सोमवार, मार्च 26, 2012

व्यंग्य- हाफ पेंट भी उतार दिया


व्यंग्य
हाफपेंट भी उतार दिया
वीरेन्द्र जैन
      राम भरोसे का आना तूफान का आना होता है। उसके आते ही लगता है कि कुछ खास बात है, आते ही उसने पुंगी बनाया हुआ अखबार फैला के पटक दिया और बोला लो देख लो। वैसे मैं देखने की जगह उसका मुख देखना और उसके उद्गार सुनने को ज्यादा उत्सुक रहता हूं, बकौल शायर

वो आये हमारे घर खुदा की कुदरत
कभी हम उनको देखते कभी अपने घर को
और आ कर भी
वो मुखातिब भी हैं करीब भी हैं
उनको देखें कि उनसे बात करें
सो हमने उनके ही श्री मुख से सुनने की लालसा में पूछा-‘क्या हुआ राम भरोसेजी?’
वे बोले ‘जो आधा था अब तो वह भी उतर गया’
‘मैं समझा नहीं’
      इसीलिए तो अखबार लाया था, देखो और पढो! इसमें लिखा है कि आर एस एस ने अब अपने स्वयं सेवकों को हाफ पेंट पहिनने से भी मुक्ति दे दी है। अभी तक कुछ लाज ढकी हुयी थी सो वो भी उतार देने का फैसला हो गया।‘
‘ अरे भाई तुम गलत समझ रहे हो इस खबर का यह मतलब नहीं है ?’
’तो क्या मतलब है?’ उसने झपट्टा जैसा मारते हुए कहा
      ‘इसका मतलब है कि भाजपा की सरकारों द्वारा सरकारी कर्मचारी के संघ में भाग लेने की अनुमति के बाद भी जब संघ में जाने वालों की संख्या दिनों दिन घटने लगी तो उन्हें लगा कि शायद हाफ पेंट में लोगों को शरम आती होगी इसलिए वे शाखा में नहीं आना चाहते सो उन्होंने अपनी वर्दी को मर्जी के अनुसार पहिनने की स्वतंत्रता दे दी। आखिर उन्हें अपना विस्तार करना है, संघ को ग्राह्य बना है, गाँव गाँव में नफरत फैलाना है जिससे एक पवित्र हिन्दू राष्ट्र का निर्माण किया जा सके।‘ मैंने उसे ठंडा करने के लिए कहा। पर वह तो और भड़क गया। बोला-
      ‘अब बहाने मत बनाओ। तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे कि वे तुम से पूछ कर गये हों कि अब क्या करना है। तुम ये नहीं देखते हो कि आजकल धोती पहिनने वाले लोग तक रोज सुबह शाम बरमूडा पहिन कर इधर से उधर और उधर से इधर होने को वाकिंग कहते हैं, सो उन्हें हाफ पेंट पर शरम क्यों आने लगी, अगर शरम आती होगी तो संघ के कार्यकलापों से आती होगी। अन्ना हजारे पर जब संघ से संचालित होने का आरोप लगा और स्वयं संघ व उसके दुमछल्ले संगठनों ने बाद में खुल कर कहा कि अन्ना का आन्दोलन उन्हींने संचालित किया था और उसमें खर्च हुए लाखों रुपये ही नहीं अपितु अपने कैडर को भी उसमें झोंका, तब अन्ना ऐसे भड़के जैसे सांड़ को लाल कपड़ा दिखा दिया हो। एक विधायक ने म.प्र. के लोकायुक्त का संघ में जाने का नकली फोटो दिखा दिया तो उसे जेल की सैर करा दी गयी। जिससे भी कह दो कि वह संघ का है तो उसे यह आरोप गाली की तरह लगता है। खुद भाजपा वाले तक संघ से अपना रिश्ता छुपाते रहते हैं और कहते हैं कि उनका कोई रिश्ता नहीं है जबकि कस्बे से लेकर ऊपर तक सारे संगठन सचिव संघ के प्रचारक ही बनाये जाते हैं।
      ‘पर ये तो रणनीति है भई कि जैसे भी हो लोग संघ की शाखाओं में आयें, वहाँ व्यायाम करें अपनी सुरक्षा के लिए लाठी वगैरह चलाना सीखें, भारत माता को प्रणाम करें। पहिले उन्होंने जैनों को प्रभावित करने के लिए चमड़े के बेल्ट और जूते बदल दिये थे, अब उन्होंने हिटलर की ड्रैस को उतारकर भारतीय गणवेष धारण करने की अनुमति दे दी है। कोई धोती पहिन कर आ सकता है, कोई लुंगी बाँध कर आ सकता है, कोई सलवार पहिन कर आ सकता है, तो कोई पाजामा पहिन कर आ सकता है। परम स्वतंत्रता है, इससे राष्ट्रीय एकता स्थापित होगी।‘
      ‘वही तो मैं कह रहा हूं कि शांति पसन्द जनता के साथ रण चल रहा है इसलिए रणनीति भी है पर गर तुमने खबर को पूरी तौर पर पढ लिया होता तो ऐसा नहीं कहते, इसमें लिखा है कि अब संघ से जुड़ने के लिए शाखा में जाने की भी जरूरत नहीं। अब सप्ताह में एक दिन ‘नो टीवी डे’ का समर्थन करते हुए परिवारों में जाकर प्रबोधन कार्यक्रम से लोगों को जोड़ेंगे और सन्युक्त परिवारों को बढावा देने के लिए जोर देंगे।‘
      ’ पर यहाँ तो गड़बड़ हो जायेगी, अगर वे सन्युक्त परिवारों को बढावा देंगे तो सास बहू के सीरियलों को देखने की जरूरत और बढ जायेगी, फिर ‘नो टीवी डे’ कैसे मनेगा। वैसे भी उनके यहाँ महिलाओं की शाखाएं न के बराबर होती हैं सो वे और म.प्र. पुलिस से क्लीन चिट प्राप्त जैसे अविवाहित प्रचारक घरों में कैसे घुस पायेंगे।‘ मैंने कहा।
      ‘अब तुम्हीं जा के समझाओ
’ यह कह कर राम भरोसे अपना अखबार समेट कर चला गया।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629

    

शुक्रवार, मार्च 16, 2012

व्यंग्य -पड़ोसी की टाँग टूटने के सत्तरह बरस


व्यंग्य
पड़ोसी की टॉग टूटने के सत्रह बरस
वीरेन्द्र जैन
            अपनी आदत के विपरीत मुंगेरीलाल काफी हाऊस में बहुत संयत और गंभीर होकर बैठा था। उसके पहने हुए कपड़े धुले जैसे लग रहे थे वे जहॉ जहॉ भी फटे हों, वहॉ वहॉ फटे दिखाई नही दे रहे थे चाहे तो उन्हैं सिल लिया गया था या इस तरह से पहना गया था कि फटे हुए हिस्से सीधे सामने न दिखें।
            '' मुंगेरीलाल, क्या बात हैं आज बहुत गरिष्ठ नजर आ रहे हो?'' रामभरोसे ने पूछा। दूसरे के फटे में टांग डालने की उसे आदत हैं।
            मुंगेरीलाल ने यथावत गंम्भीरता ओढ़े हुए रामभरोसे को हिकारत की निगाह से देखते हुए कहा, '' तुम लोगों को अपने इतिहास, परंम्परा और संस्कृति का ज्ञान तो है नहीं। बात- बात पे ठिल्ल-ठिल्ल करके अपना समय काट देते हो। जानते हो आज क्या दिन है ?
            '' शनिवार । '' रामभरोसे ने छूटते ही उत्तर दिया।

            '' अबे, दिन से मेरा मतलब दिन के महत्व से था वो क्या कहते हैं कि........ ज़ोश में मुंगरीलाल भूल गये थे कि क्या कहना है।
            '' ज्ञानी जी, आप ही बताइए कि क्या दिन है आज। '' रामभरोसे किसी नई बेवकूफी की बात सुनने और फिर उस बात का कीमा बनाने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका था।
            '' अबे आज से ठीक सत्रह वर्ष पहले मेरे पड़ोसी टांग टूटी थी। आज उसकी सत्रहवी वर्षगॉठ है। ''

            '' अब यूँ तो हर रोज कोई न कोई घटना होती ही रहती हैं और टांग तुम्हारे पड़ोसी की टूटी थी, तुम्हारी नहीं। अब इसमें इस तरह गंभीरता ओढ़कर गधे बन जाने का क्या मतलब?

            '' अब तुम्हैं कुछ पता तो रहता नहीं, जानते हो यह वही पड़ोसी है जिसने मेरी छह इंच जमीन दाब ली थी। बस, तभी से मेरा इससे झगड़ा हैं, यह न्याय का प्रश्न है। मैं उसका कुछ नही बिगाड़ सका, वह शक्तिशाली हैं, पैसे वाला हैं, विधायक उसके घर पड़ा रहता है, न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका सभी ने उसका साथ दिया। फिर आज से ठीक सत्रह वर्ष पहले वह बाथरूम में फिसल पड़ा। उसकी टांग टूट गई। मैं प्रभु को बीच में ले आया कि आखिर वही सुनता हैं उसके यहॉ रिश्वत नही चलती, उसके यहॉ देर हैं पर अंधेर नही, अत: इस दिन को मैं प्रभु के न्याय दिवस के रूप में मानता हूँ। मेरा विश्वास हैं कि मेरी जमीन दबाने के कारण और मुझे इस व्यवस्था से न्याय न मिलने के कारण ही प्रभु ने उसे बाथरूम में भेजा, वहॉ फिसलवाया ओर उसकी टांग तोड़ दी। अब जैसे आप रावण को मारे जाने वाले दिन के रूप में दशहरा मनाते हैं उसी तरह में पड़ोसी की टांग टूट जाने की खुशी में आज के पवित्र दिन को न्याय दिवस के रूप में मनाता हूँ।

            '' पड़ोसी की टांग टूटने के सत्रह बरस '' इस विषय पर समारोह आयोजित होना चाहिए व भोज होना चाहिए '' रामभरोसे ने भरसक गंभीर बनकर कहा। उसे आज के मनोरंजन का विषय मिल चुका था।

            रामभरोसे ने कार्यक्रम की रूप रेखा बनाने की तैयारी में कागज और पेन मंगा लिए व मुंगेरीलाल की तरफ से काफी का आर्डर दे दिया। लेखों भाषणों और गोष्ठियों के कुछ विषय यूँ तैयार हुए :

      1-     टांग टूटने के सत्रह बरस।
      2-    प्राकृतिक न्याय की व्यवस्था और हमारा समाज।
      3-    टूटी टॉग की दशा और दिशा।
      4-    स्वत: टॉग टूटना - एक अहिंसात्मक न्याय।
      5-    न्याय का स्वप्न और टांग का टूटना।
      श्-    सत्रह वर्षो  में टांग टूटने के क्षेत्र में प्रगति।
      7-    टांगे टूटने का इतिहास ।
      8-    आर्थोपोड्स का विकास।
            इतने में जुगाडूपाँडे आ गया। उसकी संस्कृति मंत्री के पास पहुँच है। आयोजन का मौका देखकर वह खिल उठा- उसने कहा, '' मुझे जरा जल्दी से विषय दो, मैं इसे लेकर मंत्रालय तक जाता हूँ। शाम को संस्कृति भवन में पचास-साठ रिटायर्ड बुद्विजीवियों को बटोर लाना। मैं संस्कृति मंत्री से समय एंव इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए अनुदान  का चेक लेकर आता हूँ। ये फालतू बुद्विजीवी जब भी बैठ जायेंगे तो विषय को अपनी अपनी जगह से खीच-तान कर ऐसा फैला ही लेगे वह हिन्दूस्तान का नक्शा बनकर रह जाए। ''
            रामभरोसे ने तुंरत जुगाडूपाँडे के कान में कुछ कहा जिसका मजलब बिना सुने ही सबकी समझ में आ गया  कि वह अनुदान की राशि को इतना स्वीकृति कराने के लिए कह रहा होगा जिससे कार्यक्रम के बाद उसकी सफलता की खुशी में शाम की दारू पार्टी  के लिए भी पैसा बच जाए। जुगाडूपाँडे ने उसे आश्वस्त किया कि प्रमुख कार्यक्रम तो वही हैं, शेष तो उसकी भूमिकाएं हैं।
            रात्रि में मुंगेरीलाल ने नशे में धुत होकर लौटते समय अपने पड़ोसी को भरपूर गालियॉ दीं। पड़ोसी ने उसके नशे में होने के कारण अहिंसा का परिचय दिया। फिर शेष विश्व की भॉति दोनो चैन की नींद सो गए।
            इस तरह टॉग टूटने के सत्रह बरस का भव्य आयोजन संपन्न हुआ।
----- वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास  भोपाल मप्र
फोन 9425674629

गुरुवार, मार्च 15, 2012

व्यंग्य - खून से रंगे हाथ और कांच की चूड़ियाँ


व्यंग्य
मेंहदी से नहीं खून से रंगे हाथ और काँच की चूड़ियाँ 
वीरेन्द्र जैन
क्या आप को पता है कि चूड़ियाँ कहाँ बनती हैं?
      मेरा मतलब काँच की चूड़ियों से है जो आपको पता ही है कि फिरोजाबाद में बनती हैं। फिरोजाबाद भोपाल इन्दौर से बहुत दूर नहीं है जो वहाँ से चूड़ियां नहीं आ सकें। फिरोजाबाद से आयी हुयी चूड़ियों से वैसे तो भोपाल इन्दौर के बाजार भरे रहते हैं। चौक बाजार जाओ तो लगता है कि जैसे आधी दुकानें चूड़ियों की ही हैं। फिर आखिर ऐसी क्या कमी थी कि प्रदेश के उद्योग मंत्री को कहना पड़ा कि उन्होंने चूड़ियाँ नहीं पहिन रखी हैं। वे चाहें तो चाहे जितनी चूड़ियां पहिन सकते हैं और फिर भी कोई कमी नहीं आने वाली। चाहे तो वे चूड़ियां पहिन कर गा भी सकते हैं कि मेरे हाथों में नौ नौ चूड़ियां हैं। वैसे भी वे गाना तो गाते ही हैं सो नौ नौ की जगह सौ सौ भी कह सकते हैं।
      चूड़ियां पहिनना न पहिनना अपनी अपनी पसन्द की बात है और हिन्दू या मुस्लिम देश बनने से पहले इतनी स्वतंत्रता तो देश में है ही कि नागरिक बुर्के से लेकर जो चाहे सो पहिन सकता है या नागा बाबा तक हो सकता है। अभी पिछले वर्षों में ही सरकारी कर्मचारियों के लिए शाखा में जाने पर प्रतिबन्ध हटा लिए जाने के बाद लड़कियों के एक स्कूल का मास्टर स्कूल में नेकर पहिन कर आ गया था जिसकी नासमझों ने शिकायत कर दी थी, पर समझदार सरकार के अधिकारियों ने उसके मानव अधिकार के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की थी। इसलिए अगर प्रदेश के उद्योगमंत्री ने चूड़ियां नहीं पहिन रखी हैं तो हमें कोई शिकायत नहीं है। उनके ही कुछ साथियों ने तो अंडरवियर तक नहीं पहिन रखा है जिनका पता भोपाल की एक आर टी आई कार्यकर्ता की हत्या के आरोपियों की वीडियो रिकार्डिंग से मिलता रहता है। वो तो सीबीआई से जाँच हो रही है इसलिए पता भी चल रहा है वरना पालतू पुलिस तो अब तक क्लीन चिट दे चुकी होती। ऐसी क्लीन चिटें देते रहने का उन्हें अब अभ्यास हो चुका है।
      वैसे सरकार में जितने भी मंत्री हों सबके लिए ड्रैस कोड लागू हो जाये तो बहुत ही अच्छा है, अब ये भी कोई बात है कि उद्योग मंत्री चूड़ियां नहीं पहिनने पर गर्व कर रहा हो और मुख्यमंत्री हरे काँच की चूड़ियां पहिन ले। मंत्रिमण्डल को एक स्वर से पहले तय करना चाहिए कि वो चूड़ियां पहिने है या नहीं पहिने है। यह तो ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस जैसा हाल हो गया कि पार्टी अध्यक्ष कुछ और कह रहे हैं और मंत्री पद पर सुशोभित कुछ और कह रहा है। आखिर मंत्रिमण्डल की सामूहिक जिम्मेवारी होती है।
      ......................... पर रुकिए, हो सकता है कि उद्योग मंत्री ही सही हों क्योंकि चूड़ियां पहिनने के लिए मेंहदी से रंगे हाथ होते हैं खून से रंगे हाथ नहीं। वे सचमुच काँच की चूड़ियाँ नहीं पहिनेंगे। वैसे लोहे की भी चूड़ियां होती हैं जिन्हें कुछ लोग हथकड़ी कहते हैं।
वीरेन्द्र जैन
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शनिवार, मार्च 10, 2012

vyangya- modee kee dooradarshita मोदी की दूरदर्शिता


व्यंग्य
मोदी की दूरदर्शिता
वीरेन्द्र जैन

स्व. ओमप्रकाश आदित्य की एक कविता थी-
मरने वालों के घर वालों की बददुआ न लगे
इसलिए कफन बेचने वालों ने
बनवा कर एक शमसान
नगरपालिका को कर दिया है दान
अब प्रतीक्षा है कि कोई नेता मरे
तो उसे जला कर उसका उद्घाटन करें 
      उद्घाटन की अति कर देने वाले नेताओं पर यह एक बहुत ही निर्मम व्यंग्य था, जिसके लिए उनके मरने की कल्पना की गयी थी, पर जेल जाने की नियति वाले नेताओं द्वारा जेल का उद्घाटन कुछ कुछ ऐसा ही दृष्य उपस्तिथ करता है। पिछले दिनों गुजरात के सूरत में वहाँ के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाजपोर कारागार का उद्घाटन करके उपरोक्त कविता की याद दिला दी। उक्त जेल में उन्होंने जितनी सारी सुविधाएं जुटायी हैं उससे तो ऐसा लगता है कि उन्होंने अपने और अपने चट्टे बट्टों के भविष्य को ध्यान में रख कर ही इसका निर्माण करवाया है। इस हाइटेक जेल में खेल मैदान, इंडस्ट्रियल शेड, अदालतों में पेशी के लिए वीडियो कांफ्रेंस सुविधा, हीरा प्रशिक्षण केन्द्र के साथ पुस्तकालय भी है। इस जेल में एक दो नहीं 807 सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं जिसमें से 65 कैमरे तो टिल्ट जूम कैमरे हैं जिन्हें 360 डिग्री तक घुमाया जा सकता है। इसमें 35 एक्स आप्टिकल ज़ूमिंग सम्भव है जिसकी सुविधा से जेल के बाहर गुजरने वाली सड़कों पर गुजरने वाली गाड़ियों के नम्बर तक देखे जा सकते हैं॥ एक नियंत्रण कक्ष बनाया गया है जिसकी मदद से अधिकारी रात में इंफ्रा रेड विजन की मदद से पूरे कारागार को देख सकता है। घुप अँधेरे में भी कैमरों की मदद से ब्लेक अंड व्हाइट  व्यू मानिटर पर देख सकता है।
      दो लाख वर्ग मीटर मे बने इस कारागार में से एक लाख वर्ग मीटर तीन मंजिला भवन का निर्माण किया गया है जिससे इसमें 3007 कैदी रखे जा सकते हैं। महिला कैदियों के लिए 12 विशेष बैरकें बनवायी गयी हैं जिनमें रसोई और बच्चों के लिए अप्पू घर भी है।
      इस कारागार में मोदी सरकार का पूरा मन्त्रिमण्डल अपने प्रिय पुलिस अधिकारियों के साथ सजा काट सकता है। लालू प्रसाद इस दिशा में पहले ही रास्ता दिखा चुके हैं कि कैसे वीआईपी जेल में सुविधाएं होनी चाहिए। वही कानून बनाने वाले, वही कानून तोड़ने वाले वही सजा दिलाने वाले, वही सजा पाने वाले सब कुछ वही वही सुन कर गीता के उपदेश का ध्यान आ जाता है। उदय प्रकाश की एक कबीराना कविता है-
हम हैं ताना हम हैं बाना
हमीं चदरिया, हमीं जुलाहे, हमीं गजी हम थाना
नाद हमीं, अनुनाद हमीं, निःशब्द हमीं गम्भीरा
अन्धकार हम, चाँद सुरज हम, हम कान्हा, हम मीरा
हमीं अकेले हमीं दुकेले, हम चुग्गा हम दाना
मन्दिर मस्जिद, हम गुरुद्वारा, हम मठ, हम वैरागी
हमीं पुजारी, हमीं देवता, हम कीर्तन हम रागी
मूल फूल हम, रुत बादल हम, हम माटी, हम पानी
हमीं जहूदी, शेख बिरहमन, हरिजन हम ख्रिस्तानी
पीर अघोरी, सिद्ध औलिया, हमीं पेट हम खाना
नाम पता ना ठौर ठिकाना, जात धरम न कोई
मुलक-खलक, राजा परजा हम, हम बेलन हम लोई
हम हीं दूल्हा, हमीं बराती, हम फूंका, हम छाना
     बात बात में पाँच करोड़ गुजरातियों के प्रतिनिधित्व का दावा करने वाले वहाँ 2002 के नर संहार में मरने वाले भी गुजराती ही थे। मोदीजी जब वहाँ के प्रसिद्ध पकौड़े खाओ तो चटनी जरूर छत्तीसगढ के जंगलों से मँगवा लेना वहाँ लाल चींटियों की चटनी बनती है।

वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, फ़रवरी 23, 2012

जन्म तिथि का चुनाव


व्यंग्य
जन्म तिथि का चुनाव
वीरेन्द्र जैन
            जिन्दा रहने के लिए पेट भरना जरूरी होता है। पेट भरने के लिए नौकरी जरूरी होती है। नौकरी के लिए शिक्षा जरूरी होती है, एक अदद डिग्री या प्रमाण-पत्र की आवश्यकता होती है और उस प्रमाण - पत्र  के लिए जन्म तिथि अर्थात डेट ऑफ बर्थ  की जरूरत होती है। जिन्हें पेट भरने के लिए नौकरी नहीं करना होती है वे जन्म तिथि की परवाह नहीं करते क्योंकि उन्हें रिटायर नहीं होना होता हे। उनकी सांस और दुकान एक साथ बन्द होती है अर्थात सांस ही दुकान है और दुकान ही सांस है।
किसी बुजुर्ग की दुकान बन्द देख कर लोग पूछते हैं कि - गये, क्या ?
यदि उत्तर नहीं में मिलता है तो दूसरा प्रश्न होता है कि - तो फिर दुकान क्यों बन्द है ?
आदमी की जब तक सांस है तब तक आस है कि ग्राहक आयेगा- मुनाफा चुकायेगा पुराना उधार देगा- नया ले जायेगा। सांस गयी तो आस गयी, ग्राहक भी गया और उधार भी गया।

            जिसके पास जन्म तिथि होती है उसके सहकर्मी पूछने लगते हैं कि कितने साल और बचे हैं। बडे बाबू रिटायर हों, तो अपना नम्बर लगे। आखिरी साल में तो लोग दिन गिनने लगते हैं पहली निगाह कलेन्डर पर पड़ती है। अंग्रेजों के समय  में लोग होशियार हो गये थे, उम्र दो साल कम लिखाकर ज्यादा दिन नौकरी कर लेते थे। जन्म पत्री वाला जन्म दिन और हाई स्कूल सार्टिफिकेट वाला जन्म दिन एक नहीं होते थे। भविष्यफल देखने की राशि दूसरी तथा भविष्य बनाने, नौकरी देने वाली राशि दूसरी। एक भविष्य की तो दूसरी वर्तमान की।

            जन्म के समय विक्रम सम्वत  और ईस्वी सन् दोनों के साथ साथ चलते है। पर जन्म तिथि आते आते बदल जाते है। मेरे एक ठेकेदार मित्र अपने इंजीनियरों को पार्टी देने के लिए अपने तीन जन्म दिन मनाते हैं  तथा वे तीनों ही उनके सच्चे जन्म दिन होते है। एक जन्म दिन विक्रम सम्वत के आधार पर तिथि वाले दिन पड़ता है तो दूसरा ईसवी सन् वाली तारीख को पड़ता है, तीसरा जन्म दिन स्कूल प्रमाण-पत्र के आधार पर पडता है। समझदार लोग अपना जन्म दिन स्वंय चुनते हैं। यदि उस दिन किसी अन्य महापुरूष का जन्म दिन होता है तो सारी आभा फीकी पड़ जाती है सारी बधाइयां और पुष्पगुच्छ उसी के पास पहुचते हैं। यदि लाल बहादुर शास्त्री को कैरियर मैनेजमेन्ट आता होता तो अपना जन्म दिन दो अक्टूबर को नहीं रखते। सुबह से सारी श्रद्वांजलियां गांधीजी ले जाते है, बची खुची शास्त्री जी के हिस्से में आती है। पुराने लोग जन्म तिथि के अनुसार भविष्य देखा करते थे नये लोग भविष्य की संभावनाओं पर जन्म तिथि  तय करते हैं। हिन्दू पार्टी के एक नेता की जन्म तिथि  देशी कलेन्डर से नही मनायी जाती। वे ही नये ईसवी वर्ष पर नाक भौं सिकोड़कर, संवत्सर को बधाई देते मिलते हैं। देशी तिथि पर भनाएंगे तो किसी को याद ही नहीं रहेगा। सुबह सुबह गुलदस्ते की जगह ज्ञापन लिये खड़े मिलेगे।

            पंडितों पुराहितों ने चढ़ावे  के लालच में अवतारों के जन्म दिन तो खोज लिये पर जन्म वर्ष खोजने  की जरूरत नहीं समझी। ठीक भी है, जन्म वर्ष से क्या मिलने वाला था। जन्म दिन तो छोटे मोटे जूनियर देवताओं के भी खोजकर परसाद का इंताजाम कर लिया गया है। जातिवाद  ने जातियों के अपने अपने महापुरूष भी उखड़वा दिये और धूम धकाड़ा  करने व अपनी ताकत दिखाने के लिए जन्म दिन का बहाना सबसे अच्छा है।

            दीवारों  पर लिखने  के लिए यह वाक्य बहुत अच्छा है कि व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से मकान बनता है पर मनाने के लिए जन्म दिन ही ठीक है क्योकि कर्म दिन तो वर्ष में तीन सौ पैंसठ होते हैं पर जन्म दिन तो एक ही होता है।

            जन्म लेना एक कठिन कार्य है अत: उसको प्रतिवर्ष आयोजित होना चाहिये उसकी याद की जाना चाहिये। जन्म के साथ जन्म के स्थान का भी महत्व है। राम जन्म भूमि के नाम पर मातृभूमि के पचासों लोगों को कुरबान करवा दिया गया है व पचासों  हजार करोड़ की सम्पत्ति भूमि में मिलाने के बाद लाखों श्रम दिवसों को नष्ट कराया जा चुका है भले ही तुलसीदास जी कह गये हों कि - भए प्रकट कृपाला दीन दयाला कौश्लया हितकारी- पर भूमि तो जन्म भूमि ही कहलायेगी। जो मूर्ति वहॉ रखी है वह भी अचानक वहां प्रकट ही हुई मानी जाती है। यह जन्म भूमि का प्रेम है कि वह मूर्ति '' बैक टु दि बेसिक्स '' वाले फार्मूले के अनुसार जन्म भूमि पर पधारी थी। वैसे '' सबै भूमि गोपाल की '' होती है, पर वह मंत्रालय अलग है कैदी लोग भी आन्दोलित हैं कि अयोध्या की तरह जेलों पर भी कारसेवकों की कृपा हो जाये तो सारे जेल तोड़कर विशाल कृष्ण मंदिर का निर्माण हो सकता है। कृष्ण जी रात्रि में जन्मे थे पर उनकी ‘जन्म-रात्रि’ नही मनायी जाती, उनका भी जन्म दिन ही मनाया जाता है।

            मैं किसी ठीक ठाक से जन्म दिन की खोज में हूं - बस जरा बड़ा आदमी  बन लूं। तब तक आप तलाश कर रखना।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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शनिवार, दिसंबर 24, 2011

व्यंग्य- देश की चिड़िया


व्यंग्य
देश की चिड़िया
वीरेन्द्र जैन
      अतीतजीवी जब भी देश की समस्याओं पर बात करने उतरते हैं तब भारत एक तुलनात्मक अध्ययन की तरह एक सूत्र वाक्य बार बार दुहराते हैं कि भारत कभी  सोने की चिड़िया हुआ करता था। यह सुनते ही श्रोता वर्ग की निर्धन आँखें वर्तमान को धिक्कारती हुयी अतीत में पहुँच जाती हैं और इस कीमती धातु की चमक उनकी आँखों में कौंधने लगती है। इस चकाचौंध मे वे यह नहीं सोच पाते कि यदि दूध दही की नदियाँ बहाने वाली इस चिड़िया को अब मिट्टी की चिड़िया कहें या कुछ और पर इसे ऐसा बनाने में योगदान भी तो अतीत वालों ने ही दिया है। वर्तमान तो उसका परिणाम है। मुझे यदि इस सूत्र वाक्य की अनिवार्यता के साथ भाषण करना पड़े तो मैं यही कहूंगा कि भारत अतीत में सोने की चिड़िया हुआ करता था और उसी जमाने के लोगों ने उसका सत्यानाश करके हमें स्यापा करने के लिए छोड़ दिया। पर मैं जानता हूं कि भाषण के लिए पहले से ही असंंख्य लोग भरे पड़े हैं जिनका काम सुबह से शाम तक भाषण देना और केवल भाषण देना है। हो सकता है कि वे रात में उठकर भी भाइयो और बहिनो कहना शुरू कर देते हों और इस पर उनकी पत्नी कहती हो कि तुम्हारी बहिनजी तो लखनउ में जीजा जी के पास है, यहाँ मैं लेटी हूं... चुपचाप सो जाओ।
      पर मेरी चिंता दूसरी है, शायद इसी चिंता के कारण सोना मेरी जिन्दगी में उपलब्ध नहीं है। किसी शायर ने कहा है कि है किसी माने में मुफलिस के लिए सोना नहीं । मेरी चिंता चिड़िया पर केन्द्रित है। भारत सोने का देश भी हो सकता था जैसे कि सोने की लंका के बारे में पुराण भरे पड़े हैं। पर नहीं यह सोने का देश नहीं यह सोने की चिड़िया था। इतिहास इस बारे में मौन है कि यह चिड़िया कैसे मिट्टी की चिड़िया में बदल गयी और क्यों बदल गयी। क्या इसलिए कि चिड़िया उड़ती है और अगर उड़ती है तो उसे तो अंततः उड़ना ही था, फिर असंतोष कैसा। जैसे साइबेरिया के पंछी सर्दियों में उड़कर भारत आ जाते हैं तथा भारत के बहेलिये उनमें से कई को मारकर खा जाते हैं, हो सकता है कि सोने की चिड़िया भी उसी हादसे का शिकार हो गयी हो। यदि वह चिड़िया थी, तो उसके पंख भी होंगे और हो सकता है कि उन्हीं पंखों के लिए उसका शिकार हो गया हो, जैसे मोर पंखों के लिए राष्ट्रीय पक्षी का शिकार होता है।
      मुझे लगता है कि चिड़िया को पिंजरे में पालने की प्रथा भी सोने की चिड़िया के उड़ जाने पर ही शुरू हुई होगी। बुजर्गों ने लड़कों को डाँटते हुए कहा होगा कि देखो मैं कहता था न कि चिड़िया को पिंजरे में बन्द करके रखो, नहीं तो उड़ जायेगी पर तुम नौजवान लोग मानते कहाँ हो।
ऐसा कहते हुए वे घर की जवान लड़कियों की ओर भी देख लेते होंगे।
      चिड़िया अपने प्रतिबिम्ब से लड़ने के लिए भी विख्यात है, उसका यह गुण तो हमारे देशवासियों से बहुत मिलता है। हम लोग भी अपने बनाये ऐसे शत्रु से लड़ते रहते हैं जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं होता पर हमें दिखायी देता है। हम भी चिड़ियों की तरह दिमाग से कम काम लेते हैं। चिड़िया घोंसला बनाती है और हम लोग इसके लिए हाउसिंग बोर्ड का गठन कर लेते हैं जो घोंसले जैसे ही मकान बनवा कर उसके आकर्षक विज्ञापन छपवाते रहते हैं।
      लगता है कि हमारा देश एक चिड़िया था, चिड़िया है और चिड़िया रहेगा । जब तक जागरण नहीं होता यह सोने की चिड़िया ही रहेगा।
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, नवंबर 29, 2011

व्यंग्य --- फायर ब्रांड नेता और एफ डी आई की आग


व्यंग्य
                  फायर ब्रांड नेता और एफडीआई की आग
                                                               वीरेन्द्र जैन
      राजनीति में जिन्दा बने रहकर गले में मालाएं डलवाते रहना जरूरी होता है नहीं तो फोटुओं पर माला डलने की नौबत आ जाती है। यही कारण है कि हाशिये पर धकेल दिये गये बूढे बूढे नेता तक पप्पुओं बबलुओं की तरह अपना बर्थडे मनाते रहते हैं और चमचों, दलालों से उस दिन शतायु होने के विज्ञापन छपवाते रहते हैं। मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमन्त्री उमा भारती बहुत दिनों से अखबारों के मुखपृष्ठ पर आने के प्रयास में थीं पर समय का फेर कि दसवें बारहवें पेज पर आने में भी मुश्किलें आ रही थीं। जब तक भाजपा से बाहर थीं और उसके नेताओं को गरियाती हुयी उसे समूल नष्ट करने के बयान देती रहती थीं तब  कम से कम अन्दर घुसने के प्रयासों के समाचार तो छपते रहते थे, पर भाजपा में पुनर्प्रवेश करने के बाद जो प्रदेश निकाला हुआ है, उसने तो स्तिथि बहुत ही खराब कर के रख दी। अब पिंजरे में कितनी भी उछलती कूदती रहें पर कोई नोटिस ही नहीं लेता।
      कभी अंग्रेजी के अखबार उन्हें फायर ब्रांड नेता कहते थे। साध्वियों की वर्दी तो वैसे ही फायर कलर की होती है सो फायर ब्रांड होने के लिए केवल मुँह से आग निकालना रह जाता है और जिसमें वे कोई कमी नहीं छोड़ती हैं। फायर ब्रांड होने से फ्रंट पेज पर जगह मिलने में सुविधा होती है। आखिर उनके इंतजार की घड़ियां खत्म हुयीं और एफडीआई के लिए बन्दनवार सजा कर सरकार ने उन्हें मौका दे ही दिया ताकि वे यह जता सकें कि प्रदेशों में मुख्य मंत्री के पद पर कोई स्थायी नियुक्ति नहीं होती। उन्होंने मुख पृष्ठ पर जगह बनाने के लिए कह ही दिया कि वे एफडीआई के रिटेल स्टोरों में आग लगा देंगीं। फायर ब्रांड नेता के मुख से ऐसे ही वचन शोभा देते हैं। अब फायर ब्रांड के मुख से कोई फूल तो बरसने से रहे बरना ब्रांड पर संकट आ जायेगा।
      जिस तरह दक्षिण में शिवकाशी जिला फायर वर्क्स प्रोडक्ट के लिए विख्यात है उसी तरह धर्म का चोगा ओढने वाले राजनेता अपने मुँह से पटाखे फुलझड़ी छोड़ने के लिए मशहूर हैं। आतिशबाजी की चटाक पटाक आनन्द का सृजन करती है। नेता भी अब भाषण कम और मनोरंजन अधिक करने लगे हैं। राज नारायण से लालू परसाद ही नहीं  कभी अटल बिहारी के चुटकले सुनने के लिए बहुत सारी भीड़ जुटती थी, भले ही वे चुनाव हार जाते थे। एक बार ग्वालियर में जब युवा माधवराव से हार गये तो दो जगह से चुनाव लड़ने लगे थे।       
      उमाजी का बयान पढने के बाद मैंने सपना देखा कि वे अपने बजरंग दल को लंका की तरह खुदरा बाजार की विदेशी दुकानों में आग लगा देने के लिए उकसा रही हैं पर वह वानर सेना महाभारत के अर्जुन की तरह हाथ बाँधे खड़ी है और आदेश पालन में एकमत से असमर्थता व्यक्त कर रही है। यह रुकावट मीडिया के कैमरामेनों के इंतजार वाली रुकावट नहीं है। उनकी शिकायत है कि जब गोबिन्दाचार्य को यही कहने पर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था और उनका स्वदेशी आन्दोलन अध्य्यन अवकाश में बदल गया था तब अब ऐसा क्या हो गया कि दीदी आग लगाने को उकसा रही हैं। जिस दिन अमेरिका से लताड़ आ जायेगी उसी दिन कई अरुण जैटली अमेरिकन राजदूत को सफाई देने पहुँच जायेंगे जिसका खुलासा किसी अगली विक्कीलीक्स से होगा। मनमोहन सिंह जब नई आर्थिक नीति लेकर आये थे तो भाजपा ने कहा ही था कि इन्होंने हमारी नीतियों को हाईजैक कर लिया है जैसे कौआ बच्चे के हाथ से रोटी छेन कर भाग जाता है। राजग के शासन में भी जब कोई नीति नहीं बदली गयी थी तब तो दीदी थोड़े से अंतराल को छोड़कर मंत्रिमण्डल को ही सुशोभित कर रही थीं।
      वैसे भी आग लगाने के बड़े खतरे होते हैं। होम करते हुए तक तो हाथ जल जाते हैं और लंका में आग लगाने के लिए हनुमानजी को अपनी ही पूंछ में आग लगानी पड़ी थी। कबीर तक ने साथ चलने वालों से सबसे पहले अपना घर जलाने का आवाहन किया था, पर दीदी को तो घर ऐसा सता रहा था कि छोड़े हुए घर में वापिसी के लिए उन्होंने अपना नया घर मटियामेट कर दिया। पुराने घर में जगह भी मिली तो नौकरों के कमरे में जहाँ पहले से ही बड़ी भीड़ है। अब आग लगाने के लिए पैट्रोल खरीदना पड़ेगा जो इतना मँहगा हो चुका है कि उसे खरीदने के लिए पहले कोई बैंक लूटना पड़ेगा। वैसे जो एफडीआई वाले रिटेल स्टोर में आग लगा सकते हैं वे बैंक भी लूट सकते हैं, पर उसके लिए बन्दूकों की जरूरत पड़ेगी जो पुरलिया की तरह कोई आसमान से नहीं टपकेंगीं। खैर किसी तरह उनका भी इंतजाम हो जायेगा पर फिर सारा मामला नक्सलवादियों जैसा हो जायेगा। और जब नक्सलवाद की तरह से परिवर्तन लाया जायेगा तो फिर इस भगवा रंग की वर्दी, अयोध्या में राम मन्दिर, और मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी का क्या होगा। अभी तो केवल कुर्सी का ही खतरा रहता है फिर तो जान का खतरा बना रहेगा।
      ऐसा लगता है कि कहीं उन्होंने फायर ब्रांड का मतलब गलत तो नहीं समझ लिया इसमें केवल शब्दों के गोले ही छोड़े जाते हैं। ओजस्वी वक्ता वह होता है जो अपने देश और धर्म के लिए दूसरों को जान देने के लिए उकसाता रहे। इसलिए पहले से घोषणा और सूचना करके आग लगाने के लिए जाइएगा ताकि आपको आग लगाने से रोकने के फोटो अच्छे आयें और सभी अखबारों के मुख पृष्ठ की खबर बनें। मुख्य मंत्री की कुर्सी के लिए रास्ता मुखपृष्ठों से हो कर ही जाता है।
वीरेन्द्र जैन
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