बुधवार, जून 08, 2011

व्यंग्य- एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के पक्ष में


व्यंग्य
एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के पक्ष में
वीरेन्द्र जैन
ये कांग्रेसी बहुत ही असांस्कृतिक लोग हैं और हों भी क्यों न आखिर शाखा से थोड़े ही निकले हैं। जो लोग संघ की शाखाओं से निकले हुए होते हैं वे सांस्कृतिक होते हैं क्योंकि संघ की नियमावली में लिखा हुआ है कि संघ एक सांस्कृतिक संगठन है और जो एक सांस्कृतिक संगठन है उससे निकले हुए लोग असांस्कृतिक कैसे हो सकते हैं।
अब जब भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद की वैकल्पिक प्रत्याशी, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने राजघाट पर नृत्य दिखा दिया तो ये कांग्रेसी कह रहे हैं कि राजघाट अपवित्र हो गया। ये कैसी नासमझी की बातें हैं। नाचना गाना भले ही कैसा भी हो किंतु यदि उसे नृत्य संगीत और राष्ट्रगीत जैसे संस्कृतनिष्ठ शब्द दे दिये जायें तो उसमें एक गरिमा आ जाती है। सारा प्रताप शब्दों का ही तो है, अडवाणीजी डीसीएम टोयटा को रथ कह कर लोकसभा में अपनी दो सीटों की संख्या को छियासी और फिर दो सौ तक बढा लेते हैं। अब अगर वे डीसीएम टोयटा यात्रा पर निकालते तो रामभक्त टोयटा-यात्री को टाटा कर देते। इसलिए पूरा संघ परिवार शब्दों के प्रयोग में बहुत चतुराई से काम लेता है। अपने स्कूलों को मन्दिर कहता है जिससे दूसरे धर्मों के लोग अपने बच्चों को भेजने से वैसे ही कतरा जाते हैं। सरस्वती शिशु मन्दिरों में मुसलमान बच्चे प्रविष्ट नहीं हो पाते हो जायें तो भोजन मंत्र पढने के बाद ही खाना खा पायेंगे। क्षमा करें मैं संघ के सांस्कृतिक शब्द जाल में वैसे ही उलझ गया था जैसे मैथली शरण गुप्त की पंचवटी में सूर्पणखा का बाँया हाथ चिकुर जाल में उलझ गया था। हाँ तो मैं कह रहा था कि सुषमाजी ने नृत्य किया तो ठीक किया आखिर बाबा रामदेव को फाइव स्टार होटल में मंत्रमंडलीय स्वागत के बाद महिलाओं के बीच छुपकर और उधार मांगे हुए सलवार कुर्ते में दुपट्टे से मुँह छुपा कर भागने को मजबूर करने का अपराध जो केन्द्र सरकार ने किया था, उसका विरोध तो करना था। सबके विरोध का अपना अपना तरीका होता है, सुषमाजी का तरीका सांस्कृतिक है सो वे सोनिया गान्धी के प्रधानमंत्री बनने का विरोध सिर मुँढा, जमीन पर सो और चने खाकर करना चाहती थीं तथा बाबा पर हुए हमले का विरोध राजघाट पर नाच कर करना चाहती हैं।
मैं इस छिद्रांन्वेषण में नहीं जाना चाहता कि राजघाट एक समाधि स्थल है और शांति व सादगी ही उसकी सुन्दरता है उसे धरनास्थल बनाना ही गलत है व बना भी लिया तो नाचना और ठुमका लगाना गलत है। अरे भैया जिस पार्टी की वरिष्ठ उपाध्यक्ष हेमामालिनी जैसी एक सुप्रसिद्ध नृत्यांगना हो जो अच्छों को केंट वाटर प्योरीफायर का पानी पिला देती हैं, तो उसके बाकी के सदस्य नाच गाने से कैसे दूर रह सकते हैं, चाहे अवसर दुख का हो या सुख का हो। मेरा सैंय्या छैल छबीला मैं तो नाचूंगी। भोपाल में जब पंचज कार्यक्रम वाली मुख्यमंत्री उमा भारती बनीं तब भाजपा कार्यालय के सामने महिलाओं के नाचते हुए फोटो समाचार पत्रों में छपे, जब उमाजी को निकलवाकर गोकुल ग्राम वाले गौर साब सीएम बने तब भी फोटो छपे और जब उमाभारती की लोकतंत्र की माँग को दरकिनार करते हुए स्वर्णिम मध्य प्रदेश वाले शिवराज सिंह चौहान सीएम बने तब भी वैसे ही फोटो छपे जिनमें महत्वपूर्ण यह रहा कि हर अवसर पर नाचने वाली महिलाएं वही की वही रहीं। कोउ सीएम होय हमें का हानी , हमें तो नाचना है। मुख्यमंत्री कोई हो, अवसर कोई हो, सांस्कृतिक पार्टी को तो संस्कृति से काम, सांवरे की बंशी को बजने से काम...............।
नाचने में नृत्य, गीत, संगीत सब सम्मलित रहते हैं। यह हमारी परम्परा का हिस्सा है, पुराणकथाओं के अनुसार शिव जी का तांडव और डमरू दोनों ही प्रसिद्ध हैं, तो रास रचाते श्री कृष्ण तो कुंजन कुंजन में रासलीला करते रहते थे। कर्नाटक में इसी सांस्कृतिक पार्टी की सरकार भ्रष्टाचार का नंगा नाच नाच रही है पर उसे आशीर्वाद देने का श्रेय कोई नेता नहीं लेना चाहता। रेड्डी बन्धु मुख्यमंत्री येदुरप्पा को उंगलियों पर नचा रहे हैं और मुख्यमंत्री पार्टी को नचा रहे हैं, जाओ नहीं देते स्तीफा। मुख्यमंत्री के परम शत्रु अनंत कुमार के बारे में एक नई प्रकाशित किताब में आर के आनन्द ने लिखा है कि उन्होंने उन्हें अपने पड़ोस में स्थित नीरा राडिया के फार्म हाउस में उसके साथ पश्चिमी धुनों पर थिरकते देखा है।
उधर भाजपा में किसी तरह पुनर्प्रवेश के लिए उमाभारती तकली जैसा नाच रही थीं, कभी नागपुर के संघ कार्यालय तो कभी गडकरी के दरबार में कभी यूपी तो कभी एमपी कभी उत्तराखण्ड। कभी बाबा रामदेव को प्रधानमंत्री बनवाने लगती थीं, तो कभी अन्ना हजारे के अनशन स्थल से खदेड़ी जाती थीं, पर कहीं गति नहीं मिल रही थी, किसी गुरू किसी देवता का आशीर्वाद काम नहीं आ रहा था। उनके लिए भाजपा का दरवाजा सुई का छेद हुआ जा रहा था, पर उन्होंने नाचना नहीं छोड़ा गाना नहीं छोड़ा और पूरे छह साल बाद भगवान ने उनकी नैय्या पार लगा दी, बस घाट बदल दिया।
भ्रष्टाचार के लालच से नेत्र मूंदे कांग्रेसियो जरा समझो यार सब ओर नाच चल रहा है, धरती नाच रही है, सूरज नाच रहा है चन्दा नाच रहा है, काला सफेद पैसा नाच रहा है, रिंगमास्टर के कोड़े पर सरकस का शेर तक नाच के दिखा रहा है, इसलिए नाचने दो भाई। जब ए राजा की बारात का बाजा बज गया है तो बाकी बकरों की अम्मा कब तक खैर मनायेगी। चलो तुम भी थोड़े सांस्कृतिक बन जाओ, चलो उठो, अच्छे अमूल बेबी जिद नहीं करते ।

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

सोमवार, मई 30, 2011

व्यंग्य - बहिनजी, दीदी और अम्मा आदि के रिश्ते


व्यंग्य
बहिनजी और दीदी और अम्मा आदि के रिश्ते
वीरेन्द्र जैन
अगर उत्तर प्रदेश और बंगाल के बीच अंतर पहचानना हो तो एक अंतर तो सीधा सीधा यह समझ में आता है कि उत्तर प्रदेश में बहिनजी का शासन है और बंगाल में दीदी आ गयी हैं। वैसे हिन्दी का कोई प्रकांड विद्वान कह सकता है कि दोनों में क्या अन्त्तर है दोनों ही पर्यायवाची हैं, किंतु एकमत न होने के लिए विवश दूसरे विद्वान कह सकते हैं किसी एक शब्द के होते हुए जब दूसरा शब्द जन्म लेता है तो वह किसी न किसी भिन्नता के कारण ही जन्म लेता है। बहिनजी शब्द से पुरातन पंथ की गन्ध आती है तो दीदी शब्द कुछ कुछ आधुनिक सा हो जाता है।
मायावती दीदी नहीं हुयीं और ममताजी बहिनजी नहीं हो सकतीं। बहिनजी केवल मुँह की जबर हैं किंतु दीदी ने कभी जयप्रकाश नारायण की कार के ऊपर कूद कर अपने लिए बंगाल की शेरनी का खिताब हासिल किया था ये बात अलग है कि बाद में इसी के भ्रम में वे खट्टे अंगूर वाली बिल्ली की तरह उछल कूद करती रहीं।
बहिनजी ने खुद के नाम पर करोड़ों की जायजाद खड़ी कर ली है किंतु दीदी ने जायजाद खड़ी करने वालों को ही चुनाव में खड़ा किया। बहिनजी टिकिट देने से पहले ही उम्मीदवार से धन निचोड़ लेती हैं, पर दीदी उनका धन उन्हीं के पास रहने देती हैं ताकि सनद रहे वक़्त जरूरत पर काम आये। वे इसे गान्धीजी के ट्रस्टीशिप वाले सिद्धांत का अनुशरण भी कह सकती हैं। बंगाल में जहाँ पहले कुल दो प्रतिशत करोड़पति विधायक थे पर गरीब दीदी के राज्य में सोलह प्रतिशत करोड़पति विधायक हो गये और एकाध अपवाद को छोड़कर सब के सब उन्हीं के मोर्चे के हैं।
बहिनजी हाथी पर सवार रहती हैं तो दीदी तृणमूल नाम रखकर फूल और पत्तियां दिखाती हैं जिनमें न तृण होता है और न मूल अर्थात जड़।
अमूल बेबी, तृणमूल बेबी का सहारा तलाशते हैं किंतु हाथी वाली बहिनजी के साथ दो दो हाथ करने को उतावले नजर आते हैं। भले ही भट्टा पारसौल में अपनी विश्वसनीयता का भट्टा बैठा लेते हैं।
दीदी ने अपने मंत्रिमण्डल को ऐसा साधा है कि उनके वित्तमंत्री हैं फिक्की के पूर्व् अध्यक्ष और जाने माने पूंजीवादी अर्थशास्त्री अमित मित्रा और श्रममंत्री हैं पूर्व नक्सलवादी पूर्णेन्द्र घोष। बुन्देली में एक कहावत है- दोई पलरियन दै दओ तेल, तुम नाचो हम देखें खेल, अर्थात तराजू के दोनों ही पलड़ों पर क्रमशः तेल दे दिया जिससे वे नाचते रहें और हम नाच देखते रहें। पर बहिनजी किसी स्वतंत्र अस्तित्व रखने वाले को मंत्री नहीं बनातीं।
बहिनजी, बहिनजी रहेंगीं, और दीदी, दीदी। ये बात अलग है दोनों की पूंजी ही नफरत की पूंजी हो। वैसे पूंजी तो अम्मा के पास भी नफरत की ही है जिन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद पहला बड़ा खुलासा यह किया कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गान्धी की हत्या में डीएमके का हाथ था। उम्मीद करना चाहिए कि जल्दी ही कोई दिन ऐसा भी आयेगा जब करुणानिधि के फेमिली डाक्टर को जगह जगह नहीं भटकना पड़ेगा एक ही जेल में पूरी फेमिली की जाँच कर लिया करेगा। अब पता नहीं अम्मा बहिनजी का चुनाव चिन्ह [हाथी] दान करने के लिए कौन से मन्दिर में कब जाने वाली हैं, जैसे कि पिछली बार गयी थीं, जैसे उमा भारती तिरुपति के मन्दिर में मुण्डन कराने के लिए गयी थीं भले ही इसके बाद भी पूरे समय मुख्य मंत्री नहीं रह पायीं। वैसे अम्मा ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में नफरत के अवतार नरेन्द्र मोदी को आमंत्रित करके अपनी लाइन का सन्देश तो दे ही दिया है। भाजपा के ये स्टार प्रचारक यों तो असम में भाजपा की सरकार बनवाने गये थे किंतु सीटें आधी करवा दीं।
बहिनजियो दीदियो अम्मा के लिए दुआ करो, जो अपनी जनता को अपने महल की बालकनी से ही दर्शन देती हैं। रिश्तों के बारे में मुनव्वर राना का एक शेर है-
अमीरे शहर को रिश्ते में कोई कुछ नहीं लगता
गरीबी चाँद को भी अपना मामा मान लेती है
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, अप्रैल 11, 2011

व्यंग्य - चट्टों बट्टॉं में आखिर कौन किसके खिलाफ है


व्यंग्य
चट्टों- बट्टों में आखिर कौन किसके खिलाफ है
वीरेन्द्र जैन
पिछले दिनों दिल्ली के जंतर मंतर पर अनशन अनशन खेला गया। जिन दिनों दिल्ली में राम लीला खेली जाती है उन्हीं दिनों दूसरे नगरों में भी रामलीला रामलीला चलती है। जिधर देखो उधर हनुमानजी पूँछ उठाये लंका में आग लगाते फिरते हैं सो देश के दूसरे नगरों में भी अनशन अनशन खेला गया। हम भी अनशन पर तुम भी अनशन पर। ये भी अगर लोकपाल विधेयक पास कराना चाहते हैं तो वो भी लोकपाल विधेयक पास कराना चाहते हैं। समझ में नहीं आ रहा कि जब सभी साहुकार हैं तो चोर कौन है।
“वैसे तुम पास कराना चाहते हो तो तब क्यों नहीं करा लिया जब तुम्हारी सरकार थी”
“पर तुम्हारी तो अब है तुम्हीं पास करा लो”

“ तुम बिल तो लाओ”
“तुम समर्थन दोगे?”
“ हाँ देंगे, क्योंकि तुम्हारे लोग पकड़े जायेंगे तो हमें राजनीतिक लाभ मिलेगा”
“ पर जब बिल आयेगा तो तुम्हारे कौन से बचे रहेंगे। येदुरप्पा की अम्मा कब तक खैर मनायेगी। मध्य प्रदेश में 14 मंत्रियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज है उन्हें कब तक बचाओगे! टूजी की जाँच का दायरा 2001 से इसीलिए शुरू किया गया है कि हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे। पंजाब में जब अकालियों का काल आयेगा तो तेरा क्या होगा कालिया? राजस्थान में झक मार कर वसुन्धरा को ही विपक्ष की नेता बनाना पड़ा है वरना संघ परिवार को जमीनें देने की जो जाँच चल रही है वो उसका कच्चा चिट्ठा खोल देतीं।“
“ हमारी चिंता छोड़ो, तुम अपनी करो अभी तो जो कुछ चल रहा है वह तुम्हारे खिलाफ जा रहा है, हमारे यहाँ ऊपर से लेकर नीचे तक वकील ही वकील भरे हैं, वे ऐसे पेंच निकालेंगे कि बिल का विरोध करके भी पाक साफ कहलाएंगे। कमेटी के सदस्यों के नाम पर ही झगड़ा शुरू करवा देंगे।”
“हमने तो सारी माँगें मानने का ढोंग पहले ही कर दिया है जिससे यह सन्देश गया है कि हम तो डिटर्जेंट मिले दूध के धुले हैं। विधानसभा के चुनाव निबट जाने दो फिर हमारे यहाँ भी कौन से वकीलों की कमी है।“
“ वैसे तो ये अन्ना भी है जोरदार आदमी, इसने मशाल पकड़ने को उतारू हो रहे हाथों में मोमबत्तियां पकड़ा दीं” “ और बाबा राम देव उन्हें अगरबत्तियां पकड़ा देंगे।“
“ क्या इस अनशन से कोई भ्रष्टाचारी भी डरा? क्या किसी विभाग के अधिकारी ने यह कहा कि मुझे रिश्वत नहीं चाहिए मैं अब बिना रिश्वत के ही काम कर दूंगा। क्या किसी मंत्री ने ठेकेदार और उद्योगपतियों से ब्रीफकेस लेने से मना कर दिया? क्या किसी ने किसी को पकड़वाया। क्या किसी ने शिकायतें कीं! क्या किसी का ह्रदय परिवर्तन हुआ और उसने आगे आकर अपना भ्रष्टाचार कबूलते हुए अपने स्विस बैंक में जमा की सूची दी?”
“ किसी ने कुछ नहीं किया, सबने मोमबत्तियां जलायीं और शाम को देवी के मन्दिर में जाकर पुजारी को बतलाया कि नवरात्रि पर मैंने दो दिन का उपवास किया। एक पंथ दो काज। ऊपर वालों को गाली देना बहुत आसान होता है, सब कुछ अमूर्तन में चला जाता है, पर किसी ने स्थानीय भ्रष्टाचारियों की सूची नहीं बनायी। किसी के पास भी अपने विधायक सांसद की बेनामी सम्पत्ति की सूची नहीं है।“
मशालों को मोमबत्ती में बदल दिया गया मोमबत्तियों को अगरबत्तियों में बदल दिया जायेगा जो दो चार मिनिट में राख में बदल जायेगी।
मिरी सरकार ने वादा किया है पाँचवें दिन का
किसी से सुन लिया होगा, ये अनशन चार दिन का है



वीरेन्द्र जैन
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शनिवार, मार्च 26, 2011

व्यंग्य - चुनाव परिणाम से फैसला


व्यंग्य
चुनाव परिणाम से फैसला
वीरेन्द्र जैन
हमारे प्रधानमंत्री सच्चे लोकतांत्रिक हैं, भले ही कभी लोकसभा चुनाव नहीं जीत पाये हों। उन्होंने न्याय का नया मापदंड निर्मित किया है जिसका नाम रखा जाना चाहिए “चुनाव जीत लो न्याय”। इस तरीके से देश के सारे न्यायालयों को सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों के बन्द होने जैसी सम्भावनाएं पैदा हो गयी हैं। सदन में उन्होंने कहा कि मैंने, मेरे द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति ने, या मेरी पार्टी ने 2008 में अल्पमत में आ गयी सरकार को बचाने हेतु वोट के लिए नोट नहीं दिये। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि चुनाव में हम जीत गये।
उनके कथन में हमारे देश में प्रयुक्त होने वाले एक पुराने सूत्र वाक्य की ध्वनि सुनायी दे रही थी- सत्यमेव जयते। अर्थात सत्य ही जीतता है, या जो जीतता है वही सत्य होता है चाहे वह भारतीय मतदान प्रणाली के अनुसार हुये चुनाव की जीत ही क्यों न हो। उनके बयान से सबसे ज्यादा खुश गुजरात में नरेन्द्र मोदी हुये। वे अमित शाह से बोले, ‘देखो मैंने कहा था न...’ “क्या...” अमित शाह ने प्रश्न किया। “यही कि 2002 में हुये मुसलमानों के नरसंहार में मेरा कोई हाथ नहीं था” “पर ये कैसे तय हुआ” उन्होंने फिर पूछा “इसलिए कि उसके बाद मैं एक बार नहीं दो बार चुनाव जीत गया हूं, और हमारे प्रधान मंत्री ने न्याय का यही माप दण्ड तय कर दिया है। चुनाव जीतो और जीत का प्रमाणपत्र लेकर माननीय न्यायधीश के पास पहुँच जाओ।“ झारखण्ड में यही बात शिबू सोरेन अपने भाजपायी सहयोगियों को समझा रहे थे कि अब तो मैं अपने ऊपर लगे सारे आरोपों से मुक्त हो जाऊंगा इसलिए मुख्यमंत्री की कुर्सी को अपने गले में डले पीले दुपट्टे से पौंछ कर रखना। बिहार में लालू प्रसाद नीतीश कुमार के आगे खम्भ ठोकने को तैयार हो रहे हैं। तामिलनाडु में ए राजा का शीराजा बिखरने से पहले ही सम्हल सकता है। मायावती सीबीआई से अपने सारे केस वापिस लेने के लिए कह रही हैं। अमर सिंह सोच रहे हैं कि काश मुझे भी कोई ऐसा सुरक्षित स्थान मिल जाये जहाँ से चुनाव जीतकर अपने ऊपर लगे सारे आरोपों से मुक्त हो सकूं। मुलायम टिकिट देने से पहले कह रहे हैं कि जिस के ऊपर जितने ज्यादा केस चल रहे हों उन्हें सबसे पहले और सबसे सुरक्षित सीट से टिकिट दिया जायेगा। चुनाव जीतना ही सत्य है भले ही चुनाव पूरी तरह झूठे वादे और झूठी उपलब्धियों के विज्ञापनों पर आधारित हों। चुनाव चाहे पाँच पाँच सौ रुपये फी वोट के हिसाब से खरीद कर जीते गये हों। चाहे दारू की बोतल से नहला कर और जाति के रिश्ते से जीत गये हों। चुनाव जीत कर नेता कह सकते हैं कि सूरज पूरब से नहीं बल्कि पश्चिम से उगता है। कोई गैलीलिओ यह बताने से पहले कि पृथ्वी सूरज का चक्कर लगाती है चुनाव का फार्म भरेगा और वोट माँगने के लिए गाँव गाँव के चक्कर लगाते हुए यह भी भूल जायेगा कि कौन किसका चक्कर लगाता है।

वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, मार्च 11, 2011

व्यंग्य- ...........और अब भोजपाल


व्यंग्य
और अब भोजपाली
वीरेन्द्र जैन
जब बम्बई, मुम्बई हो गयी, कलकत्ता कोलकता हो गया, त्रिवेन्द्रम तिरंतपुरम हो गया तो हमारा कर्तव्य बनता है कि हम भी अपनी तरह से अपने नगर का नाम बिगाड़ें। क्यों नहीं बिगाड़ेंगे आखिर हम किसी से पतला तो नहीं थूकते हैं?
किस ने किस कारण से अपने नगर का स्वाभाविक नाम बिगाड़ा उसके कारणों के पीछे हम नहीं जाते, हमें तो करना, सो करना। जब न्यायाधीश किसी को फाँसी दे सकता है तो हम क्यों नहीं दे सकते। इतिहास तो हमारे स्कूलों की पाठ्यपुस्तक है और अपने राज्य की पाठ्य पुस्तकों में हम मनमाना फेरबदल करवा सकते हैं। सारे वर्तमान को इतना पीछे ले जाना है कि बीच के मुगल और ईसाई अर्थात अंग्रेज का इतिहास ही मिट जाये। सोई हो गया जय हिन्दू राष्ट्र।
अब लोकतंत्र के त्योहार 15 अगस्त और 26 जनवरी मनाते मनाते भी हमारी राजनीति राजमाताओं और राज कुँवरों के यहाँ गिरवी रखी हुयी है सो हम फिर से माँ की कोख की ओर बढ रहे हैं। जो नहीं बढ रहे वे देशद्रोही हैं। कोई कुछ भी कहे हम अपने भोपाल का नाम भोजपाल रख रहे हैं,... मेरी मर्जी।
आप कहते रहें कि 14 राजा भोजों में से ये ही भोज रहे हों तो भी जो नाम समय के प्रवाह में बदला जा चुका है उसमें पीछे कैसे लौटा जा सकता है। अरे भाई लौटा जा सकता है क्योंकि हमने वोट जुटाये हैं, भले ही कैसे भी जुटाये हों। कहते रहो कि इनसे अच्छी तो मायावती है जिसने अगर शहरों के नाम बदले तो उन्हें अपने समय के समाज सुधारकों का नाम दिया,.... दिया होगा। जो अतीत में दुखी रहे वे तो बदलेंगे, पर हमें अतीत में पूजा जाता था इसलिए हम तो सुख की ओर लौटेंगे, अर्थात अतीत की ओर लौटेंगे।
अगर भोपाल का नाम राजा भोज के नाम पर भोजपाल हो गया तो ये बदलाव यहीं तक सीमित नहीं रहेगा। राजा भोज जब कब्र से उठ कर खड़े हो जायेंगे तो गंगा राम साहू को गंगू तेली बनना पड़ेगा। दोनों बराबरी पर कैसे बैठ सकते हैं, कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली! अतीत में जायेंगे तो जूता कम्पनी में काम करने वाले मजदूर को चमार हो जाना पड़ेगा और दलित सफाईकर्मी को मेहतर होना पड़ेगा। फिर उन्हें होटलों के कपों में चाय नहीं मिलेगी। वेद का वाक्य सुन लेने वाले दलित के कानों में पिघला शीशा डलवा दिया जायेगा। और, और, और, हम बिल्कुल पीछे चले जायेंगे, जहाँ पंडित पन्डित की जगह और हरिजन हरिजन की जगह।
आप कह रहे हैं कि यदि 1400 साल पुराने राजा भोज को शहर के सीने पर ठोका जा सकता है तो उससे पीछे क्यों नहीं जाया जा सकता। साँची के पास होने के कारण बहुत सम्भव है कोई अशोक जैसे बौद्ध राजा के राज्य के उदाहरण भी मिल जायें। जब धार के राजा भोज यहाँ तक फैल सकते हैं तो विदिशा का राजा यहाँ तक क्यों नहीं आ सकता। आप कहते रहिए, हम नहीं मानते सो नहीं मानते। संघ पारिवार की गाड़ी बैक होती है तो एक निश्चित सीमा तक बैक होती है, बीच में मुगल राज को छोड़ दिया, अंग्रेजों को छोड़ दिया, और जब हिन्दुओं की “वे आफ लाइफ” पर सुई टिक गयी तो गाड़ी रोक दी। हमारी गाड़ी हमारे हिसाब से पीछे जाती है।
अब यहाँ कोई भोपाली नहीं रहेगा और ताज महल को शिव मन्दिर बताने वाले भोपाल के इतिहास पुरुषों के नाम कुछ ऐसे लिए जायेंगे-
शकीला बानो भोजपाली
ताज भोजपाली
असद भोजपाली
कैफ भोजपाली
मंजर भोजपाली
वो तो अच्छा है कि भाजपा कार्यालय में झाड़ू लगाने को तैयार बैठे शायरे आजम भोपाली नहीं हुये बरना अन्यथा उन्हें तो भोजपाली होकर बड़ी खुशी होती।

वीरेन्द्र जैन
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रविवार, फ़रवरी 13, 2011

व्यंग्य - ब्लैंक चैक


व्यंग्य
ब्लेंक चैक
वीरेन्द्र जैन
पूंजीवादी युग में राजनीति की भाषा भी मौद्रिक हो जाती है। कभी सन्यासियों से उम्मीद की जाती थी कि वे ध्यान की मुद्रा में बैठे मिलेंगे। कई लोग तो यह भरोसा करने लगे थे कि उनके जैसी मुद्रा बना लो तो ध्यान लग जाता है। लोग बुद्ध महावीर आदि की मुद्राएं बना कर बैठ कर देखते थे, पर अब मुद्रा के नाम पर मुद्राएं अर्थात करैंसी का ही ध्यान आता है। कागजी मुद्राएं आने और बैंकिंग के विकास के बाद तो कागज की मुद्राओं के भी कागज चलने लगे जिन्हें चैक कहा जाता है। किसी जमाने में चेकों का भरोसा नहीं होता था क्योंकि खाते में बैलेंस हो या न हो पर चैक काटी जा सकती थी। फिर सरकार को लगा कि बैंक, जिसका मतलब ही होता है भरोसा, वह चेक के भुगतान न होने पर टूट जाता है, इसलिए बिना बैलेंस के चेक काटने को अपराध घोषित कर दिया। पर इससे बिना बैलेंस के चेक कटना तो बन्द नहीं हुए पर अपराधों के दर्ज होने की संख्या में जरूर वृद्धि हो गयी। आज सबसे ज्यादा लम्बित प्रकरणों की संख्या बिना भुगतान के चैक जारी करने वाले प्रकरणों की है।
लम्बित प्रकरणों की इस ढेरी में एक की वृद्धि और होने जा रही है। भूतपूर्व भाजपा नेत्री उमाभारती जो कभी अपने को साध्वी बताती थीं, अब अपने आप को चेक बताने लगी हैं और उन्होंने भाजपा के पक्ष में कटने की घोषणा कर दी है। यह चेक भी बिना कोई राशि भरे हुए जारी करने जा रही हैं जो उत्तर प्रदेश में पेयेबिल अर्थात भुगतान योग्य होगा। भले ही यह कोर बैंकिंग का जमाना हो जिसमें किसी भी बैंक शाखा के खातेदार का चेक कहीं भी भुगतान हो जाता हो, पर वे चैक को स्पेशियली क्रास्ड करके जारी कर रहीं है जिसका मतलब होता है कि यह किसी खास जगह की खास बैंक शाखा में ही जमा किया जा सकता है।
ब्लेंक चैक का अपना रहस्य होता है, यह चेक पाने वाले का जुआ होता है कि वह उसमें क्या राशि भरे। उमाभारती ने उत्तर प्रदेश के पिछले चुनावों में अपने उम्मीदवारों को वापिस बुला लिया था ताकि हिन्दू एकता बरकरार रहे इसलिए यह तो पता ही नहीं चला कि उनके खाते में बैलेंस था भी या नहीं। पर जब उन्होंने उपचुनाव में सोनिया गान्धी के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारा था और भाजपा को अपना उम्मीदवार बैठा कर उनका समर्थन करने का आवाहन किया था तब उनकी जमानत जब्त होने की सीमा से भी कम बैलेंस निकला था। गुजरात में उन्होंने गुरु के आदेश को बहाना बना कर अपने उम्मीदवार वापिस बुला लिए थे और अपने खाते के राज को राज ही रहने दिया था। मध्य प्रदेश में वे बड़ा मल्हरा और टीकमगढ दोनों ही जगह से हारी थीं। बड़ामल्हरा में तो उन्होंने प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके भाजपा के पुराने साथी शिवराज सिंह पर उनकी हत्या कराने का आरोप लगाया था, पर अब उन्हें अपने स्वास्थ की चिंता को भूलकर किसानों के लिए अपने कातिल के पास बैठने से कोई गुरेज नहीं है। भाजपा के बागियों के सहारे पूरे प्रदेश में उन्हें बारह लाख वोट जरूर मिले थे जो उनके अस्थिर मनोभावों के कारण अपने अपने रस्ते से लग चुके हैं। पर जहाँ उनके खाते में सबसे ज्यादा बैलैंस है वहीं पर उनका चेक भुगतान योग्य नहीं है। जहाँ भुगतान के लायक बताया जा रहा है वहाँ उनके खाते के बैलेंस का पता नहीं है।
ये चेक आखिर ब्लैंक क्यों है। क्या पैन नहीं हैं? और न हो तो भी कोई बात नहीं आजकल तो नेट बैंकिंग आ गयी है। बिना पैन के भी राशि यहाँ की वहाँ की जा सकती है। पर अपने खाते के बैलेंस का पता तो होना चाहिए, और अगर नहीं है तो एटीएम से पता किया जा सकता है क्योंकि अब तो सातों दिन चौबीसों घंटे एटीएम खुला मिलता है। ऐसा लगता है कि यह जीरो बैलेंस खाते का ब्लैंक चैक है। चेक लेने और देने वाले दोनों को पता है कि खाते की औकात क्या है, पर टुच्ची साहित्यिक संस्थाओं द्वारा दिये गये पुरस्कारों की तरह खाली लिफाफों का आदान प्रदान हो रहा है और दोनों ही अपनी जनता को बेबकूफ बना रहे हैं।
ये दीवालिया बैंक के जीरो बैलेंस खाते का ब्लैंक चैक है, जो उसको दिया जा रहा जिसका खाता ही नहीं खुल रहा है।
वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, फ़रवरी 02, 2011

व्यंग्य-- जब आवे संतोषधन


व्यंग्य
जब आवै सन्तोष धन

वीरेन्द्र जैन

वैश्वीकरण, अर्थात सारी दुनिया के लोगों के लिए अपने फाटक खोल देने के बाद, औषधि बनाने वाली कंपनीयों के लिए आर एन्ड डी अर्थात रिसर्च और डेवलपमेन्ट विभाग खोलना और कंपनी के कुल बजट का दस प्रतिशत उसमें व्यय करना कानूनन जरूरी बना दिया गया है। मेरी दृष्टि में हिन्दूस्तान, जो कि इण्डिया, भारतदेश या भरतखण्डे के नामों से भी जाना जाता है के लिए यह कानूनी प्रावधान अनावश्यक था। हमारे यहॉ तो रोगियों, उनके रिशतेदारों और उनकी पूछताछ करने वाले शुभचिंतकों के बीच यह विभाग हजारों सालों से कार्यरत है।
आपके मुखारविन्द से रोग या उसके लक्षण पूरी तरह प्रकट भी नहीं हो पाते कि विभिन्न पद्वतियों, जड़ी बूटियों, घरेलू नुस्खों, देशी इलाजों, डाक्टरों, अस्पतालों, चमत्कारी बाबाओं, सिद्व स्थानों प्राकृतिक झरनों की इन्सटैंंट सूची आपके समक्ष खुलनी शुरू हो जाती है। आप थक जाते है, आपका रोग थक जाता है पर वह सूची कभी नहीं थकती। रहस्य रोमांच की सारी कथाएं फीकी पड़ने लगती है और इन कथाओं के शमशान की और कूच कर चुके नायक सड़कों पर छलांगे लगाने लगते हैं। ऐसे देश में रिसर्च एन्ड डेवलपमेंन्ट का विभाग बनाने की क्या जरूरत है ? ज्यादा से ज्यादा इतना किया जा सकता है कि मरीज की मिजाज पुर्सी के लिए आने वालों के उद्गारों को रिकार्ड करने के लिए टेप फिट कर दिये जायें। जब वैज्ञानिक इन टेपों को सुनेंगे तो आश्चर्य से दांतों में उंगली नहीं पूरा का पूरा पंजा दबा लेंगे। हो सकता है कि कुछ वैज्ञानिक तो आर्कमडीज की तरह यूरेका- यूरेका चिल्लाते हुऐ दूसरों के हाथों पांवों की उंगलियां अपने दांतों के नीचे दबाकर खुद आश्चर्य प्रकट करने लगें और दूसरों को भी इसका अवसर दें।
अभी कल ही अपनी बहुओं को संतोष की सांस लेने का अवसर देने की खातिर रोज शाम को पार्क में इकट्ठा होने वाले रिटायर्ड लोगों का दल डायबिटीज पर चर्चा कर रहा था। अपने पैंट की बेल्ट को एक और अगले छेद में फंसाते हुए एक बूढ़ा बोला- जामुन की गुठली को छांह में सुखाना चाहिये और जब खूब सूख जाये तो उसे फोड़ कर उसके अन्दर जो दल निकले उसे खल्लड़ में खूब बारीक पीस कर कपड़े से छान लेना चाहिए। इस छने हुऐ चूर्ण को एक चुटकी मुंह में रखने के बाद आप कैसी भी मिठाई खा लें या सीधे सीधे शक्कर के दाने फांक लें, मजाल है कि मीठा लग जाये। ऐसा लगेगा जैसे धूल फांक रहे हों।
साहित्य में घुसे रहने का यह दोष होता है कि इस शुद्व वयोवृद्व हर्बल आयुर्वेद चर्चा में भी मुझे रहीम याद आ गये।
जब आवे सन्तोष धन
सब धन धूरि सामान
मुझे जामुन की गुठली का चूर्ण संतोष धन की तरह लगा जिसके सेवन के बाद आपकों सारी मिठाई धूल फांकने की तरह लगने लगती है। सूचनाओं के बेतरतीब धने जंगल में विचारों और विश्वासों के घोड़े अक्सर ही रास्ता भटक जाते हैं। मूल विषय से भटक कर मेरे विचारों का टट्टू भी ''संतोष धन'' के पीछे पड़ गया। यह कैसा होता है ? कहॉ मिलता है ? कमाया जाता है कि ब्याज में आ जाता है ? ऐसा क्यों कहा गया है कि ''जब आवे संतोष धन'' अर्थात अपने आप आता है- अतिथियों की तरह। लो हम आ गये। अब तुम्हारे धन की तो ऐसी की तैसी। उसे धूरि समान करके नहींं छोड़ा तो हमारा नाम भी संतोष धन नहीं।

संतोष धन परेशान करने लगा है क्योंकि जिज्ञासा निरन्तर बढ़ती जा रही है। पड़ोस के सेठजी से पूछता हूं- क्यों सेठ जी आपके यहॉ संतोष धन आया क्या ? सेठ जी तुरन्त ही झल्ला पड़े- भैया मैं गरीब आदमी हूँ हमारे यहॉ कोई भी कैसा भी धन नहीं आया। तुम क्या इनकमटैक्स वाले हो?

मैने सोचा कि चलो गरीब आदमी से ही पूछते हैं उसका तो सारा धन धूरि समान होकर ही पड़ा हुआ है, शायद उसके यहॉ संतोष धन परमानेंट रहता हो। मेरा प्रश्न सुनकर गरीब आदमी भी झल्ला पड़ा। बोला- आप तो उस मेजबान की तरह हैं, जो दावत में बुलाये, और खाना तो न खिलाये, पर कहे पान खा लीजिए। संतोष धन तो तब आयेगा जब असन्तोष धन तो आ जाये। हाथ न मुठी- खुरखुरा उठी। हम तो वैसे भी संतोष किये बैठे हैं-
नाज है उनकों, बहुत सब्र मुहब्बत में किया
पूछिये, सब्र न करते तो और क्या करते।

जब और कोई धन नहीं होता है तो संतोष धन तो खाली जगह में बैठ ही जाता है। संतोष धन में कोई ब्लैक या ब्हाईट का चक्कर नहीं रहता। वह व्हाईट ही व्हाईट रहता है क्योकि उस पर इन्कम टैेक्स बगैरह कुछ भी नहीं लगता। संतोष धन को चोर नहीं चुराते और ना डकैत संतोष धन के लिए अपहरण कर फिरौती मांगते हैं। कोई भ्रष्ट्राचारी अफसर, नेता, मंत्री संतोषधन में रिश्वत की मांग नहीं करता है कि आपके काम के लिए इतना संतोष धन लगेगा।
दुकानदार संतोष धन में सौदा नहीं देते और ना होटल का वेटर संतोषधन को टिप में स्वीकार करता है। पत्नी और बच्चे तक कहते हैं कि संतोष धन आप ही रखे रहिये बाकी जेब में जो कुछ भी हो वो मुझे दे दीजिये।

संतोष धन किसी को नहीं चाहिये। जो कुछ भी है उसको धूरि समान कराने की जरूरत किसी को नहीं है। संतोष धन आ जायेगा तो वित्त और वाणिज्य विभाग दरवाजे पर लगाने के लिए ताला खरीदने लगेंगे। बन्द दफ्तर के बाहर लिखा मिलेगा कि यहाँ कभी वाणिज्य कार्यालय हुआ करता था जब तक कि संतोष धन नहीं आया था।


वीरेन्द्र जैन
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