गुरुवार, मई 31, 2012

व्यंग्य- एक डायबिटिक द्वन्द


एक डायबिटिक द्वन्द
वीरेन्द्र जैन
कार्लमार्क्स का यह विश्लेषण पुराना पड़ गया है कि दुनिया दो ध्रुवों में बंटी हुयी है, एक मालिक ओर एक मजदूर, एक शोषक और एक शोषित। मुझे लगता है कि अब दुनिया जिन दो हिस्सों में बंट रही है उसे डायबिटिक और नानडायबिटिक का नाम देना पड़ेगा। एक वे जिन्हें डायबिटीज है और दूसरे वे जिन्हें डायबिटीज नहीं है। हॉं कल नहीं होगी ऐसा नहीं कहा जा सकता है।जिस दर से डायबिटीज के मरीज फल फूल रहे हें उसे देख कर तो लगता है कि थोड़े दिनों में बंटवारा बहुत साफ हो जायेगा।
      ऐसा नहीं है कि मुझे डायबिटीज हो गयी है इसलिए मैं चिंतित हूँ अपितु यह तो मेरा स्वभाव है कि शहर के अंदेशे में रहता ही रहा हूँ और इसी चिंता के कारण तो मुझे डायबिटीज हो गयी है। परसों मैंने यह खबर रामभरोसे को सुनायी तो उसकी आंखों में रहीम का दोहा नाली के पानी में मच्छरों के लारवा की तरह तैरने लगा।
      यों रहीम सुख होत है देख बढत निज गोत
      ज्यों बढरी अंखियॉं निरख अंखियन खों सुख होत
      वे खुश थे कि मैं उनकी जमात में शामिल हो गया था। प्रातःकाल की शीतल मंद बयार में जब निद्रादेवी की गोद और ज्यादा गुदगुदी लगती है तब मैं जूते पहिन कर सड़कें नाप रहा होंऊॅंगा। पड़ोस की लड़कियॉं कहेंगीं- अंकलजी आप भी घूमने जाने लगे! हमारे दादाजी भी जाते हैं। वे मुझे सीधे डेढ पीढी ऊपर चढा देंगीं और मैं कुढ कर रह जाऊंगा।
      जिन्हें डायबिटीज नहीं है वे शोषक हैं । वे फलों के राजा आम पर चाकू चला सकते हैं और उसे कली कली काट कर खा सकते हैं। दूध शक्कर में मथ कर मैंगोशेक बना सकते हैं या अपने दोनों होठों से दबा कर उसे प्यार से चूस सकते हैं तथा कई तरह के मधुर रसों में डूब सकते हैं। जिन्हें डायबिटीज है वे पहले कवि वियोगी की तरह तरस सकते हैं और आम के ठेले के पास से बेनियाज होकर कैफ भोपाली का वो शे’र गुनगुना सकते हैं-
      गुजरना उनकी गली से बेनियाजाना
      ये आशिकों की सियासत किसी को क्या मालूम
      पहले वे लीची के ठेले के पास खड़े होकर लीची का भाव पूछते थे व मंहगी होने के कारण बिना खरीदे रह जाते थे और तब गुस्सा मॅंहगाई पर आता था। अब तो उसका भाव ही नहीं पूछ सकते। अब वो ज्यादा याद आती है। हो सकता है कि सस्ती हो गयी हो पर क्या फायदा! चीकू के ठेले को आलू का ठेला मान लेते हैं।
      मिठाई की दुकान के बारे में पहले माना जाता था कि ऊॅंची दुकान शायद डायबिटीज वालों के लिए ही बनी हैं इसीलिए उसके पकवान फीके होते हैं पर बुरा हो इन डाक्टरों का जो ऊॅंची नीची किसी भी दुकान पर देख लें तो गांव की पाठशाला के गुरूजी की तरह कान उमेठने लगें। मिठाई का बाजार वेश्या की गली हो गया है। किसी नगर में मेहमानी करते हुये यह नहीं पूछ सकते कि आपके नगर की कौनसी चीज प्रसिद्ध है?  सारी चीजें तो शक्कर वाली ही होती हैं- मथुरा के पेड़े हों, आगरा का पेठा हो, हाथरस की खुरचन हो या गंगानगर की मिल्ककेक, सब तो शक्कर के विभिन्न अवतार हैं। इलाहाबाद के अमरूद मलीहाबाद का दशहरी, बालोद का चीकू, सब के सब शर्करा की वृद्धि कर मधुमेहवाणी करते रहते हैं कि यमराज भैंसे या पैसिंजर से नहीं बोईंग-707 से आ रहा है।
      पता नहीं अर्थशास्त्रियों का ध्यान इस पर गया है या नहीं कि भविष्य की अर्थव्यवस्था पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। मुझे तो भविष्य साफ दिख रहा है कि शक्कर के कारखाने बन्द होकर उनमें पैथोलाजी की प्रयोगषालाएं चल रही हैं या इन्सुलिन बनाने के कारखाने चल रहे हैं। हर फुटपाथ पर डायबिटोलोजिस्ट से लेकर डायटीशियन तक फट्टा बिछाये बैठे हैं। चाय काफी में शक्कर लेने के लिए अलग से आर्डर देना पड़ता है। गन्ने के खेत खत्म हो जाने से प्रेमी प्रमिका को पुराने मंदिर में मिलना पड़ता है जहॉं पहले ही हाउसफुल होने की नौबत है तथा सुविधा देने के लिए पुजारियों ने रेट बढा दिये हैं। महाराष्ट्र सरकार ने सहकारिता विभाग बन्द कर दिया है तथा राशन के दुकानदार शक्कर लिए बिना मिट्टी का तेल भी नहीं दे रहे हैं या अलग से पैसे चाह रहे हैं। शराब बनाने के लिए मोलएसस का अकाल पड़ गया है। अमरोहा सहित कई नगरों में मक्खियॉं कम हो गयी हैं तथा पर्यावरण को यथावत रखने के प्रति चिंतित रहने वाले एनजीओ एक और प्रजाति के कम हो जाने की चिंता को लेकर एक नया प्रोजेक्ट स्वीकृत करा रहे है जिसमें कई रिटायर्ड आइएएसों को काम मिल रहा है।
      बच्चे खुश हैं कि उनकी टाफी अब अंकल नहीं खा सकते। बड़े लोग अब आइसक्रीम दिलाने के लिए ज्यादा ना नुकर नहीं करते क्योंकि वे ही आह भर कर कहते हें कि अभी खा लो बाद में तो बन्द हो ही जाना है। बहुएं सोचती हें कि बूढा घूमने गया तो एक घन्टे के लिए तो शांति मिली नही तो चिचियाता रहता कि हमारे लिए बिना शक्कर की, हमारे लिए बिना शक्कर की। बिना डायबिटीज वाले लड़ाई के लिए ललकारते रहेंगे पर डायबिटीज वाले क्या खाकर लड़ेंगे! और लड़ेंगे भी तो उनके घाव भरने में हफ्तों लगेंगे जबकि बिना डायबिटीज वाले जख्म पर पपड़ी पाड़े दूसरे ही दिन खम्भ ठोकते नजर आयेंगे।
      हमारे विचारक जाने क्यों नहीं सोच रहे हैं वरना डायबिटीज से तो आर्थिक सामाजिक राजनीतिक धार्मिक वैज्ञानिक अवैज्ञानिक हर तरह से प्रभाव पड़ने वाला है। मैं अपने से ही जानता हूँ कि जब से डाक्टर ने मुझे डायबिटीज बतलायी है तब से मेरी तो दुनिया ही बदल गयी है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास  भोपाल म.प्र.
फोन 9425674629  


मंगलवार, मई 29, 2012

व्यंग्य - डरी हुयी दीदी का जमाना दुश्मन है


व्यंग्य
डरी हुयी दीदी का जमाना दुश्मन है
वीरेन्द्र जैन
      पुरानी फिल्मों का एक गाना था जिसे में गीत नहीं कहना चाहता क्योंकि मैं गीत और गाने में फर्क करता हूं। उसके बोल थे-
गोरी चलो न हंस की चाल, जमाना दुश्मन है
तेरी उमर है सोला साल, जमाना दुश्मन है
      पर जिसके बारे में सोच के मुझे ये गाना याद आया उसकी आंकड़ागत उम्र भले ही सोलह साल से साढे तीन गुना हो गयी हो पर बौद्धिक उम्र अभी भी सोलह साल से भी नीचे होगी। वैसे इस गाने के याद आने का उम्र से कोई ज्यादा वास्ता नहीं है, पर जमाने के दुश्मन हो जाने से है। और दुश्मनी भी प्यार मुहब्बत वाली नहीं अपितु खूनी दुश्मनी। जिसे फिल्मी भाषा में कहें तो जानी दुश्मन।
      जी हाँ मेरा आशय स्वयं को बंगाल की शेरनी कहलवाने वाली ममता दीदी से है जिन्होंने हिन्दी साहित्य में एक नया शब्द पैदा करवाया है दीदीगीरी। और इस दीदीगीरी के आगे प्रणव मुखर्जी की दादागीरी भी नहीं चल पाती। पर अब दीदी को भी लगने लगा है कि सारा जमाना उनका दुश्मन हो गया है। आसेतु हिमालय और अटक से कटक तक ही नहीं अपितु उत्तर कोरिया, वेनेजुएला, और हंगरी तक उनके खिलाफ हो गये हैं और उनकी जान लेने के लिए वित्तीय मदद कर रहे हैं। उनको लगता है कि उनकी जान के लिए बड़ी भारी सुपारी लगेगी और अकेले हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था में वह दम कहाँ रही इसलिए विदेशों से वित्तीय मदद ली जा रही है।ऐसा लगता है जैसे एक विश्वयुद्ध शुरू हो गया हो। दीदी के अनुसार इसमें पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की मदद ली जा रही है। उनके अनुसार खतरनाक स्थिति यह है कि माकपा और माओवादी जो आपस में एक दूसरे पर हिंसा का आरोप लगाते रहे हैं उन्होंने भी उनकी जान लेने के लिए हाथ मिला लिया है, अर्थात न मार्क्सवादियों के पास कोई राजनीतिक कार्यक्रम है न माओवादियों के पास। दोनों के पास इकलौता राजनीतिक कार्यक्रम यही रह गया है कि दीदी की जान ले लो। वैसे ही जैसे कि कभी दीदी का इकलौता कार्यक्रम मार्क्सवादियों का विरोध करना हुआ करता था इसीलिए वे मानती हैं कि मार्क्सवादी अब सब कुछ छोड़ कर उनकी जान के पीछे पड़ गये हैं।
      यह सचमुच चिंता का विषय लगता है कि मार्क्सवादी पहले वहाँ बंगाल में सत्ता में थे और अब दो प्रतिशत मत कम मिलने के कारण उनसे सत्ता छूट गयी है इसलिए वे इस तरह से सत्ता हथियाना  चाहते हैं, और कैसे नासमझ हैं कि  यह सत्ता पाकिस्तान की आईएसआई, वेनेजुएला, उत्तरी कोरिया, और हंगरी की मदद से यह काम दिल्ली की बड़ी सत्ता के लिए नहीं करते? सोचो तो बड़ा सोचो। दिल्ली में तो जब प्रधानमंत्री का पद थाली में रख कर मिल रहा था वह भी ठुकरा दिया था पर ममता दीदी की जान के पीछे पड़े हैं।
      वे ऐसे छूटी हुयी सत्ता को पाने का काम केरल में भी नहीं कर रहे, जहाँ केवल एक सीट से पिछड़ गये हैं क्या पाकिस्तान की आईएसआई , वेनेजुएला, हंगरी, और उत्तरी कोरिया का धन वहाँ तक नहीं पहुँच सकता। बेचारे ओमन चाण्डी को कोई खतरा नजर नहीं आता।
      दीदी को डरावने सपने आने लगे हैं। जिन माओवादियों की सहायता से उन्होंने सत्ता पायी थी अब वे ही उन्हें दुश्मन नजर आने लगे हैं। अगर कोई छात्रा एक सवाल पूछ दे तो वो उन्हें माओवादी नजर आती है। अगर टीवी प्रोग्राम में साक्षात्कारकर्ता कोई सवाल करे तो वे भाग जाती हैं। शोले फिल्म की घुड़दौड़ जैसा हाल हो गया है। यहाँ बसंती की जान खतरे में है। कार्टून डरा रहा है, अपनी ही पार्टी के सदस्य द्वारा लिखी गयी किताब डरा रही है जिसमें वो लिख देता है कि सिंगूर के अनशन के समय वे छुप कर चाकलेट खाती रही हैं। गीत लिखने वाला उनका सांसद गीत लिख कर डरा रहा है। कभी समर्थन देने वाली महास्वेता देवी डरा रही हैं। और तो और उनका ही रेल मंत्री डरा रहा है जिसे रेल बजट प्रस्तुत करने के बाद वे स्तीफा देने को कहती हैं। मारे गये माओवादी किशनजी का भूत भी उन्हें डराता होगा।   हो सकता है कि हिलेरी क्लिंटन भी उन्हें डराने आयी हों और अपना काम करके चली गयी हों। डरे हुए आदमी को अपनी ही छाया से डर लगने लगता है। वैसे तो वे अपनी जान को खुद ही देने के कई नाटक कर चुकी हैं। 1996 में उन्होंने कलकता के अलीपुर में आयोजित एक रैली में एक काले शाल को अपने गले में कस लिया था औरहजारों लोगों के सामने फाँसी लगा लेने की धमकी दी थी, पता नहीं तब कौन से देश ने उन्हें सहायता दी थी। बहरहाल कामरेड ज्योति बसु उन्हें नौटंकी कहते रहे हैं। 

      लगता है कि उनकी जान ही कुर्सी में छुपी हुयी है और कुर्सी पर आया खतरा उन्हें जान का खतरा लगने लगता है।
वीरेन्द्र जैन
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अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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सोमवार, मई 14, 2012

व्यंग्य- पत्नी सी पत्नी, मामा सा मामा


व्यंग्य
पत्नी सी पत्नी मामा सा मामा
वीरेन्द्र जैन
      औपचारिक पत्नियों को देखते देखते बहुत दिन हो गये थे, पर पिछले दिनों एक खरी पत्नी जैसी पत्नी देखने को मिली तब समझ में आया कि तुमने कैसे ये मान लिया, धरती वीरों से खाली है । ये नकली पत्नियाँ बाहर बाहर तो ताजमहल के सामने वाली बेंच पर फोटो खिंचवाने वाली मुद्रा बनाये रहतीं हैं और अन्दर अपनी वाली पर आती रहती हैं। सन्दर्भित ‘पत्नी’ ने इस द्वैत को तोड़ दिया है। कवि ने कहा है-
तन गोरा मन सांवला, बगुले जैसा भेक
तासे तो कागा भला बाहर भीतर एक  
हुआ ये कि लोकायुक्त पुलिस ने बहुत दिनों बाद अंगड़ाई ली और भोपाल में एक मोटी मछली के यहाँ छापा मार दिया। छापे में उनकी उम्मीद से भी ज्यादा नोट निकलते चले गये, सोना, चाँदी, मकान, जमीन, शेयर, और न जाने क्या क्या निकला जो सौ सवा सौ करोड़ की सीमा को भी पार करता चला गया। यही वह अवसर था जब उस अफसर की पत्नी ने स्वाभाविक पत्नी धर्म का निर्वाह करते हुए लोकायुक्त पुलिस की क्लास ले डाली और उनसे सवाल किया कि हमारे यहाँ तो छापा मारते हो पर उस मंत्री के यहाँ छापा क्यों नहीं मारते जो हर महीने एक करोड़ रुपये लेता है। दृष्य देखने वाला ही रहा होगा जब पतिदेव महोदय उनके मुँह पर हाथ रखते हुए उन्हें घसीटकर अन्दर ले गये पर परम्परागत  पत्नी का मुँह तो पानी की लाइन में हुए लीकेज की तरह होता है जिसमें से एक बार निकलना शुरू होने के बाद शब्द की धार लगातार बहती रहती है। उसने चीख चीख कर पतिदेव से कहा कि मैं कहती थी कि सन्युक्त संचालक ही बने रहो, पर आप नहीं माने संचालक बन गये तो खुद फँस गये, जबकि बाँटना सबको पड़ता था। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में जिस गहराई से मन्दोदरी विलाप का चित्रण किया है उसे पढ कर तो सन्देह होने लगता है कि वे कथा में किसके पक्ष में हैं। ठीक उसी तरह एक ठीक ठाक तरह की पत्नी अपने राक्षस पति के पराभव पर याद दिलाती है कि उसने समय रहते कैसी कैसी समझाइशें दी थीं।
      ग्रहणी लिखने में लोग सामान्यतयः वर्तनी की भूल कर जाते हैं, उसे ‘गृहणी’ लिखते हैं जबकि मेरे अनुसार यह शब्द ग्रहण करने से बना होगा। वो एक बार पैसा ग्रहण कर ले तो वो उसका अपना हो जाता है और लूट के पैसे को जाते देख कर भी ऐसा लगता है कि जैसे खुद ही लुट गये। अफसर की पत्नी में अगर ईर्षा न हो तो उसका जीवन बेकार है, उसे अपने सौ सवा सौ करोड़ से ज्यादा तकलीफ अपने विभाग के मंत्री को एक करोड़ रुपये प्रतिमाह पँहुचाने पर होती रही है। हमारे तो लुट गये पर उसके सही सलामत हैं, उसका बालबाँका भी नहीं हुआ। क्या दुनिया है कमाये हमारा पति और मंत्री मुफ्त में ही लेता जाये। लुटे हमारा पति और मंत्री चैन करे। नौकरी हमारे पति की जाये और मंत्री को एक मलाईदार विभाग और मिल जाये। तेरी जय जय कार जमाने।
      अफसर के साथ एक बाबूनुमा आडिटर के घर पर भी छापा पड़ा जो सच्चा रामभक्त निकला। वह पूरे छपे के दौरान हँसता मुस्कराता रहा जैसे नानक के शब्दों में कह रहा हो कि-
 राम की चिड़ियाँ राम के खेत     
चुग लो चिड़ियाँ भर भर पेट
यह रहस्य बाद में खुला कि वह मामा का भी मामा है। नहीं समझे! अरे भाई अपने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का सगा मामा अर्थात पिता का साला। पहले मामा को मुख्यमंत्री के बंगले पर ही सेवा करने का मौका मिला था जहाँ उसने जरूरत से ज्यादा ही सेवा कर दी थी तो उसे खुला खेत चरने को भेज दिया गया था। इस रामभक्त ने कहा कि मैंने तो अपने मोबाइल की रिंगटोन भी रामजी करेंगे बेड़ा पार डाल रखी है। हमारा कुछ नहीं होगा। उसका अत्मविश्वास देखने लायक था।
      मामा को कुछ व्याकरणाचार्य माँ से जोड़ कर कहते हैं कि इस शब्द में दो मा हैं इसलिए यह दो माँ के बराबर होता है, पर गणित के लोग इसे गलत ठहराते हैं। वे कहते हैं कि दो माइनस मिल कर के प्लस में बदल जाते हैं और परिणाम को उलट देते हैं। किसी शायर ने कहा है-
दो माइनस मिलकर के होता है एक प्लस
जालिम दो बार ही कह दे नहीं नहीं
जब एक ही मामा से पूरा प्रदेश परेशान हो तब फिर मामाओं के भी मामा निकलते जायेंगे तो क्या होगा। पता नहीं अभी कितने मामा और बाकी हैं और उन मामाओं के भी और और मामा बाकी हैं।
वीरेन्द्र जैन
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अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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मंगलवार, मई 01, 2012

व्यंग्य - आधुनिक श्रवण कुमार और बुजर्गों की दृष्टि


व्यंग्य
आधुनिक श्रवण कुमार और बुजर्गों की दृष्टि
वीरेन्द्र जैन
      हमारे पुराण इतने सम्पन्न हैं कि आप अच्छा बुरा कुछ भी करें उसमें से प्रतीक तलाश सकते हैं। मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री जहाँ बच्चियों के मामा बनने की कोशिश करते हैं वहीं उनके विरोधी उनके कंस या शकुनि मामा होने का प्रतीक तलाश लाते हैं। विडम्बना यह है कि बढते कुपोषण, बेरोजगारी, लैंगिक भेदभाव, गैंग रेप की बढती घटनाओं में ये प्रतीक गलत भी नहीं लगता
                इन दिनों उन्हें श्रवण कुमार बनने की धुन सवार हुयी है। जब भी कहीं फिल्में ज्यादा बनने लगती हैं तो लोग नई नई भूमिकाएं तलाशने ही लगते हैं। पिछले दिनों मध्य प्रदेश में फिल्म गली गली में चोर है की शूटिंग हुयी थी, पता नहीं उन्हें इस फिल्म के लिए भी हमारे प्रदेश की गलियाँ ही क्यों उपयुक्त लगीं। भाजपा में आजकल जिसे देखो वही अडवाणी जी से आगे निकलने की कोशिश करने लगता है। अडवाणीजी ने डीसीएम टोयटा से यात्रा करके उसे रथ यात्रा कहा था तो शिवराज सिंह रेल से बुजर्गों को यात्रा कराने की योजना बना के उसमें एक ‘ती’ जोड़ के उसे तीरथ यात्रा योजना बना दिया। पर रथ यात्रा हो या तीरथ यात्रा असफलता दोनों के ही साथ लगी हुयी है। न अडवाणी राम बन पाये और न ही शिवराज श्रवण कुमार बन पायेंगे। वैसे भी कई दशरथ शिकार पर निकल पड़े हैं।
      श्रवण कुमार बनने में एक बात आड़े आती है। श्रवण कुमार के माता पिता अन्धे थे और वे अपने आप तीरथ करने नहीं जा सकते थे पर प्रदेश के बहुसंख्यक बुजर्ग चश्मा लगा कर साफ साफ देखते हैं, और उन्हें सारे ध्रुव तारे दिखाई देते हैं। लोकप्रिय कवि नीरज की पंक्तियाँ हैं-
मथुरा से काशी तक भटकी
बल्कल से मलमल तक धायी
पर बिल्कुल बेदाग कहीं भी
चादर कोई नजर न आयी
देखे संत महंत हजारों
परखे कलाकार कवि लाखों
लेकिन सबकी गोराई के
पीछे छुपी मिली कजराई
इसलिए यह उम्मीद करना कि तीरथ करने से दृष्टिवान लोग भी श्रवण कुमार के माँ बाप बन जायेंगे एक गलतफहमी है।
      इस तीरथ यात्रा योजना में धर्म के हिसाब से तीर्थ भी बाँट दिये गये हैं। धार्मिक ध्रुवीकरण की ये बारीक हरकत भी हमारे बुजर्गों को श्रवण कुमार के माँ बाप समझने के कारण की जा रही है। अजमेर शरीफ का चयन मुस्लिम तीर्थ की तरह किया गया है जबकि वहाँ जितने मुस्लिम तीर्थयात्री होते हैं उतने ही हिन्दू तीर्थ यात्री भी होते हैं। और यही बात तो संघ परिवार को पसन्द नहीं। अपने वश भर वहाँ बम विस्फोट भी करा दिये पर जाने वालों की संख्या में कमी नहीं आयी उल्टे विस्फोट कराने वाले पकड़ में आ गये और सारी कलई खुल गयी। जब उससे बात नहीं बनी सो मुफ्त तीर्थयात्रा का दाना डाल दिया गया। लोग अगर बँटेंगे नहीं तो भाजपा का क्या होगा!
      पहले बाबाओं को बुलाते थे और उनके सामने औंधे सीधे होकर भीड़ासन करते थे पर अब बाबाओं की भी कलई खुलती जा रही है, चाहे रामदेव हों या आशाराम सभी को दवाइयाँ बेचना है और जनता के पास कुछ भी खरीदने को कुछ नहीं बचा। यही कारण है कि सबकी फिल्में पिटने लगी हैं। ये एक अंतिम प्रयास है पर इतना तय है कि मुफ्त तीर्थ पर जाने वालों से न जा पाने वाले कहीं ज्यादा होंगे और दुआओं से बददुआएं अधिक मिलेंगीं। 
           वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, अप्रैल 10, 2012

व्यंग्य- सांसद, विधायक बनाने की फैक्ट्री बन्द


व्यंग्य
सांसद, विधायक बनाने की फैक्ट्री बन्द
वीरेन्द्र जैन
      जब से एसएममएस से संवाद की शुरुआत हुयी है तब से वर्तनी की तो ऐसी की तैसी हो गयी है। युवा पीढी का सोचना है कि संवाद प्रेषित होना वर्तनी अर्थात स्पैलिंग की चिंता से अधिक महत्वपूर्ण है। हिन्दी के लोकप्रिय कवि नीरज कहते हैं कि-
शब्द तो शोर है तमाशा है
भाव के सिन्धु में बताशा है
मर्म की बात होंठ से ना कहो
मौन ही भावना की भाषा है
मुझे लगता है कि वर्तनी को हिकारत की दृष्टि से देखने के इस समय में यह वर्तनी की भूल ही होगी जब भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी पार्टी सदस्यों की एक बैठक में कहते है कि भाजपा सांसद, विधायक बनाने की फैक्ट्री नहीं है। दर असल वे कहना चाहते होंगे कि हे रामलला अब भाजपा सांसद, विधायक बनाने की फैक्ट्री नहीं रही।
      ये फैक्ट्री तो थी, और बकायदा थी। ये बात दूसरी है कि ये फैक्ट्री साइन बोर्ड भले ही किसी और चीज का लगाये बैठी हो पर काम सांसद विधायक उत्पादन का ही करती थी। उनके सारे सैद्धंतिक समझौते सांसद विधायक उत्पादन करने की दृष्टि से ही किये जाते रहे हैं। यह अकेली फैक्ट्री रही है जो सभी संविद सरकारें बनने की स्थिति में अपना आवेदन लेकर सबसे आगे खड़ी नजर आती रही है। सांसद, विधायक बना दो चाहे जैसे बना दो, बाकी भितरघात तो हम करते रहेंगे। 1977 में जनता पार्टी के गठन के समय जब फैक्ट्री को दूसरी फैक्ट्री में मिलाने की बात आयी तो इनकी पुरानी फर्म भारतीय जन संघ ने सबसे पहले अपनी फैक्ट्री को डिसाल्व करने का रिजोल्यूशन पास कर दिया। सांसद विधायक का उत्पादन भर होता रहे, बोर्ड का क्या है उसे उतार कर स्टाक रूम में जमा कर दिया। नई कम्पनी टूटेगी तो झाड़ पोंछ कर फिर से लगा लेंगे, ज्यादा से ज्यादा एकाध अक्षर या शब्द बदल देंगे, पर प्रोडक्शन तो वही रहेगा।
      अगर फैक्ट्री नहीं होती तो सबसे ज्यादा दल बदल कर आये लोग क्यों स्टाक किये जाते । जिस गान्धी नेहरू परिवार को पानी पी पी कर कोसते रहे हैं उसकी बहू रानी क्या गौ सेवा के लिए भाजपा में शामिल हुयी थीं! वह काम तो वे पहले भी कुत्ते, बिल्लियों, गधों और सुअरों की रक्षा के साथ पहले ही एन जी ओ बनाकर करती आ रही थीं। उन्हें टिकिट नहीं देते तो पता लग जाता और अभी भी माँ बेटे किसी का भी टिकिट काट कर देख लेना। देश भर को कांट वाटर प्यूरीफायर का पानी पिलाने वाली स्वप्न सुन्दरी हेमा मालिनी क्या भाजपा शासित राज्यों में नाच नाच कर बत्तीस लाख भुगतान लेने के लिए शामिल हुयी हैं? उनका भी टिकिट काट कर देख लेना? धर्मेन्द्र जी ने तो कह ही दिया था कि फैक्ट्री ने मुझे बहुत इमोशनली ब्लैकमेल किया। हमारे शत्रुघ्न सिन्हाजी भी नशीली मुद्रा में बैगपाइपर सोडा को विज्ञापित करने के लिए फैक्ट्री में नहीं आये थे अपितु सांसद और मौका मिलने पर केन्द्रीय मंत्री बनने के लिए ही आये थे। और ओशो के स्वामी विनोद खन्नाजी भी कोई समाधि की ओर जाने के लिए फैक्ट्री में नहीं आये थे। स्मृति ईरानी, नवजोत सिंह सिद्धू, चेतन चौहान क्या राम मन्दिर बनवाने के लिए शामिल हुए थे? रामायण धारावाहिक की सीताजी को जबसे सांसद नहीं बनाया तब से वे फैक्ट्री की ओर झांकी भी नहीं। यही हाल रावण अरविन्द त्रिवेदी और हनुमान दारासिंह्जी का भी है, वे कोई कीर्तन करने तो फैक्ट्री में नहीं आये थे उद्योगपति गडकरी जी। आपने तो अभी तक उन दिग्विजय सिंह, जिनके भाई को फैक्ट्री के उत्पाद के रूप में निकाला था,  के उस सवाल का भी जबाब नहीं दिया कि इतने कम समय में आपने इतनी दौलत कैसे एकत्रित कर ली। जब इतनी दौलत एकत्रित हो जाती है तो भाषा तो फैक्ट्री वाली हो ही जाना है। राज्यसभा में आपकी फैक्ट्री के नेता की दौलत का विकास भी गत पाँच साल में 23 करोड़ से बढ कर कुल 158 करोढ ही हो पायी है जिसका खुलासा उन्होंने राज्य सभा के लिए अपना नामांकन भरते समय किया है।
      अरे मैं भी कहाँ की बात ले बैठा आप तो ये ही बता दीजिए कि ये जो विदेश में रह कर भाजपा के दोस्त बने रहने और दूसरों को भाजपा का दोस्त बनाने वाले अंशुमान मिश्र जी हैं ये कच्चा माल बनकर भाजपा विधायकों के सहयोग से क्या बनने के लिए झारखण्ड से राज्यसभा के उम्मीदवार बने थे? और जब नहीं बन पाये तो उसी फैक्ट्री को उलटनी की कोशिश करने लगे थे जिसके दोस्त बनाते बनाते उनकी कार के कई टायर घिस गये होंगे। उन्होंने न केवल मुरली मनोहर की धोती ही खोल दी अपितु उत्तर प्रदेश के एक एक नेता की पोल खोलने पर ऐसे उतर आये थे जैसे कि कभी अमर सिंह मुलायम की पोल खोलने पर उतारू हो गये थे, पर अब दोनों के मुँह पर ढक्कन लग गया है। आजकल विज्ञापन भी खूब आ रहा है जिसमें बताया जा रहा है कि ढक्कन लगा कर खाना बनाने से गैस की बचत होती है। बहरहाल आपकी समझ में आ जाना चाहिए कि इस रामलीला पार्टी के चारों ओर जो ये लोग मक्खियों की तरह मंढरा रहे हैं वे सत्ता का लाभ लेने हेतु सांसद विधायक बनने के लिए ही लगे हैं। अब अगर तुम्हारी फैक्ट्री बन्द होने वाली है तो ये दूसरी फैक्ट्री तलाश लेंगे, आप चिंता करके अपना बजन न घटाएं। मैं देख रहा हूं कि आपका बजन बहुत घट गया है।
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, मार्च 26, 2012

व्यंग्य- हाफ पेंट भी उतार दिया


व्यंग्य
हाफपेंट भी उतार दिया
वीरेन्द्र जैन
      राम भरोसे का आना तूफान का आना होता है। उसके आते ही लगता है कि कुछ खास बात है, आते ही उसने पुंगी बनाया हुआ अखबार फैला के पटक दिया और बोला लो देख लो। वैसे मैं देखने की जगह उसका मुख देखना और उसके उद्गार सुनने को ज्यादा उत्सुक रहता हूं, बकौल शायर

वो आये हमारे घर खुदा की कुदरत
कभी हम उनको देखते कभी अपने घर को
और आ कर भी
वो मुखातिब भी हैं करीब भी हैं
उनको देखें कि उनसे बात करें
सो हमने उनके ही श्री मुख से सुनने की लालसा में पूछा-‘क्या हुआ राम भरोसेजी?’
वे बोले ‘जो आधा था अब तो वह भी उतर गया’
‘मैं समझा नहीं’
      इसीलिए तो अखबार लाया था, देखो और पढो! इसमें लिखा है कि आर एस एस ने अब अपने स्वयं सेवकों को हाफ पेंट पहिनने से भी मुक्ति दे दी है। अभी तक कुछ लाज ढकी हुयी थी सो वो भी उतार देने का फैसला हो गया।‘
‘ अरे भाई तुम गलत समझ रहे हो इस खबर का यह मतलब नहीं है ?’
’तो क्या मतलब है?’ उसने झपट्टा जैसा मारते हुए कहा
      ‘इसका मतलब है कि भाजपा की सरकारों द्वारा सरकारी कर्मचारी के संघ में भाग लेने की अनुमति के बाद भी जब संघ में जाने वालों की संख्या दिनों दिन घटने लगी तो उन्हें लगा कि शायद हाफ पेंट में लोगों को शरम आती होगी इसलिए वे शाखा में नहीं आना चाहते सो उन्होंने अपनी वर्दी को मर्जी के अनुसार पहिनने की स्वतंत्रता दे दी। आखिर उन्हें अपना विस्तार करना है, संघ को ग्राह्य बना है, गाँव गाँव में नफरत फैलाना है जिससे एक पवित्र हिन्दू राष्ट्र का निर्माण किया जा सके।‘ मैंने उसे ठंडा करने के लिए कहा। पर वह तो और भड़क गया। बोला-
      ‘अब बहाने मत बनाओ। तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे कि वे तुम से पूछ कर गये हों कि अब क्या करना है। तुम ये नहीं देखते हो कि आजकल धोती पहिनने वाले लोग तक रोज सुबह शाम बरमूडा पहिन कर इधर से उधर और उधर से इधर होने को वाकिंग कहते हैं, सो उन्हें हाफ पेंट पर शरम क्यों आने लगी, अगर शरम आती होगी तो संघ के कार्यकलापों से आती होगी। अन्ना हजारे पर जब संघ से संचालित होने का आरोप लगा और स्वयं संघ व उसके दुमछल्ले संगठनों ने बाद में खुल कर कहा कि अन्ना का आन्दोलन उन्हींने संचालित किया था और उसमें खर्च हुए लाखों रुपये ही नहीं अपितु अपने कैडर को भी उसमें झोंका, तब अन्ना ऐसे भड़के जैसे सांड़ को लाल कपड़ा दिखा दिया हो। एक विधायक ने म.प्र. के लोकायुक्त का संघ में जाने का नकली फोटो दिखा दिया तो उसे जेल की सैर करा दी गयी। जिससे भी कह दो कि वह संघ का है तो उसे यह आरोप गाली की तरह लगता है। खुद भाजपा वाले तक संघ से अपना रिश्ता छुपाते रहते हैं और कहते हैं कि उनका कोई रिश्ता नहीं है जबकि कस्बे से लेकर ऊपर तक सारे संगठन सचिव संघ के प्रचारक ही बनाये जाते हैं।
      ‘पर ये तो रणनीति है भई कि जैसे भी हो लोग संघ की शाखाओं में आयें, वहाँ व्यायाम करें अपनी सुरक्षा के लिए लाठी वगैरह चलाना सीखें, भारत माता को प्रणाम करें। पहिले उन्होंने जैनों को प्रभावित करने के लिए चमड़े के बेल्ट और जूते बदल दिये थे, अब उन्होंने हिटलर की ड्रैस को उतारकर भारतीय गणवेष धारण करने की अनुमति दे दी है। कोई धोती पहिन कर आ सकता है, कोई लुंगी बाँध कर आ सकता है, कोई सलवार पहिन कर आ सकता है, तो कोई पाजामा पहिन कर आ सकता है। परम स्वतंत्रता है, इससे राष्ट्रीय एकता स्थापित होगी।‘
      ‘वही तो मैं कह रहा हूं कि शांति पसन्द जनता के साथ रण चल रहा है इसलिए रणनीति भी है पर गर तुमने खबर को पूरी तौर पर पढ लिया होता तो ऐसा नहीं कहते, इसमें लिखा है कि अब संघ से जुड़ने के लिए शाखा में जाने की भी जरूरत नहीं। अब सप्ताह में एक दिन ‘नो टीवी डे’ का समर्थन करते हुए परिवारों में जाकर प्रबोधन कार्यक्रम से लोगों को जोड़ेंगे और सन्युक्त परिवारों को बढावा देने के लिए जोर देंगे।‘
      ’ पर यहाँ तो गड़बड़ हो जायेगी, अगर वे सन्युक्त परिवारों को बढावा देंगे तो सास बहू के सीरियलों को देखने की जरूरत और बढ जायेगी, फिर ‘नो टीवी डे’ कैसे मनेगा। वैसे भी उनके यहाँ महिलाओं की शाखाएं न के बराबर होती हैं सो वे और म.प्र. पुलिस से क्लीन चिट प्राप्त जैसे अविवाहित प्रचारक घरों में कैसे घुस पायेंगे।‘ मैंने कहा।
      ‘अब तुम्हीं जा के समझाओ
’ यह कह कर राम भरोसे अपना अखबार समेट कर चला गया।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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शुक्रवार, मार्च 16, 2012

व्यंग्य -पड़ोसी की टाँग टूटने के सत्तरह बरस


व्यंग्य
पड़ोसी की टॉग टूटने के सत्रह बरस
वीरेन्द्र जैन
            अपनी आदत के विपरीत मुंगेरीलाल काफी हाऊस में बहुत संयत और गंभीर होकर बैठा था। उसके पहने हुए कपड़े धुले जैसे लग रहे थे वे जहॉ जहॉ भी फटे हों, वहॉ वहॉ फटे दिखाई नही दे रहे थे चाहे तो उन्हैं सिल लिया गया था या इस तरह से पहना गया था कि फटे हुए हिस्से सीधे सामने न दिखें।
            '' मुंगेरीलाल, क्या बात हैं आज बहुत गरिष्ठ नजर आ रहे हो?'' रामभरोसे ने पूछा। दूसरे के फटे में टांग डालने की उसे आदत हैं।
            मुंगेरीलाल ने यथावत गंम्भीरता ओढ़े हुए रामभरोसे को हिकारत की निगाह से देखते हुए कहा, '' तुम लोगों को अपने इतिहास, परंम्परा और संस्कृति का ज्ञान तो है नहीं। बात- बात पे ठिल्ल-ठिल्ल करके अपना समय काट देते हो। जानते हो आज क्या दिन है ?
            '' शनिवार । '' रामभरोसे ने छूटते ही उत्तर दिया।

            '' अबे, दिन से मेरा मतलब दिन के महत्व से था वो क्या कहते हैं कि........ ज़ोश में मुंगरीलाल भूल गये थे कि क्या कहना है।
            '' ज्ञानी जी, आप ही बताइए कि क्या दिन है आज। '' रामभरोसे किसी नई बेवकूफी की बात सुनने और फिर उस बात का कीमा बनाने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका था।
            '' अबे आज से ठीक सत्रह वर्ष पहले मेरे पड़ोसी टांग टूटी थी। आज उसकी सत्रहवी वर्षगॉठ है। ''

            '' अब यूँ तो हर रोज कोई न कोई घटना होती ही रहती हैं और टांग तुम्हारे पड़ोसी की टूटी थी, तुम्हारी नहीं। अब इसमें इस तरह गंभीरता ओढ़कर गधे बन जाने का क्या मतलब?

            '' अब तुम्हैं कुछ पता तो रहता नहीं, जानते हो यह वही पड़ोसी है जिसने मेरी छह इंच जमीन दाब ली थी। बस, तभी से मेरा इससे झगड़ा हैं, यह न्याय का प्रश्न है। मैं उसका कुछ नही बिगाड़ सका, वह शक्तिशाली हैं, पैसे वाला हैं, विधायक उसके घर पड़ा रहता है, न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका सभी ने उसका साथ दिया। फिर आज से ठीक सत्रह वर्ष पहले वह बाथरूम में फिसल पड़ा। उसकी टांग टूट गई। मैं प्रभु को बीच में ले आया कि आखिर वही सुनता हैं उसके यहॉ रिश्वत नही चलती, उसके यहॉ देर हैं पर अंधेर नही, अत: इस दिन को मैं प्रभु के न्याय दिवस के रूप में मानता हूँ। मेरा विश्वास हैं कि मेरी जमीन दबाने के कारण और मुझे इस व्यवस्था से न्याय न मिलने के कारण ही प्रभु ने उसे बाथरूम में भेजा, वहॉ फिसलवाया ओर उसकी टांग तोड़ दी। अब जैसे आप रावण को मारे जाने वाले दिन के रूप में दशहरा मनाते हैं उसी तरह में पड़ोसी की टांग टूट जाने की खुशी में आज के पवित्र दिन को न्याय दिवस के रूप में मनाता हूँ।

            '' पड़ोसी की टांग टूटने के सत्रह बरस '' इस विषय पर समारोह आयोजित होना चाहिए व भोज होना चाहिए '' रामभरोसे ने भरसक गंभीर बनकर कहा। उसे आज के मनोरंजन का विषय मिल चुका था।

            रामभरोसे ने कार्यक्रम की रूप रेखा बनाने की तैयारी में कागज और पेन मंगा लिए व मुंगेरीलाल की तरफ से काफी का आर्डर दे दिया। लेखों भाषणों और गोष्ठियों के कुछ विषय यूँ तैयार हुए :

      1-     टांग टूटने के सत्रह बरस।
      2-    प्राकृतिक न्याय की व्यवस्था और हमारा समाज।
      3-    टूटी टॉग की दशा और दिशा।
      4-    स्वत: टॉग टूटना - एक अहिंसात्मक न्याय।
      5-    न्याय का स्वप्न और टांग का टूटना।
      श्-    सत्रह वर्षो  में टांग टूटने के क्षेत्र में प्रगति।
      7-    टांगे टूटने का इतिहास ।
      8-    आर्थोपोड्स का विकास।
            इतने में जुगाडूपाँडे आ गया। उसकी संस्कृति मंत्री के पास पहुँच है। आयोजन का मौका देखकर वह खिल उठा- उसने कहा, '' मुझे जरा जल्दी से विषय दो, मैं इसे लेकर मंत्रालय तक जाता हूँ। शाम को संस्कृति भवन में पचास-साठ रिटायर्ड बुद्विजीवियों को बटोर लाना। मैं संस्कृति मंत्री से समय एंव इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए अनुदान  का चेक लेकर आता हूँ। ये फालतू बुद्विजीवी जब भी बैठ जायेंगे तो विषय को अपनी अपनी जगह से खीच-तान कर ऐसा फैला ही लेगे वह हिन्दूस्तान का नक्शा बनकर रह जाए। ''
            रामभरोसे ने तुंरत जुगाडूपाँडे के कान में कुछ कहा जिसका मजलब बिना सुने ही सबकी समझ में आ गया  कि वह अनुदान की राशि को इतना स्वीकृति कराने के लिए कह रहा होगा जिससे कार्यक्रम के बाद उसकी सफलता की खुशी में शाम की दारू पार्टी  के लिए भी पैसा बच जाए। जुगाडूपाँडे ने उसे आश्वस्त किया कि प्रमुख कार्यक्रम तो वही हैं, शेष तो उसकी भूमिकाएं हैं।
            रात्रि में मुंगेरीलाल ने नशे में धुत होकर लौटते समय अपने पड़ोसी को भरपूर गालियॉ दीं। पड़ोसी ने उसके नशे में होने के कारण अहिंसा का परिचय दिया। फिर शेष विश्व की भॉति दोनो चैन की नींद सो गए।
            इस तरह टॉग टूटने के सत्रह बरस का भव्य आयोजन संपन्न हुआ।
----- वीरेन्द्र जैन
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