मंगलवार, सितंबर 11, 2012

व्यंग्य- प्राइम मिनिस्टर मटेरियल


व्यंग्य
प्राइम मिनिस्टर मटेरियल

वीरेन्द्र जैन

       भौतिकवाद बहुत बढ गया है। कोई आत्मा परमात्मा की बात ही नहीं करता। ढूंढने वालों ने भगवान का तत्व भी खोज लिया पर उसे भी ‘गाड पार्टिकल’ का नाम दिया। पार्टिकल, मटेरियल, सब इसी में दुनिया रंगती जा रही है। अब देखिए मोदी ने नीतिश को पीएम मटेरियल बता दिया। अरे वो गुजरात वाले मोदी नहीं, बिहार वाले मोदी जो नीतीश के ही असिस्टेंट हैं और गुजरात के मोदी के मारे अपनी नौकरी खतरे में मान कर चलते हैं, लोग कहते हैं कि जितने काले, सभी बाप के साले। पर वे सोचते हैं कि करे दाढीवाला पकड़ा जाए मूँछ वाला।
यह पुराने पीएम मटेरियल लाल कृष्ण अडवाणी जी को खुश करने का तरीका भी हो सकता है कि नितिश को तो बनना नहीं पर यह संदेश तो चला ही जाये कि बिहार का मोदी गुजरात कि मोदी को प्रधानमंत्री मटएरियल नहीं समझता। वैसे वे भीतर भीतर ये भी सोचते हैं कि अगर ये नितिश पीएम के चक्कर में उलझ जाये और  कार्यकारी मुख्यमंत्री हम हो जायें तो सारा बिहार आरएसएस वालों के नाम कर दें। अभी तो हाल यह है कि शरद यादव से लेकर जेडी[यू] का लल्लू-पंजू भी गरिया कर चला जाता है पर ऊपर से आदेश है कि कि सत्ता का दामन नहीं छोड़ना है सो गाली भी खा रहे हैं और नीचे भी पड़े हैं।
 भाजपा के स्वाभाविक मित्र बाल ठाकरे ने बिहारियों को मुम्बई से निकालने का जो हड़कम्प मचाया तो नीतिश ने उनकी मानसिक स्थिति पर टिप्पणी कर दी। इस पर ठाकरे ने सवाल पूछ लिया कि फिर वे गुजरात के मोदी को बिहार क्यों नहीं आने देते। नितिश ने कहा कि तुम तो आने की बात कर रहे हो हमने तो उन्हें उप मुख्यमंत्री बनाया हुआ है। नरेन्द्र हुये या सुशील मोदी मोदी सब बराबर। संकेत बाल ठाकरे ने भी दे दिया कि वे अब अडवाणी को एनडीए का पीएम मटेरियल नहीं मानते, सो उन्होंने और ऊंची खेल दी। उन्होंने सुषमा स्वराज जी को सबसे अच्छा पीएम मटेरियल बता दिया। उनका एक गुण और भी है जो दूसरे किसी पीएम मटेरियल में नहीं हो सकता। वे राजनीति और प्रशासन में भले ही कम जानती हों पर सोनिया गान्धी के पीएम मटेरियल बनने की सम्भावनाओं पर सिर घुटा कर जमीन पर सोकर और चने खाकर जीने की धमकी दे सकती हैं या अन्ना हजारे के जेल जाने के विरोध में राजघाट पर ठुमका लगा सकती हैं। ऐसा करना क्या लालकृष्ण अडवाणीजी या नरेन्द्र मोदीजी के वश में है। पता नहीं अब नरेन्द्र मोदी का क्या होगा जिन्होंने दस बीस दर्ज़न आधी बाँह के कुर्तों का आर्डर पहले ही से दे दिया था कि प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी बनते समय काम में आयेंगे। जिन टाटा ने ममता दीदी की कृपा से अपना नैनो का कारखाना बंगाल से उठाकर गुजरात में ला पटका था तो उस समय मोदी को पीएम का सुपात्र घोषित कर दिया था वे अब क्या सोचते हैं यह पता तो तब लगेगा जब नीरा राडिया के नये टेप प्रकाश में आयें। उमाभारती ने तो अडवाणीजी को पिता तुल्य घोषित कर देने के बाद भी पीएम मटेरियल के रूप में बाबा रामदेव को सुपात्र माना था और उन्हें प्रधानमंत्री पद पर सुशोभित देखना चाहती थीं। 
       इस बरसात में खूब पानी बरसा तो जगह जगह बाढ आ गयी, दूसरी तरफ बाढ में पीएम मटेरियल भी बह बह कर खूब आ रहा है। बाढ आती है तो कचरा आता ही आता है इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं है। भाजपा प्रवक्ता ने सही कहा है कि उनकी पार्टी में तो पीएम मटेरियल भरे पड़े हैं। अकेले अडवाणीजी, सुषमाजी, मोदीजी, अरुण जैटलीजी थोड़े ही हैं जो उन्होंने नहीं कहा वह यह था कि ‘पहले बहुमत तो मिले’। जो पहले साथ में थे वे- बिछड़े सभी बारी बारी......... । तेलगु देशम तो पहले भी सरकार में साथ नहीं था, बीजू जनता दल भी नफरत से थूक कर चला गया, शिवसेना तो जब जी में आता है लतिया देता है, अकाली दल ने खुद बढ कर इनकी सीटें और वोट दोनों घटवा दिये तथा उसके द्वारा हत्यारों को ज़िन्दा शहीद घोषित किये जाने पर इन्हें मुर्दे जैसे बैठे रहना पड़ता है। यूपी में इनकी छीछालेदर इतनी हो चुकी है कि उमा भारती को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करने के बाद भी जब सीटें पहले से घट गयीं और उन्हें विधानसभा में पार्टी का नेता भी नहीं बनाया तो वे शपथ ग्रहण करने के बाद एक दिन भी विधानसभा नहीं गयीं, बस चोरी छुपे मध्य प्रदेश में ‘धार्मिक’ काम करती रहती हैं। अमर सिंह भी गुम सिंह हो गये हैं जो देर रात्रि में अरुण जैटली के घर से बाहर निकलते देखे जाते थे और सपा के लिए सौदा कर आते थे। वे सक्रिय होते तो कुछ नये पीएम मटेरियल सामने लाते जैसे राष्ट्रपति पद के लिए उन्होंने झंडू बाम और नवरत्न तेल बेचने वाले का नाम सुझाया था। एक ओर जब ऐसा राष्ट्रपति 26 जनवरी की परेड की सलामी ले रहा होता तब देश के तीन सौ चैनल उसके सहारे एक रुपये में परमानन्दा करा रहे होते।
       इस बाढ को देखकर अगर मौसम के अनुकूल टिप्पणी किसी की आयी है तो वो शरद यादव की है कि पीएम का पद तो पकौड़ी हो गया है। अखबार लेकर रामभरोसे आया था और  कह रहा था पकौड़ी खिलवाओ, मैं समझ नहीं पाया कि उसे पकौड़ी खाना है या पीएम मटेरियल बनना है।     
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, जुलाई 27, 2012

व्यंग्य- चमत्कार जो नहीं हुआ


व्यंग्य
                                   चमत्कार जो नहीं हुआ
                                                                              वीरेन्द्र जैन
चचा का एक शे’र है,  हाँ यार चचा माने चचा ग़ालिब -
हमने सोचा था कि ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्जे
देखने हम भी गये थे, पै तमाशा न हुआ
इसी तर्ज पर पीए संगमा साब पर भरोसा करके अपुन सोच रहे थे कि राष्ट्रपति चुनाव में चमत्कार होगा, पर नहीं हुआ। राष्ट्रपति चुने जाने के लिए वे जिस तरह से गले में ढोल टांग कर नाचे और जगह जगह जाकर भाजपाइयों से बड़े बड़े सिन्दूरी टीके लगवाये उससे कई लोग उनकी बात का भरोसा करने लगते थे कि कहीं हो ही न जाये चमत्कार। पर नहीं हुआ। प्रणव मुखर्जी साब ने कहा था कि उन्हें चमत्कारों पर भरोसा नहीं है और वे सही साबित हुए और गणित के हिसाब से जीत गये जिसमें दो और दो चार ही होते हैं। भाजपाई के अफवाह फैलाऊ दस्ते तो सोशल मीडिया पै सक्रिय ही हो गये थे कि सोनिया गान्धी ने इन्दिरा गान्धी की तरह ट्रिक चली है और फार्म किसी का भरा है और जितवा किसी को देंगीं जिससे एक ईसाई राष्ट्रपति बन सके व प्रणव दादा से राजीव के सामने प्रधानमंत्री बनने की जुर्रत का बदला ले सकें। पर इन अफवाहों के झांसे में कोई नहीं आया।
       पर ठहरिए! अगर आप इसे चमत्कार मानें तो एक चमत्कार अवश्य हुआ कि इस देश की जनता को पता चल गया कि वोट माँगना और वोट देना दो अलग अलग बातें हैं। जनता से वोट माँगने वालों को वोट देना नहीं आता। इस देश के भाग्यविधाता जिनके वोट से हमारे लिए कानून बनते हैं उनमें से 15 सांसदों और 49 विधायकों ने उस मतपत्र पर भी गलती की जिसमें कुल दो ही उम्मीदवार थे, जो किसी भी चुनाव की न्यूनतम संख्या होती है। रक्षामंत्री पद के एक आकांक्षी ने तो पहले दूसरे को वोट दे दिया फिर मतपत्र को ही फाड़ डाला। इस चमत्कार में राज्य विशेष से कोई फर्क नहीं पड़ा। संघ के शब्दों में कहें तो अटक से कटक तक और हिमालय से कन्या कुमारी तक सारा भारत एक है। आन्ध्र प्रदेश में पाँच वोटों ने चमत्कार किया, अरुणाचल में तीन ने, असम में दो ने बिहार में तीन ने, छत्तीसगढ में एक ने, हरियाणा में आठ ने, हिमाचल में एक ने जम्मूकश्मीर में दो ने, झारखण्ड में एक ने, कर्नाटक में तीन ने, केरल में एक ने, हमारे स्वर्णिम मध्यप्रदेश में चार ने, मणिपुर में एक ने, मेघालय में दो ने, मिज़ोरम में एक ने, नगालेंड में दो ने, पंजाब में दो ने, सिक्किम में दो ने, तामिलनाडु में चार ने, चमत्कार किया। मैंने बड़ी कोशिश की कि इन गौरवशाली जनप्रतिनिधियों की पार्टी और उनके शुभ नाम पता चल जाएं पर अभी तक सफल नहीं हुआ हूं। पीए संगमा साब को जरूर इन लोगों का सम्मान करना चाहिए, जिन्होंने चमत्कार कर के उनके वचनों की लाज रख ली। यह जरूर पता चल गया कि इन लोगों की आत्मा आवाज नहीं करती, या कम से कम उनके पक्ष में तो नहीं ही करती, जिसे उन्होंने बार बार आवाज दी थी।
       जब से खनन मास्टर येदुरप्पा साब ने भाजपा हाईकमान को तिगड़ी का नाच नचा कर अपने दूसरे पट्ठे को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया है तबसे वे राष्ट्रीय स्तर से कम का सोचते ही नहीं हैं। उन्होंने भी लगे हाथ पीए संगमा साब को सलाह दे डाली है राष्ट्रपति चुनाव के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाकर अपनी और दुर्गति न कराएं। उल्लेखनीय यह भी है कि उनके कर्नाटक में ही 14 भाजपा विधायकों ने पार्टी लाइन से अलग जाकर प्रणव मुखर्जी साब को महामहिम बनने के लिए वोट दिया। बहुत सम्भव है कि इन 14 में येदुरप्पा साब खुद भी शामिल हों, भले ही वे इंकार कर रहे हैं। इंकार तो उन्होंने पहले भी बहुत सारे आरोपों का किया था। मेरे एक मित्र बीमार होने से बहुत डरते हैं। उनके इस डर में बीमारी की तकलीफों से ज्यादा उन बेबकूफ दोस्तों की सलाहों का डर ज्यादा होता है, जिनमें से कोई भी अपनी सलाह देने से पीछे नहीं रहना चाहता।
       मुसीबत जसवंत सिंह की है जिनके पीछे आरएसएस लाइफबाय से हाथ धोकर पड़ा है। वे भाजपाइयों में सबसे शिष्ट शालीन और वरिष्ठ दिखते हैं पर शाखा से नहीं फौज से निकले हैं इसलिए संघ चाहता है कि वे किसी भी तरह पीछा छोड़ें। पर वे उस दिल की तरह हो गये हैं जो मानता ही नहीं। जब कन्धार में अपह्रत विमान छुड़वाने के लिए जाने की बात आयी तो भारत माँ के श्री चरणों में बलि बलि जाने वाले नेकरधारी सब पीछे हट गये, और जसवंत सिंह को ही आतंकियों के साथ भेजा गया। गोरखालेंड आन्दोलनकारियों से सौदे में खरीदी सीट से जब बंगाल में चुनाव लड़ने की बात सामने आयी तो फिर जसवंत सिंह को ये सोच कर आगे कर दिया गया कि जीते तो जीत भाजपा की और हारे तो जसवंत सिंह से छुट्टी मिली। सन्योग से वे प्रह्लाद की तरह जीत भी गये और बंगाल में भाजपा से सांसद चुने जाने का इतिहास बनाया। राजस्थान से किसी भी सम्भावनाशील नेता को दूर रखने के काम में प्राण प्रण से जुटी वसुन्धरा राजे ने उन पर नारकोटिक्स नियमों का उल्लंघन करने का मुकदमा लदवा दिया। जब लोकसभा में संसदीय दल का नेता चुनने का सवाल आया तो उन्हें ज़िन्ना पर पुस्तक लिखने के आरोप में पार्टी से ही बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। तब उनने अटल बिहारी के दफ्तर में अमेरिकी एजेंट होने से लेकर गुजरात नरसंहार के समय स्तीफा देने तक के कई राज खोलने शुरू किये तो उन्हें वापिस पार्टी में ले लिया गया। अब जब उपराष्ट्रपति पद पर जीत की कोई सम्भावना नहीं है तब उन्हें तिलक लगा कर माला पहिना कर आगे कर दिया गया और पीछे से उनके संघर्ष करने पर साथ देने वाले नारे लग रहे हैं। जब वे कह रहे हैं कि उपराष्ट्रपति का पद विपक्ष को मिलना चाहिए तो उन्हें जबाब मिल रहा है कि यह बात तो राष्ट्रपति के चुनाव के समय उनकी पार्टी को सोचना चाहिए थी।
       गनीमत है कि उन्होंने भाजपा में रहते हुए भी अभी तक किसी चमत्कार की बात नहीं की है। और यह भी कोई कम चमत्कार थोड़े ही है।
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, जुलाई 13, 2012

व्यंग्य- बलात्कार प्रधान देश


व्यंग्य
                बलात्कार प्रधान देश
                                                                                    वीरेन्द्र जैन
       आखिर ये मुँह ही तो थक चुका था यह कहते कहते कि भारत एक कृषि प्रधान देश है ,भारत एक कृषि प्रधान देश है। इस वाक्य को मंत्र की तरह बार बार, बार बार दुहराना होता था। लेखों में तो, भाषणों में तो, सभी जगह कृषि प्रधान देश था भारत। किसान सूखे से तबाह हो जाता था, बाढ में चौपट हो जाता था, फसल पर पाला पड़ जाता था, खलिहान में आग लग जाती थी, बेमौसम की बरसात किये कराये पर पानी फेर देती थी, पर देश कृषि प्रधान ही बना रहता। हम इसे अपनी मौलिक सोच की तरह कहते थे तो पता चलता था कि ये तो नकल है और जब दूसरे भी यही दुहराते तो ऐसा लगता था जैसे कि मेरी नकल कर रहे हों । झल्लाहट होती थी यह सुन सुन कर कि कौन किसकी नकल कर रहा है- मातृवत परदारेषु जैसा मामला था कि हमारी बीबी तुम्हारी माता, तुम्हारी बीबी हमारी माता पता नहीं कि हम तुम्हारे बाप या तुम हमारे।      
       आजादी आने के बाद भी लम्बे समय तक देश कृषि प्रधान ही बना रहा, यहाँ तक कि शर्म आने लगी कि यह  अभी तक कृषि प्रधान ही बना हुआ है। दूसरे देश कहाँ से कहाँ तक की प्रधानी पर पहुँच गये और एक हम हैं कि अभी तक वहीं के वहीं डले हुए हैं। बगल वाला पाकिस्तान तक आतंक प्रधान देश बन गया पर हम कुछ नहीं कर सके।
हम से क्या हो सका मुहब्बत में,                                                                 तुमने तो खैर बेबफाई की
       अब लगता है कि माहौल कुछ कुछ बदल रहा है, देश कई दिशाओं में प्रधानता की ओर बढ रहा है। भ्रष्टाचार में शायद ही किसी एकाध देश से पीछे होगा पर यह तो कह ही सकते हैं कि भारत एक बलात्कार प्रधान देश है। हालात यह हो गये हैं कि अगर देश में बलात्कार बन्द हो जायें तो बेचारे अखबारों का क्या होगा वे कब तक और कहाँ तक लौकी के पकौड़े और बरसात में स्वस्थ कैसे रहें छापते रहेंगे। पूरे अखबार में कम से कम एकाध दो बलात्कार तो चाहिए ही चाहिए। इस कमी को पूरा करने के लिए हमने एक पूरी कौम पैदा कर ली है। हमारे देश में तीसरे खंभे के नाम से जाने जाने वाले लम्पट दलों के छुटभैए नेताओं और नवधनाड्यों के नौजवानों की कृपा से देश का चौथा खम्भा बचा हुआ है और समाचार पत्र पत्रिकाओं से लेकर सत्य कथाएं तक दूधों नहा कर पूतों फल रही हैं।
       बलात्कारों ने पूरे देश को राष्ट्रीय एकता के सूत्र में बाँधने में अपूर्व योगदान दिया है। आदमी चाहे असमी बोलता हो या तामिल, गुजराती बोलने वाला हो या पंजाबी बोलने वाला कोलकते का हो या काझीकोड का अपनी भाषा के अपने अखबार के लोकल पेज पर बलात्कार की खबर जरूर पढता है। हिमालय से कन्या कुमारी तक और अटक से कटक तक पूरा भारत एक है। हमारे द्वारा प्यार से ‘सुरक्षित’ रखे गये कश्मीर से लेकर पीओके अर्थात पाकिस्तान ओक्यूपाइड कश्मीर तक इन खबरों में समानता बनी हुयी है। न जाति का भेद है न धर्म का, सवर्णों से लेकर दलित तक, और शैव, शाक्त, वैष्णव, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी, बिना किसी भेद भाव के समाज में धर्मनिरपेक्षता का वातावरण बनाने के लिए बलात्कार कर रहे हैं।
       इस देश और समाज की एकता के लिए चिंतित लोगों ने देश के चप्पे चप्पे को बलात्कारमयी बनाने की कोशिश की है और वे इसमें असफल भी नहीं कहे जा सकते हैं। कृषि प्रधान देश के खेत और घर तो इसके लिए परम्परा से ही सबसे प्रिय जगह रही है पर अब तो स्कूलों में, कालेजों में, पार्कों में, आश्रमों में, पूजा स्थलों में, प्रार्थना स्थलों में, अस्पतालों में, कार्यालयों में, गलियारों में, यहाँ तक कि शौचालयों तक में इन खबरों के कार्यक्रम स्थल बन रहे हैं। गतिमान दशा में पहले यह काम यदा कदा ट्रेनों के कूपों में हुआ सुना जाता था पर वाहनों के विकास ने इसे गति के साथ जोड़ दिया जाता है। एकाध सप्ताह ही बीतता है कि राम भरोसे कहने लगता है कि बहुत दिन हो गये चलती कार में बलात्कार के समाचार नहीं आ रहे हैं कहीं पैट्रोल की मँहगाई का असर तो नहीं है। दो दिन बाद ही पैट्रोल के दाम एक रुपया सत्तर पैसे सस्ते होने और चलती सफारी में मंत्रीजी के भतीजे और गैंग द्वारा रास्ते से उठायी गयी लड़की से बलात्कार की खबर एक साथ आ जाती है, भले ही पैट्रोल के एक रुपए सत्तर पैसे सस्ता होने से उसका कोई सम्बन्ध नहीं हो। सहकारी आन्दोलन अगर कहीं सफल होता नजर आ रहा है तो वह यही क्षेत्र है। ‘गैंग रेप’ शब्द को हिन्दी के शब्दकोष में सम्मलित किये जाने पर विचार चल रहा है। लगता है कि ट्रैनों, बसों, कारों, जीपों, के निरंतर आरामदायक बनाये जाने के विज्ञापन इस को प्रोत्साहित करने के लिए ही दिये जाते हैं। हमारे मध्य प्रदेश में [मेरा मतलब राज्य से ही है] तो गत दिनों एक सरकारी एम्बुलेंस वाले ने एक महिला मरीज की रास्ते में ही प्राकृतिक चिकित्सा कर देने के समाचार प्राप्त हुए हैं।
       अस्पतालों में डाक्टर इसी ओवरटाइम में लगे सुने जाते हैं, तो थानों में पुलिस अधिकारी, कालेजों में प्रोफेसर, या जहाँ जो काम करता है वहाँ ओवर टाइम कर रहा है। व्यापारिक कार्यालयों और गैर सरकारी कार्यालय के अधिकारी इस मामले में कोई भेद नहीं मानते। साहब के देर होते ही उनकी पत्नियों के दिमागों में एक ब्लू फिल्म के साथ हथकड़ी लगे जेल ले जाये जाते हुए दृष्य कौंधने लगते है और वेतन के साथ उससे चौगुनी ऊपरी कमाई पर संकट आने के दौरे पड़ने लगते हैं। सेना के कई अधिकारी तक यह मानने लगे हैं कि उनका काम विदेशी हमलावरों से रक्षा करना है और देश तो अपने परिवार की तरह है।
       हमारे पुराणों में तो यदा कदा कोई इन्द्र किसी गौतम ऋषि के घर में कूदता होगा पर आज के इस पवित्र पावन विश्वगुरु देश में सभी इन्द्र होते जा रहे हैं। मन्दिर मस्ज़िद के नाम पर धर्म की रक्षा करने वाले तक अपने धर्म का झंडा उठाये हुए दूसरे धर्मों की महिलाओं से बलात्कार करने को पुण्य का काम मानते हैं और ज़न्नत में अपनी जगह पक्की करवाने में लगे हैं। अगर इतने और ऐसे लोग स्वर्गवासी हो जायेंगे तो या खुदा, स्वर्ग के अपने चरित्र का क्या होगा?
वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, जून 27, 2012

व्यंग्य- राष्ट्रपति पद प्रत्याशी की तलाश


व्यंग्य
राष्ट्रपति पद प्रत्याशी की तलाश
वीरेन्द्र जैन
       पुराने जमाने की कई कहानियों में आता है कि जब किसी राज्य के राजा का निधन हो जाता और उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं होता था तो मंत्रिपरिषद यह तय करती थी कि प्रातः जो भी व्यक्ति सबसे पहले नगर के मुख्य द्वार से प्रवेश करेगा उसे ही हम अपना राजा मान लेंगे। राजा के चुनाव की इस विधि में कई मुंगेरीलालों की किस्मत खुल जाती थी और पूरा राज्य कहानियों के उत्पादन का बड़ा केन्द्र बन जाता था। इन कहानियों को सुन सुन कर हम सोचा करते थे कि हाय हम न हुए वो पहले आदमी जो उस नगर में प्रवेश कर पाये। हमारे देश में भी पुरातन काल से अटूट प्रेम करने वाली एक राजनीतिक पार्टी है जो इसी फार्मूले से राष्ट्राध्यक्ष का चुनाव करने में भरोसा करती है। उसके पास भले ही राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने वाला कोई नेता न हो पर वह किसी न किसी को चुनाव जरूर लड़वाना चाहती है, और प्रत्याशी का चुनाव लगभग इसी तरह करना चाहती है।
       इसी तलाश में वे राम भरोसे के पास भी आये थे और उससे राष्ट्रपति पद प्रत्याशी बनने की विनय करने लगे थे पर रामभरोसे ने साफ मना कर दिया।
        मैंने पूछा कि भाई क्यों नहीं बने तो बोला मुझे खाना बनाना नहीं आता
        मैंने कहा कि भाई वहाँ खाना बनाने की कोई बात नहीं राष्ट्रपति भवन में बहुत सारे रसोइए होते हैं, और फिर यह तो दूसरी पार्टी है यहाँ खाना बनाना जरूरी नहीं यह बम बनाने वाले को भी राष्ट्रपति पद प्रत्याशी बना सकती है।
       तो फिर बम बनाने वाले ने क्यों मना कर दिया? उसने प्रति प्रश्न किया।
      
अरे भाई उन्होंने मना नहीं किया अपितु समझदारी से काम लिया कि जब जीतना ही नहीं है तो एनडीए के विस्तार की सम्भावनाओं के लिए क्यों अपनी इज्जत का कचरा करवाया जाये। इसके बाद ही वे दूसरे उम्मीदवार की तलाश में भटकने लगे और तुम्हारे पास इसलिए आये क्योंकि तुम्हें इज्जत का कोई खतरा नहीं है, वह पहले ही मिट्टी में मिल चुकी है, और तब से ही मिट्टी अपनी इज्जत की चिंता कर रही है मैंने उसे समझाया।  
       पर मेरे साथ समस्या दूसरी थी वह फुसफुसा कर बोला तो मुझे एक्सक्लूजिव स्टोरी सुनते पत्रकार की तरह सतर्क हो जाना पड़ा।
                “वह क्या  समस्या थी? मैंने भी फुसफुसा कर पूछा।
       बात यह है कि मुझे सर्दियों से बहुत डर लगता है और राष्ट्रपति को 26 जनवरी जैसी कड़कड़ाती सर्दी में परेड की सलामी लेनी पड़ती है। इतनी ठंड में सलामी लेना मेरे बस की बात नहीं है, सो मैंने कह दिया कि मुसद्दी लाल को बना दो मुझे नहीं बनना। उसने राज जाहिर किया।
      
पर मुसद्दी लाल को क्यों? मैंने पूछा
      
मैं उससे बदला लेना चाहता हूं उसने वैसे ही फुसफुसा कर कहा। और उसके बाद वे चले गये
       इसके बाद वे कई और जगह भी गये होंगे पर कहीं बात नहीं बनी। एक विवादीलाल से तो उन्होंने कहा कि हम आपको एनडीए की ओर से प्रत्याशी बनाना चाहते हैं तो उसने पूछ लिया कि एनडीए में कौन कौन है। जब उन्होंने अपनी पार्टी के साथ जनता दल [यू], शिव सेना, अकाली दल, आदि का नाम लिया तो उसने एक बुन्देली कहानी ही सुना दी। कहानी कुछ इस प्रकार थी-
       एक बार एक कवि ने जब सब कुछ बेच खाया पर उसकी कविताएं नहीं बिकीं तो घर का आखिरी आइटम बेचने निकला जो कि चारपाई का एक पाया था। अतिरंजना के अभ्यस्त उस कवि ने गलियों में यह कहते हुए आवाज लगायी- 
खाट लो खाट,
सियरा नईंयां, पाटी नईंयां,
बीच का झकझोल नईंयां,
 चार में से तीन नईंयां
खाट लो खाट, खाट लो खाट
जाहिर है कि उसके बाद वे मुसद्दी लाल के यहाँ से भी चले आये क्योंकि उनके साथ भी कुछ कुछ ऐसी ही हालत थी।
       राष्ट्रपति के लिए सहमति बनाने निकले थे, वह तो नहीं बनी, प्रधानमंत्री का सवाल अलग से गले में हड्डी की तरह पड़ गया। नमाज छुड़ाने चले थे रोजे गले पड़ गये।
       फिर संयोग से उन्हें एक बना बनाया प्रत्याशी मिल गया जो प्रस्तावक, समर्थक तलाशे बिना पहले से ही अपने गले में माला डाले फिर रहा था। उसके घर के वोट ने साथ नहीं दिया था, उसकी पार्टी ने साथ नहीं दिया था पर वह प्रत्याशी बना घूम रहा था, सो उन्होंने सोचा कि चलो इसको ही समर्थन दे दो। ईसाई है तो क्या हुआ, नहीं करेंगे कुछ दिनों तक चर्चों पर हमले, नहीं जलायेंगे कुछ पादरियों को उनके मासूम बच्चों सहित जीप में, नहीं करेंगे धर्मांतरण के नाम पर ननों की हत्या कुछ दिन तक , पर लोग ये तो नहीं कह पायेंगे कि 2014 में सरकार बनाने के ख्वाब देख रहे थे एक ठो राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी भी नहीं तलाश पाये।
       वह तो टिका दिया पर अभी उपराष्ट्रपति का चुनाव बाकी है।
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शनिवार, जून 16, 2012

व्यंग्य- नये नामकरण करने वाले


व्यंग्य
नये नामकरण करने वाले
वीरेन्द्र जैन
       घर में पंडाल सजा हुआ था तथा अपने सबसे अच्छे समझे जाने वाले कपड़े पहिने लोग इधर से उधर हो रहे थे [फिर भी कहीं नहीं पहुँच पा रहे थे, गोया लोग न होकर मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए के सरकार हो]। बात यह थी कि घर में एक आयोजन था जिसे नामकरण संस्कार के नाम से जाना जाता है। अगर शेक्सपियर भी हिन्दुस्तानी होता तो वो भी ये नहीं कहता कि ‘नाम में क्या रखा है’। अरे भाई नाम में और कुछ रखा हो या न रखा हो कम से कम नामकरण संस्कार तो रखा ही है जिसमें सुन्दर स्वादिष्ट भोजन मिष्ठान्न के अलावा पण्डित को भरपूर दक्षिणा का सुख तो रखा ही है।
       मध्य प्रदेश में तो आजकल इसका महत्व बहुत ही बढ गया है। दर असल मध्य प्रदेश में अच्छे पंडित नहीं पाये जाते थे इसलिए प्रदेश की सरकार ने एक बिहारी पंडित का आयात कर लिया जो यहाँ के नासमझों को समझा रहा है कि नामकरण कैसे किया जाता है। उसने न केवल योजनाओं के ही नाम बदलवा दिये अपितु व्यक्तियों के नाम बदलवाने पर भी उतारू हो गया है। लाड़लीलक्ष्मी, कन्यादान, जलाभिषेक, बलराम योजना, से वही काम हो सकता है जो शिक्षा में सरस्वती शिशु मन्दिर के प्रवेश से हो सकता है, अर्थात शिक्षा का साम्प्रदायीकरण। उजाड़ मस्ज़िद को मन्दिर बनाने के पीछे धार्मिक कारण थोड़े ही होते हैं वो तो इसलिए किये जाते हैं ताकि अलग अलग समुदाय के लोग आपस में लड़ने लगें। रही मन्दिर की सो हजारों मन्दिर उजाड़ पड़े हैं जिनमें कोई दिया भी नहीं जलाता। इस बिहारी पंडित ने नामकरण के सिलसिले में नया शगूफा यह छोड़ा है कि उसने प्रदेश की राजधानी भोपाल नगर की प्रथम नागरिक अर्थात मेयर श्रीमती कृष्णा गौर से शुरुआत की है और उनका नाम कृष्णा गौर से कृष्णा यादव गौर कर दिया है। मजे की बात यह है यह काम उस राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक रहे व्यक्ति ने किया है जिसका दावा है कि वे जातिवाद का विरोध करने के लिए व्यक्तियों को उसके जातिसूचक उपनाम से पुकारे जाने की जगह उसके प्रथम नाम से पुकारते हैं जैसे के अटल बिहारी वाजपेयी को वाजपेयी जी न कह कर अटलजी कहते हैं। पर जबसे संघ मोदी के चरणों में शरणागत हुआ है तब से उसके अनुशासन का कचूमर बन गया है। इसलिए यह उम्मीद करना कि नामकरण पुराने तरीके से होगा, एक कोरी कल्पना से अधिक कुछ नहीं है।
       मैं सोचता हूं कि यह परम्परा और आगे बढेगी और इसका जो स्वरूप बनेगा वो कुछ कुछ निम्न प्रकार ही होगा- 
·         सुन्दरलाल पटवा का नाम सुन्दरलाल जैन पटवा हो जायेगा
·         शिवराज सिंह चौहान का नाम शिवराज सिंह कुर्मी चौहान हो जायेगा
·         ईश्वरदास रोहाणी का नाम ईश्वरदास सिन्धी रोहाणी हो जायेगा
·         बाबूलाल गौर का नाम बाबूलाल यादव गौर हो जायेगा
·         उमा शंकर गुप्ता का नाम उमाशंकर वैश्य गुप्ता हो जायेगा
·         कैलाश विजयवर्गीय का नाम कैलाश ब्राम्हण विजयवर्गीय हो जायेगा
·         सरताज सिंह का नाम सरताज सरदार सिंह हो सकता है
पर इस बिहारी पंडित को पिछड़ों व दलितों के नामकरण में बड़ी दिक्कतें आ सकती हैं। दलित उत्पीड़न का आरोप लगेगा तो जमानत तक नहीं होगी। जिन महिलाओं ने अंतर्जातीय विवाह के बाद अपना नाम नहीं बदला है उनके नाम में परेशानियां आयेंगीं। उमा भारती जैसी साध्वियाँ जो जब साध्वी के चोले में प्रगट होती हैं तो ‘जाति न पूछो साधु की’ वाला रूप रखती हैं किंतु जब चुनाव में खड़ी होती हैं तो लोधी हो जाती हैं, पता नहीं उनके साथ क्या होगा!
  रामलीला पार्टी को कुछ न कुछ स्वांग भरते रहना होता है, अगर इस में न उलझाये तो लोग पानी सड़क बिजली की बात करने लगते हैं।
वीरेन्द्र जैन
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व्यंग्य- कारन कवन नाथ मोहि मारा


व्यंग्य
कारन कवन नाथ मोहि मारा
वीरेन्द्र जैन
       संजय जोशी निकाल बाहर किये गये। और यह मामला गुपचुप नहीं हुआ, अपितु भरी सभा में हुआ। भीष्म, गुरुद्रोण बगैरह बगैरह सब देखते रह गये और द्रोपदी का चीर हरण हो गया। द्रोपदी का चीर तो कृष्ण ने बढा दिया था पर इस महाभारत की लीला में तो कोई लीलाधर सामने नहीं आया। जिन्होंने संजय जोशी को अन्दर किया था वे ही उसे आया है सो जायेगा, राजा, रंक, फकीर की तरह बाहर जाते देखते रहे। गालिब चचा कह गये हैं कि-
निकलना खल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिन
बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले
पर वहाँ एक कूचे के बाद दूसरी गलियाँ तो मिलती हैं, यहाँ तो जहाँ जहाँ गये वहाँ वहाँ से निकाले गये, मुम्बई से लखनऊ जाने के रास्ते को भी तय करने की कोशिश की गयी कि वो गुजरात से होकर न हो। हवा में गन्ध तक न पहुँचे। तानाशाह की शान में गुस्ताखी न पड़े। ऐसा हुआ भी पर जहाँ भेजा वहाँ भी नहीं रहने दिया गया। वहाँ से भी निकलना पड़ा। चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना। कश्मीरी पंडित तो राज्य के एक हिस्से को छोड़ कर दूसरे हिस्से में रह रहे हैं, उस पर इतनी हाय तोबा है कि सरकार को इन विस्थापित नागरिकों को गत दो दशक से  प्रतिमाह आर्थिक मदद दे रही है जो चार हजार रुपये प्रतिमाह, नौ किलो गेंहूँ, दो किलो चावल, और एक किलो चीनी तक सीमित है। धरती की जन्नत छोड़कर आने वालों को दस गुणा बारह का टीन की छत वाला एक आश्रय उपलब्ध कराया गया है। पर संजय जोशी को तो वह भी नहीं मिला। कश्मीरी पंडितों के लिए स्यापा करने वाले तो बहुत सारे रुदाले हैं पर संजय जोशी के लिए कोई आंसू नहीं बहा रहा कि कहीं मोदी न देख ले। अब वे घर के रहे न घाट के। जिन शिवराज सिंह चौहान का राजतिलक करवाया था वे भी मुँह में दही जमा कर बैठे रहे। जिन उमाभारती के साथ पार्टी में अन्दर किया गया था वे भी ध्यानमग्न हो गयीं।
       जो अपने साथी पर हुए अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठा सके वे कहते हैं कि हम जनता के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएंगे। गर्वीले गुजरात ने मराठा साम्राज्य ध्वस्त कर दिया। अध्यक्ष ने विशेष अधिकार से सम्मेलन गुजरात में नहीं होने दिया था और अपने महाराष्ट्र में आयोजित किया, पर फिर भी चली गुजरात की।
       वैसे भाजपा में ये तो चलता ही रहता है,  यह तो मौल्लिचन्द्र शर्मा के समय से चला आ रहा है, बलराज मधोक ने तो बड़ों बड़ों के खिलाफ किताबें लिख मारी थीं पर दुर्भाग्य कि वे ब्रेल लिपि में नहीं थी और जिनकी दृष्टि बाँध दी गयी हो उन्हें क्या दिखता है? कल्याण सिंह का तो पता है, पर आज मदनलाल खुराना कहाँ हैं, उमाभारती भाजपा में तो चुहिया बनकर वापिस घुस गयीं पर उनके गुरू गोबिन्दाचार्य तो भटक भटक कर रामदेव को भजने को विवश हो गये हैं। थिंक टैंक से सड़ाँध आने लगी है। उमा भारती का भी मध्यप्रदेश निकाला हो गया है, खबरदार जो मध्यप्रदेश की धरती पर झांका। दूर से ही गाती रहो, ‘ये मेरे प्यारे वतन, ये मेरे उजड़े चमन, तुझ पर दिल कुर्बान’। अपने बीमार भाई और देव दर्शन का बहाना बना कर आना पड़ता है तब भी सरकारी सीआईडी सक्रिय रहती है।
       रामचरित मानस में बाली राम से पूछता है – मैं बैरी, सुग्रीव पियारा, कारन कवन नाथ मोहि मारा। बेचारे संजय जोशी तो यह भी नहीं पूछ पा रहे हैं। जिस मध्यप्रदेश की पुलिस से सीडी के बारे में क्लीनचिट मिली थी कहीं फिर से दबाव में आकर वही पुलिस ये न कह दे कि सीडी तो सही थी। ऐसी सीडियाँ आत्मा की तरह होती हैं जो कभी नष्ट नहीं होती भले ही उसके पात्रों को क्लीनचिट मिल गयी हो। जब क्लीनचिट मिलने के बाद भी बनवास झेलना पड़ा था तो दुबारा सीडी खुलने के बाद तो न जाने क्या होगा।
      
भले ही झूठी सही पर सवाल तो यह है कि सीडी बनवाई किसने थी और जिस सीडी को पार्टी की ही एक सरकार फर्जी बता रही है उस फर्जी काम को करवाने का सन्देही सबके सिर पर बैठ गया है। संस्कृत के एक श्लोक में कहा गया है कि जिसके पास पैसा है वही मनुष्य़ कुलीन है, वही विद्वान है, वही पंडित है, वही श्रोता है, वही गुणी है, वही सुदर्शनीय है, सारे के सारे गुण सोने में बसते हैं. [सर्वे गुणः कांचनं आसवंते]। गुजरात में आने वाली परियोजनाओं में पैसा ही पैसा है जनवरी, 2011 में महात्मा (गांधी) मंदिर में गुजरात के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी ने 100 देशों से आये 10,000 अंतर्राष्ट्रीय कारोबारियों के सम्मेलन की अध्यक्षता की थी। मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने गुजरात में 45,000 करोड़ डॉलर निवेश करने का वादा किया है। इसलिए भाजपा गुजरात को कबीर के हीरा पायो गाँठ, गठियाओ की तरह छोड़ना नहीं चाहती चाहे कुछ भी हो जाये इसलिए सारे गुण आजकल मोदी में बसते हैं, जिनके लिए संजय जोशी तो क्या अडवाणी तक को हकाला जा सकता है। नेतृत्व की हालत यह हो गयी है कि सौ सौ जूते खाँय, तमाशा घुस के देखेंगे। अडवाणीजी, प्रधानमंत्री बनें न बनें पर ब्लाग लेखक तो बन ही जायेंगे, ब्लागर्स की ओर से स्वागत है अडवाणीजी।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, मई 31, 2012

व्यंग्य- एक डायबिटिक द्वन्द


एक डायबिटिक द्वन्द
वीरेन्द्र जैन
कार्लमार्क्स का यह विश्लेषण पुराना पड़ गया है कि दुनिया दो ध्रुवों में बंटी हुयी है, एक मालिक ओर एक मजदूर, एक शोषक और एक शोषित। मुझे लगता है कि अब दुनिया जिन दो हिस्सों में बंट रही है उसे डायबिटिक और नानडायबिटिक का नाम देना पड़ेगा। एक वे जिन्हें डायबिटीज है और दूसरे वे जिन्हें डायबिटीज नहीं है। हॉं कल नहीं होगी ऐसा नहीं कहा जा सकता है।जिस दर से डायबिटीज के मरीज फल फूल रहे हें उसे देख कर तो लगता है कि थोड़े दिनों में बंटवारा बहुत साफ हो जायेगा।
      ऐसा नहीं है कि मुझे डायबिटीज हो गयी है इसलिए मैं चिंतित हूँ अपितु यह तो मेरा स्वभाव है कि शहर के अंदेशे में रहता ही रहा हूँ और इसी चिंता के कारण तो मुझे डायबिटीज हो गयी है। परसों मैंने यह खबर रामभरोसे को सुनायी तो उसकी आंखों में रहीम का दोहा नाली के पानी में मच्छरों के लारवा की तरह तैरने लगा।
      यों रहीम सुख होत है देख बढत निज गोत
      ज्यों बढरी अंखियॉं निरख अंखियन खों सुख होत
      वे खुश थे कि मैं उनकी जमात में शामिल हो गया था। प्रातःकाल की शीतल मंद बयार में जब निद्रादेवी की गोद और ज्यादा गुदगुदी लगती है तब मैं जूते पहिन कर सड़कें नाप रहा होंऊॅंगा। पड़ोस की लड़कियॉं कहेंगीं- अंकलजी आप भी घूमने जाने लगे! हमारे दादाजी भी जाते हैं। वे मुझे सीधे डेढ पीढी ऊपर चढा देंगीं और मैं कुढ कर रह जाऊंगा।
      जिन्हें डायबिटीज नहीं है वे शोषक हैं । वे फलों के राजा आम पर चाकू चला सकते हैं और उसे कली कली काट कर खा सकते हैं। दूध शक्कर में मथ कर मैंगोशेक बना सकते हैं या अपने दोनों होठों से दबा कर उसे प्यार से चूस सकते हैं तथा कई तरह के मधुर रसों में डूब सकते हैं। जिन्हें डायबिटीज है वे पहले कवि वियोगी की तरह तरस सकते हैं और आम के ठेले के पास से बेनियाज होकर कैफ भोपाली का वो शे’र गुनगुना सकते हैं-
      गुजरना उनकी गली से बेनियाजाना
      ये आशिकों की सियासत किसी को क्या मालूम
      पहले वे लीची के ठेले के पास खड़े होकर लीची का भाव पूछते थे व मंहगी होने के कारण बिना खरीदे रह जाते थे और तब गुस्सा मॅंहगाई पर आता था। अब तो उसका भाव ही नहीं पूछ सकते। अब वो ज्यादा याद आती है। हो सकता है कि सस्ती हो गयी हो पर क्या फायदा! चीकू के ठेले को आलू का ठेला मान लेते हैं।
      मिठाई की दुकान के बारे में पहले माना जाता था कि ऊॅंची दुकान शायद डायबिटीज वालों के लिए ही बनी हैं इसीलिए उसके पकवान फीके होते हैं पर बुरा हो इन डाक्टरों का जो ऊॅंची नीची किसी भी दुकान पर देख लें तो गांव की पाठशाला के गुरूजी की तरह कान उमेठने लगें। मिठाई का बाजार वेश्या की गली हो गया है। किसी नगर में मेहमानी करते हुये यह नहीं पूछ सकते कि आपके नगर की कौनसी चीज प्रसिद्ध है?  सारी चीजें तो शक्कर वाली ही होती हैं- मथुरा के पेड़े हों, आगरा का पेठा हो, हाथरस की खुरचन हो या गंगानगर की मिल्ककेक, सब तो शक्कर के विभिन्न अवतार हैं। इलाहाबाद के अमरूद मलीहाबाद का दशहरी, बालोद का चीकू, सब के सब शर्करा की वृद्धि कर मधुमेहवाणी करते रहते हैं कि यमराज भैंसे या पैसिंजर से नहीं बोईंग-707 से आ रहा है।
      पता नहीं अर्थशास्त्रियों का ध्यान इस पर गया है या नहीं कि भविष्य की अर्थव्यवस्था पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। मुझे तो भविष्य साफ दिख रहा है कि शक्कर के कारखाने बन्द होकर उनमें पैथोलाजी की प्रयोगषालाएं चल रही हैं या इन्सुलिन बनाने के कारखाने चल रहे हैं। हर फुटपाथ पर डायबिटोलोजिस्ट से लेकर डायटीशियन तक फट्टा बिछाये बैठे हैं। चाय काफी में शक्कर लेने के लिए अलग से आर्डर देना पड़ता है। गन्ने के खेत खत्म हो जाने से प्रेमी प्रमिका को पुराने मंदिर में मिलना पड़ता है जहॉं पहले ही हाउसफुल होने की नौबत है तथा सुविधा देने के लिए पुजारियों ने रेट बढा दिये हैं। महाराष्ट्र सरकार ने सहकारिता विभाग बन्द कर दिया है तथा राशन के दुकानदार शक्कर लिए बिना मिट्टी का तेल भी नहीं दे रहे हैं या अलग से पैसे चाह रहे हैं। शराब बनाने के लिए मोलएसस का अकाल पड़ गया है। अमरोहा सहित कई नगरों में मक्खियॉं कम हो गयी हैं तथा पर्यावरण को यथावत रखने के प्रति चिंतित रहने वाले एनजीओ एक और प्रजाति के कम हो जाने की चिंता को लेकर एक नया प्रोजेक्ट स्वीकृत करा रहे है जिसमें कई रिटायर्ड आइएएसों को काम मिल रहा है।
      बच्चे खुश हैं कि उनकी टाफी अब अंकल नहीं खा सकते। बड़े लोग अब आइसक्रीम दिलाने के लिए ज्यादा ना नुकर नहीं करते क्योंकि वे ही आह भर कर कहते हें कि अभी खा लो बाद में तो बन्द हो ही जाना है। बहुएं सोचती हें कि बूढा घूमने गया तो एक घन्टे के लिए तो शांति मिली नही तो चिचियाता रहता कि हमारे लिए बिना शक्कर की, हमारे लिए बिना शक्कर की। बिना डायबिटीज वाले लड़ाई के लिए ललकारते रहेंगे पर डायबिटीज वाले क्या खाकर लड़ेंगे! और लड़ेंगे भी तो उनके घाव भरने में हफ्तों लगेंगे जबकि बिना डायबिटीज वाले जख्म पर पपड़ी पाड़े दूसरे ही दिन खम्भ ठोकते नजर आयेंगे।
      हमारे विचारक जाने क्यों नहीं सोच रहे हैं वरना डायबिटीज से तो आर्थिक सामाजिक राजनीतिक धार्मिक वैज्ञानिक अवैज्ञानिक हर तरह से प्रभाव पड़ने वाला है। मैं अपने से ही जानता हूँ कि जब से डाक्टर ने मुझे डायबिटीज बतलायी है तब से मेरी तो दुनिया ही बदल गयी है।
वीरेन्द्र जैन
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