बुधवार, जून 27, 2012

व्यंग्य- राष्ट्रपति पद प्रत्याशी की तलाश


व्यंग्य
राष्ट्रपति पद प्रत्याशी की तलाश
वीरेन्द्र जैन
       पुराने जमाने की कई कहानियों में आता है कि जब किसी राज्य के राजा का निधन हो जाता और उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं होता था तो मंत्रिपरिषद यह तय करती थी कि प्रातः जो भी व्यक्ति सबसे पहले नगर के मुख्य द्वार से प्रवेश करेगा उसे ही हम अपना राजा मान लेंगे। राजा के चुनाव की इस विधि में कई मुंगेरीलालों की किस्मत खुल जाती थी और पूरा राज्य कहानियों के उत्पादन का बड़ा केन्द्र बन जाता था। इन कहानियों को सुन सुन कर हम सोचा करते थे कि हाय हम न हुए वो पहले आदमी जो उस नगर में प्रवेश कर पाये। हमारे देश में भी पुरातन काल से अटूट प्रेम करने वाली एक राजनीतिक पार्टी है जो इसी फार्मूले से राष्ट्राध्यक्ष का चुनाव करने में भरोसा करती है। उसके पास भले ही राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने वाला कोई नेता न हो पर वह किसी न किसी को चुनाव जरूर लड़वाना चाहती है, और प्रत्याशी का चुनाव लगभग इसी तरह करना चाहती है।
       इसी तलाश में वे राम भरोसे के पास भी आये थे और उससे राष्ट्रपति पद प्रत्याशी बनने की विनय करने लगे थे पर रामभरोसे ने साफ मना कर दिया।
        मैंने पूछा कि भाई क्यों नहीं बने तो बोला मुझे खाना बनाना नहीं आता
        मैंने कहा कि भाई वहाँ खाना बनाने की कोई बात नहीं राष्ट्रपति भवन में बहुत सारे रसोइए होते हैं, और फिर यह तो दूसरी पार्टी है यहाँ खाना बनाना जरूरी नहीं यह बम बनाने वाले को भी राष्ट्रपति पद प्रत्याशी बना सकती है।
       तो फिर बम बनाने वाले ने क्यों मना कर दिया? उसने प्रति प्रश्न किया।
      
अरे भाई उन्होंने मना नहीं किया अपितु समझदारी से काम लिया कि जब जीतना ही नहीं है तो एनडीए के विस्तार की सम्भावनाओं के लिए क्यों अपनी इज्जत का कचरा करवाया जाये। इसके बाद ही वे दूसरे उम्मीदवार की तलाश में भटकने लगे और तुम्हारे पास इसलिए आये क्योंकि तुम्हें इज्जत का कोई खतरा नहीं है, वह पहले ही मिट्टी में मिल चुकी है, और तब से ही मिट्टी अपनी इज्जत की चिंता कर रही है मैंने उसे समझाया।  
       पर मेरे साथ समस्या दूसरी थी वह फुसफुसा कर बोला तो मुझे एक्सक्लूजिव स्टोरी सुनते पत्रकार की तरह सतर्क हो जाना पड़ा।
                “वह क्या  समस्या थी? मैंने भी फुसफुसा कर पूछा।
       बात यह है कि मुझे सर्दियों से बहुत डर लगता है और राष्ट्रपति को 26 जनवरी जैसी कड़कड़ाती सर्दी में परेड की सलामी लेनी पड़ती है। इतनी ठंड में सलामी लेना मेरे बस की बात नहीं है, सो मैंने कह दिया कि मुसद्दी लाल को बना दो मुझे नहीं बनना। उसने राज जाहिर किया।
      
पर मुसद्दी लाल को क्यों? मैंने पूछा
      
मैं उससे बदला लेना चाहता हूं उसने वैसे ही फुसफुसा कर कहा। और उसके बाद वे चले गये
       इसके बाद वे कई और जगह भी गये होंगे पर कहीं बात नहीं बनी। एक विवादीलाल से तो उन्होंने कहा कि हम आपको एनडीए की ओर से प्रत्याशी बनाना चाहते हैं तो उसने पूछ लिया कि एनडीए में कौन कौन है। जब उन्होंने अपनी पार्टी के साथ जनता दल [यू], शिव सेना, अकाली दल, आदि का नाम लिया तो उसने एक बुन्देली कहानी ही सुना दी। कहानी कुछ इस प्रकार थी-
       एक बार एक कवि ने जब सब कुछ बेच खाया पर उसकी कविताएं नहीं बिकीं तो घर का आखिरी आइटम बेचने निकला जो कि चारपाई का एक पाया था। अतिरंजना के अभ्यस्त उस कवि ने गलियों में यह कहते हुए आवाज लगायी- 
खाट लो खाट,
सियरा नईंयां, पाटी नईंयां,
बीच का झकझोल नईंयां,
 चार में से तीन नईंयां
खाट लो खाट, खाट लो खाट
जाहिर है कि उसके बाद वे मुसद्दी लाल के यहाँ से भी चले आये क्योंकि उनके साथ भी कुछ कुछ ऐसी ही हालत थी।
       राष्ट्रपति के लिए सहमति बनाने निकले थे, वह तो नहीं बनी, प्रधानमंत्री का सवाल अलग से गले में हड्डी की तरह पड़ गया। नमाज छुड़ाने चले थे रोजे गले पड़ गये।
       फिर संयोग से उन्हें एक बना बनाया प्रत्याशी मिल गया जो प्रस्तावक, समर्थक तलाशे बिना पहले से ही अपने गले में माला डाले फिर रहा था। उसके घर के वोट ने साथ नहीं दिया था, उसकी पार्टी ने साथ नहीं दिया था पर वह प्रत्याशी बना घूम रहा था, सो उन्होंने सोचा कि चलो इसको ही समर्थन दे दो। ईसाई है तो क्या हुआ, नहीं करेंगे कुछ दिनों तक चर्चों पर हमले, नहीं जलायेंगे कुछ पादरियों को उनके मासूम बच्चों सहित जीप में, नहीं करेंगे धर्मांतरण के नाम पर ननों की हत्या कुछ दिन तक , पर लोग ये तो नहीं कह पायेंगे कि 2014 में सरकार बनाने के ख्वाब देख रहे थे एक ठो राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी भी नहीं तलाश पाये।
       वह तो टिका दिया पर अभी उपराष्ट्रपति का चुनाव बाकी है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629
    

शनिवार, जून 16, 2012

व्यंग्य- नये नामकरण करने वाले


व्यंग्य
नये नामकरण करने वाले
वीरेन्द्र जैन
       घर में पंडाल सजा हुआ था तथा अपने सबसे अच्छे समझे जाने वाले कपड़े पहिने लोग इधर से उधर हो रहे थे [फिर भी कहीं नहीं पहुँच पा रहे थे, गोया लोग न होकर मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए के सरकार हो]। बात यह थी कि घर में एक आयोजन था जिसे नामकरण संस्कार के नाम से जाना जाता है। अगर शेक्सपियर भी हिन्दुस्तानी होता तो वो भी ये नहीं कहता कि ‘नाम में क्या रखा है’। अरे भाई नाम में और कुछ रखा हो या न रखा हो कम से कम नामकरण संस्कार तो रखा ही है जिसमें सुन्दर स्वादिष्ट भोजन मिष्ठान्न के अलावा पण्डित को भरपूर दक्षिणा का सुख तो रखा ही है।
       मध्य प्रदेश में तो आजकल इसका महत्व बहुत ही बढ गया है। दर असल मध्य प्रदेश में अच्छे पंडित नहीं पाये जाते थे इसलिए प्रदेश की सरकार ने एक बिहारी पंडित का आयात कर लिया जो यहाँ के नासमझों को समझा रहा है कि नामकरण कैसे किया जाता है। उसने न केवल योजनाओं के ही नाम बदलवा दिये अपितु व्यक्तियों के नाम बदलवाने पर भी उतारू हो गया है। लाड़लीलक्ष्मी, कन्यादान, जलाभिषेक, बलराम योजना, से वही काम हो सकता है जो शिक्षा में सरस्वती शिशु मन्दिर के प्रवेश से हो सकता है, अर्थात शिक्षा का साम्प्रदायीकरण। उजाड़ मस्ज़िद को मन्दिर बनाने के पीछे धार्मिक कारण थोड़े ही होते हैं वो तो इसलिए किये जाते हैं ताकि अलग अलग समुदाय के लोग आपस में लड़ने लगें। रही मन्दिर की सो हजारों मन्दिर उजाड़ पड़े हैं जिनमें कोई दिया भी नहीं जलाता। इस बिहारी पंडित ने नामकरण के सिलसिले में नया शगूफा यह छोड़ा है कि उसने प्रदेश की राजधानी भोपाल नगर की प्रथम नागरिक अर्थात मेयर श्रीमती कृष्णा गौर से शुरुआत की है और उनका नाम कृष्णा गौर से कृष्णा यादव गौर कर दिया है। मजे की बात यह है यह काम उस राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक रहे व्यक्ति ने किया है जिसका दावा है कि वे जातिवाद का विरोध करने के लिए व्यक्तियों को उसके जातिसूचक उपनाम से पुकारे जाने की जगह उसके प्रथम नाम से पुकारते हैं जैसे के अटल बिहारी वाजपेयी को वाजपेयी जी न कह कर अटलजी कहते हैं। पर जबसे संघ मोदी के चरणों में शरणागत हुआ है तब से उसके अनुशासन का कचूमर बन गया है। इसलिए यह उम्मीद करना कि नामकरण पुराने तरीके से होगा, एक कोरी कल्पना से अधिक कुछ नहीं है।
       मैं सोचता हूं कि यह परम्परा और आगे बढेगी और इसका जो स्वरूप बनेगा वो कुछ कुछ निम्न प्रकार ही होगा- 
·         सुन्दरलाल पटवा का नाम सुन्दरलाल जैन पटवा हो जायेगा
·         शिवराज सिंह चौहान का नाम शिवराज सिंह कुर्मी चौहान हो जायेगा
·         ईश्वरदास रोहाणी का नाम ईश्वरदास सिन्धी रोहाणी हो जायेगा
·         बाबूलाल गौर का नाम बाबूलाल यादव गौर हो जायेगा
·         उमा शंकर गुप्ता का नाम उमाशंकर वैश्य गुप्ता हो जायेगा
·         कैलाश विजयवर्गीय का नाम कैलाश ब्राम्हण विजयवर्गीय हो जायेगा
·         सरताज सिंह का नाम सरताज सरदार सिंह हो सकता है
पर इस बिहारी पंडित को पिछड़ों व दलितों के नामकरण में बड़ी दिक्कतें आ सकती हैं। दलित उत्पीड़न का आरोप लगेगा तो जमानत तक नहीं होगी। जिन महिलाओं ने अंतर्जातीय विवाह के बाद अपना नाम नहीं बदला है उनके नाम में परेशानियां आयेंगीं। उमा भारती जैसी साध्वियाँ जो जब साध्वी के चोले में प्रगट होती हैं तो ‘जाति न पूछो साधु की’ वाला रूप रखती हैं किंतु जब चुनाव में खड़ी होती हैं तो लोधी हो जाती हैं, पता नहीं उनके साथ क्या होगा!
  रामलीला पार्टी को कुछ न कुछ स्वांग भरते रहना होता है, अगर इस में न उलझाये तो लोग पानी सड़क बिजली की बात करने लगते हैं।
वीरेन्द्र जैन
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व्यंग्य- कारन कवन नाथ मोहि मारा


व्यंग्य
कारन कवन नाथ मोहि मारा
वीरेन्द्र जैन
       संजय जोशी निकाल बाहर किये गये। और यह मामला गुपचुप नहीं हुआ, अपितु भरी सभा में हुआ। भीष्म, गुरुद्रोण बगैरह बगैरह सब देखते रह गये और द्रोपदी का चीर हरण हो गया। द्रोपदी का चीर तो कृष्ण ने बढा दिया था पर इस महाभारत की लीला में तो कोई लीलाधर सामने नहीं आया। जिन्होंने संजय जोशी को अन्दर किया था वे ही उसे आया है सो जायेगा, राजा, रंक, फकीर की तरह बाहर जाते देखते रहे। गालिब चचा कह गये हैं कि-
निकलना खल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिन
बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले
पर वहाँ एक कूचे के बाद दूसरी गलियाँ तो मिलती हैं, यहाँ तो जहाँ जहाँ गये वहाँ वहाँ से निकाले गये, मुम्बई से लखनऊ जाने के रास्ते को भी तय करने की कोशिश की गयी कि वो गुजरात से होकर न हो। हवा में गन्ध तक न पहुँचे। तानाशाह की शान में गुस्ताखी न पड़े। ऐसा हुआ भी पर जहाँ भेजा वहाँ भी नहीं रहने दिया गया। वहाँ से भी निकलना पड़ा। चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना। कश्मीरी पंडित तो राज्य के एक हिस्से को छोड़ कर दूसरे हिस्से में रह रहे हैं, उस पर इतनी हाय तोबा है कि सरकार को इन विस्थापित नागरिकों को गत दो दशक से  प्रतिमाह आर्थिक मदद दे रही है जो चार हजार रुपये प्रतिमाह, नौ किलो गेंहूँ, दो किलो चावल, और एक किलो चीनी तक सीमित है। धरती की जन्नत छोड़कर आने वालों को दस गुणा बारह का टीन की छत वाला एक आश्रय उपलब्ध कराया गया है। पर संजय जोशी को तो वह भी नहीं मिला। कश्मीरी पंडितों के लिए स्यापा करने वाले तो बहुत सारे रुदाले हैं पर संजय जोशी के लिए कोई आंसू नहीं बहा रहा कि कहीं मोदी न देख ले। अब वे घर के रहे न घाट के। जिन शिवराज सिंह चौहान का राजतिलक करवाया था वे भी मुँह में दही जमा कर बैठे रहे। जिन उमाभारती के साथ पार्टी में अन्दर किया गया था वे भी ध्यानमग्न हो गयीं।
       जो अपने साथी पर हुए अन्याय के खिलाफ आवाज नहीं उठा सके वे कहते हैं कि हम जनता के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएंगे। गर्वीले गुजरात ने मराठा साम्राज्य ध्वस्त कर दिया। अध्यक्ष ने विशेष अधिकार से सम्मेलन गुजरात में नहीं होने दिया था और अपने महाराष्ट्र में आयोजित किया, पर फिर भी चली गुजरात की।
       वैसे भाजपा में ये तो चलता ही रहता है,  यह तो मौल्लिचन्द्र शर्मा के समय से चला आ रहा है, बलराज मधोक ने तो बड़ों बड़ों के खिलाफ किताबें लिख मारी थीं पर दुर्भाग्य कि वे ब्रेल लिपि में नहीं थी और जिनकी दृष्टि बाँध दी गयी हो उन्हें क्या दिखता है? कल्याण सिंह का तो पता है, पर आज मदनलाल खुराना कहाँ हैं, उमाभारती भाजपा में तो चुहिया बनकर वापिस घुस गयीं पर उनके गुरू गोबिन्दाचार्य तो भटक भटक कर रामदेव को भजने को विवश हो गये हैं। थिंक टैंक से सड़ाँध आने लगी है। उमा भारती का भी मध्यप्रदेश निकाला हो गया है, खबरदार जो मध्यप्रदेश की धरती पर झांका। दूर से ही गाती रहो, ‘ये मेरे प्यारे वतन, ये मेरे उजड़े चमन, तुझ पर दिल कुर्बान’। अपने बीमार भाई और देव दर्शन का बहाना बना कर आना पड़ता है तब भी सरकारी सीआईडी सक्रिय रहती है।
       रामचरित मानस में बाली राम से पूछता है – मैं बैरी, सुग्रीव पियारा, कारन कवन नाथ मोहि मारा। बेचारे संजय जोशी तो यह भी नहीं पूछ पा रहे हैं। जिस मध्यप्रदेश की पुलिस से सीडी के बारे में क्लीनचिट मिली थी कहीं फिर से दबाव में आकर वही पुलिस ये न कह दे कि सीडी तो सही थी। ऐसी सीडियाँ आत्मा की तरह होती हैं जो कभी नष्ट नहीं होती भले ही उसके पात्रों को क्लीनचिट मिल गयी हो। जब क्लीनचिट मिलने के बाद भी बनवास झेलना पड़ा था तो दुबारा सीडी खुलने के बाद तो न जाने क्या होगा।
      
भले ही झूठी सही पर सवाल तो यह है कि सीडी बनवाई किसने थी और जिस सीडी को पार्टी की ही एक सरकार फर्जी बता रही है उस फर्जी काम को करवाने का सन्देही सबके सिर पर बैठ गया है। संस्कृत के एक श्लोक में कहा गया है कि जिसके पास पैसा है वही मनुष्य़ कुलीन है, वही विद्वान है, वही पंडित है, वही श्रोता है, वही गुणी है, वही सुदर्शनीय है, सारे के सारे गुण सोने में बसते हैं. [सर्वे गुणः कांचनं आसवंते]। गुजरात में आने वाली परियोजनाओं में पैसा ही पैसा है जनवरी, 2011 में महात्मा (गांधी) मंदिर में गुजरात के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी ने 100 देशों से आये 10,000 अंतर्राष्ट्रीय कारोबारियों के सम्मेलन की अध्यक्षता की थी। मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने गुजरात में 45,000 करोड़ डॉलर निवेश करने का वादा किया है। इसलिए भाजपा गुजरात को कबीर के हीरा पायो गाँठ, गठियाओ की तरह छोड़ना नहीं चाहती चाहे कुछ भी हो जाये इसलिए सारे गुण आजकल मोदी में बसते हैं, जिनके लिए संजय जोशी तो क्या अडवाणी तक को हकाला जा सकता है। नेतृत्व की हालत यह हो गयी है कि सौ सौ जूते खाँय, तमाशा घुस के देखेंगे। अडवाणीजी, प्रधानमंत्री बनें न बनें पर ब्लाग लेखक तो बन ही जायेंगे, ब्लागर्स की ओर से स्वागत है अडवाणीजी।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, मई 31, 2012

व्यंग्य- एक डायबिटिक द्वन्द


एक डायबिटिक द्वन्द
वीरेन्द्र जैन
कार्लमार्क्स का यह विश्लेषण पुराना पड़ गया है कि दुनिया दो ध्रुवों में बंटी हुयी है, एक मालिक ओर एक मजदूर, एक शोषक और एक शोषित। मुझे लगता है कि अब दुनिया जिन दो हिस्सों में बंट रही है उसे डायबिटिक और नानडायबिटिक का नाम देना पड़ेगा। एक वे जिन्हें डायबिटीज है और दूसरे वे जिन्हें डायबिटीज नहीं है। हॉं कल नहीं होगी ऐसा नहीं कहा जा सकता है।जिस दर से डायबिटीज के मरीज फल फूल रहे हें उसे देख कर तो लगता है कि थोड़े दिनों में बंटवारा बहुत साफ हो जायेगा।
      ऐसा नहीं है कि मुझे डायबिटीज हो गयी है इसलिए मैं चिंतित हूँ अपितु यह तो मेरा स्वभाव है कि शहर के अंदेशे में रहता ही रहा हूँ और इसी चिंता के कारण तो मुझे डायबिटीज हो गयी है। परसों मैंने यह खबर रामभरोसे को सुनायी तो उसकी आंखों में रहीम का दोहा नाली के पानी में मच्छरों के लारवा की तरह तैरने लगा।
      यों रहीम सुख होत है देख बढत निज गोत
      ज्यों बढरी अंखियॉं निरख अंखियन खों सुख होत
      वे खुश थे कि मैं उनकी जमात में शामिल हो गया था। प्रातःकाल की शीतल मंद बयार में जब निद्रादेवी की गोद और ज्यादा गुदगुदी लगती है तब मैं जूते पहिन कर सड़कें नाप रहा होंऊॅंगा। पड़ोस की लड़कियॉं कहेंगीं- अंकलजी आप भी घूमने जाने लगे! हमारे दादाजी भी जाते हैं। वे मुझे सीधे डेढ पीढी ऊपर चढा देंगीं और मैं कुढ कर रह जाऊंगा।
      जिन्हें डायबिटीज नहीं है वे शोषक हैं । वे फलों के राजा आम पर चाकू चला सकते हैं और उसे कली कली काट कर खा सकते हैं। दूध शक्कर में मथ कर मैंगोशेक बना सकते हैं या अपने दोनों होठों से दबा कर उसे प्यार से चूस सकते हैं तथा कई तरह के मधुर रसों में डूब सकते हैं। जिन्हें डायबिटीज है वे पहले कवि वियोगी की तरह तरस सकते हैं और आम के ठेले के पास से बेनियाज होकर कैफ भोपाली का वो शे’र गुनगुना सकते हैं-
      गुजरना उनकी गली से बेनियाजाना
      ये आशिकों की सियासत किसी को क्या मालूम
      पहले वे लीची के ठेले के पास खड़े होकर लीची का भाव पूछते थे व मंहगी होने के कारण बिना खरीदे रह जाते थे और तब गुस्सा मॅंहगाई पर आता था। अब तो उसका भाव ही नहीं पूछ सकते। अब वो ज्यादा याद आती है। हो सकता है कि सस्ती हो गयी हो पर क्या फायदा! चीकू के ठेले को आलू का ठेला मान लेते हैं।
      मिठाई की दुकान के बारे में पहले माना जाता था कि ऊॅंची दुकान शायद डायबिटीज वालों के लिए ही बनी हैं इसीलिए उसके पकवान फीके होते हैं पर बुरा हो इन डाक्टरों का जो ऊॅंची नीची किसी भी दुकान पर देख लें तो गांव की पाठशाला के गुरूजी की तरह कान उमेठने लगें। मिठाई का बाजार वेश्या की गली हो गया है। किसी नगर में मेहमानी करते हुये यह नहीं पूछ सकते कि आपके नगर की कौनसी चीज प्रसिद्ध है?  सारी चीजें तो शक्कर वाली ही होती हैं- मथुरा के पेड़े हों, आगरा का पेठा हो, हाथरस की खुरचन हो या गंगानगर की मिल्ककेक, सब तो शक्कर के विभिन्न अवतार हैं। इलाहाबाद के अमरूद मलीहाबाद का दशहरी, बालोद का चीकू, सब के सब शर्करा की वृद्धि कर मधुमेहवाणी करते रहते हैं कि यमराज भैंसे या पैसिंजर से नहीं बोईंग-707 से आ रहा है।
      पता नहीं अर्थशास्त्रियों का ध्यान इस पर गया है या नहीं कि भविष्य की अर्थव्यवस्था पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। मुझे तो भविष्य साफ दिख रहा है कि शक्कर के कारखाने बन्द होकर उनमें पैथोलाजी की प्रयोगषालाएं चल रही हैं या इन्सुलिन बनाने के कारखाने चल रहे हैं। हर फुटपाथ पर डायबिटोलोजिस्ट से लेकर डायटीशियन तक फट्टा बिछाये बैठे हैं। चाय काफी में शक्कर लेने के लिए अलग से आर्डर देना पड़ता है। गन्ने के खेत खत्म हो जाने से प्रेमी प्रमिका को पुराने मंदिर में मिलना पड़ता है जहॉं पहले ही हाउसफुल होने की नौबत है तथा सुविधा देने के लिए पुजारियों ने रेट बढा दिये हैं। महाराष्ट्र सरकार ने सहकारिता विभाग बन्द कर दिया है तथा राशन के दुकानदार शक्कर लिए बिना मिट्टी का तेल भी नहीं दे रहे हैं या अलग से पैसे चाह रहे हैं। शराब बनाने के लिए मोलएसस का अकाल पड़ गया है। अमरोहा सहित कई नगरों में मक्खियॉं कम हो गयी हैं तथा पर्यावरण को यथावत रखने के प्रति चिंतित रहने वाले एनजीओ एक और प्रजाति के कम हो जाने की चिंता को लेकर एक नया प्रोजेक्ट स्वीकृत करा रहे है जिसमें कई रिटायर्ड आइएएसों को काम मिल रहा है।
      बच्चे खुश हैं कि उनकी टाफी अब अंकल नहीं खा सकते। बड़े लोग अब आइसक्रीम दिलाने के लिए ज्यादा ना नुकर नहीं करते क्योंकि वे ही आह भर कर कहते हें कि अभी खा लो बाद में तो बन्द हो ही जाना है। बहुएं सोचती हें कि बूढा घूमने गया तो एक घन्टे के लिए तो शांति मिली नही तो चिचियाता रहता कि हमारे लिए बिना शक्कर की, हमारे लिए बिना शक्कर की। बिना डायबिटीज वाले लड़ाई के लिए ललकारते रहेंगे पर डायबिटीज वाले क्या खाकर लड़ेंगे! और लड़ेंगे भी तो उनके घाव भरने में हफ्तों लगेंगे जबकि बिना डायबिटीज वाले जख्म पर पपड़ी पाड़े दूसरे ही दिन खम्भ ठोकते नजर आयेंगे।
      हमारे विचारक जाने क्यों नहीं सोच रहे हैं वरना डायबिटीज से तो आर्थिक सामाजिक राजनीतिक धार्मिक वैज्ञानिक अवैज्ञानिक हर तरह से प्रभाव पड़ने वाला है। मैं अपने से ही जानता हूँ कि जब से डाक्टर ने मुझे डायबिटीज बतलायी है तब से मेरी तो दुनिया ही बदल गयी है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास  भोपाल म.प्र.
फोन 9425674629  


मंगलवार, मई 29, 2012

व्यंग्य - डरी हुयी दीदी का जमाना दुश्मन है


व्यंग्य
डरी हुयी दीदी का जमाना दुश्मन है
वीरेन्द्र जैन
      पुरानी फिल्मों का एक गाना था जिसे में गीत नहीं कहना चाहता क्योंकि मैं गीत और गाने में फर्क करता हूं। उसके बोल थे-
गोरी चलो न हंस की चाल, जमाना दुश्मन है
तेरी उमर है सोला साल, जमाना दुश्मन है
      पर जिसके बारे में सोच के मुझे ये गाना याद आया उसकी आंकड़ागत उम्र भले ही सोलह साल से साढे तीन गुना हो गयी हो पर बौद्धिक उम्र अभी भी सोलह साल से भी नीचे होगी। वैसे इस गाने के याद आने का उम्र से कोई ज्यादा वास्ता नहीं है, पर जमाने के दुश्मन हो जाने से है। और दुश्मनी भी प्यार मुहब्बत वाली नहीं अपितु खूनी दुश्मनी। जिसे फिल्मी भाषा में कहें तो जानी दुश्मन।
      जी हाँ मेरा आशय स्वयं को बंगाल की शेरनी कहलवाने वाली ममता दीदी से है जिन्होंने हिन्दी साहित्य में एक नया शब्द पैदा करवाया है दीदीगीरी। और इस दीदीगीरी के आगे प्रणव मुखर्जी की दादागीरी भी नहीं चल पाती। पर अब दीदी को भी लगने लगा है कि सारा जमाना उनका दुश्मन हो गया है। आसेतु हिमालय और अटक से कटक तक ही नहीं अपितु उत्तर कोरिया, वेनेजुएला, और हंगरी तक उनके खिलाफ हो गये हैं और उनकी जान लेने के लिए वित्तीय मदद कर रहे हैं। उनको लगता है कि उनकी जान के लिए बड़ी भारी सुपारी लगेगी और अकेले हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था में वह दम कहाँ रही इसलिए विदेशों से वित्तीय मदद ली जा रही है।ऐसा लगता है जैसे एक विश्वयुद्ध शुरू हो गया हो। दीदी के अनुसार इसमें पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की मदद ली जा रही है। उनके अनुसार खतरनाक स्थिति यह है कि माकपा और माओवादी जो आपस में एक दूसरे पर हिंसा का आरोप लगाते रहे हैं उन्होंने भी उनकी जान लेने के लिए हाथ मिला लिया है, अर्थात न मार्क्सवादियों के पास कोई राजनीतिक कार्यक्रम है न माओवादियों के पास। दोनों के पास इकलौता राजनीतिक कार्यक्रम यही रह गया है कि दीदी की जान ले लो। वैसे ही जैसे कि कभी दीदी का इकलौता कार्यक्रम मार्क्सवादियों का विरोध करना हुआ करता था इसीलिए वे मानती हैं कि मार्क्सवादी अब सब कुछ छोड़ कर उनकी जान के पीछे पड़ गये हैं।
      यह सचमुच चिंता का विषय लगता है कि मार्क्सवादी पहले वहाँ बंगाल में सत्ता में थे और अब दो प्रतिशत मत कम मिलने के कारण उनसे सत्ता छूट गयी है इसलिए वे इस तरह से सत्ता हथियाना  चाहते हैं, और कैसे नासमझ हैं कि  यह सत्ता पाकिस्तान की आईएसआई, वेनेजुएला, उत्तरी कोरिया, और हंगरी की मदद से यह काम दिल्ली की बड़ी सत्ता के लिए नहीं करते? सोचो तो बड़ा सोचो। दिल्ली में तो जब प्रधानमंत्री का पद थाली में रख कर मिल रहा था वह भी ठुकरा दिया था पर ममता दीदी की जान के पीछे पड़े हैं।
      वे ऐसे छूटी हुयी सत्ता को पाने का काम केरल में भी नहीं कर रहे, जहाँ केवल एक सीट से पिछड़ गये हैं क्या पाकिस्तान की आईएसआई , वेनेजुएला, हंगरी, और उत्तरी कोरिया का धन वहाँ तक नहीं पहुँच सकता। बेचारे ओमन चाण्डी को कोई खतरा नजर नहीं आता।
      दीदी को डरावने सपने आने लगे हैं। जिन माओवादियों की सहायता से उन्होंने सत्ता पायी थी अब वे ही उन्हें दुश्मन नजर आने लगे हैं। अगर कोई छात्रा एक सवाल पूछ दे तो वो उन्हें माओवादी नजर आती है। अगर टीवी प्रोग्राम में साक्षात्कारकर्ता कोई सवाल करे तो वे भाग जाती हैं। शोले फिल्म की घुड़दौड़ जैसा हाल हो गया है। यहाँ बसंती की जान खतरे में है। कार्टून डरा रहा है, अपनी ही पार्टी के सदस्य द्वारा लिखी गयी किताब डरा रही है जिसमें वो लिख देता है कि सिंगूर के अनशन के समय वे छुप कर चाकलेट खाती रही हैं। गीत लिखने वाला उनका सांसद गीत लिख कर डरा रहा है। कभी समर्थन देने वाली महास्वेता देवी डरा रही हैं। और तो और उनका ही रेल मंत्री डरा रहा है जिसे रेल बजट प्रस्तुत करने के बाद वे स्तीफा देने को कहती हैं। मारे गये माओवादी किशनजी का भूत भी उन्हें डराता होगा।   हो सकता है कि हिलेरी क्लिंटन भी उन्हें डराने आयी हों और अपना काम करके चली गयी हों। डरे हुए आदमी को अपनी ही छाया से डर लगने लगता है। वैसे तो वे अपनी जान को खुद ही देने के कई नाटक कर चुकी हैं। 1996 में उन्होंने कलकता के अलीपुर में आयोजित एक रैली में एक काले शाल को अपने गले में कस लिया था औरहजारों लोगों के सामने फाँसी लगा लेने की धमकी दी थी, पता नहीं तब कौन से देश ने उन्हें सहायता दी थी। बहरहाल कामरेड ज्योति बसु उन्हें नौटंकी कहते रहे हैं। 

      लगता है कि उनकी जान ही कुर्सी में छुपी हुयी है और कुर्सी पर आया खतरा उन्हें जान का खतरा लगने लगता है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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सोमवार, मई 14, 2012

व्यंग्य- पत्नी सी पत्नी, मामा सा मामा


व्यंग्य
पत्नी सी पत्नी मामा सा मामा
वीरेन्द्र जैन
      औपचारिक पत्नियों को देखते देखते बहुत दिन हो गये थे, पर पिछले दिनों एक खरी पत्नी जैसी पत्नी देखने को मिली तब समझ में आया कि तुमने कैसे ये मान लिया, धरती वीरों से खाली है । ये नकली पत्नियाँ बाहर बाहर तो ताजमहल के सामने वाली बेंच पर फोटो खिंचवाने वाली मुद्रा बनाये रहतीं हैं और अन्दर अपनी वाली पर आती रहती हैं। सन्दर्भित ‘पत्नी’ ने इस द्वैत को तोड़ दिया है। कवि ने कहा है-
तन गोरा मन सांवला, बगुले जैसा भेक
तासे तो कागा भला बाहर भीतर एक  
हुआ ये कि लोकायुक्त पुलिस ने बहुत दिनों बाद अंगड़ाई ली और भोपाल में एक मोटी मछली के यहाँ छापा मार दिया। छापे में उनकी उम्मीद से भी ज्यादा नोट निकलते चले गये, सोना, चाँदी, मकान, जमीन, शेयर, और न जाने क्या क्या निकला जो सौ सवा सौ करोड़ की सीमा को भी पार करता चला गया। यही वह अवसर था जब उस अफसर की पत्नी ने स्वाभाविक पत्नी धर्म का निर्वाह करते हुए लोकायुक्त पुलिस की क्लास ले डाली और उनसे सवाल किया कि हमारे यहाँ तो छापा मारते हो पर उस मंत्री के यहाँ छापा क्यों नहीं मारते जो हर महीने एक करोड़ रुपये लेता है। दृष्य देखने वाला ही रहा होगा जब पतिदेव महोदय उनके मुँह पर हाथ रखते हुए उन्हें घसीटकर अन्दर ले गये पर परम्परागत  पत्नी का मुँह तो पानी की लाइन में हुए लीकेज की तरह होता है जिसमें से एक बार निकलना शुरू होने के बाद शब्द की धार लगातार बहती रहती है। उसने चीख चीख कर पतिदेव से कहा कि मैं कहती थी कि सन्युक्त संचालक ही बने रहो, पर आप नहीं माने संचालक बन गये तो खुद फँस गये, जबकि बाँटना सबको पड़ता था। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में जिस गहराई से मन्दोदरी विलाप का चित्रण किया है उसे पढ कर तो सन्देह होने लगता है कि वे कथा में किसके पक्ष में हैं। ठीक उसी तरह एक ठीक ठाक तरह की पत्नी अपने राक्षस पति के पराभव पर याद दिलाती है कि उसने समय रहते कैसी कैसी समझाइशें दी थीं।
      ग्रहणी लिखने में लोग सामान्यतयः वर्तनी की भूल कर जाते हैं, उसे ‘गृहणी’ लिखते हैं जबकि मेरे अनुसार यह शब्द ग्रहण करने से बना होगा। वो एक बार पैसा ग्रहण कर ले तो वो उसका अपना हो जाता है और लूट के पैसे को जाते देख कर भी ऐसा लगता है कि जैसे खुद ही लुट गये। अफसर की पत्नी में अगर ईर्षा न हो तो उसका जीवन बेकार है, उसे अपने सौ सवा सौ करोड़ से ज्यादा तकलीफ अपने विभाग के मंत्री को एक करोड़ रुपये प्रतिमाह पँहुचाने पर होती रही है। हमारे तो लुट गये पर उसके सही सलामत हैं, उसका बालबाँका भी नहीं हुआ। क्या दुनिया है कमाये हमारा पति और मंत्री मुफ्त में ही लेता जाये। लुटे हमारा पति और मंत्री चैन करे। नौकरी हमारे पति की जाये और मंत्री को एक मलाईदार विभाग और मिल जाये। तेरी जय जय कार जमाने।
      अफसर के साथ एक बाबूनुमा आडिटर के घर पर भी छापा पड़ा जो सच्चा रामभक्त निकला। वह पूरे छपे के दौरान हँसता मुस्कराता रहा जैसे नानक के शब्दों में कह रहा हो कि-
 राम की चिड़ियाँ राम के खेत     
चुग लो चिड़ियाँ भर भर पेट
यह रहस्य बाद में खुला कि वह मामा का भी मामा है। नहीं समझे! अरे भाई अपने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का सगा मामा अर्थात पिता का साला। पहले मामा को मुख्यमंत्री के बंगले पर ही सेवा करने का मौका मिला था जहाँ उसने जरूरत से ज्यादा ही सेवा कर दी थी तो उसे खुला खेत चरने को भेज दिया गया था। इस रामभक्त ने कहा कि मैंने तो अपने मोबाइल की रिंगटोन भी रामजी करेंगे बेड़ा पार डाल रखी है। हमारा कुछ नहीं होगा। उसका अत्मविश्वास देखने लायक था।
      मामा को कुछ व्याकरणाचार्य माँ से जोड़ कर कहते हैं कि इस शब्द में दो मा हैं इसलिए यह दो माँ के बराबर होता है, पर गणित के लोग इसे गलत ठहराते हैं। वे कहते हैं कि दो माइनस मिल कर के प्लस में बदल जाते हैं और परिणाम को उलट देते हैं। किसी शायर ने कहा है-
दो माइनस मिलकर के होता है एक प्लस
जालिम दो बार ही कह दे नहीं नहीं
जब एक ही मामा से पूरा प्रदेश परेशान हो तब फिर मामाओं के भी मामा निकलते जायेंगे तो क्या होगा। पता नहीं अभी कितने मामा और बाकी हैं और उन मामाओं के भी और और मामा बाकी हैं।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629 

मंगलवार, मई 01, 2012

व्यंग्य - आधुनिक श्रवण कुमार और बुजर्गों की दृष्टि


व्यंग्य
आधुनिक श्रवण कुमार और बुजर्गों की दृष्टि
वीरेन्द्र जैन
      हमारे पुराण इतने सम्पन्न हैं कि आप अच्छा बुरा कुछ भी करें उसमें से प्रतीक तलाश सकते हैं। मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री जहाँ बच्चियों के मामा बनने की कोशिश करते हैं वहीं उनके विरोधी उनके कंस या शकुनि मामा होने का प्रतीक तलाश लाते हैं। विडम्बना यह है कि बढते कुपोषण, बेरोजगारी, लैंगिक भेदभाव, गैंग रेप की बढती घटनाओं में ये प्रतीक गलत भी नहीं लगता
                इन दिनों उन्हें श्रवण कुमार बनने की धुन सवार हुयी है। जब भी कहीं फिल्में ज्यादा बनने लगती हैं तो लोग नई नई भूमिकाएं तलाशने ही लगते हैं। पिछले दिनों मध्य प्रदेश में फिल्म गली गली में चोर है की शूटिंग हुयी थी, पता नहीं उन्हें इस फिल्म के लिए भी हमारे प्रदेश की गलियाँ ही क्यों उपयुक्त लगीं। भाजपा में आजकल जिसे देखो वही अडवाणी जी से आगे निकलने की कोशिश करने लगता है। अडवाणीजी ने डीसीएम टोयटा से यात्रा करके उसे रथ यात्रा कहा था तो शिवराज सिंह रेल से बुजर्गों को यात्रा कराने की योजना बना के उसमें एक ‘ती’ जोड़ के उसे तीरथ यात्रा योजना बना दिया। पर रथ यात्रा हो या तीरथ यात्रा असफलता दोनों के ही साथ लगी हुयी है। न अडवाणी राम बन पाये और न ही शिवराज श्रवण कुमार बन पायेंगे। वैसे भी कई दशरथ शिकार पर निकल पड़े हैं।
      श्रवण कुमार बनने में एक बात आड़े आती है। श्रवण कुमार के माता पिता अन्धे थे और वे अपने आप तीरथ करने नहीं जा सकते थे पर प्रदेश के बहुसंख्यक बुजर्ग चश्मा लगा कर साफ साफ देखते हैं, और उन्हें सारे ध्रुव तारे दिखाई देते हैं। लोकप्रिय कवि नीरज की पंक्तियाँ हैं-
मथुरा से काशी तक भटकी
बल्कल से मलमल तक धायी
पर बिल्कुल बेदाग कहीं भी
चादर कोई नजर न आयी
देखे संत महंत हजारों
परखे कलाकार कवि लाखों
लेकिन सबकी गोराई के
पीछे छुपी मिली कजराई
इसलिए यह उम्मीद करना कि तीरथ करने से दृष्टिवान लोग भी श्रवण कुमार के माँ बाप बन जायेंगे एक गलतफहमी है।
      इस तीरथ यात्रा योजना में धर्म के हिसाब से तीर्थ भी बाँट दिये गये हैं। धार्मिक ध्रुवीकरण की ये बारीक हरकत भी हमारे बुजर्गों को श्रवण कुमार के माँ बाप समझने के कारण की जा रही है। अजमेर शरीफ का चयन मुस्लिम तीर्थ की तरह किया गया है जबकि वहाँ जितने मुस्लिम तीर्थयात्री होते हैं उतने ही हिन्दू तीर्थ यात्री भी होते हैं। और यही बात तो संघ परिवार को पसन्द नहीं। अपने वश भर वहाँ बम विस्फोट भी करा दिये पर जाने वालों की संख्या में कमी नहीं आयी उल्टे विस्फोट कराने वाले पकड़ में आ गये और सारी कलई खुल गयी। जब उससे बात नहीं बनी सो मुफ्त तीर्थयात्रा का दाना डाल दिया गया। लोग अगर बँटेंगे नहीं तो भाजपा का क्या होगा!
      पहले बाबाओं को बुलाते थे और उनके सामने औंधे सीधे होकर भीड़ासन करते थे पर अब बाबाओं की भी कलई खुलती जा रही है, चाहे रामदेव हों या आशाराम सभी को दवाइयाँ बेचना है और जनता के पास कुछ भी खरीदने को कुछ नहीं बचा। यही कारण है कि सबकी फिल्में पिटने लगी हैं। ये एक अंतिम प्रयास है पर इतना तय है कि मुफ्त तीर्थ पर जाने वालों से न जा पाने वाले कहीं ज्यादा होंगे और दुआओं से बददुआएं अधिक मिलेंगीं। 
           वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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