारी जाने के लिए मजबूर हो जाती है। अब मति चाहे प्रभु की हो, प्रभुवर्ग की हो या आम जनता की, जब मारी जाना होती है सो मारी ही जाती है। जबसे मैंने यह सुना है कि उसकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता तभी से मैं अपने सारे दोष उसी पर मढ़ देने में सिद्वहस्त हो गया हूँू।

अब यह भी कोई बात हुई कि वह मुझे बीमारी दे और वह भी बसंत के मौसम में, यह उसकी मति मारे जाने का लक्षण नहीं तो और क्या है ? अरे भला आदमी बीमारी को कुछ अच्छा सा अवसर देखकर नही दे सकता था! कि जब दफ्तर में ज्यादा काम हो तब दे दे,े जब बच्चे छुट्टियों में पहाड़ घुमाने की जिद कर रहे हों तब दे दे। ऐसे रिश्तेदारों के यहॉ विवाह समारोह हो जहॉ बड़ा खर्च करना जरूरी होता है तब दे देता। लोग इस्तीफा देने तक में अवसर की अनुकूलता का ध्यान रखते हैं और यह प्रभु है कि बीमारी देने में भी वक्त नही देखता। सोचता हूँ कि मोनोपली का लाभ उठाने में जब सभी माहिर हैं तो प्रभु ही क्यों पीछे रहे, वह भी राशन के दुकानदार, विद्युत सरकारी टेलीफोन विभाग की तरह अपनी मनमानी करता रहता है।

वैसे बसंत में लोग बनावटी बीमार दिखने में भी आनंदित महसूस करते है, कोई प्रेमरोगी होने का ढोग करता है तो किसी का दिलो जिगर चाक- चाक हुआ रहता है, भले ही उसमें से रक्त की एक बूंद भी न टपकती हो। कोई अपना बैंक बेलेन्स, दुकान, जमीन, बीमा, का पैसा आदि छोड़कर शेष सारा जीवन न्यौछावर करता नजर आता है। जैसे कि जीवन नहीं नाक हो जिसे जब चाहे छिनका जा सके। कुछ घायल होने के लिए खुद सलाह देते हैं कि '' सीधा तो कर लो तीर को '' और कुछ कहते हैं कि
'' आज अपने हाथों से क्यों न कत्ल हो जाएँ,
अब तो मेरे कातिल के हाथ थक गए होंगे। ''

वैसे मैं इस बासंती मौसम में भी इनमें से किसी कोटि का बीमार नहीं था। अब चाहे आप मुझे रस हीन, हृदयहीन, निरा बौद्विक भौतिक प्राणी के रूप में उपेक्षा से देखें पर में तो अपने और जग के सारे दोषों के लिए प्रभु को जिम्मेवारी सौंपकर ऐसे खड़ा हो जाता हूॅ जैसे दूध की थैली में से दूध निकाल लेने और आखिरी बूॅद तक झटक लेने के बाद वह उजली पारदर्शी होकर कचरेदान में शोभायमान होती है।

मैं इस देश के कर्मचारियों, अधिकारियों और राजनेताओं की तरह बनावटी बीमार भी नही था जो डाक्टरों को स्वस्थ्य करने की जगह बीमार करने के लिए पैसे देते हैं। मैं बीमार था और प्रभु की कृपा से सचमुच बीमार था। सुइयॉ दिल में चुभने की जगह बाहों और कूल्हे पर चुभाई जा रहीं थीं। छाती खोलकर सीने पर तीर खाने की जगह गोलियॉ खा रहा था और वह भी मुँह के रास्ते। अधरों का रस पीने की जगह मौसम्बी का दूसरे के द्वारा निकाला हुआ रस पी रहा था। लोग अस्पताल में मुझे देखने आते, तो मुझे कम नर्सो को ज्यादा देखते। नर्सें शायद उनके हृदय में पीड़ा पहुँचा रही हों पर मुझे तो वे निरंतर मेरे कुल्हों में बदल बदलकर सुइयॉ चुभाने की पीड़ा पहुँचा रही थीं। बांसती मौसम में जब दिलों में हूक उठती है, मेरे पेट में गैस बन रही थी जिसका इस्तेमाल ईधन के रूप में भी संभव नही होता। जब कलियों के चटककर फूल बनने का समय था तब मेरा सिर चटक रहा था और पेट फूल रहा था। जब ऑखों में गुलाबी डोरे उभरने का समय था मेरी ऑखे दर्द और बुखार में लाल हो रही थीं, जब नायक से नायिका अंग अंग में पीर होने का वर्णन गा गाकर कर रही हो तब मैं उसी पीर का वर्णन कराह- कराहकर कर रहा था। जब कवियों - रसिकों के मन मचल रहे होंगे, तब मेरा जी मिचला रहा था। जब असंख्य देहैं पुष्प गंधों से महक रही थीं तब मैं पसीने में मिली एंटी बायटिक की दुर्गध से सराबोर पड़ा था। जब लोग चांदनी में नहाने को कपड़े उतार रहे थे तब में नगर निगम के द्वारा रिसाए गए प्रदूषित जल से भी स्नान कर सकने की हिम्मत नही जुटा पा रहा था। जब साहित्यप्रेमियों को ईसुरी, घनानंद, जयदेव और कालिदास याद आ रहे थे तब में एंटी बायटिक एंटीसेप्टिक, एंटासिड, एंटीइन्फ्लूएंट आदि आदि दवाइयों के ब्रान्ड नाम उनके लेने के समय उनके फायदे और नुकसान के बारे में जानने की कोशिश कर रहा था। जब लोग दिलो जान लुटा रहे थे तब मैं डॉक्टरों, दवाइयों और नर्सिग होम पर पैसे लुटा रहा था। जब नायिकाओं के विनोद पर नायकों को हॅसी आ रही थी तब मुझे खॉसी आ रही थी।

जब लोग मदिरा पीकर मस्त हो रह थे, मैं काम्पोज खाकर सुस्त हो रहा था। जिस बंसत ऋतु में कामदेव कालिदास की नायिका के प्रत्येक अंग में प्रवेश कर जाते हैं तथा ऑखों में चंचलता बनकर, कपोलों में पीलापन बनकर, कुचों में कठोरता बनकर, कमर में पतलापन बनकर तथा जॉघों में पुष्टता बनकर प्रकट होते हैं ,बिल्कुल उसी तरह मेरी बीमारी ने भी इस बसंत ऋतु में मेरे पूरे शरीर में प्रवेश कर लिया था बस, अंतर इतना था कि नायिकाओं के जिन अंगों में जिस रूप में बसंत प्रकट हो रहा था मेरे उससे भिन्न अंगों में बीमारी प्रकट हो रही थी पीलापन मेरी ऑखों में था, कठोरता पेट में थी, पतलापन कलाइयों में था और कपोलों पर रूखापन विद्यमान था।

खैर, जो हुआ, सो हुआ, जब मैं अस्पताल में वापिस आ गया हूँ तथा उसी मोनोपलिस्ट एकाधिकारवादी प्रभु से प्रार्थना है कि भविष्य में वह अपनी मति को मारी जाने से बचा ले तो बसंत को भी कुछ अपने खेल दिखाने को मौका मिले और इतनी फूल, पत्तियों, पार्क, बगीचे, नायिकाएं, उन पर आते जाते रंग उनके निरंतर विकास मान परिधान, बासंती हवाएं तथा प्रकृति का एयरकंडीशनर व्यर्थ होने से बच सकता है। गीतकारों के गीत, कवियों की कविताएं, कहानीकारों की कहानियों, ललित निबंधकारों का श्रम तथा आकाशवाणी, दूरर्दशन वालों की नौकरी बरबाद होने से बच सकती है। आखिर मितव्ययिता भी तो कोई महत्व रखती है।

मैं ये नही कहता कि बीमारी न दे और डॉक्टरों की रोजी रोटी छीन ले, पर थोड़ा वक्त और मौसम देख-दाख के दे, इतनी ही विनय है।
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वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, दिसंबर 29, 2009

व्यंग्य एक नेता का मनोबली आत्मालाप्

व्यंग्य
एक नेता का मनोबली आत्मालाप
वीरेन्द्र जैन

ये कोई मिग या मिराज विमान नहीं है कि हमसे बिना पूछे चाहे जब चाहे जितने गिरते जायें। ये राजनेताओं का नैतिक पतन भी नहीं है कि एक बार गिरा तो पहाड़ से गिरे पत्थर की तरह तलहटी तक लुढकता ही गया। ये पुलिस का मनोबल है जिसे हम किसी भी तरह गिरने नहीं दे सकते अगर उसका मनोबल गिर गया तो हमारा क्या होगा- क़ालिया ।
उसके मनोबल के बने रहने पर ही तो हम टिके हुऐ हैं वरना हमारे कामकाज तो ऐसे हैं कि लोग गली गली सौ जूते मार कर एक गिनें और फिर गिनती ही भूल जायें। पुलिस का मनोबल कोई झुमका भी नहीं है कि बरेली के बाजार में गिर भी जाय और जिसका गिरा है वो ठुमुक ठुमुक कर गाने भी गाता रहे । यह हमारे लिए चिन्ता का विषय है। इसलिए, हे! पुलसिया लोगो, हम तुम्हारा मनोबल गिरने नहीं देंगे और लगातार नीचे से हथेली लगाये रहेंगे। तुम घबराना मत, हम साधे हुये है।
हम तो उन सारे थानेदारों से जिनके ट्रांसफरों के लिए हमने ही दलाली की थी, रोज फोन करके पूछते रहते हैं- ' कहो शुक्ला जी कैसे हो ? ''
'' ठीक है, कौन बोल रहे हैं?'' थानेदार कहता है।
'' अरे हमें नहीं पहचाने, हम राम संजीवन त्रिपाठी बोल रहे हैं, गृहमंत्री जी के साले''
'' अरे त्रिपाठी जी दण्डवत प्रणाम, आपकी आवाज आज कैसी आ रही है ''
'' अब उम्र है भईया, फिर दो ढ़ाई पैग भी भीतर पड़े हुऐ है। अच्छा तुम ये बताओं कि कहीं तुम्हारा मनोबल तो नही गिर रहा ''
'' अरे नहीं त्रिपाठी जी पर यहॉ रिश्वत का रेट बहुत गिरा हुआ है, लगता है कि सालभर में ट्रासर्फर में खर्च किये हुऐ पैसे भी नही निकलेंगे'' ।
'' अरे निकलेंगे भई, सब निकलेंगें वो भदौरिया कोई उल्लू तो नहीं था जो इस थाने के पॉच लाख बोल के गया था। वो तो तुम अपने जातभाई हो इसलिए तुम्हें साढे चार में दिलवा दिये। कभी कभी दो चार डकैतियॉ डलवा दिया करो। ये जो दो नम्बर की कमाई वाले लोग हैं इनका वजन हल्का करते रहना है। ये तो पूरी लुटाई की रिपोर्ट भी नहीं लिखवा पाते वरना इनकम टैक्स वाले पूछने लगेगे कि कहॉ से आया ''
'' मुझे तो डर लगता है ''
'' इसका मतलब तुम्हारा मनोबल गिर रहा है। हम ऐसा करते हैं कि एकाध उठे हुये मनोबल वाला असिस्टेंट भिजवाये देते हैं जो थाने में पकड़ कर एकाध की वो मरम्मत करेगा कि साला वहीं टें बोल जाय। इससे तुम्हारा भी मनोबल उठ जायेगा। फिर उसकी महरारू रोती हुई आयेगी सो तुम वही थाने में उसके साथ थोड़ा बहुत बलात्कार कर डालना जिससे तुम्हारा मनोबल तो बल्लियों उछलेगा''।
'' पर त्रिपाठी जी नेतागिरी ?
'' अरे शुक्ला तुम येई पेंच तो नई समझे। वहॉ पै ससुर नेतागिरी करने वाला कोई नहीं है। वो भदौरिया इसी खातिर तो पॉच दे रहा था, वो तो हम तुम्हारी खातिर अपना नुकसान कर लिये। वहॉ ससुरी नेतागिरी वाली दो ही तो पार्टियॉ है सो एक तो तुम हमारे आदमी हो और दूसरी पार्टी वाले हमारे फूफा के समधी होते हैं। बस कभी कभी उनका आदर सत्कार कर दिया करो, मन्दिर बनवाने के लिए चन्दा दे दिया करो और उनके काम के लिए एकाध गुण्डे को छुट्टा छोडे रखों, बस हो गया फिर जो चाहे सो करो। तुम्हारा राज । ''
'' पर अखबार वाले ''
'' भई शुक्ला, चींटियों का मुंह कितना सा, दो चार दाने डाल दो तो अघाये अघाये फिरते हैं। ''
इस तरह हम रोज उनका मनोबल बना कर रखते है जिसका मनोबल गिरा वो पुलिस के काम का नहीं रहा। एक छुकरिया बहुत मानव अधिकार- मानव अधिकार करती थी सी एक दिन हमने एक कानिस्टबल से कह रह उसी का मनोबल गिरवा दिया। अब भूल गई मानव अधिकार। पुलिस के अधिकार के आगे काहे का मानव अधिकार ।
हमारा तो कहना है कि शासन ऐसा हो कि चोर उचक्के, अपराधी, गुण्डे सब डर कर रहें, पर पुलिस से डरकर रहें। अगर वे जनता से डरने लगे तो फिर पुलिस को कौन पूछेगा। पुलिस का काम ही लोगों को डरा कर रखना है इसीलिए तो उनका मनोबल उठा कर रखा जाता है। जिसका मनोबल उठा हुआ हो उससे सब डरते हैं। दूसरी तरफ गिरे हुये मनोबल वाले को सब लतिया कर चलते जाते है। हम विरोधियों को इसीलिए तो धिक्कारते हैं क्योंकि वे जरा जरा सी बात पर पुलिस का मनोबल गिराने लगते हैं। अरे भई पुलिस को डन्डे फटकारते रहना चाहिए अब इसमें रस्ता चलते लोगों को दो चार डन्डे लग जायें तो इसमें रोने धोने की क्या बात है। कहते हैं उन्हें संस्पेंड कर दो। हम ऐसा नही होने देते, इसी से तो उनका मनोबल बना रहता है कि उनके पीछे कोई तो है।
मनोबल वो कलफ है जिससे पुलिस की वर्दी कड़क रहती है। मनोबल वह पालिश है जिससे उनके जूते चमकते रहते हैं। मनोबल वह ब्रासों है जिससे उसकी बैल्ट के बक्कल सोने जैसे दिखते हैं। इसी पुलिस की दम पर तो हम करोड़ों के कमीशन खा रहे हैं सरकारी जमीनें बेच रहे हैं, नकली स्टाम्प बिकवा लेते हैं सरकारी कारखानों को खाने में लगे रहते हैं फिर उसे कोड़ियों के मोल कबाड़ियों को तौल देते है। ऐसी पुलिस का मनोबल हम कैसे गिरने दे सकते हैं। हरगिज नहीं। हम नही गिरने देगे।
पुलिसियो, अपना मनोबल उठाये रखो , हम तुम्हारे साथ है।

वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, दिसंबर 28, 2009

व्यंग्य जिसने की बेशरमाई उसने खाई दूध मलाई

व्यंग्य
जिसने की बेशरमाई उसने खाई दूध मलाई
वीरेन्द्र जैन
जैसा मेरा अनुमान था कि राज नाथ अनाथराज हो गये हैं और उन्हें लगभग वैसे ही अन्दाज़ में बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है जैसा कि रावण ने विभीषण को दिखाया था, वह गलत साबित हुआ। कल जब वे दो उंगलियाँ उठा कर अंग्रेजी की वी बना विक्टरी का संकेत देते हुये दिखाई दिये तब लगा कि उनके लिये अभी भी कुछ काम बाकी बचा हुआ था-
दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं
दोस्तों की मेहरबानी चाहिये
राजनाथ की ये दो उंगलियाँ जो पिछले कुछ दिनों से अपने दुश्मनों की जीत का शोर सुनने से बचने के लिये दोनों कानों में डालने के काम आ रही थीं हवा में हैं। यह अवसर उनको झारखण्ड चुनाव परिणाम आने के बाद गुरूजी अर्थात शिबू शोरेन की कृपा से मिल सका है जिन्होंने कह दिया था कि हमें मुख्यमंत्री बनाने के सारे रास्ते खुले हैं जिसे भी बनाना हो चला आये। सो नेह निमंत्रण पा कर भाजपा दौड़ी दौड़ी चली आयी और झारखण्ड के जंगलों में गूंजने लगा- मैं तुझसे मिलने आयी, मन्दिर जाने के बहाने।
इन्हीं राजनाथ ने झारखण्ड के चुनाव हो जाने के बाद कहा था कि हम अटल बिहारी वाजपेयी के जन्म दिन पर उपहार के रूप में कि झारखण्ड में सरकार देंगे। फर्क केवल इतना रह गया कि बीमार वाजपेयी को भाजपा नहीं अपितु भाजपा के समर्थन वाली सरकार दी है और उन शिबू सोरेन की सरकार दी है जिनको केन्द्र में मंत्री बनाने पर उसने हंगामा खड़ा कर दिया था और दागियों को मंत्री बनाये जाने के खिलाफ सदन नहीं चलने दिया था। पहले अगर उनके दल को कोई आरोपी समर्थन देता था तो वे कहते थे कि गंगा में मिलकर गन्दे नाले भी पवित्र हो जाते हैं, पर हे अनाथ अब ये तथा कथित गंगा कहाँ मिल रही है?
संघ द्वारा स्थापित कठपुतली अध्यक्ष के प्रेस कांफ्रेंस की स्याही भी नहीं सूख पायी थी जिसमें उन्होंने शेखी बघारी थी कि सता की राजनीति तो होती रहेगी पर हम राजनीति को समाज से जोड़ने की बात करते हैं, उन्हींने अपने पहले काम के रूप में भाजपा को शिबू सोरेन से जोड़ दिया और उनके विधायक दल के नेता कहने लगे कि भले ही उन्होंने शिबू सोरेन को दागी बताते हुये चुनाव लड़ा था पर [चुनाव परिणाम आने के बाद]अब हमारी सोच यह है कि सोरेन कोर्ट से बरी हो चुके हैं इसलिए दागी नहीं हैं। ये बात अलग है उनकी यह बात आम जनता को तो छोड़िये उनके ही एक सांसद को हज़म नहीं हुयी और झारखण्ड के गोड्डा क्षेत्र के सांसद निशिकांत दुबे ने अपना स्तीफा श्रीमती सुषमा स्वराज और संगठन महामंत्री रामलाल को भेज दिया है तथा मीर कुमार को भी भेजे जाने की अफवाह फैलवा दी है।
अब ये कौन बतायेगा कि ये सत्ता की राजनीति है या समाज की राजनीति है! हो सकता है कि अगले कुछ वर्षों में तो वे नीतीश भक्ति की तरह इतनी गुरुभक्ति दिखा दें कि संघ के असली गुरूजी को ही भूल जायें। यदि भाजपा नेता किसी शर्मप्रूफ क्रीम के विज्ञापन हेतु माडल के रूप में काम करने लगें उनकी सफलता की बहुत सम्भावनायें हैं। स्लोगन कुछ ऐसा हो सकता है- जिसने की शरम, उसके फूटे करम, जिसने की बेशरमाई, उसने खाई दूध मलाई। कहो गडकरी भाई- हाँ राजनाथ भाई।
राम भरोसे हमेशा की तरह मुझसे असहमत है, वह कह रहा था कि भाजपा के नये अध्यक्ष सत्ता की राजनीति में भरोसा नहीं करते। वे अपने महाराष्ट्र में पार्टी को हरा कर आये हैं तो पार्टी के अध्यक्ष बन गये। सुषमा स्वराज के राज्य हरियाना में पार्टी साफ हो गयी तो वे विपक्षी दल की नेता बन गयीं। आडवाणी ने पूरे देश में पार्टी को हरवा दिया सो वे दोनों सदनों के सद्स्यों के नेता बन गये। यही तो उदाहरण है कि पार्टी को सत्ता से दूर करो पद से जुड़ो। हो सकता है कि नये अध्यक्ष का नया फार्मूला हो आखिर उन्होंने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस पहला महत्वपूर्ण वाक्य यही तो बोला कि आइ एम कमिटिड फोर कंस्ट्रक्शन।
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, दिसंबर 25, 2009

व्यंग्य- बढे बालो से योग प्रशिक्षण के रिश्ते

बढ़े बालों से योग प्रशिक्षण के रिश्ते
वीरेन्द्र जैन
इन दिनों योग बहुत फरफरा रहा हैं। जिसे देखों वही हाथ, पाँव, गर्दन, पेट, पीठ, आदि ऊँचा नीचा आड़ा तिरछा करने में जुटा हुआ है। लोग सासों पर साँसे लिये चले जा रहे है। और ज़ोर ज़ोर से लिए चले जा रहे हैं। अब कोई नहीं कहता कि गिनी चुनी साँसें मिली हैं अगर जल्दी जल्दी ले लोगों तो जल्दी राम (देव) नाम सत्य हो जायेगा। ऐसा लगता है जैसे- जल्दी जल्दी लेकर साँसों का हिसाब रखने वाले को गच्चा देने की कोशिश कर रहे हों। वह पूछता होगा कि आज कितनी लीं, तो योग करने वाला, सात हज़ार लेकर कहता होगा कि, पाँच हज़ार ही ली हैं महाराज !
बच्चे, बूढ़े, औरतें सब एक छोटे से ड्राइंग रूम में टी.वी. के सामने लद्द पद्द हुऐ जा रहे हैं किसी की टाँग उत्तर को जा रही है तो किसी का सिर रसातल की ओर जा रहा है। शरीर का कोई भी भाग किसी भी दिशा में असामान्य तरीके से मोड़ा जाये या मोड़ने का प्रयास किया जाये तो उस क्रिया को किसी आसन का नाम दिया जा सकता है, जिसे वे लोग कर रहें हैं। चैन की नींद सोये हुए बच्चों को उठा कर उससे योग कराया जा रहा है तथा गुस्से में वह जो लात घूँसे फटकार रहा है उसे शायद लन्तंग फन्तंग आसन कहते होंगे । बाबा जी देख सकते तो धीर गंभीर स्वर में बतलाते कि यह आसन बहुत उपयोगी है, इसके करने से शरीर में उत्पन्न आवेश बाहर निकलता है और थोड़ी देर में चित्त शांत हो जाता है। मैने भी एक बार मेहमाननवाज़ी करते हुये मेज़बानों की खुशी के लिए उनके साथ टी.वी के सामने आसन करने का धर्म निभाया था पर ऐसा करते समय मेरी लात सीधे बाबा जी के मुँह में लगी और वे अर्न्तध्यान हो गये। मैं समझा कि बुरा मान गये हैं और मुझे शाप देने के लिए शब्द कोश देखने चले गये होंगे पर समझदार मेज़वान ने अपने अनुभवी परीक्षण के बाद बताया कि ऐसा नहीं है अपितु सच्चाई यह है कि तुम्हारे पाद प्रहार से टी.वी फुक गया है। रही बाबा जी की बात सो वे अभी भी पड़ोसी के यहाँ सिखला रहें है। मैने शर्मिन्दा होना चाहा पर सच्चे मेजबान ने मुझे शर्मिन्दा नही होने दिया अपितु छत पर सूख रहें मेरे एक जोड पेंट शर्ट को बन्दर द्वारा ले जाना घोषित कर दिया।
योग में हस्त एवं पद का यहाँ वहाँ फटकारे जाने को तो किसी न किसी र्तर्क में फिट किया जा सकता है पर उसका बालों से क्या सम्बंध है ये मैं अभी तक नहीं समझ पाया। मैंने टी.वी. पर जितने भी योग गुरू देखे उनके बालों और दाढी को स्वतंत्रता पूर्वक फलते फूलते देखा। यदि किसी की दाढ़ी नही बड़ी होती तो बाल बड़े होते हैं। मुझे नहीं पता कि क्या बालों से हाथ पाँव ठीक चलते हैं या साँसें तेजी से बहती हैं। आखिर कुछ तो होगा जो ये लोग बाल और दाढ़ी बढ़ाये मिलते हैं। हो सकता है ठीक तरह से योग करने पर बाल तेजी से बढ़ते हों। मुढ़ाने की प्रथा ने भी इसी कारण अपना स्थान बनाया होगा। एक बार सफाचट करा लो और योग करो, तो फौरन बढ़ जायेगे।
योग अब धर्म का स्थान ग्रहण करता जा रहा है। पहले अतिक्रमण करने के लिए किनारे की ओर धर्मस्थल बना लिया जाता था जिससे धार्मिक अनुयायी उस अतिक्रमित स्थल की रक्षा करना अपना धर्म समझते थे। अब लोग अतिक्रमण की जगह योगाश्रम खोल लेते हैं और नगर निगम के अतिक्रमण हटाओं दस्ते के आने पर भारतीय संस्कृति और योग विद्या पर किया गया आक्रमण बताने लगते हैं। कुछ तो इसे कोका कोला आदि विदेशी कम्पनियों के इशारे पर की गई कार्यवाही निरूपित करते हुये इतना कोलाहल करते हैं कि अतिक्रमण की बात ही तूती की आवाज़ होकर रह जाती है। आप उद्योग खोलकर कर्मचारियों का वेतन दबा सकते हैं या चाहे जब उन्हें नौकरी से बाहर कर सकते हैं । यदि कोई यूनियन बनाये और अपनी मजदूरी माँगे तो योगाश्रम का बोर्ड आपकी रक्षा करेगा। आप कह सकते हैं कि हमारे योग के विरोध में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के ऐजेन्ट भारतीय संस्कृति के खिलाफ षडयंत्र कर रहें है।
योगी होने से आप विदेशी कम्पनियों के निशाने पर होने का ढोंग फैला जेड श्रेणी सुरक्षा माँग सकते हैं और विदेश जाने के मौके पा सकते हैं। इमरजैसी में धीरेन्द्र ब्रम्हचारी ने भी खूब योग सिखाया था पर बाद में देशी बन्दूकों पर विदेशी मुहर लगाने वाला उनका कारखाना चर्चा में आया था। चन्द्रास्वामी तो एक प्रधानमंत्री के धर्मगुरू थे व धर्मज्ञान देने अनेक मुस्लिम देशों के प्रमुखों के मेहमान होते थे। मेरी कामना है कि प्राचीनतम योग की ताज़ा हवा खूब देर तक चले और लोगों के कब्ज ढीले करे। ऐलोपेथी दवाओं की जगह आयुर्वेदिक दवाओं की दुकानें चलें तथा उन दवाओं को बनाने वाली कंम्पनियों का मालिक कोई योग गुरू ही हो।
वैसे बाबा के योग सिखाने वाले कार्यक्रम के दोनों सिरों और बीच में उन कंपनियों के विज्ञापन दिखाये जा सकते हैं जिनमें बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के उत्पादनों को बेचने के लिए सुन्दर ललनाएँ अपने रूप का छोंक लगा रही हों। आप मान सकते हैं कि इन ललनाओं ने अपना रूप योग से ही सँवारा होगा।

सोमवार, दिसंबर 21, 2009

व्यंग्य मुद्रा गाथा

व्यंग्य
मुद्रा गाथा
वीरेन्द्र जैन
वैसे तो मुंह से मुद्रा शब्द का उच्चारण होते ही मन में सोने के नही तो लोहे के सिक्के खनखनाने लगते हैं किन्तु मेरा आशय उन मुद्राओं से न होकर मनुष्य की मुद्राओं से है।
योग और ध्यान में मुद्राओं को विशेष महत्व प्रदान किया गया है। योग जिसे आत्मा का परमात्मा से जोड़ माना जाता है वह भी मुद्रा के बिना सम्भव नहीं है। मुझे तो लगता है कि शायद इसी गलतफहमी में लोग परमात्मा से जुड़ने के लिए मुद्राएं जोड़ कर रखने लगे होगें। जिस प्रकार महापुरूषों ने अपने अपने पंथ अलग अलग बना रखे हैं। उसी तरह उनकी मुद्राऐं भी अलग अलग हैं। बुद्व की मूर्तियां उनकी मुद्रा से ही अलग पहचान में आ जाती हैं। जिस तरह जीता हुआ आदमी दो उंगलियों से अंग्रेजी का वी बनाकर विजयी होने की सूचना देता है उसकी प्रकार बुद्व की मूर्तिया तर्जनी उंगली और अंगूठे को जोडकर ( और शेष तीन उंगलियों को खड़ी रख कर) जिस शून्य का निर्माण करते हैं उससे वे अपने शून्यवाद का उपदेश देते हुए प्रतीत होते है। महावीर और बुद्व की मूर्तियों में उनके बालों के घुंघराले होने से पता चलता है कि ज्ञान की प्राप्ति के लिए केश विन्यास का क्या महत्व है।
हिन्दी साहित्य के महान साहित्यकारों ने भी अपनी रचनाओं में अपनी अपनी मुद्राओं की सूचनाएं दी है। जिन साहित्य कारों ने अपनी मुद्राओं की सूचनाए नहीं दी हैं उन पर रिसर्च करने वाले भविष्य में उनकी मुद्राएं भी खोज निकालेंगे। कबीरदास अपने फक्कड़पने के अन्दाज में ही अपनी मुद्रा और मुद्रा स्थल का जिक्र करते हुए कहते हैं कि -
कबिरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ'
कबीर की मुद्रा, खडे 'होने' ही नही, खडे 'रहने' की मुद्रा है। वे यह मुद्रा सूने जंगल में जाकर नही बनाते अपितु बीच बाजार में बनाते हैं तथा सहारे के लिए हाथ में लाठी भी लिये रहते है। भक्तिकाल की मशहूर कवियत्री मीरा बाई राज परिवार से हैं और वे खड़े होकर नही रह सकतीं। बाजार से तो वैसे भी उनका कोई सम्बंध नहीं क्योकि वे चादर बनाती नहीं, ओढ़ती हैं। इसलिए मीरा बाई की मुद्रा बैठने की मुद्रा है वे कहती हैं कि –
संतन ढिंग बैठ बैठ लोक लाज खोई ।
कबीर और मीरा की मुद्राओं का अन्तर उनकी पृष्ठभूमियों का अन्तर है। कबीर मेहनतकश हैं।,इसलिए अपना उत्पाद बेचने हेतु बाजार में खडे हैं- मीरा राजपरिवार से हैं इसलिए संतो के पास बैठी हैं और बेच कुछ नहीं रहीं हैं, खो रही हैं।
दाग साहब की मुद्रा उठने बैठने की मुद्रा है। वे कहते हैं- हजरते दाग जहॉ बैठ गये- बैठ गये। वे बैठना पसन्द करते हैं पर बैठ पाना नसीब में नहीं है। इसलिए जब बैठ पाते हैं तो बैठ ही जाते हैं।
मिर्जा गालिब चलकर रहने में भरोसा करते हैं। उन्हें एकान्त तो पसन्द है, पर जम कर बैठना पसन्द नहीं। वे कहते हैं- रहिये अब ऐसी जगह चलकर जहॉ कोई ना हो। गालिब का चलकर रहना' शोर से चलकर तनहाई में जा बसना नहीं है बल्कि वे गतिमान ही बने रहना चाहते हैं इसलिए जहॉ कोई भी न हो वहॉ भी वे चलकर ही रहना चाहते हैं। इशक के दरिया में भी वे डूब कर चलते हैं- पर चलते है- इक आग का दरिया है और डूब कर जाना है। अगर उन्हें बैठना भी पडता है तो वे उसमें भी दोष खोजते रहते हैं और पछताते रहते हैं कि - इशक ने गालिब निकम्मा कर दिया। बरना वह भी आदमी था काम का।
गालिब से अलग कुछ ऐसे भी शायर हुए हैं जिनकी मुद्रा ही आराम की मुद्रा रही है वे न केवल खुद आराम पसन्द करते हैं अपितु दूसरों को भी सलाह देते है कि ''आराम बड़ी चीज है मुंह ढक के सोइये'।
घुटने मोड़कर आधे पैरों को आसन बना लेने वाले गांधी जी की चर्खा कातने की अलग ही मुद्रा है तो चन्द्रशोखर आजाद की मुद्रा मूंछ ऐंठने की है। अम्बेडकर उंगली उठाकर समाज के दोषियों को इंगित करते रहते है तो एकदम सीधे खड़े रहने में और सिर को ताने रहने में विवेकानन्द का कोई सानी नहीं है।
आधुनिक काल के साहित्याकारों में बड़े बडे बालो के साथ सुमित्रानन्दन पंत की मुद्रा दूसरों से अलग हटकर है।इस समय नीरज जैसे- लोकप्रिय कवि की अपनी मजबूरी है जब वे कहते है कि “एक पॉव चल रहा अलग अलग और दूसरा किसी के साथ है”। पता नहीं यह कौन सी मुद्रा होगी!
हां मुद्रा राक्षस के बारे में मुझ जैसे देवता आदमी में कुछ कहने का साहस नहीं है।

वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, जुलाई 13, 2009

पत्नी के मायके जाने पर - कुछ नोट्स

व्यंग्य
पत्नी के मैके जाने पर
वीरेन्द्र जैन

पत्नी ज्ञान की दुशमन होती है, खास तौर से अंर्तज्ञान की। यही कारण है कि अंर्तज्ञान प्राप्त करने वाले बड़े बडे महापुरूषों ने ज्ञान पाने के लिए सबसे पहला काम यही किया कि पत्नी से छुटकारा लिया। बहुत ही छोटी छोटी बातें जो हम अपनी ऑखों में पत्नी रूपी धुंध लगे होने के कारण देख नही पाते वे धुंध छॅटने पर साफ नजर आने लगती हैं, यद्यपि कुछ की सूची मैंं यहॉ गिना रहा हूं पर 'हरि अनंत हरि कथा अनंता' की तरह यह सूची का कुछ मामूली-सा ही हिस्सा है।
सावन में पत्नी मायके जाने के लिए उतावली रहती है। पत्नी का मैका प्रेम बहुत सुखकारी है, वह कम से कम सावधिक ही सही स्वतंत्रता तो देता है। पत्नी के मैके जाने पर हमें पता चलता है-
1- कि मुहल्ले में काफी लड़कियॉ जवान हो गई हैं।
2- कि मुहल्ले में किससे किसका क्या चल रहा है।
3- कि इन्टर नैट के कुछ और भी उपयोग हैं।
4- कि श्रीमती अवस्थी, हमारी पत्नी के न होने पर हमारे ड्राइंगरूम में आना पंसद नही करतीं, वैसे चाहे सारे दिन चबर चबर करती रहें।
5- कि चावला साहब की मिसेज किसी काम की खातिर लड़की के बजाय लडके को भेजना क्यों शुरू कर देती हैं।
श- कि मुहल्ले में धूल बहुत उड़ती हैं और केवल महरी द्वारा की गई झाडू- बुहारी से सफाई नही रखी जा सकती।
7- कि मकड़ियां अब भी पाई जाती हैं और उनका प्रमुख काम निरंतर जाले लगाकर किंग बू्र्सों को प्रेरणा देना है।
8- कि तकिए के लिहाफ कितने दिन में गंदे हो जाते हैं।
9- कि हमें किसी समय शंतरज खेलना भी आता था।
10- कि आकाश कितना बड़ा है, और सुंदर भी।
11- कि अभी तो मैं जवान हूॅ।
12- कि होटल वाले इतने धनवान क्यों होते जा रहे हैं।
13- कि मंहगाई सचमुच बहुत बढ़ गई है, और पत्नी घरखर्च में से उतना नहीं बचाती जितने का हमें अनुमान था।
14- कि नींद न आने के और क्या क्या कारण हो सकते हैं।
15- कि समाज अभी बहुत दकियानूस और पिछड़ा हुआ है।
1श- कि अखबार में ''नगर में आज'' के अंन्तर्गत जो कार्यक्रम घोषित होते हैं वे वास्तव में भी होते हैं।
17- कि दोस्त लोग चाय पिलाने के बाद पान खिलाने के बहाने बाहर चौराहे तक लाकर क्याें नमस्ते कर लेते हैं।
18- कि स्थायी रूप से स्वतंत्र दोस्त अस्थायी स्वतंत्र लोगों को दोस्त बनाने पर ज्यादा, भरोसा नहीं करते कि जाने कब इसका खूंटा आ जाये और ये खाया पिया चुकाने का समय आने के पूर्व ही कन्नी काट ले।
19- कि घर-बार वाला घर केवल ''बार'' होकर कैसे रह जाता है।
20- कि सात नंबर की बस चूक जाने से कोई कयामत नहीं आ जाने वाली, दूसरी और बसें भी कालोनी को जाती हैं।
21- कि लंच टाइम में कैंटीन में बहुत भीड़ होती है।
22- कि बिना लंच बाक्स लिए हुए बस का सफर ज्यादा सुविधाजनक होता है।
23- कि दूधवाला सुबह- सुबह नींद खराब करता है।
24- कि समय पर आपके घर न मिलने पर महरी उतना ही बडबड़ाती है जितना कि आप उसके न आने पर।
25- कि फ्रिज घर की एक मौलिक आवश्यकता है, जिसके बिना आप नहीं रह सकते।
2श- कि मौके पर मिल सकें इसलिए चीजें संभाल कर रखी जानी चाहिए।
27- कि बाजार से लाई हुई सौंफ में बहुत कचरा होता है।
28- कि जैसे आवशयकता अविष्कार की जननी है वैसे ही सुविधा आदतों की जननी है
29- कि यह आवशयक नही कि आप शांत समय में अधिक लिख- पढ़ सकें।
30- कि घरेलू सामान खरीदने और अखबार की रद्दी व खाली बोतलें बेचने के मामले में पुरूष नारी से ज्यादा अबला होता है।
31- कि पहली तारिख को कलैंडर बदलना होता है।
32- कि नहाने के बाद अंडरवियर- बनियान धोने में नहाने का सारा मजा जाता रहता है।
33- कि आटा मॉढते समय दक्षिण भारतीय लोगों के चावल खाने की आदत के प्रति श्रद्वा जागती है।
34- कि यूरोप वालों की फूड हैबिट्स हमसे बैटर और कम टाइम कंज्यूमिंग होती हैं।
35- कि घर पर कपड़ा धोने का एक लाभ यह भी हैं कि बाल्टियॉ अपने- आप धुल जाती हैं।
3श- कि मुहल्ले की महिलाओं के पास पूछने के लिए केवल एक ही सवाल बाकी बचा है- कि भाभी जी कब आ रही हैं?।
और अंत में -
37- कि आखिर जैसा भी हो अब तो पत्नी को लौट ही आना चाहिए।